Posted by: Rajesh Shukla | July 2, 2017

नोटबन्दी : डीमोनेटाइजेशन और दलाल मोदी 


पचास दिनों की नोटबंदी और भयंकर जन यंत्रणा के बाद मोदी सरकार से यह पूछना आवश्यक है कि यह इतनी अफरातफरी  में बलपूर्वक लागू किया गया डीमोनेटाइजेशन किसके हित में किया गया है ? यह अब तक की सरकार द्वारा उठाया गया एक मात्र कदम है जिसमें 109 लोगों की मृत्यु हुई है । पचास दिनों में पचास से अधिक बार नियम बदले गये और अनेकों बार बैंकों के अधिकारियों को इसके खिलाफ प्रदर्शन करना पड़ा । इन पचास दिनों तक जनता की मुसीबतें और उसकी दर्दनाक ब्रेकिंग न्यूज को सबने अपनी आँखों से देखा । कितनी ही शादियां टूटीं, कितने लोग हस्पताल में कैश उपलब्ध न होने के कारण मर गए ।  देश के किसानों की साल भर की कमाई में मोदी ने नोटबंदी करके मानो आग ही लगा दिया है, उनका उत्पाद बाजार में मिट्टी हो गया ! एक कुन्टल धान की कीमत 900 रूपये हो गई जो पिछले सीजन 1400 रूपये थी,  प्रति कुन्टल पर 600 रूपये का नुकसान हुआ किसानों का ? नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों को लैंड बिल द्वारा भूमिविहीन करना चाहती थी पर उसे असफल कर दिया गया, यह उनकी दूसरी चाल है जिसमें उन्हें बर्बाद करने की कोशिश की गई। अब पचास दिनों की नोटबंदी और इसकी विफलता के बाद इसका राजनीतिक लाभ भी मोदी जी लेना चाहते हैं? आपने बैंक की लाईन में मेरे लिए इतना कष्ट सहा, आप बर्बाद भी हुये -इसके लिए धन्यवाद!

डीमोनेटाइजेशन एक सतत प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत पिछली सरकार ने एटीम

, नेट बैंकिंग, ऑनलाइन खरीदारी और भुगतान जैसी सुविधाओं को शुरू किया था। जब यह प्रक्रिया चल ही रही थी और लोग स्वतः अपनी सुविधानुसार इसे अपना भी रहे थे तब फिर नरेन्द्र मोदी सरकार ने इसे जबर्दस्ती देश पर थोपने की कोशिश क्यों किया? डिमोनेटाइजेशन इतना आवश्यक क्यों हो गया कि बगैर इसके न तो विकास हो सकता था और न ही गरीब धनी बन सकता था? और फिर नोटबन्दी करके काले धन पर हमला का बहाना क्यों किया गया! और गरीब जनता का धन बैंकों में जमा करवा कर उन्हें ऑनलाइन विनिमय करने को बाध्य क्यों किया गया ? वास्तव में इस पूरी प्लानिंग में प्रधानमंत्री बैंकों का दलाल की भूमिका में थे, उनका न तो कालेधन से कोई लेना देना था और न ही देश की जनता के दुःख और पीड़ा से । बैंकिंग रैकेट के लिए खुलकर काम किया है पीएम नें और काले धन के नाम पर जनता एवं छोटे व्यापारियों का महती नुकसान किया गया है। यही काम एक दशक पहले पंजाब एन्ड सिंध बैंक नें अपने शुरुआत में किया था…याद है मुझे, लोगों का लाखों अकाउंट एक ड्राइव के तहत खुलवाया गया जिसमे लाखो डिमैट अकॉउंट भी थे, जब कई सौ हजार करोड़ बैंक में जमा हो गया फिर बैंक ने 3 महीने तक अकॉउंट का पैसा ही नहीं निकलने दिया। बैंक अधिकारियों ने बहाना बनाया कि बैंक का एटीम विदेश से आ रहा है लगने के बाद एटीएम से ही पैसे निकाले जा सकते है। उन दिनों एटीम एक नई बात थी। जनता परेशान थी लेकिन क्या करती ? इंतेजार के अतिरिक्त कोई दूसरा समाधान भी तो नहीं था। जनता का पैसा अवैध तरीके से सीज करके उससे बैंक नें पैसे कमाये और फिर तीन महीने बाद सबका खाता बहाल कर दिया गया। यही मोदी ने भी किया नोट बन्दी में !

मोदी ने आर्थिक बदहाली झेल रहे बैंको को उबारने का काम किया है,बैंकों ने 14 लाख करोड़ रुपये को बाजार में सर्कुलेट कर उससे न केवल अरबों कमाये बल्कि मोदी के समर्थक एक बड़े ठग रैकेट की मदद भी की है। यह आक्षेप निराधार नहीं है कि मोदी ने कुछ चन्द पूंजीपतियों के लिये 125 करोड़ जनता को 50 दिन लाईन में खड़ा कर के रखा। तथ्य यह भी है कि सरकार भी आर्थिक तंगहाली को झेल रही थी जिसको मोदी ने नोटबंदी में मॉसठगी द्वारा कम किया ? डीमोनेटाइजेशन और काले धन के नाम पर लोगों को सिर्फ  उल्लू बनाया गया ? इसमें क्या आश्चर्य है कि 50 दिन की मॉस ठगी के बाद पीएम हाऊसिंग लोन बाटने लगें और बैंक कुछ ब्याज कम करने की घोषणा करने लगें? #कर्जलेलो ,वास्तव में 14 लाख करोड़ की ठगी के बाद यह भी न हो तो फिर #DemonetizationDisaster का कोई अर्थ रह जाएगा?

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