Posted by: Rajesh Shukla | April 26, 2015

ऋतं च सत्यं च


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असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय –कठोपनिषद

जब किसी देश का आन्तरिक सामंजस्य बिगड़ता है अर्थात जब उस देश का भर्ग प्रकाश विरहित हो जाता है तब उस देश का विनाश हो जाता है, ऐसा दूरदृष्टि संपन्न ज्ञानियों का मानना है ! उस देश की जनता विकट संकटों में फंसती चली जाती है और उसका समाधान न तो अज्ञानता में बुरी तरह फंसा हुआ लालची पूजारी और बाबा कर सकता है और न ही वह अर्थ व्यवस्था जिसका आधार कर्ज है!  ऋण और व्याज आधारित एक दलाल अर्थव्यवस्था किसी भी तरह देश की जनता का भला नहीं कर सकती है ! यदि हम देखें तो व्याज शब्द का अर्थ होता है भाण, कपट, छल और यह दलाल अर्थव्यवस्था मूलभूत रूप से  इसी चीज की प्रसारक है ! भारत देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कपट और छल को जनता उस समय तो नहीं समझ पायी जब कार्पोरेट चैनलों नें कपट और छल का सहारा लेकर जनता को भ्रमित किया लेकिन अब एक साल बाद इस कपटी ,झूठा और ठोंगी नेता को जनता कमोवेश पहचान गयी है ! अनृत बहुत लम्बे समय तक नहीं टिकता, यह अनुभव से हम जानते हैं! अनृत में ऋत नहीं होता इसलिए यह स्पंदन करने में सक्षम नहीं! जब अंगेजी में हम इसे फार्ट कहते हैं तो उसका तात्पर्य यही होता है! खैर, चलिए इस पोस्ट को थोड़ा और अलग भारतीय ठंग से  लिखते हैं! इसको आध्यात्म से भी जोड़ते हैं लेकिन थोड़ा आधुनिक रूप में !

जब हम कहते हैं कि किसी मनुष्य पर नृऋति देवता सवार हैं तो इसका मतलब है उस व्यक्ति के जीवन में पग पग पर बाधा आ रही है ! इसका घंटा-घड़ियाल वाले पूजारी धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है, इसे हम फेनोमेनोलोजी और ऑन्टोलोजी द्वारा समझें तो शायद हम इसे बेहतर ठंग से समझ पायेंगे ! बाधा चार प्रकार की होती है –देश जन्य, काल जन्य , छंद जन्य और वस्तु जन्य ! जब ज्ञानी लोग कहते हैं कि उस देश में नहीं रहना चाहिए जहाँ का शासक और उसके साथ जुडा वर्ग अज्ञान का प्रसारक हो , झूठ और मिथ्यात्व द्वारा जनता को चुतिया बनाता हो, इसका मतलब कुछ तो होता है न ! क्योकि वहां की जनता उस तरह की है इसलिये उनका शासक भी उसी तरह का है ! ऐसे देश में किसी ज्ञानी ,साहित्कार , कवि , कलाकार जो अपनी अपनी अपनी  साधनाओं में लगे होते है उनके लिए बाधा स्वाभाविक है ! उन्हें उस देश में संकटों का सामना करना पड सकता है ! ऐसे देश में शुभत्व कमोवेश समाजिक जीवन से गायब होता है ! कुछ समय का भी प्रभाव उस देश पर होता है , समय ही ऐसा बनता है की लोगों की मति विपरीत दिशा में चलनें लगती है ! अनृत को ही सत्य समझा जाने लगता है ! दिल्ली में जनता नें अरविन्द केजरीवाल को चुना यह जानते हुए कि अरविन्द झूठे वायदे कर रहा है ! यह दिल्ली की जनता पर तमस का गहरा प्रभाव के कारण हुआ ! ऐसा  निर्णय जनता तब लेती है जब वह भ्रमित होती है या कुछ लोग संगठित होकर उन्हें भ्रमित करनें में सफल हो जाते हैं! ऐसे देश में रजस तो होता है लेकिन वह तमस के प्रभाव में रहता है इसलिए वह देश मूलभूत रूप से अनुत्पादक और अरचनात्मक होता है ! इस अन्धकारमय देश में सत्वगुणी प्रकृति के ज्ञानी , साहित्यकार , कवि  और  कलाकार दुःख को प्राप्त हो रहें है ! शास्त्रों में  इसीलिए कहा गया है कि उन्हें उस देश का परित्याग कर देना चाहिए और उस देश में रहना चाहिए जहाँ देश और समय दोनों उनके अनुकूल हों ! हमें जर्मनी में नाजिस्ज्म के समय को याद रखना चाहिए, जब वहां की जनता पर नृऋति सवार हुआ और देश मूढ़ वृत्ति से आक्रांत हुआ तो वहां के श्रेष्ठजनों नें उस देश का परित्याग कर दिया था ! सारे दार्शनिक, कवि और  वैज्ञानिकों नें अमेरिका इत्यादि देशों में शरण लिया था जिसका लाभ अमेरिका को हुआ जो अपने पूंजीवाद के सबसे रचनात्मक समय में था और उत्थान को प्राप्त हो रहा था! परमाणु बम भी अमेरिका में जर्मन नाजियों से त्रस्त होकर अमेरिका में शरण लेने वाले वैज्ञानिक नें ही बनाया था ! हलांकि आज अमेरिका वैसा नहीं रहा क्योकि अब वह तमस के गहरे प्रभाव में है और मूढ़ता ने समाज को जकड़ लिया है! एक अलग तरह का पागलपन व्याप्त है, पागलपन ऐसा कि लोग सपने में ही उठकर जनस्थानों पर जाकर गोली चलाने  लगते हैं ! अमेरिका फासिज्म की एक अलग तरह की प्रयोगशाळा बन गयी है जिसका भयानक परिणाम अमेरिकी समाज को भुगतना पड़ेगा ! समाज कुछ स्तरों पर भुगत भी रहा है लेकिन अभी इसका विस्फोट नहीं हुआ है!

जब व्यक्ति किसी  ऐसे देश में शरण लेता है जहाँ ऋत का प्रभाव होता है तो वह नृऋति से मुक्त होकर ऋति को प्राप्त हो जाता है !  ऋत के होने से ही ऋति होती है और ज्ञानभाष्वरता का विकास होता है ! इसी से जीवन में सत्य और ज्ञान का प्रकाश आता है और जीवन आनंद से परिपूर्ण बनता है ! जब तक नृऋति होता है तब तक  किसी देश की जनता का जीवन में छंद नहीं होता क्योकि मिथ्यात्व जीवन को ग्रस लेता है ! भारत देश में झूठ , व्यभिचार , मिथ्यात्व, भ्रष्टाचार , ठोंग , इन सबका गहरा प्रभाव है ! समाज कहीं न कहीं “पाप्माविद्ध” और “असुरविद्ध”  है, जन मानस में अनृत का वेध है! धर्म का भगवा लिवास में असुर जनता के भाव संस्कारों को अनृत से विद्ध कर रहे हैं ! ऐसे में धर्म कैसे टिक सकता है? भारत देश बलात्कार में विश्व में तीसरे स्थान पर है, वेश्यावृत्ति में तीसरे स्थान पर है! क्या यह भ्रष्टता धर्म और सत्य के रहने पर टिक सकती है? देश में 20 करोड़ लोग धर्म प्रचार में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं, धर्म की ध्वजा उठाये राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ की संख्या  इसमें जोड़ दें यह संख्या बड़ी हो जाएगी, फिर भी धर्म नदारद है !! इसका अर्थ है कि केवल असुर प्रवृत्तियों वाले लोगों से यह क्षेत्र भी विद्ध है जो केवल अनृत का प्रचार कर रहा है! यह देश इस बात का साक्षी है की कोई एक व्यक्ति जिसके भीतर सत्य ज़िंदा रहा है उसने समाज में ऋत का संचार किया है ! ये करोड़ों की संख्या में जो लालची, भौतिकवादी, वेश्यागामी बाबा उदारवाद के दौर में उपरायें हैं उन्होंने केवल अधर्म का विस्तार किया है ! कमसे कम से विगत बीस एक वर्षों में तो यह हुआ ही है ! इसका ओंटोलोजी से गहरा सम्बन्ध है ! यह समझने की बात है ! दूसरी तरफ भ्रष्ट पत्रकरिता करने वाले वुद्धिजीवी हैं जो व्याजखोर है और दलाल अर्थव्यवस्था के पोषक हैं ! इनका उपनिवेशवादी चित्त किसी वेश्या से भी गया गुजरा है ! एक अमेरिकी नें ट्विटर पर इस वेश्यावृत्ति के लिए प्रेस्टीटयूट शब्द का इस्तेमाल ठीक ही किया है! और आश्चर्य यह है कि प्रेस्टीटयूट लोग इसे अपना सम्मान समझते हैं ! जब लेखन व्याज अर्थात कपट और छल द्वारा विद्ध होता है तब वह वक्रगामी होकर भ्रष्ट हो जाता है! इससे न तो उसका और न ही देश की जनता का भला हो सकता है ! हम देख रहें कि किस तरह यह मध्यवर्ग लगातार भ्रष्ट हुआ है और लागातार समाज और देश की अवनति में योगदान दे रहा है ! देश और समाज की अवनति का क्रम बस्तूर जारी है और यह कपटी वर्ग अपनी वेश्यावृत्ति और चीयरलीडरई को रंडियों के शुक्रियाने का अंदाज में एक विद्रूपहंसीं के साथ स्वीकार करता है ! यदि हम एक तांत्रिक की तरह बात करें तो पूछेंगे, आखिरकार इस अशुभ वेध का उपाय क्या है? अशुभ नहीं है, इसका उपाय शुभ ही है ! ओजस्वी सच का जहर की तरह पर अशुभ के प्रति निरपेक्ष सन्धान ! ठीक उसी तरह जैसा नीत्शे नें दो शतक पूर्व किया था !
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