Posted by: Rajesh Shukla | April 23, 2015

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर दो शब्द


rare-pic-of-netaji-subhash-chandra-bose-with-adolf-hitlerनेताजी सुभाष चन्द्र बोस मुसोलिनी की तरह एक बुर्जुआ राष्ट्रवादी थे यह एक बात हई और नेताजी गाँधी-नेहरु-अम्बेडकर की तरह एक मानवतावादी थे और ब्रिटिश राज में नौकरशाह रह चूके नेताजी भारतीय अद्ध्यात्मिक-वैचारिक परम्परा में भी विश्वास करते थे यह दूसरी बात हुई! यदि हम उनकी महानता का निर्णय इन दो बातों के आधार पर करें तो हमें उनके व्यक्तित्व की कुछ खबर मिलेगी! हालिया की ख़बरों में यह बात सामने आई थी कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल नें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनके परिवार के पीछे खुफिया तंत्र को लगाया था! प्रश्न उठा कि इस देश भक्त के पीछे सरकार ने खुफिया तंत्र क्यों लगाया? इस सवाल का सीधा सम्बन्ध वर्तमान सरकार की राजनैतिक विचारधारा से है जिसने फासिस्ट राष्ट्रवादी विचारधारा को सदैव संदेह की नजरों से देखा था! गौरतलब है कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई का दौर द्वितीय विश्वयुद्ध का दौर भी था जिसे उदारवादी जनतंत्र की विचारधारा पर चलने वाले देश फासिस्ट विचारधारा पर चलने वाले देशों से लड़ रहे थे! गाँधी-नेहरु जिस उदारवादी सेक्युलर जनतंत्र की विचारधारा से जुड़े थे उस पर चलने वाले देश न केवल उदारवादी पूंजीवाद को मानने वाले देश थे बल्कि कम्युनिस्ट देश भी थे भले ही वे बुर्जुआ जनतंत्र के खिलाफ किसी न किसी क्रांति द्वारा अस्तित्व में आये थे ! एक तरफ उपनिवेशवाद के दौर की पूंजीवादी उदारवादी बुर्जुआ विचारधारा पर चलने वाले ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका और यूरोप के ज्यादातर देश थे तो दूसरी तरफ क्रांति के बाद पैदा हुए कुछ नए राष्ट्र सोवियत रूस जैसे थे जिनके सामने एक नई दुनिया पैदा करने का सपना था! फिर तीसरे छोर पर अतिवादी और मानवता विरोधी फासिस्ट विचारधाराएँ थी जिनका प्रतिनिधित्व मुसोलिनी और हिटलर कर रहे थे ! तीनों की अपनी अपनी राष्ट्रवाद की परिभाषाएं और विचारधाराएँ थीं ! बुर्जुआ जनतंत्र जिसे हम लिबरल जनतंत्र कहते हैं वह पूंजीवाद की विचारधारा है जिससे फासिज्म और कम्युनिज्म ये दो विचारधाराएँ अपने अपने स्तर से लड़ रहीं थीं लेकिन बनिस्बत इसके उस दौर में फासिज्म ही दोनों का असली दुश्मन था! कैपिटलिज्म नें पुनर्जागरण के बाद जिस आधुनिकता को जन्म दिया था फासिस्ट विचारधाराएँ उसके खिलाफ खड़ी थीं, ये मूलभूत रूप से प्रगति और एनलाईटेनमेंट विरोधी एक शहरी मध्यवर्ग की पेटी-बुर्जुआ विचाराधाराएँ थीं! हिटलर और मुसोलिनी के फासिज्म के खिलाफ दोनों विचारधाराओं अर्थात पूंजीवाद और मार्क्सवाद ने ही द्वितीय विश्वयुद्ध लड़ा और विजय हासिल की थी ! यह इतिहास है !

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक राष्ट्रवादी थे लेकिन उनका राष्ट्रवाद उधार का राष्ट्रवाद था जो उनके फासिस्ट महत्वाकांक्षा की उपज थी! हिटलर और मुसोलिनी दोनों ने ऐसे अनेकानेक लोगों को इन्स्पायर किया था जिसमें नेताजी अकेले नहीं थे ! राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता गोलवरकर से लेकर सावरकर तक सभी उनकी विचारधारा से ही प्रभावित थे! फर्क इतना था कि नेताजी मुसोलिनी की एक शुद्ध नकल थे और उसके फासिस्ट मिलिटरीज्म को ही सत्ता हासिल करने का बेहतर विकल्प मानते थे जबकि संघी नाजियों की तरह छद्मवादी थे, इन्होनें धार्मिक रूप धारण कर हिटलर के नाजिज्म का हिंदुत्व के साथ प्रयोग किया! संघियों को इसमें जितनी सफलता मिली उतनी नेताजी को नहीं मिली क्योकि भारतीय पेटी बुर्जुआ शायद उस मिटटी का नहीं था ! भारत में नेताजी का फासिस्ट प्रयोग एक बचकाना प्रयोग से ज्यादा नहीं कहा जा सकता है ! राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ फासिस्ट विचारधारा पर चलने वाला भारत का सबसे सफल संगठन है ! यह सफलता निःसंदेह उसे बगैर हिंदुत्व के नहीं मिल सकती थी इसलिए संघ हिंदुत्व का ठोंग करने और बेनकाब होने के बाद भी इसका त्याग कभी नहीं कर पाता है ! एक लिबरल जनतंत्र और उसका संविधान के अस्तित्व में आ जाने के बाद उस समय की सरकार का यह पुनीत कर्तव्य था की फासिस्ट विचारधारा द्वारा सत्ता की आकांक्षा पाले सुभाष चन्द्र बोस पर नजर रखी जाय! सदैव संदेहस्पस्द संघ नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी गृहमंत्री पटेल की नजर कोई कम नहीं थी!

हलांकि विचारधारा के स्तर पर गाँधी-नेहरु और पटेल का सामंती कन्जेर्वेटिव उदार हिंदूवादी समूह के बीच संघर्ष कोई कम नहीं था! इसका जिक्र राम चन्द्र गुहा नें अपनी किताब “इण्डिया आफ्टर गाँधी” में काफी रोचक ठंग से किया है! पटेल का सामंती कन्जेर्वेटिव हिंदूवाद महात्मा गाँधी से किस तरह जुड़ पाया यह एक अलग शोध का विषय है क्योकि गाँधी कई मामलों में बहुत हद तक एक प्रगतिवादी थे! बतौर गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल द्वारा सरकार में शीर्षस्थ पदाधिकारियों और सक्रेटरीज को गुप्त लिखा गया ख़त उन्हें कट्टरपंथीयों के ज्यादा करीब ले जाता है! उन्होंने अधिकारियों को लिखा था कि “भारत के मुसलमान विश्वास योग्य नहीं हैं! जो भी मुसलमान सरकार में हैं उनके हाथ में गुप्त सूचनायें नहीं पड़नी चाहिए!” पटेल की यह सामंती कन्जेर्वेटिव हिंदूवादी सोच न तो गाँधी से मिलती है और न ही नेहरु से, कमसे कम लिखित दस्तावेजों के आधार पर तो यह कहा ही जा सकता है ! राम चन्द्र गुहा नें एक दूसरी प्रमुख बात का भी जिक्र किया है कि कांग्रेस के भीतर दो वर्ग थे जिसमें सामंती कन्जेर्वेटिव हिंदूवादी समूह के नेता पटेल थे और प्रगतिवादी, सेक्युलर और समाजवादी समूह के नेता नेहरु थे! कांग्रेस में पटेल का ही पलड़ा भारी रहा, कम से कम उनकी मृत्यु तक तक तो रहा ही! जवाहर लाल नेहरु नें पार्टी में इस सामंती कन्जेर्वेटिव हिंदूवादी ट्रेंड के खिलाफ निर्णायक लड़ाई पटेल की मृत्यु के तुरंत बाद होने वाले चुनाव में लड़ी और उन्होंने इन तत्वों पर कमोवेश विजय प्राप्त हासिल किया !hqdefault

नेताजी और पटेल दोनों ही राष्ट्रवादी थे लेकिन उनका राष्ट्र्वाद कांग्रेस के किसी काम का नहीं था, इनकी सोच कांग्रेस की राजनैतिक प्रस्थापनाओं में कहीं भी ठीक नहीं बैठती थी! पटेल एंड कंपनी नें समाजवाद को लेकर नेहरु के खिलाफ जो मुहिम छेड़ रखा था उससे पता चलता है कि वे कांग्रेस लायक किसी भी तरह नहीं थे! उनकी सोच में उदात्त कुछ भी नहीं था! बनिस्बत इसके नेहरु नें कांग्रेस में इन्हें जोड़े रखा! इसके पीछे की कोम्प्लेक्सिटी एकमात्र यही थी कि सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक स्तरों पर इनका प्रभाव बहुत अधिक था! ज्यादातर आर्थिक समूहों पर तो उनकी ही चलती थी क्योकि ये समूह उन्हीं के क्षेत्रों से आते थे ! यह बहुत महत्वपूर्ण बात है जिससे नेहरु जिन्दगी भर लड़ते रहे! इन कंजर्वेटिव समूहों के कारण देश वह सब नहीं कर सका जिसका सपना आधुनिक राष्ट्रों नें संजोया था! संविधान निर्माता भीम राव अम्बेडकर की सोच निःसंदेह इनसे उन्नत थी और वे इनसे आधुनिक थे! हिन्दू धर्म और अध्यात्म के बारे में भी उनकी अवधारणाएं इनसे बेहतर थीं, और ऐसा इसलिए था क्योकिं वे एक दलित समाज का हिस्सा थे! जिस सत्तात्मक परिवर्तन का सपना उन्होंने देखा था उसके विरोध में ये सभी सामंती सोच वाले लोग खड़े थे! उनका कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा “आई एम फेड-अप विद दीज दकियानूस हिंदुत्व पीपल” कुछ ऐसा था ! इन सबके बीच नेताजी बोस राष्ट्रीय राजनैतिक विमर्श का हिस्सा नहीं रहे, वे एक एलियनेशन में अपने फासिस्ट मिलिटरिज्म का अभ्यास करते रहे! यह सब वायवी था! मीडिया द्वारा उनपर बहस करना और उन्हें न जाने क्या क्या बताना मूर्खतापूर्ण बात है! हिंदुत्व फासिस्ट लोगों के लिए निःसंदेह वे काम के हो सकते हैं यदि वे भी फासिस्ट मिलिटरिज्म को आजमाना चाहते हों, अन्यथा उन्हें राष्ट्रीय हीरो का दर्जा देना देश का ही अपमान है! ये मौकापरस्त पेटी बुर्जुआ व्यक्तित्व डस्टबिन की चीज हैं !

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