Posted by: Rajesh Shukla | December 22, 2014

हे हिंदुत्व के घृणा प्रचारक!


INDIA_-_Vhp_conversioni_(F)विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) नेता अशोक सिंघल ने रविवार को धर्मातरण के मुद्दे पर  कहा कि वीएचपी दुनिया के धर्मातरण के लिए नहीं बल्कि लोगों का दिल जीतने निकला है। परन्तु भाई मेरे!  यह कैसा दिल जीतना है कि  बल प्रयोग किया जाय या राशन कार्ड का ललच दिया जाय या नागरिकता का लालच देकर धर्म परिवर्तन किया जाय ?  क्या यह दिल जीतना किसी का बलात्कार से कम है ? क्या यह  धर्म परिवर्तन जैसी वाहियात चीज से ही संभव है ? और हे हिंदुत्व के घृणा प्रचारक !  क्या धर्म परिवर्तन जैसी कोई परम्परा हिन्दू धर्म में रही है? भगवान कृष्ण नें तो अर्जुन को भी नहीं कहा कि तू मेरे कहे अनुसार धर्म कर ! अट्ठारह अध्याय का भरा पूरा प्रवचन के बाद उन्होंने कहा ” यथेच्छसि तथा कुरु” -हे अर्जुन, तेरे समक्ष मैंने सत्य और असत्य का विस्तार से विवेचन किया, अब जैसी तेरी इच्छा वैसा ही कर। यदि हिन्दू धर्म को अच्छा समझ कर लोग आये तो हिन्दू धर्म का उत्थान होगा । वैष्णव भक्ति वेदांत प्रभुपाद नें हजारों अमेरिकियों को दीक्षित किया और उन्होंने प्यार से यह सब किया , बवाल से नहीं। बतौर  एक हिन्दू मुझे प्रभुपाद की तरह का धर्म परिवर्तन स्वीकार्य भी हो सकता है परन्तु यह  लूम्पेनिज्म तो मुझे हरगिज स्वीकार्य नहीं है। 

imagesइस तरह का धर्म परिवर्तन टिकाऊ भी नहीं है। पैसे से और बल पूर्वक धर्म परिवर्तन हर तरह से अवैध है। वह व्यक्ति जो पैसे के लिए धर्म परिवर्तन करता हो उसका धर्म ज्यादा पैसे देकर पुनः परिवर्तित किया जा सकता है। वास्तव में करवर्ज़न हिन्दू धर्म से किसी भी रूप में सम्बंधित नहीं है, यह एक ईसाई विचार है। हिन्दू धर्म में दीक्षा और अभिषेक करके व्यक्ति को किसी संप्रदाय में या किसी अन्य धर्म से सम्बंधित व्यक्ति को हिन्दू धर्म में दीक्षित किया जाता है।  हिन्दू धर्म में कन्वर्जन या धर्मान्तरण न कभी किया गया है और न कभी किया जायेगा ! राजनीतिक कन्वर्जन या धर्मान्तरण अपने स्वरूप में विस्तारवादी है , यह एक हिंसा है । यह व्यक्ति की व्यक्तिता का बलात्कार और हत्या है ! जिस तरह सम्राज्यवाद किसी देश का बाजार जीतता है और फिर उस देश को गुलाम बना लेता है उसी तरह का सम्राज्य्वाद इस तरह का राजनीतिक कन्वर्जन है । ईस्लाम  ने अपने  साम्राज्य्वाद  में ज्यादातर कन्वर्जन तलवार की धार पर ही किया है ! धर्म जब ऐसे लोगो का अस्त्र बनता है जिनका धर्म से दूर  दूर तक कोई लेना देना न हो तो धर्म मानवता पर कहर  बन कर  गिरता है !

ईसाईयत में यह राजनीतिक विचार ईसाई धर्म के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप अख्तियार कर लेने के बाद आया।  यदि ठीक से देखें तो ईसाई  धर्म में कन्वर्जन एक उदात्त धर्म दर्शन है । conversion-of-st-paulसेंट पॉल का कन्वर्सन कोई धर्म गुरु नहीं करता, उनका कन्वर्जन उनकी यात्रा के दौरान स्वयमेव होता है –वो पहले ही आध्यात्मिक स्तर पर इतने उठे हुए थे कि उनका एक एपिस्टल  के रूप में कन्वर्सन होना लाजमी था ।  न्यू टेस्टामेंट का एक्सोडस में उनके दैवी साक्षात्कार का जिक्र कुछ इस तरह है ” एक प्रकाश पुंज ने उन्हें आवृत्त कर लिया और वे निश्चेत होकर गिर पड़े फिर  एक दैवी वाणी नें उनसे कहा  ” जिसको यात्रा में  उनके साथियों ने भी देखा ! उस दैवी वाणी से सेंट पॉल नें पूछा “आप कौन हैं देव ? ” वाणी ने उत्तर दिया ” मैं जीसस हूँ , जिसको तुम दण्डित करते हो ! दामस्कस जाओ वहां तुम्हें ज्ञात होगा तुम्हे क्या करना है! ” यह एक आध्यात्मिक परिघटना है ! व्यक्ति का कन्वर्जन चाहे इस तरह का दिव्य आशीर्वाद द्वारा हो या फिर  धर्म गुरुओं द्वारा उसे यह ग्रेस रूप में मिले– दोनों तरह का धर्म परिवर्तन एक आध्यात्मिक बात है।  जॉन बैप्टिस्ट  नें कहा ” मैं पानी से बपतिस्मा देता हूँ लेकिन जो आने वाले हैं वह तुम्हे आग से बपतिस्मा देंगे !” इसमें भी कन्वर्जन का अर्थ उदात्त जीवन से है जिसे वह व्यक्ति ही  दे सकता है जिसने उस जीवन को भोगा हो । यह बपतिस्मा भी हिन्दुओं की दीक्षा जैसी ही  है ।  जीसस का “मैं तुम्हारा बपतिस्मा  पवित्र आत्मा द्वारा करूंगा !” हिन्दुओं का शक्तिपात दीक्षा जैसा ही है जिसमें व्यक्ति का पूर्ण से व्यक्तित्वांतरण हो जाता है ।  यही कन्वर्जन की मूल बात है ।  यह जो कट्टर हिंदुत्व लुम्पन तत्वों द्वारा धर्म परिवर्तन किया जा रहा है  वह एक राजनीतिक कन्वर्जन है! यह पाप कृत्य है जो न केवल हिन्दू धर्म के खिलाफ है बल्कि भारत के संविधान की मूल आत्मा के भी खिलाफ है ! वास्तव में यदि कन्वर्जन हो तो इस हिंदुत्व का ही सेक्युलर कन्वर्जन होना चाहिए !

दूसरी तरफ मोहन भगवत और अशोक सिंघल का यह कथन भी ठीक नहीं है कि “दिल्ली में 800 साल बाद एक स्वाभिमानी हिन्दू सत्ता में आया है।” यह  समस्त हिन्दू देश प्रेमियों का अपमान है ।  यह  उन देश के लिए निछावर हो जाने वाले हिन्दू वीरो की तौहीन है जिन्होंने प्राणों की आहुति देकर देश को स्वतन्त्र करवाया था ।  स्वतंत्रता के बाद भी कोई विदेशी नहीं था  सत्ता में ! न तो गांधी और नेहरू अन्य थे और न ही बल्लभ भाई पटेल और बाबा साहेब अम्बेडकर कोई मुसलमान । नरेंद्र मोदी ने किसी गैर हिन्दू की मूर्ति नहीं बनवायी है और न किसी गैर हिन्दू की समाधि पर फूल चढ़ाये थे ! हाँ यह कहते कि 800 साल बाद देश को सन 1947  में बाहरी लोगों से स्वतंत्रता प्राप्त हुयी थी तो शायद सबको स्वीकार हो जाता ! अपनी संकीर्ण धार्मिक सोच और गन्दे  भौतिकवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिन्दू धर्म  को नीचे न  गिरने दें और न ही हिन्दू को  नीचे गिरायें । हिंदु धर्म अपने उदात्त स्वरूप के कारण दुनिया के लोगों को आकर्षित करता है। हिन्दू धर्म में देवयान का विस्तार भी इसके उदात्त स्वरूप से ही निश्चित होता है। ऋचा स्वरूप हो जाना  ही हिन्दू की एकमात्र नियति है ! ऋषियों के इस देश में यह बाजारू राजनीतिक धर्म परिवर्तन  स्वीकार्य नहीं है !



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note: इस कन्वर्जन में देखिये, भगवा भेष में ये गुंडे क्या वैदिक मन्त्र पढ़ रहे हैं ? यज्ञ कुण्ड तक नहीं बनाया है ईंटा सजा करके  कर रहे है ! ये तो राक्षसों से भी बदतर हैं , कम से कम वो भी विधियों का त्याग नहीं करते थे ! ये हिन्दू धर्म का अपमान कर रहे हैं ! पूछना जरूरी है कि  कन्वर्जन का कौन सा वैदिक मन्त्र  ये चोट्टे पढ़ते हैं और किस स्वर में पढ़ते हैं  !!

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