Posted by: Rajesh Shukla | November 15, 2014

सेल्फ़ी वाला पीएम


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नरेंद्र मोदी क्या चाहते हैं, यह केवल उनको ही  स्पष्ट नहीं है जो अस्पष्ट दिमाग रखते हैं! हर व्यक्ति का मूल्यांकन उसके अतीत के आधार पर ही होता हैं, यह बात राजकिशोर के राष्ट्रीय  सहारा में लिखे लेख “मोदी के भीतर एक और मोदी” के ठीक उलट है और इसकी ताकीद स्वयं नरेंद्र मोदी करते हैं ! उन्होंने जनता से वोट भी अपने अतीत के आधार पर ही, पूर्व में किये गए कर्मों पर ही माँगा । गोधरा दंगा सेक्युलर लोगों के लिए जघन्य अपराध था लेकिन मोदी ने इसे कभी अपराध नहीं माना। उन्होनें इसका उपयोग हिंदुत्व का हीरो की छवि निर्मित करने में किया और उसे भुनाया भी । उनका अतीत का जीवन दो धरातल पर निर्मित हुआ है- एक संघ कार्यकर्ता के बतौर दूसरा बतौर गुजरात मुख्यमंत्री। अतीत के खोल से बाहर निकलना आसान नहीं होता चाहे वह अतीत कैसा भी हो। यह ध्यान रहे कि संघ  में मात्र सदस्य  नहीं होते  बल्कि उनका सम्बन्ध एक सम्बन्धी का होता है। संघ  में आने वालों के साथ खून का रिश्ता होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है। नरेंद्र मोदी संघ की निर्मिती हैं उनमें संघ बसता है , संघ की  सोच उनके अस्तित्व में  घुलमिलकर एक रस हो गयी है ! इसलिए इस अतीत से मुक्ति का प्रश्न ही कहाँ उपस्थित होता है ! यदि स्तंभकार मोदी को इससे मुक्त एक राष्ट्रवादी के रूप में देखने की  कोशिस करता है तो वह एक मुर्ख ही है !  और क्या कोई अपने अच्छे अतीत से भी बाहर निकलना चाहता है ? नही ! फिर भी यदि मोदी अतीत से बाहर निकलना चाहते हैं तो अब किस अतीत से ?

अतीत को सदैव एक नकारात्मंक संदर्भ में देखा जाता है। हर कोई अतीत की अपनी बुरी परछाइयों से ही मुक्त होना चाहता है और अतीत की अच्छी छवियों से जुड़ा रहना चाहता है। नरेंद्र मोदी ने  गुजरात मुख्यमंत्री के रूप में अपनी एक सकारात्मक, अच्छी और विकासवादी छवि को ब्रांड मोदी कहकर बेचा और उस छवि से पिण्ड छुड़ाने की हर तरह की  कोशिस की है जिसे कटटर हिंदुत्ववादी छवि से जोड़ा जाता है । लेकिन इन सबके बीच उन्होंने संघ से मुक्त होने की कोई मनसा नहीं जाहिर की है! दूसरी तरफ एक हिपोक्रिसी भी हम देखते हैं। यह कि क्या  मोदी ने अपनी  हिंदुत्व से समझौता न करने वाले एक लिबरल की छवि बनाने की चेष्टाओं में कोई कमी की है ? बगैर समझौता किये हुए इस छवि को प्रभावी बनाने के लिए वो सब कुछ कर रहे हैं । यह आक्षेप उन पर विश्व मीडिया ने उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद लगाया कि “मोदी का इधर बीच हुए दंगों पर महामौन उनके हिंदुत्ववादी छवि को ही पुख्ता करता है बनिस्बत इसके की वे  सबको एक साथ ले कर चलने वाली सरकार की बात करते हैं ! वे  सबके प्रधानमंत्री नहीं हैं !” समावेशी विकास का  नारा के  साथ नरेंद्र मोदी जी ने भाजपा की मेंबरशिप अभियान की शुरुआत करते हुये पुनः हिंदुत्व का एक लिबरल-सेक्युलर  दृष्टिकोण को दोहराया  “” भाजपा के गुलदस्ते में हर रंग के फूल होने चाहिए!.” और यह हिंदुत्व के दंगों, लव-जिहाद और हिन्दूराष्ट्र के प्रोजेक्ट के बीच ? और आश्चर्य यह है कि प्रधानमन्त्री की हिंदुत्व सेक्युलर भाजपा शासित प्रदेशो में किसी माइनॉरिटी वर्ग का किसी तरह का प्रतिनिधित्व नहीं है ! पिछले २०१४ लोक सभा चुनाव में भाजपा ने १९% मुसलमान जनसँख्या वाले उत्तर प्रदेश में  किसी मुसलमान को कोई टिकट नहीं दिया था । अन्य भाजपा शासित  राज्यों गुजरात , राजस्थान , छत्तीसगढ़ इत्यादि में भी अल्पसंख्यक  का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है ।

आश्चर्य इस बात का है कि प्रतिष्ठित पत्रकार तक इस बात को नजरअंदाज करते हैं और भाजपा की तुलना सेक्युलर कांग्रेस से करते हैं । प्रतिष्ठित पत्रकार सेक्युलरिज़्म का मुद्दा को  सिख दंगो से  तत्काल डिल्यूट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते -विद देयर प्रो-नाजिज्म नेचुरल निहिलिज्म : “बोथ आर सेम “? हिन्दुत्ववादी समय में न्यूज चैनलों में एक चीयरलीडर पत्रकारों की जमात का भी जन्म हुआ है जो हिंदुत्ववादी और कट्टर सोच रखते हैं, ये बीमार चित्त चीयरलीडर पत्रकार नरेंद्र मोदी के बड़े भक्त हैं और उनकी हर की तरह गलतियों और दुष्टताओं को झाल-करताल के साथ राष्टहित में किया गया काम बतलाते हैं । अम्बानी न्यूज  चैनल के चीयरलीडर पत्रकार तो शुद्ध पत्रकारीय  वेश्यावृत्ति कर रहे हैं । ये नरेंद्र मोदी के झूठ के झंडाबरदार हैं। इन सबके बीच मोदी ने महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण तक को राष्ट्रिय स्वयंसेवक की विचारधारा से जोड़ डाला, कांग्रेस के दिग्गज नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल  को संघ में समाहित कर उनकी 2500 करोड़ रूपये लागत की मूर्ति तक बनवा डाली । मजेदार बात यह है कि नरेंद्र मोदी अपना हर अभियान कांग्रेस पार्टी या गैर संघ आइकॉन के नाम पर ही कर रहे हैं । मोदी के अब तक के तीन बड़े कार्यक्रम कांग्रेस और अन्य नेताओं के नाम पर ही हुए हैं–पटेल मूर्ति उद्घाटन और प्रोपगेंडा कांग्रेस के पटेल जी के नाम पर , स्वच्छ भारत अभियान कांगेस के गांधी जी के नाम पर ,सांसद ग्राम योजना जय प्रकाश नारायण का नाम लेकर!!

अपने पिताजीओं की करतूत पर मोदी को शर्म क्यों आ रही है ? हेडगेवार, गोलवलकर , और सावरकर की भक्ति  में कोई सार नजर नहीं आया तो गांधी और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा पर चलनें की प्रतिबद्धता जताते हुए झाड़ू लेकर “स्वच्छ भारत अभियान ” की शुरुआत कर डाली जो अंत में एक हिपोक्रेसी ही निकला ! इसे राजकिशोर जैसे भक्तों नें  भारत के इतिहास में इसे एक  अभूतपूर्व घटना बतलाकर जयजयकार के नारे लगाये ! नीता अम्बानी ने भी देश साफ करने का यह शुभ मौका अपने हाथ से नहीं जाने दिया, लेकिन साथ में गंगा नहाना भी नहीं भूली अर्थात एक साथ दो महापुण्य अर्जित किये! यह मोदी की महिमा है ! मोदी की महिमा इस अर्थ में अद्भुत है की व्होर्स यकायक धार्मिकचेतना से भरपुर होने लगीं, गंगा नहाने जाने लगीं और राष्ट्रभक्ति ऐसी उमड़ी की फिर पूछो ही मत !प्रीति जिंटा ने गंगा नहाने और मोदी का जयकारा लगाने के बाद सिनेमा हॉल में एक व्यक्ति के साथ वही  किया जो हिंदुत्व के गुंडे हर कहीं करते दिख जाते हैं। मोदी का हिंदुत्व बतौर नाजिज्म अज्ञानता का राष्ट्रवाद और अज्ञानता का ही साम्राज्यवाद है जिसमें व्होर्स के कैप्चर होने की गुंजाईश सबसे ज्यादा है। देश की जनता को यह सब स्पष्ट दिख रहा है–मोदी अपने आदर्श गाय-ग्राम और एफडीआई का राष्ट्रवाद इन दोनों से जनता को अब तक किसी तरह की कोई राहत नहीं दे पाये हैं । राहत के नाम पर जनता को झूठी चेतना से भरपूर सेल्फ़ी है और झूठे  राष्ट्रवादी प्रवचन हैं । मोदी भक्तों से पूछो तुम्हारे पास क्या है ? तो उत्तर देंगे ” हमारे पास मोदी की सेल्फ़ी है !” मोदी सेल्फ़ी वाला पीएम  हैं ! अब इंस्टाग्राम से इंस्टेंट फोटो भी मोदी भेजने लगे हैं, सब कुछ, सारा विकास  फोटो में है –स्पेक्टेकल !! (भौकाल)

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