Posted by: Rajesh Shukla | August 4, 2014

सत्ता का केन्द्र: पीएमओ या परमधाम नागपुर


images (1)
देश राजनैतिक गलियारों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि वस्तुतः सत्ता का केन्द्र पीएमओ है या परमधाम नागपुर है‍‌‍? यह सवाल बुद्धिजीवी समाज भी पुनः पूछने लगा है। लेकिन क्यों, जबकि बुद्धिजीवी समाज को यह पहले से ज्ञात है कि नरेन्द्र मोदी और संघ में कोई अन्तर नहीं हैं?  यही सबसे बडी दुविधा दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी जन की है जो सच को स्वीकारना नहीं चाहते। यदि मोदी जी संघ से मुक्त होकर अपना निर्णय ले सकने में सक्षम हैं तो नरेंद्र मोदी ने बीजेपी नेताओं संग बैठक के बाद सरकार,पार्टी और संघ में तालमेल बिठाने के लिए 4 सदस्‍यीय कमेटी क्यों बनाई है? खबर के अनुसार इस नागपुर कमेटी में खुद मोदी के अलावा अरुण जेटली, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह शामिल होंगे। गौरतलब है कि यह नागपुर कमेटी कोई ऐसी-वैसी कमेटी नहीं कही जा सकती क्योंकि इसमें देश के प्रधानमंत्री समेत चारों बडे कैबिनेट मंत्रीं शामिल हैं। क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पकड भाजपा पर अब ज्यादा शक्तिशाली हो गई है॑ या संघ अपनी पकड को और भी मजबूत करने की कोशिस कर रहा है? गौरतलब है कि संघ के स्पोक्स परसन राम माधव और अन्य ऐसे तेज तर्रार लोगो को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हाल ही में राजनीतिक कोर में स्थानान्तरित किया है। यह कुछ नयी बात है-मतलब सत्ता का केन्द्र को लेकर  अब ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिये !।  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तो अब भाजपा की क्लास भी लेने लगा है। अभी कुछ दिन पहले ही भाजपा के नेताओं की क्लास ली गई है जिसपर जावडेकर जी नें सफाई दी थी कि यह एक रूटीन बैठक थी। यह कोई नई बात नहीं है यह पहले भी होती थी बस बात इतनी है कि पहले यह गुपचुप ठंग से होतीं थी जबकि अब यह खुलेआम होती है। इसमें कोई सन्देह की गुन्जाईश नहीं है क्योकि मूलभूत रूप से भाजपा संघ की ही पॉलिसी पर चलती है। भाजपा एक शातिर दो मुहाँ साँप की तरह  है – एक  मुँह संघ की आवाज़ बोलता है  है तो दूसरा एक जनतांत्रिक राजनीति के अनुसार बोलता है। इसने जनता को सदैव कन्फ्यूज किया है। आश्चर्य यह है कि बहुत से पत्रकार न केवल भाजपा का दो मुँहेपन से कन्फ्यूज होते हैं बल्कि जनता को भी कन्फ्यूज करने लगे हैं। भाजपा स्पष्ट करना चाहिये “ हू स्पीक्स फ्रोम देयर माऊथ “ ‍?

images

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्वदेशी अर्थव्यवस्था का दर्शन को मुक्त अर्थव्यवस्था का उदारवादी दर्शन के विचारक भले ही प्रासंगिक नहीं मानते हो लेकिन यह दर्शन पुनः सामने आ खडा हुआ है। संघ के विचारको ने एक समय अपनी राष्ट्रवादी सोच और स्वदेशी अर्थव्यवस्था का दर्शन के कारण विश्व व्यापार संगठन समझौता (WTO) का विरोध किया था और अब हम इसको मुखर रूप में देख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विश्व व्यापार संगठन पर हालिया में लिये गये नीतिगत निर्णयों को संघ के विरोध की छाप के रूप में देखा जा सकता हैं | मोदी सरकार नें खाद्यान्न सुरक्षा की वकालत बताते हुए विश्व व्यापार संगठन के समझौते को पारित होने से रोक दिया है। यह अलग बात है कि परिदृष्य दूसरा है विश्व व्यापार संगठन का विरोध ब्रिक्स देशों की बैठक और ब्रिक्स बैंक के आस्तित्व में आने के बाद हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विष्लेषणकारों के अनुसार यह विदेश नीति मे एक बडे परिवर्तन का संकेत है। किस तरह का परिवर्तन यह स्पष्ट नहीं है सिवाय इसके कि ब्रिक्स बैंक शंघाई में होगा अर्थात विश्वबैंक अब केन्द्र नहीं रह जायेगा अर्थात युरो-अमेरिकी जोन अब केन्द्र नहीं रह जायेंगा। केन्द्र में होंगे चीन और भारत?  नरेन्द्र मोदी ने यह स्पष्ट संकेत जरूर दिया है कि अब भारत अमेरीका नियंत्रित संगठनों से मुक्ति चाहता है। क्या इस नितिगत निर्णय में भी संघ का कोई प्रभाव था?  इस बावत कुछ भी निश्चित रूप से नही कहा जा सकता है। यह हम स्पष्ट रूप से जानते हैं कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने स्वदेशी एजेंडा का त्याग कर मुक्त अर्थव्यवस्था को  स्वीकार किया है और यहां तक कि डिफेंस में १००% विदेश निवेश तक को स्वीकार किया किया है! संघ की तरफ से नागपुर से प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया “यह हमें इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाएगा और हमारी सेक्योरिटी को मजबूत करेगा। देश क्यों आयात करे जब वह इसका निर्माण खुद कर सकता है”|  लेकिन इस स्वीकारोक्ति के बाद संघ ने जीएम फसलों का फील्ड ट्रायल के बावत जो कुछ किया उससे कई तरह के सवाल सामने खडे होते है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संघ के हस्तक्षेप के बाद सरकार की तरफ से स्पष्ट कहा है कि सरकार ने जेनेटिक इंजिनियरिंग अप्रेजल कमिटी की ओर से 13 जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) क्रॉप्स के फील्ड ट्रायल की मंजूरी को टालने का फैसला किया है। क्या जीएम फसलों के ट्रायल पर नरेंद्र मोदी सरकार ने संघ के आगे घुटने टेक दिए हैं? क्या यह निर्णय देश हित मे लिया गया है।

पहले यह बात सामने आयी थी कि संघ परिवार की आर्थिक शाखा स्वदेशी जागरण मंच के पास नरेंद्र मोदी सरकार के लिए पूरा एजेंडा है। इसमें एफडीआई पर श्वेत पत्र लाना, जीएम फसलों का फील्ड ट्रायल रोकना और शिक्षा के क्षेत्र में नई शुरुआत  जैसे कदम शामिल हैं। अर्थात क्या संघ और मोदी में पॉलिसी को लेकर टकराव वास्तविक है तब जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मुक्त अर्थव्यवस्था का दर्शन को ही विकास का का असली दर्शन मान चुका है? या यह विरोध एक ठोंग मात्र है ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हालिया के अपने एक भाषण से तो यह स्पष्ट होता है कि वे लैब से लैण्ड तक का दर्शन को ही प्राथमिकता देने के पक्ष में है। क्या मोदी जी का लैब से लैण्ड स्वदेशी है? या मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा विकसित  डिसास्टर! सरकार द्वारा जीएम  क्रॉप्स के फील्ड ट्रायल की मंजूरी को टालने का फैसला इधर बीच सबसे बडी खबरों में एक है जिस पर अभी तक तर्कसंगत चर्चा नहीं हुई है। व्यक्ति का स्व-स्वातंत्र्य, उसकी राजनैतिक स्वतंत्रता मूलभूत रूप देश की आर्थिक स्वतंत्रता से जुडी होती है लेकिन उदारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था के इस दौर में क्या संघ या स्वदेशी जागरण मंच अपनी पॉलिसी को आगे बढा पायेगा? क्योंकि सवाल फिर भी वहीं है कि आर्थिक स्वायत्तता के बगैर कोई भी देश स्वयं को सम्प्रभु नहीं कह सकता है ।

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Categories

%d bloggers like this: