Posted by: Rajesh Shukla | June 26, 2014

उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में संघीस्वराज


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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ विचारधारात्मक स्तर पर भले ही एक आदर्शवादी संगठन हो लेकिन अपनी राजनीति और संगठनात्मक विस्तार में यह किसी वामपंथी क्रन्तिकारी संगठन से काम नहीं रहा है । ऐसा भी नहीं है की संघ अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा की आदर्शवादिता का कोई बेहतर आदर्श सामने रखता हो। यह मूलभूत रूप से समझौतावादी और मौकापरस्त संगठन रहा है जिसकी पुष्टि इसका ८५ साल से अधिक पुराना इतिहास करता है। राजनीति में यह भौतिकवादियों की तरह यथार्थवादी और अन्य पार्टियों से ज्यादा व्यावहारिक रहा है। अपनी राजनैतिक गत्यात्मकता को संघ ने लगातार धारदार बनाया है, भौतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ठाला है और सदैव आगे ही बढ़ा है । यह सबको ज्ञात है कि जब तक नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक उन्होंने संघ को गुजरात में प्रभावी नहीं होने दिया बल्कि कितने ही संघ के दिग्गजों को किनारे लगाया। संघ से उनके सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं रहे है लेकिन स्थितियां शायद अब वैसी ही नहीं है । मोदी अंतराष्ट्रीय पूंजी  का दबाव में काम करने को बाध्य होंगे और दूसरी तरफ संघ की आर्थिक  पॉलिसी बदल जाने से यह टकराव  शायद अब न हो | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सत्ता लोलुपता अब बढ़ गयी है ! संघ ने समझौता किया है और उसी नरेन्द्र मोदी को आगे ले आया जिससे वह पीड़ित था, यह हमने विगत चुनाव में देखा ! नरेंद्र मोदी को अपना राष्ट्रीय नेता स्वीकार कर संघ ने वास्तव में अपनी आर्थिक विचारधारा के स्तर पर समझौता किया, संघ ने मोदी की उस आर्थिक विचारधारा को स्वीकार किया जो संघ की स्वदेशी अर्थव्यवस्था की विचारधारा से बहुत अलग है।अर्थव्यस्था और उससे सम्बंधित पॉलिसी को लेकर दो धराये दक्षिण पंथ में शुरू से रही है; यह बात एनडीए -1 सरकार में स्पष्ट रूप से सामने आया था। यदि हम याद करें तो एनडीए-१ में एक घमासान वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच उदारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था और स्वदेशी अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर हुआ था जिसमे भाजपा को संघ के सामने घुटने टेकने पड़े थे। संघ जहां एफडीआई और मुक्त अर्थव्यवस्था की विरोधी था वहीं उस समय वित्तमन्त्री रहे यशवंत सिन्हा मुक्त अर्थव्यवस्था के हिमायती थे और उसके अनुसार ही अपनी पॉलिसी सामने रखते रहे। जिसका संघ ने न केवल विरोध किया था बल्कि यशवंत सिन्हा से वित्त मंत्रालय छीन लिया गया और संघ के ज्यादा करीब रहे जसवंत सिंह को दिया गया । संघ और  भाजपा ने उस समय बीच का रास्ता निकाला था !uiui

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दबाव में भाजपा की एनडीए सरकार ने उस समय इंश्योरेंस और शिक्षा जैसे सेक्टर में २६% से ज्यादा एफडीआई न लाने का वादा किया और सरकार चलती रही। जबकि दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार की आर्थिक पॉलिसी पर संघ अपना कोई प्रभाव नहीं लगा पाया था। मोदी ने विदेश निवेश को दिल खोल कर आमंत्रित किया और विदेशी निवेशकों की ईच्छानुसार अर्थव्यवस्था को विकसित किया। जिसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि राज्य में उत्पादन की छोटी इकाइयां, लघु उद्योग बंद होते चले गए और राज्य की पूरी इकनॉमी उपभोग केंद्रित हो गई। गुजरात में दो दशको में आर्थिक असमानता अन्य विकासशील राज्यों की तुलना में बहुत द्रुत गति से बढ़ी । जब विकास का राष्ट्रिय इंडेक्स आया तो पता चला इस विकसित राज्य के बच्चे सबसे ज्यादा कुपोषण का शिकार हुए हैं । यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट ने बतलाया  की गुजरात की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ४१% गरीबी में जीता है जबकि इसकी 24.69% जनसंख्या भूख की मारी है । कार्पोरेट और उसकी मीडिया ने इस मुद्दे को दरकिनार कर दिया और उदारवादी अर्थव्यवस्था पर असामान्य ढंग से विकसित गुजरात मॉडल को एक आदर्श के रूप में पेश किया गया। एक बुर्जुआ जनतंत्र में जिसके साथ कार्पोरेट होता है विजय श्री भी उसकी होती है, मोदी जी की विजय कोई अपवाद नहीं हैं । राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्वदेशी अर्थव्यवस्था का दर्शन एक राष्ट्रवादी सोच पर टिकी हुई थी जो देश को आत्मनिर्भर बनाने की बात करता था जिसे मुक्त अर्थव्यवस्था का उदारवादी दर्शन के विचारक भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में प्रासंगिक नहीं मानते । संघ के विचारको ने एक समय अपनी राष्ट्रवादी सोच और स्वदेशी अर्थव्यवस्था का दर्शन के कारण संघ ने विश्व व्यापार संगठन समझौता (WTO) का विरोध किया था लेकिन अब वे उदारवाद की भाषा बोलने को बाध्य हैं| उन्हें अब मुक्त अर्थव्यवस्था को स्वीकार करने से कोई गुरेज नहीं है ! नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने स्वदेशी एजेंडा का त्याग कर मुक्त अर्थव्यवस्था को डिफेंस में १००% विदेश निवेश के साथ खुले दिल से स्वीकार किया किया ! संघ की तरफ से नागपुर से प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया “यह हमें इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाएगा और हमारी सेक्योरिटी को मजबूत करेगा। देश क्यों आयत करे जब वह इसका निर्माण खुद कर सकता है”| इकनॉमिक टाइम्स के हवाले से  संघ परिवार की आर्थिक शाखा स्वदेशी जागरण मंच के पास नरेंद्र मोदी सरकार के लिए पूरा एजेंडा है। इसमें एफडीआई पर श्वेत पत्र लाना, जीएम फसलों का फील्ड ट्रायल रोकना, चीन के साथ बिजनस घटाना और शिक्षा के क्षेत्र में नई शुरुआत  जैसे कदम शामिल हैं। अर्थात क्या संघ और मोदी में टकराव  की  सम्भावना अभी भी हैं ? या यदि होगा तो सच में होगा या यह एक ठोंग मात्र रहेगा ? कुछ भी नहीं कहा  जा सकता! फ़िलहाल तो संघ मोदी के साथ ही चलने को उतावला है ।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनैतिक सोच में आया परिवर्तन कार्ल मार्क्स के सिद्धांत की पुष्टि करता है की व्यक्ति की चेतना नहीं बल्कि उसकी भौतिक परिस्थितियां ही उसकी विचारधारा का निर्माण करती हैं । यह ग्लोबल पूंजीवाद की सेवा के लिए आया परिवर्तन स्पष्ट रूप से संघ के छद्म राष्ट्रवाद को बेनकाब करता है| वास्तव में सर्वोदय, स्वराज, स्वदेशी यह सब महात्मा गांधी के शब्दकोष से लिए गये थे जिन पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक  की कभी कोई आस्था नही थी। महात्मा गांधी को समाजवाद से जो प्राप्त हुआ था उसमे सबसे प्रमुख यही था कि व्यक्ति का स्व-स्वातंत्र्य, उसकी राजनैतिक स्वतंत्रता मूलभूत रूप देश की आर्थिक स्वतंत्रता से जुडी होती है। इसी मूल सिद्धांत पर उन्होंने सर्वोदय की पूरी अवधारणा को विकसित किया था।लेकिन उदारवादी मुक्त अर्थ व्यवस्था के इस संघी दौर में सवाल फिर भी वहीं खड़ा है कि आर्थिक स्वायत्तता के बगैर कोई भी देश किस तरह स्वयं को सम्प्रभु कह सकता है ? व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी संस्कृति का सवाल भी इसी प्रश्न में इसमें अनुस्यूत है| राष्ट्रवाद का यही सबसे प्रमुख सवाल है, बगैर इसके राष्ट्रवाद बेईमानी है!

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