Posted by: Rajesh Shukla | November 7, 2012

प्रभाष जोशी: हिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरूष


हिन्दी पत्रकारिता अनुत्पादक और गुलाम हो चुकी है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दो दिन पहले प्रभाष जोशी की पुण्यतिथि थी और हिन्दी समाचार पत्रों में उन पर कोई सामग्री नहीं मिली। मै हिन्दी दैनिक भाष्कर पढता हूं लेकिन उसमें भी उनकी पुण्यतिथि पर कुछ नहीं  दिखा शायद उन्हें पत्रकार समाज ने भूला ही दिया है । हमने गूगल सर्च किया तो  छिटपुट कुछ आयोजनो की खबरे मिलीं, उसमें भी भडास४ मीडिया की खबर और उसके द्वारा पुनरूत्पादित एक साक्षात्कार मिला लेकिन उनकी पुण्यतिथि पर कोई नया लेख नही मिला। इक्का दुक्का न्यूज वेबसाईटों नें उनके  पुराने संस्मरणो और साक्षात्कार छाप लिये बस कोरम पुरा। जनसत्ता हो सकता है रविवार को उन पर एक दो लेख छापे, ओमथानवी को तो शायद नही भूलना चाहिये।  हिन्दी समाचार पत्रो से भी  कोई विशेष आशा नहीं की जा सकती है क्योंकि ज्यादातर अंग्रेज परस्त हो गये है तथा एक उपनिवेशवादी उपागम से चलने लगे है।  हिन्दी पत्रकारों में अब “मसि कागद छुयो नही” वाली बैलों की जमात ही ज्यादा है जो मार्केटिंग एक्जिक्यूटिव है या बडे हो गये तो बकचोद मैनजर हो गये। पत्रकारों में जो एजेण्ट हो गया उसको पदमश्री दिया जाता है-बरखा दत्त जैसी अंग्रेजी बिचेज को यह शोहरत हासिल है। एक बडी संख्या विदेशी मीडिया में पत्रकार एजेण्टों की है लेकिन वे एजेण्ट के साथ घुग्घू और  सियार  भी हैं-मरी हुई आत्मायें। इन फासिस्ट बुद्दि बैलों की जमात का चुनाव कर मीडिया मालिकों ने वास्तव में हिन्दी समाचार पत्रो  को एक नये तरह के क्लिनिकल बॉडी में तब्दील कर दिया है। यह एक तरह का नया एसिलम है।  हिन्दी पत्रकारिता में ऑनडेस्क लेखन का प्रचलन तो कब का खत्म हो चुका है। ऑन डेस्क लेखन के गिरते स्तर का अनुमान हिन्दी समाचार पत्रों के सम्पादकीय से ही लगाया जा सकता है। खैर, ब्लॉग प्रभाष जोशी की पुण्यतिथि पर उन्हे अपनी श्रद्धान्जलि देता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रभाष जोशी उन गिने-चुने पत्रकारों में से रहे हैं जिनकी लोकप्रियता सिर्फ पठन-लेखन के स्तर पर ही नहीं रही थी, उन्हें चाहने और मानने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। प्रभाष जी एक जबरदस्त पत्रकार थे,  उनकी लेखनी किसी भी स्तर पर किसी साहित्यकार से कम नहीं थी। यदि आप आज के प्रतिष्ठित साहित्यकारों से पूछे तो उनकी राय उनके प्रति एक ऐसे पत्रकार की है जो अपने पत्रकारीय लेखन में एक साहित्यकार थे भले ही वे एक साहित्यकार न बन सके। उन्होने साहित्यकारों की तरह एकदम आत्मनिष्ठ लेखन नही किया, वे एक सक्रिय कार्यकर्ता की तरह पत्रकारिता करते रहे।

प्रभाष जोशी नें अपने पत्रकारीय लेखन से हिन्दी पत्रकारिता को सम्मान और प्रतिष्ठा  दिलवाई । जनसत्ता में वे लागातार समकालीन विषयों और मुद्दों पर लिखते रहे। उनका प्रसिद्ध स्तम्भ ” कागद-कारे” उस दौर में जनसत्ता का सबसे ज्यादा पढा जाने वाला स्तम्भ था शायद सबसे ज्यादा उद्धृत किया जाने वाला स्तम्भ भी  यही था। आश्चर्य मत किजिये उनका स्तम्भ सोशल मीडिया पर भी सबसे ज्यादा सर्कुलेट होने वाला रहा और सोशल मीडिया पर सवसे चर्चित पत्रकार भी वही थे। उस दौर में उन्ही के लेखन पर हिन्दी पत्रकारों के बीच सबसे ज्यादा बहस भी किया जाता रहा। मैने कभी समाचार पत्रों के लिये एक पत्रकार के बतौर काम नहीं किया इसलिये मुझे उनके बारे बहुत ज्ञात नही और न ही मैने उनकी कोई किताब पढी है। उनकी जो छवि मेरे मन में है वह उनके दो चार जनसत्ता में पढे लेखो तथा पत्र पत्रिकाओं में उन पर की गई चर्चाओ से बनी है।  वास्तव में जयप्रकाशनारायण और गांधी दोनों की आत्माये उनमें सक्रिय रूप से काम करती रही । वे न  केवल गांधी पीस फाउण्डेशन के साथ जुडे रहे बल्कि जयप्रकाश नारायण की विचारधारा पर काम किया तथा उसे प्रचारित किया। उन्होने  जयप्रकाश नारायण के विचारो के प्रचार के लिये रामनाथ गोयनका के सहयोग से एक जर्नल का सम्पादन भी किया था।

मालवा की मिट्टी की एक खूशबू उनके व्यक्तित्व में थी। उनका पत्रकारीय लेखन राजनीति से लेकर क्रिकेट तक जाता था। क्रिकेट पत्रकारिता में अंग्रेजी के वर्चस्व को उन्होने तोडा और एक बेहतर क्रिकेट पत्रकारिता करके दिखलाया। प्रभाष  जोशी एक बेवाक पत्रकारिता में विश्वास करते थे, जो लिख दिया सो लिख दिया। दूसरी तरफ यह कहना समीचीन होगा कि उन्होने पत्रकारिता के मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। जब सच बोलने और लिखने की बात आती थी तो उन्हे कोई हिचक नहीं होती थी। उन्होने अपने अभिभावक मालिक रामनाथ  गोयनका के बारे में सच कह दिया था कि गोयनका गालियों मे बात करते थे। यह उनका गांधीवादी साहस था।
“मुझे नहीं मालूम
मेरी प्रतिक्रियाएँ
सही हैं या ग़लत हैं या और कुछ
सच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य”-मुक्तिबोध

केवल सच ही एसी चीज है जो पत्रकार को पूंजीवादी बुर्जुआ तंत्र में भी स्वायत्त लेखन करने की शक्ति देता है। मुझे लगता है कि पत्रकारिय लेखन में ऐस्थेटिक भी इसी से पैदा होता।  मै गांधी को अपना आदर्श नही मानता लेकिन उन्हें इस सच का ज्ञान था। भारतीय हिंदी पत्रकारिता में  जोशी जी ने जो मान और सम्मान दिलाया वह अद्वितीय है। यह काम कोई मूल्यों का धनी व्यक्ति ही कर सकता था।  प्रभाष जोशी ने विनोबा भावे के साथ भूदान आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था इसलिये इन महापुरूषो का बहुत गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर था। एक गांधीवादी के बतौर वे  कभी स्खलित नही हुये। अकादमिक क्षेत्र में ” हिंदू होने का धर्म ” “मसि कागद और कागद कारे” इत्यादि उनकी लोकप्रिय किताबों में से है। उन्हें हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल २००७-०८ का शलाका सम्मान भी प्रदान किया गया था। प्रभाष जोशी भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन हम लेखको और पत्रकारो मे उनके पत्रकारीय मूल्य और उनका एक्टिविज्म जिन्दा रहेगा।

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