Posted by: Rajesh Shukla | November 5, 2012

जी न्यूज दलाली:बैलेंसशीट देखकर पत्रकारिता करने का परिणाम


”मीडिया इंडस्ट्री में चारों तरफ ब्लैकमेलिंग ही हो रही है. ऐसा बिलकुल नहीं है. सीईओ इज ए डर्टी एनिमल. ऐसा समझना भी ठीक नहीं. खराब माहौल के बावजूद बहुत सारे लोग बेहतर तरीके से अपना काम कर रहे हैं. यह बात अलग है कि जो बिजनेस ला सकता है उसे कमियों के बावजूद भी चुन लिया जाता है. दरअसल आज सबसे बड़ी समस्या और मुद्दा सेल्फ रेगुलेशन की है, जब तक विभाजन रेखा नहीं खींच लेते तब तक हम बेहतर की उम्मीद नहीं कर सकते. सेल्फ रेगुलेशन कोड ऑफ साइलेंस बन गया है. ये टूटेगा तभी सेल्फ रेगुलेशन के प्रति भरोसा लौटेगा.” गवर्नेंस नाऊ के संपादक बी.वी.राव ने ज़ी न्यूज़ और उद्योगपति नवीन जिंदल के बीच हुए ताजा विवाद के संदर्भ में आयोजित एक संगोष्ठी में ये बाते कहीं. यह संगोष्ठी मीडिया खबर डॉट कॉम और सीएमएस मीडिया लैब ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था.

गौरतलब है कि ज़ी न्यूज़ पर उद्योगपति नवीन जिंदल ने ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया है और इस संबंध में स्टिंग की सीडी भी जारी कर मीडिया जगत में खलबली मचा दी. न्यूज़ चैनलों के संपादकों की संस्था ब्रॉडकास्टर एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) ने कार्रवाई करते हुए ज़ी न्यूज़ के संपादक की बीईए की प्राथमिक सदस्यता खत्म कर दी.

ज़ी न्यूज़ – नवीन जिंदल प्रकरण में बीईए की भूमिका के बारे में बताते हुए बीईए के महासचिव एन.के.सिंह ने कहा कि पेशेगत नैतिकता के तहत सुधीर चौधरी पर कार्रवाई की. तीन सदस्यों की एक कमेटी बनी, टेप देखा और लगा कि गड़बड़ी है. सो प्रोफेशन कन्डक्ट के आधार पर आरोपी संपादक को संस्था से बाहर निकाला गया. लेकिन उसके पहले सुधीर चौधरी को भी अपना पक्ष रखने के लिए मौका दिया गया. दरअसल यह सारी गड़बड़ियां बैलेंसशीट देखकर पत्रकारिता करने का परिणाम है.

वहीं आजतक के पूर्व न्यूज़ डायरेक्टर और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने कहा कि ज़ी न्यूज़ और नवीन जिंदल प्रकरण को एक एक मामले के तौर पर देखकर अगर हम बात करें तो कहीं कुछ निकलकर नहीं आएगा. दरअसल ये लार्जर जर्नलिस्टिक सिनारियो का एक मैनिफेस्टो है. देखा जाए तो एडिटर और बिजनेस हेड का पद ही अपने आप में कॉन्फलिक्ट ऑफ इन्टरेस्ट है. ज़ी न्यूज़ में ऐसा ही हुआ तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं. पहले पेड न्यूज पर्दे के पीछे करते थे और अब एकदम सामने से होने लगा. हमें कार्पोरेट मीडिया की जो समस्या बात करनी होगी. उसके तह में ही पत्रकारिता की समस्याएं छुपी हुई है.

दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि हम पत्रकारिता के स्वर्णयुग में नहीं रह रहे हैं. मीडिया संस्थान को चलाने के लिए एक बड़ी पूंजी की जरुरत है और जो पूँजी लगाएगा उसे लाभ चाहिए. इसलिए पत्रकारीय अपराध नहीं रुक रहे. सेल्फ रेगुलेशन भी ऐसा करने में असफल रहा है. बीईए और एनबीए जैसे संस्थानों को अपनी सदस्यता के मापदंड़ों पर विचार करना चाहिए. इसके अलावा विज्ञापन की दरों को तय करना होगा और उसे रेगुलेट करने की जरुरत है.

सीएमएस मीडिया लैब के चेयरमेन डॉ.भास्कर राव ने कहा कि 24X7 एक तरह से फैल्यूअर हो गया है..हम इसे बहुत करीब से देख रहे हैं. पत्रकार की भूमिका बहुत ही तेजी से ध्वस्त हो रही है और जब तक इसे दोबारा से हासिल नहीं कर लिया जाता, कुछ बेहतर होने की उम्मीद हम नहीं कर सकते. ये विवाद एक तरह से दो मालिकों के बीच का विवाद है लेकिन इसे न्यूजरुम में घुसेड़ दिया गया है. अगर आप इसकी प्रवृत्ति पर विचार करें तो ये पूरी तरह से घाटे का धंधा हो गया है और जब तक उल्टे-सीधे तरीके से कुछ किया न जाए, तब तक वो मार्केट में टिका नहीं रह सकता.

 

from visfot.com

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