Posted by: Rajesh Shukla | October 31, 2012

न्यूयार्क टाईम्स ने छेड़ी नई बहस


अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अमेरीकी मीडिया विभाजित है लेकिन यह किसी को अनुमान नहीं था कि यह विभाजन किसी एक पार्टी के खुले समर्थन और प्रचार तक जा पहूंचेगा। कल न्यूयार्क टाईम्स नें ओबामा को दूसरे कार्यकाल के लिये राष्ट्रपति बनाये जाने की वकालत कर मानों बुर्जुआ समाचार पत्रों की पोल-पट्टी ही खोल कर रख दी है। अमेरीकी चुनाव कोई जनतंत्र का चुनाव नहीं रहा अब यह एक कार्पोरेट चुनाव है। बुर्जुआ जनतंत्र के बारे में तथा समाचारों के चरित्र के बारे में एक बार फिर मार्क्स ही सही निकले। ब्लादिमिर लेनिन ने लिखा था कि ” बुर्जुआ प्रेस न केवल सम्मिलित प्रचार तंत्र है बल्कि  जनता के खिलाफ एक सम्मिलित आन्दोलन करने वाला तंत्र भी है। बाद में उन्होने जोडा था कि प्रेस एक कार्पोरेट कुत्ता है (लेकिन पालतू है) जो सिर्फ मलिक के कहने पर भौकता है”। बुर्जुआ मीडिया फ्री प्रेस तथा फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की दिन रात बात करता है लेकिन वास्तविक अर्थो में  स्वतंत्रता  का गला घोंटने वाली एक फासिस्ट मशीन है ।  जनतंत्र का सबसे बडा आदर्श माने जाने वाले देश अमेरिका में मीडिया एक कार्पोरेट नियंत्रण केन्द्र से ज्यादा नहीं है। अमेरीकी राष्ट्रपति चुनाव में न्यूयार्क टाईम्स ने मीडिया की जनतांत्रिक  भूमिका को खत्म किया है।
न्यूयार्क टाइम्स ने अपने सम्पादकीय में जो कुछ लिखा वह मीडिया के लिये शर्मनाक रहा  -समाचार पत्र ने भांड की भूमिका में ओबामा के कार्यकाल को सफल मानते हुये उनको दूसरी बार राष्ट्रपति बनाने की गुहार लगाई। न्यूयार्क टाईम्स ने  लिखा ओबामा ने आर्थिक मंदी को रोकने के लिये प्रयास किया है और 2008 की मंदी के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लागातार सुधार आया है। इस समय गलत राजनीति देश को एक दूसरी मंदी मे ले जा सकती है।

सम्पादकीय में राष्ट्रपति की काबिलियत तथा उपलब्धियों का इतना बखान किया गया है कि यह कीर्तन बन गया है। न्यूयार्क टाईम्स ने अपने विस्तृत समर्थन पत्र में ओबामा की तमाम उपलब्धियों में अलकायदा नेतृत्व को कमजोर करने और स्वाथ्स्य सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किये जाने को प्रमुख बतलाया है। समाचार पत्र की घोषणा से सम्पूर्ण समाचार जगत में आलोचनाओं का एक दौर चल पडा है। समाचार पत्र नें अपना बचाव करते हुये यह कहा है कि अन्य प्रमुख समाचार पत्र भी विभाजित है और किसी-न-किसी का समर्थन कर रहे हैं। हमने पॉलिसी का समर्थन किया है। यह ओबामा का शासन काल ही था जिसमे वालस्ट्रीट क्रैश कर गया था और विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया था। ओबामा द्वारा क्रोनी कैपिटलिज्म को प्रश्रय देने का खामियाजा जनता ने चार सालों तक भोगा और अमेरिका में बेरोजगारी अपने सबसे बदतर स्थिति मे पहूंच गई थी। न्यूयार्क टाईम्स नें इसकी आलोचना क्या जिक्र तक नहीं किया।

गौरतलब है कि छह नंवबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा और विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार मिट रोमनी के बीच कांटे की टक्कर देखी जा रही है। न्यूयार्क टाईम्स एक लिबरल  बुर्जुआ अखबार कहा जाता है और अमेरिकी इतिहासकारों के अनुसार अपनी स्थापना के समय 1956 से इसने किसी रिपब्लिकन पार्टी को समर्थन नही दिया है। यह शुरू से ही ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थक रहा है।  न्यूयार्क टाईम्स की तुलना हम भारत के एक  दो अंग्रेजी के समाचार पत्रों से कर सकते हैं।  मिट रोमनी के दक्षिणपंथी होने की आलोचना करते हुये समाचार पत्र नें कहा है कि “ये दक्षिणपंथी ताकतें महिलाओं की हेल्थकेयर स्कीम्स को खत्म कर रहीं है और उनके जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा हैं। पचास साल के बाद भी दक्षिणपंथियों ने सिविल राईट को खत्म करने की कोशिस की है और विशेष समूहों में मैरिज करने का अधिकार को इंकार किया है। यहां तक कि उन्हें वोट देने का मौलिक अधिकार से भी वंचित करने की कोशिस की गई है। ” इन समाचार पत्रों में एलजीबीटी समूहों के लिये गाण्डूबाजी के अधिकार सबसे महत्वपूर्ण हैं क्योकि ये बहुसंख्यक समाज के ताने बाने को खत्मकरनें में सहयोगी होते है। बाराक ओबामा तथा उनके बहुसंख्यक समर्थक एलजीबीटी अमेरिका के ईसाई समाज के ताने बाने को खत्म करने की हर सम्भव कोशिस कर रहे है। बुर्जुआ आधुनिकता के दौर से ही इस तरह का एक राक्षसी जीवन की मांग करता रहा है  तथा उसका पक्षधर रहा है। फ्रेंच बुर्जुआ  रिवोल्यूशन का जुगेन्डस्टील वास्तव मे मूलभूत रूप से क्रिमिनलाईज्ड जीवन पद्धति और समाज की ही मांग थी जिसका अन्त वह नाजी फासिज्म में करता है। यह बुद्धिजीवियों के लिये चिंता का विषय है।

न्यूयार्क टाईम्स के इस प्रत्यक्ष समर्थन की मीडिया में भर्तस्ना का दौर शुरू हो गया है। दी टेलीग्राफ नें एक सम्पादकीय में जोरदार ठंग से कहा कि यह अमेरीकी जनता निर्णय करेगी कि कौन राष्ट्रपति होगा न कि न्यूयार्क टाईम्स का बिग जर्नलिज्म। मीडिया जनतंत्र में चौथा खम्भा होता है लेकिन समाचार पत्र ने पार्टी विशेष का समर्थन की घोषणा कर उसे गिराने की कोशिस की है।

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