Posted by: Rajesh Shukla | October 30, 2012

ओबामावादी सोशलमीडिया वार में लाईक-डिसलाईक के बीच फंसे मिट रोमने


अमेरिकी  राष्ट्रपतियों का चुनाव प्रचार कोई कम बडा स्टार वार नहीं है। हर चार साल बाद होने वाला अमेरीकी राष्ट्रपति का चुनाव दुनिया सबसे बडा चुनाव होता है भले ही इसमे भाग लेने वाली जनसंख्या उत्तरप्रदेश से ज्यादा न हो। कई बार जनसंख्या नहीं शक्ति ही ज्यादा महत्वपूर्ण होती है । राष्ट्रपति ओबामा और मिट रोमनी का चुनाव अन्तराष्ट्रीय चर्चा का विषय  है। पिछलग्गू देश ही क्या उसके शक्तिशाली साथी देशो की भी मेन-स्ट्रीम मीडिया  अपने न्यूज कार्यक्रमों का समय का एक बडा हिस्सा  उनके चुनावी समर को कवर करने पर खर्च कर रही है। मेन-स्ट्रीम मीडिया नें अपने ठंग से इन उम्मीदवारों के प्रचार में तथा  राजनैतिक बहसों को आयोजित करने तथा प्रसारित करने में एक बडी भूमिका निभाई है। हलांकि यह कुछ हद तक इस हाथ दे उस हाथ ले वाला मामला भी है।  इस बार के अमेरीकी चुनावी कैम्पैन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनके चुनावी प्रचार की कमान महिलाओं के हाथ में है। अमेरीकी राष्ट्रपति के दोनों उम्मीदवारों के कैम्पेन मैनेजमेन्ट को सम्भालने वाली महिलाये  टेक्नोक्रेट हैं। इनके नाम क्रमशः जुलियाना स्मूट तथा स्टेफेनी कुट्टर (ओबामा की कैम्पेन मैनेजर) और बारबरा कोमस्टॉक (रोमनी की कैम्पेन मैनेजर) हैं। ये तीनों महिलायें केवल उनकी कैम्पेन मैनेजर नहीं हैं ये उनके चुनाव का एक चेहरा भी है तथा महिलाओं को रिप्रेजेन्ट करती हैं।टीवी मीडिया से लेकर ट्वीटर मीडिया तक ये महिलायें दोनो पार्टियों  की एक प्रमुख महिला आवाज की तरह हैं। ट्वीटर पर इनका वाक् युद्ध स्वयं में एक मजेदार मसाला है तथा मेनस्ट्रीम मीडिया के लिये बाईट कम नहीं है। इन दो प्रमुख महिलाओं की भूमिकायें न केवल एक मैनेजर के रूप में है बल्कि एक सोशल मीडिया पत्रकार के रूप में भी बहुत महत्वपूर्ण है।
ओबामा-रोमनी के राष्ट्रपति चुनाव में मेन-स्ट्रीम मीडिया हमेशा की तरह  एक महुत्वपूर्ण भूमिका में है लेकिन यह वास्तव में बहुत जनतांत्रिक मामला नहीं है क्योकि ज्यादातर मामलों में कार्पोरेट अपने पक्ष में सब कुछ करने और करवाने में सफल हुआ है। राष्ट्रपति चुनाव में ऐंकरों और पत्रकारों द्वारा टेलीविजन ने जिस तरह कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है तथा एक दुश्प्रचार द्वारा मिट रोमनी को दबाने की कोशिस की गई है वह भी गौरतलब है और यह मीडिया षडयंत्र की एक नई कहानी कहता है। टीवी महिला ऐंकरो द्वारा शो होस्ट करवाकर ओबामा महिलाओं के अधिकारों तथा उनकी आर्थिक सामाजिक बेहतरी के चैपियन बन कर उभरने की कोशिस की हैं। यह सब निःसन्देह एक कांन्सपिरेसी थ्योरी के तहत किया गया। अमेरीकी जनता टीवी केन्द्रित होती है, जो कुछ टीवी में होता है वही सच माना जाता है। टीवी चैनलों पर कैन्डी क्रोले, मर्था , जैसिका येल्लीन जैसी महिला पत्रकार केवल पत्रकार नही है। इनको एक तरह से महिलाओ का राजनैतिक रिप्रेजेन्टेशन का मुखौटा की तरह भी सामने रखा गया है तथा यह बतलाने की कोशिस की गई है कि महिलाये राष्ट्रपति चुनाव के ऐसे कार्यक्रम भी होस्ट करने की क्षमता रखती हैं। इसका प्रभाव दिखावा पसंद अमेरिका के शहरी मध्यवर्ग पर बहुत पडा है जो सोशलमीडिया पर सबसे बडा आमसहमति बनाने वाला वर्ग है।दूसरी तरफ अमेरीकी प्रिंट मीडिया पूरी तरह रिपब्लिकन-डेमोक्रैट्स में विभाजित  रही है और खुलकर  अपने पक्ष के लिये प्रचार दुश्प्रचार करती है। चुनाव विश्लेषण करने पर पता चलता है कि न केवल कार्पोरेट मेन-स्ट्रीम मीडिया में बल्कि सोशल मीडिया में भी ओबामा ने एक तरह से ईविल कैम्पेन किया है। अमेरीका की सारी सरकारी मशीनरी मानो ओबामा का ही कैम्पेन कर रही हो। ओबामा पार्टी की तरफ के षडयंत्रकारी दुष्प्रचारकों ने “मीनिंगफुल” और “मीनिंगलेस” की सपाट कटेगरी में उम्मीदवारो को बांट कर कैम्पेन किया है। ओबामा मीनिंगफुल और रोमने मीनिंगलेस -इसमें कुछ ऐसा बुरा कैम्पेन चला कि रोमनी ने यदि मीनिंगफुल भी कहा है तो उसे ताली बजाकर, कार्टूनो, इमेजेज, मजाकिया बातों और ठहाकों में मीनिंगलेस बताया गया है। इस ईविल को बहुत आर्हनाईज्ड ठंग से अंजाम दिया गया है । इसमें एकतरह का स्पीच कांस्पीरेसी थ्योरी का भी उपयोग किया गया है।  यह एक बहुत बेहूदा तथा सतही कैम्पेन बन कर सामने आया है जिसमें सच का गला एक अलग तरह के उन्मादी मूर्खों द्वारा घोटा जा रहा है । जनता को यह भी जानना चाहिये कि जो  सेक्यूलर या डेमोक्रेटिक होने का दावा करता है वह भी खतरनाक फासिस्ट  हो सकता है। वास्तव में ओबामा का यह  मीनिंगफुल-मीनिंगलेस कैम्पेन एक  फास्सिस्ट उपागम ही है। ओबामा अपने भाषणों में भले ही बहुत सेन्सअल लगते हों लेकिन वे मूलतः सेन्सुअली-नान सेन्सुअल है या ज्यादा बेहतर है कहना कि नान-सेन्सिकली औसिएटिंग है। अब राष्ट्रपति का चुनाव सोशल मीडिया पर लाईक-डिसलाईक के आधार पर होने लगा है-यह  एक बहुत मूर्खतापूर्ण  विकास है ।

बराक ओबामा  शहरी मध्यवर्ग के उस वर्ग को जो गाण्डूपने ( गे-लेस्बीयन वाले) को ज्यादा  पसंद करता है  अपने पक्ष में करने में सफल हुये हैं। काले अमेरिकियों में यह वर्ग सबसे ज्यादा   है तथा सोशलमीडिया में बहुत एक्टिव तथा प्रभावशाली वर्ग है। अमेरीकी शहरी समाज में भी यह वर्ग बहुत प्रभाव रखता है। इस वर्ग  ने ओबामा के इस चुनाव में एक बडी भूमिका निभाई है। गाण्डुओं के सबसे पसंदीदा राष्ट्रपति बराक ओबामा हैं। बाराक ओबामा ने उन चीजो को ही ज्यादा प्रचारित किया है जो ईसाई समाज  में हेय माना जाता है। अमेरिका में ओबामा के शासन काल में आर्गनाईज्ड ठंग से गाण्डू-लेस्बियन-ट्रांसजेन्टर की एक बडी शहरी जनसंख्या का उत्पादन किया गया है तथा जोम्बी जैसी समाजिक बिमारियाँ भी ओबामा के ही समय में सबसे ज्यादा अमेरिका में उपरियाईं है। ट्रांसजेन्टर वाले गुदा-में लिंग लगवा लेंगे तथा लिंग में गुदा, ऑपरेशन से योनि मे लिग लटकवा लेंगे तो लिंग की जगह योनि बनवा लेंगे लेकिन ये मूलतः  मानसिक विक्षिप्त गुदामैथुन वाले  होते हैं। ओबामा ने मानसिकतः विक्षिप्त गाण्डू जनसंख्या के साथ एक ड्रग इत्यादि में लिप्त तथाकथित हिप्पी जनसंख्या को सभ्य समाज से ज्यादा तरजीह दिया है। यह अमेरिका का राजनैतिकतः बहुत  एक्टिव वर्ग है और ओबामा के दुष्प्रचार में एक बडा करगर अस्त्र बनकर सामने आया है।

मेनस्ट्रीम मीडिया के अपने कार्पोरेट हित होते हैं इसलिये उनके प्रचार भी उसी ठंग के हो रहे है । एक जनतांत्रिक देश में मीडिया निष्पक्ष ही मानी जाती है लेकिन अमेरिका में मीडिया एक तरह से ओबामा का माउथपीस बनकर सामने आई है। न्यूयार्क टाईम्स नें बाराक ओबामा को दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने को अमेरिका के हित में बतलाया है जो कि जनतंत्र मे मीडिया की भूमिका को पूरी तरह खत्म करने वाली बात है। अमेरीकी मीडिया का ध्रुवीकरण हो गया है -दोनो स्तरों  टीवी तथा प्रिंट  मीडिया में इसका ध्रुवीकरण देखा जा सकता है। यह कोई अमूर्त राजनैतिक ध्रुवीकरण नहीं है बल्कि एक कार्पोरेट ध्रुवीकरण है। ऐसे माउथपीस बने मेनस्ट्रीम मीडिया के दौर में सोशल मीडिया की भूमिका कई गुनी बढ गई है। सोशल मीडिया में अमेरीकी राष्ट्रपति के चुनाव पर जो परिचर्चाये और बहसे होती हैं वह सीधे जनता की समझ और नकार इंकार को प्रतिबिंबित करती हैं। सोशल मीडिया विशेषकर ट्वीटर मीडिया एकमात्र जनतांत्रिक तथा निष्पक्ष मीडिया के रूप में सामने आया है।

समाचार ऐजेंसी रयूटर्स के ऑनाईन चुनाव  निष्कर्ष  कि राष्ट्रपति ओबामा को 49% समर्थन मिला है तथा मिट रोमनी को 46% मिला है स्वयं ही प्रोपागाण्डा हो सकता है। यह कोई नेलसन सर्वेक्षण नही था फिर भी इसमे एक सच्चाई है। यह अवधारणा सोशल मीडिया में हो रही बहसों तथा छिटपुट ऑनलाइन लाईक डिसलाईक  के आधार पर बनाई गई थी। अमेरीकी संस्थाओं द्वारा किये विश्लेषणो में भी यह बात सामने आई है कि सोशलमीडिया में हो रही बहसों तथा ऑनलाईन फेसबुक, ब्लांग, यूट्यूब तथा टम्बलर इत्यादि सोशल मीडिया  का राष्ट्रपति चुनाव में उतना बडा प्रभाव नहीं पडा है जितना ट्वीटर मीडिया का पडा है। इसकी एक वजह यह है कि ट्वीटर मशीन पर बाराक ओबामा और मिट रोमनी में कई बार रीयल टाईम बहसें ट्वीट्स के द्वारा होती देखी जाती हैं। उनके द्वारा मुद्दों पर किये गये ट्वीट्स पर तमाम मेन स्ट्रीम मीडिया से सोशल मीडिया तक में बहसो का एक सिलसिला चल निकलता है जो अन्ततोगत्वा ट्वीटर पर ही प्रवाहित होता है और ऑनलाईन मासेज को प्रभावित करता है। ट्वीटर निःसन्देह जनसमर्थन जुटाने का एक बडा माध्यम बनकर सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर सोशलमीडिया में हुई बहसों तथा मुद्दो पर हुई आपम बातचीत का प्रतिशत ट्वीटर पर सबसे अधिक 77 प्रतिशत तक रहा है जबकि अन्य सोशलमीडिया प्लेटफार्म्स जैसे फेसबुक, टम्बलर, गूगल,आर्कुट तथा ब्लाग्स पर हुये संवाद का प्रतिशत अधिकतम 6% से 7%  तक रहा है। फेसबुक की तुलना में  ब्लाग्स की भूमिका हलांकि ज्यादा महत्वपूर्ण बन कर सामने आई है। समाचार पत्रो  में  राजनैतिक विचार विमर्श निष्पक्ष नहीं हैं इसलिये पाठकों का सहज झुकाव ब्लाग की तरफ हुआ है।  ब्लाग विचार विमर्श का एक निष्पक्ष प्लेटफार्म है इसलिये इसका कन्टेन्ट अन्य सोशल मीडिया में खबरों के बाद सबसे ज्यादा सर्कुलेट होता है।  सोशलमीडिया में  निःसन्देह ट्वीटर मीडिया का  प्रभाव सबसे ज्यादा  है‍‍। इसकी एक बडी वजह इस प्लेटफार्म पर रीयलटाईम टाईमलाईन का होना, सूचनाओं का सर्कुलेशन की गत्यात्मकता तथा उसकी टैक्सचुआलिटी है। ओबामा या रोमनी का एक टवीट मेनस्ट्रीम मीडिया के लिये भी एक बाईट  बन कर सामने आता है।  एक ट्वीट बराबर एक बाईट। सोशलमीडिया में अन्य प्लेटफार्म्स पर राष्ट्रपति चुनाव में संवाद कम हुआ अपेक्षाकृत ट्वीटर मशीन के। मेन-स्ट्रीम मीडिया की खबरों और बहसों को सर्कुलेट कर जो बहसे की गई या करवाई गईं हैं उनका उतना प्रभाव सोशल मीडिया पर हुई बहसो और समर्थन पर नहीं पडा है बनिस्बत इसके की सोशलमीडिया में उनके कन्टेन्ट ही सबसे ज्यादा सर्कुलेट होते हैं। राजनैतिक विमर्श के बावत सोशल मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। भारत में भी सोशलमीडिया राष्ट्रीय चुनाव को अमेरीकी चुनाव की तरह ही प्रभावित करेगा। सोशल मीडिया बहसों का अपना एक अलग स्वरूप विकसित हुआ है जिसे समझने की जरूरत है तथा उसके सही जनतांत्रिक उपयोग की जरूरत है।

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