Posted by: Rajesh Shukla | October 27, 2012

नवीन जिंदल का फाईनल साल्यूशन


न्यूज की दलाली कोई राकेट साईंस नहीं है यह एक ब्राडअण्डरस्टैण्डिंग का सवाल है –सुधीर चौधरी, जी-न्यूज हेड तथा सम्पादक

जी-न्यूज चैनल नें  सिनेमाई खबर कार्यक्रम दिखा कर  नवीन जिन्दल से जो फिरौती मांगी थी वह निःसन्देह एक अक्षम्य अपराध है। मीडिया का क्रिमिनलाईजेशन तो बहुत पहले हो चुका था जब मीडिया को मीडिया के लिये नहीं बल्कि दबाब बनाने, धमकाने तथा किसी तरह वर्चस्व बनाने का संन्यंत्र के रूप में लॉच किया जाने लगा था। क्रिमिनलाईजेश की हद सिर्फ फिरौती पर खत्म नहीं होती इसके अन्य खतनाक पहलू भी है जिनमें सामाजिक षडयंत्र से लेकर देशद्रोह तक शामिल हैं। मीडिया का एक काम जो शिक्षा का तथा दुनिया सजग करने का है वह तो कमोवेश मीडिया से गायब ही है। प्रिंट मीडिया में परवर्जन बनाने और प्रचारित करने वाले कन्टेन्ट और पोर्न लबालब भरा रहता है जिसका बहुत व्यापक दुष्प्रभाव समाज पर पड रहा है। मीडिया के बुद्धजीवीयों के दिमाग की नसें केकडा खाते खाते बहुत मोटी हो गई हैं, अब वे कमोवेश मार्केटिंग मैनेजर हो गये हैं । स्टिंग ऑपरेशन को  जिस तरह मीडिया  फिरौती,दलाली तथा निहित राजनैतिक स्वार्थो के लिये के लिये इस्तेमाल कर रही है वह बहुत खतरनाक बनकर सामने आया है। एक अमेरिकी षडयंत्र की भी बू मीडिया में दिख रही है। यह एक परम सच है कि हम एक बुर्जुआ जनतंत्र में हैं जिसके सिद्धांत की मूल प्रस्थापना में ही करप्शन है। पाश्चात्य जनतांत्रिक विचारकों की नजर में यह प्रकृतिक है।  जनतंत्र में करप्शन अनुस्यूत है और मीडिया भी उससे अलग नहीं है। हर कोई जो धन का संग्रह कर रहा है वह करप्शन , लूट तथा शोषण से ही कर रहा है इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है। इस स्थिति में व्यापक स्तर पर जो करप्शन है उसे खत्म करने का यह सिलसिला क्या कभी खत्म हो सकता है। करप्शन यह और हिपोक्रेटिक आदर्शवादी अप्रोच है। यदि देखे तों शायद ही कोई मिले जो कहीं न कहीं करप्ट न हो।

दी हिन्दू के सम्पादक रहे एन राम नें कल पूछा कि करप्शन के मद्देनजर मीडिया के लिये पूंजीपती क्यों एक पवित्र गाय है? उनके लूट और शोषण का पर्दाफास कौन करेगा? उनकी देशद्रोही गतिविधियों की जांच पडताल कौन करेगा? फोर्ड फाऊंडेशन क्या देश की कोई देशप्रेमी एनजीओ है जिस पर प्रश्न उठाने से मीडिया पेटी-बुर्जुआ घबराता है? कौन नही जानता कि फोर्ड फाऊंडेशन के तमाम सांस्कृति तथा सामाजिक काम तथा रिसर्च मात्र डाटा संग्रह है जिसका उपयोग अमेरकी कारपोरेट तथा सीआईए देश के खिलाफ अपनी अनेको स्तर की पॉलिसीज और स्ट्रेटेजिज बनाने में करता है। यह एक तरह की देश के खिलाफ गुप्तचरी करता है।  मीडिया पूंजीपतियों का गिरेबान कब पकडेगी, विशेषकर उनका जो विदेशी कार्पोरेटो कें एजेण्ट मात्र है और कई तरह की देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त हैं। नवीन जिंदल कोयला घोटाले की वजह से पकडे गये जबकि उनका जो घोटाला भारतीय जनतंत्र में एक सामान्य प्रेक्टिस है। हर कोई जो सत्ता से जुडा है उसका लाभ लेता है, नवीन जिंदल नें भी लिया। वह एक स्थापित पूंजीपति हैं इसलिये उन्हे कितने कोल ब्लाक मिले इस पर  प्रश्न चिन्ह  उठाना मूर्खतापूर्ण बात है। वह कांग्रेस के नेता होने से पहले एक पूंजीपति हैं। जीन्यूज जैसी अस्तरीय  मीडिया  हाउसेज एक मीडिया के बतौर वास्तव में एक दुश्मनी का साधन बन कर सामने आये है। जी न्यूज ने न केवल फिरौती वसूलने की कोशिस की बल्कि वास्तव में नवीन जिंदल से एक दुश्मनी निकालने की भी कोशिस की  है। हालिया में नवीन जिंदल की तरफ से जारी क्लिप में यदि आप देखे तो सब कुछ साफ हो जाता है। सुधीर चौधरी की बातचीत का ठंग किसी बुद्धिजीवी सम्पादक का नहीं बल्कि शुद्ध दलालों वाला है जिसमें एक क्रिमिनालिटी है।  यह न्यूज का चेहरा कैसे हो सकता है जो फिरौती और दलाली को  अण्डरस्टैंडिग समझाता है।  सुधीर नें तो टेप में दी ईकॉनामिक टाईम्स को भी नही बख्शा की उसकी हर स्टोरी बिकी होती है। चौधरी को जी-न्यूज का हेड और सम्पादक सम्भवतः इसी गुण के कारण बनाया गया होगा।  यदि टीवी के सम्पादक और ऐंकर इसी स्तर के है तो यह बहुत सीरियस मामला है। जी-न्यूज की फरौती तथा कालिखपोतू राजनीति की वजह कार्पोरेट की अन्दरूनी गुटबाजी  भी हो सकती है। मीडिया इस तरह का साधन बनकर उभरी भी है, किसी से दुश्मनी निकालनी हो तो कुछ पैसे खर्च करों- मीडिया से स्टिंग ऑपरेशन करवाओ। हमें इस तरह की  खबरों के प्रसारण के बारे में पुनः नये सिरे से सोचने की जरूरत है।  वाशिंगटन पोस्ट नें भी जो स्टोरी मनमोहन सिंह पर बनाई  थी और जिसे भारतीय मीडिया नें सर्कुलेट किया था वास्तव में कार्पोरेट लाबिईंग ही थी–एक तरह की दलाली, यह कोई पत्रकारिता नही थी। ऐसी खबरों को प्रसारित करने से पूर्व जांच पडताल की जानी चाहिये और वैध न होने पर उसे सेंसर किया जाना चाहिये। जब कैमरे की पीछे बैठा शख्श पत्रकार- क्रिमिनल हो तो फिर तो किसी का भी चेहरा साफ सुथरा नही बचेगा। वास्तव में यह अन्य मीडिया के मद्देनजर भी महत्वपूर्ण है।

हलांकि भारत में  सिनेमा कन्टेन्ट पर सेंसर करने वाली संस्था सेंसर बोर्ड ही बहुत बदतर स्थिति में है क्योकि उसको न तो सेन्स का कोई ज्ञान रहता है और न ही एस्थेटिक विमर्शों का इसलिये बदतर ही ज्यादातर मामलो में मीडिया पाईपलाईन से बहता है।  यह कम आश्चर्य की बात नही है कि न केवल व्यापारी  बल्कि मीडिया मे काम करने वाले सम्पादक भी बदतर को ही सबसे बिकाऊ कन्टेन्ट मानते हैं और समाज की भलाई का सही पैमाना? प्लेसेन्टा केन्द्रित या पोर्न केन्द्रित जीवन पद्धति का जिस तरह रिशेप्शन बुर्जुआ करता है वह हमारे लिये चिंता विषय होना चाहिये। एकतरफ तो वह अपने परिवार को उससे ऊपर रखने की कोशिस करता है तो दूसरी तरफ उसे समाज में बहने देता है जिससे लोग पतित हों कर नष्ट-प्रणष्ट हो जायें। क्या हमारे समाज में यह चौर्यवृत्ति और करप्शनवृत्ति, यह रेप, एक लूट अकस्मात सामने आ गया है? नही॑!! यह मीडिया , सिनेमा, संस्कति, पोर्न-विचारों का निकष है। हम केवल पार्टी नेताओं को इसके लिये दोषी नहीं ठहरा सकते। जो स्वयं को सबसे बडा आदर्शवादी  बतला रहा था वह भी अन्ततः एक निहायत मूर्ख किस्म का चोर निकला। गडकरी की बात कर रहा हूँ, यह इतना मूरख निकला कि इसे कम्पनी बनाने की भी फुर्सत नही मिली।  इसकी मूर्खता की हद यह कि उसे कम्पनी का डायरेक्टर बनाने को ड्राइवर ही मिला? कमसे कम पार्टी के ही या संघ के ही तेज तर्रार  बेरोजगार लडकों मे से किसी को चुना होता तो वह इतना तो बतलाता कि साहब कम्पनी कमसे आस्तित्व में होनी चाहिये जिससे कि जब कभी कोई बात आये तो कहा तो जा सके कि कम्पनी है।  लूटेरे नेताओं में ज्यादातर के साथ केस इसी तरह का है। मैने एक पोस्ट में जिक्र भी किया था कि  दासों पर विश्वास करने का कारण क्या है। इसे समझने की जरूरत है। भारतीय पूँजीपतियों में भी मूरखो की बडी कद्र है।  शायद इसलिये कि उन्हे लगता है चालाक तथा समझदार कुछ उल्टा सीधा कर सकता है जबकि मूर्ख  जैसा बताया जायेगा वैसा गदहे की तरह करता रहेगा। किसी बडे अर्थशास्त्र के विद्वान ने यह लक्षित भी किया है कि इन दशको में पूँजीवाद के पतन की एक बहुत बडी वजह यही है। यदि मूर्ख का चुनाव नहीं होता तो शायद गडकरी आज इस तरह नंगा नहीं होता। मीडिया भी इतनी बदतर स्थिति में शायद नहीं होती। मीडिया स्वयं खबर पर सेंसर को गम्भीरता से ले और  स्वनियमन करे- हिपोक्रेसी नही। इस समय न्यूज मीडिया में बुद्धिजीवियों का ही अकाल है इसलिये यह बदतर न्यूज कन्टेन्ट का रिसाव हो रहा है। ज्यादातर मामलो में मीडिया में बैठा हुआ सम्पादक एक  बेकार मैनजर जैसा है जिसे मार्केटिंग भी नहीं आती है। उसने लिखना-पठना-सोचना सब छोड दिया है और बस एक पेटी-बुर्जुआ मानसिकता के स्तर का मैनेजिरियल काम कर रहा है। मीडिया को सीरियस होने की सख्त जरूरत है।

दूसरी तरफ  खबरिया चैनलो के मालिकों का  जो व्यापारिक दबाव सम्पादकों पर होता है वह एक अलग मुद्दा है। यह भी कहीं न कहीं सम्पादकों को जुर्म के लिये प्रेरित करता है। कल हेडलाईन्स टुडे के ऐंकर राहुल कंवल नें ट्वीट किया  था “Very unforcomfortable with Editors having revenue responsibilities. Editorial decisions should be made independent of revenue concerns” यह सम्पादकों और ऐकर्स की आन्तरिक पीडा की अभिव्यक्ति है। बरखा दत्त ने भी  ट्वीट किया “Most Media ownership globally either Corporate or State funded( Al Jazeera). Best that networks can do is proper system of disclosure. ” यह दोनो स्थितियां बडी खतरनाक हैं -इसमें तो पत्रकारीय मूल्यों का मरना तय है। न्यूज चैनलों के मालिकों को समझना पडेगा कि न्यूज चैनल उस अर्थ में एक लाभकारी तंत्र नहीं हो सकता जिस अर्थ एन्टरटेनमेन्ट चैनल हैं । जी-न्यूज का सम्पादक नवीन जिंदल से एक व्यापारी की तरह डील करने गया था-क्या उसे सुभाष चंद्रा ने भेजा था? यह एकदम सम्भव है क्योकि व्यापारिक तथा राजनैतिक हितों को अलग करना मुश्किल है। चंद्रा के लिये सब कुछ व्यापार है इसलिये पत्रकारीय धर्म को  पहचानना तथा उसकी कद्र करना उनके लिये मुश्किल है। दैनिक भाष्कर में अभय कुमार दुबे ने आज एक बडी अच्छी बात लिखी है कि ” बिजनेसमैन  जब पालिटिक्स करता है तो वह व्यापारिक कौशल भी उसमे लाता है  साथ एक ऐसी प्रवृत्ति भी लाता है जिसे उसे या उस जैसे व्यापारियों को छोडकर समाज के बाकी हिस्से अनैतिक और हानिकारक मानते है। ”  वह व्यापार को  अनैतिक कार्य करने का वैध माध्यम मानता है और उसे सहज ठंग से करता है। व्यापार पर कोई उंगली नही उठाता क्योकि इससे अर्थव्यवस्था जुडी है इसलिये सबकुछ जायज मान लिया जाता है। एन राम  राजदीप सर देसाई के न्यूज आवर में दो दिन पहले इसी बात को कहीं न कही रखने की कोशिस कर रहे थे। यही बात न्यूज उद्योग के बारे में भी है। हमें इस पर गम्भीरता सोचने की जरूरत है। यदि राजनेता भ्रष्ट हैं तो इतना तो है कि उनमें एक सामाजिक सरोकार है लेकिन पूंजीपति ज्यादा भ्रष्ट होने के साथ एक  सरोकारहीन लूटेरा है। मीडिया बुद्धिजीवियों को इन दोनों पर अपना जेहाद करने की जरूरत है।  करप्शन पर फाईनल साल्यूशन  पूँजीपतियों के काले कारनामों का पर्दाफास किये बिना तथा उन्हे दबाव में  लिये बिना सम्भव नहीं।  इस देश के बेहतर उद्योगपति जिनपर देश का बहुत कुछ टिका हुआ है सामने आकर इस मुहिम को इनिशियेट करें जिससे लूटतंत्र  से पुनः जनतंत्र की तरफ लौटा जा सके। नवीन जिन्दल का टेप मीडिया के लिये एक बडा  सवाल है तथा एक हस्तक्षेप भी है।

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