Posted by: Rajesh Shukla | October 26, 2012

कैसे करें इस खबर का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण


यह मां की बलात्कार की खबर नवभारत टाईम्स में छपी थी। मै टाईम्स नेटवर्क पर एक ब्लाग पोस्ट लिखने की कोशिस कर रहा था तथा कुछ सर्च भी कर रहा था कि यह स्टोरी मेरे सामने आ गई। पता नही क्यों पढने लगा इसको। पढना तो ठीक है लेकिन कमेंट पढना कितना सही आदत है? मैनें खबर पढते हुये  इसपर लिखे गये कमेन्ट पर एक नजर दौडाई। कमेन्ट पढकर मै एकदम से सोच में पढ गया कि ऐंसी खबर पर भी व्यक्ति कैसे मजा ले सकता है॑! खबर के बीच में जो कमेंट सामने आये उसमें एक अलग तरह का परवर्जन है जो निःसन्देह बहुत खतरनाक है।
उनमे भारतीय जनतंत्र का सेक्युलर बनाम भगवा की लडाई भी दिखी जब इस बेहद सेन्सिटिव खबर पर एक ने लिखा कि वह रेप करने वाला नंदकिशोर नही था नईम था। और दूसरे ने कमेंन्ट मारा कि क्यूं नईम तेरा बाप लगता है..??? मजेदार यह कि तीसरे ने ध्यान दूसरी तरफ बंटाया और सुझाया कि रे यार ध्यान से पढ़ो मा सौतेली है. नवभारत वाले भी चस्के लेते है और असली खबर नही छापते. अब एक हिन्दू का नाम आया तो मुल्ला बड़े मजे लेने लगे. पर पता नही इनको की सारे अपनी मा के यार है. जब ही तो सारे भाईजान है. पैदा करते है और भाईजान बन जाते है. उसके कहने का मतलब है कि मां सोतेली हो तो रेप जायज है।

ये कमेन्ट वास्तव में ऑनलाईन नही होने चाहिये थे लेकिन समाचारपत्र स्वयं पोर्न प्रचार करते हैं इसलिये सम्पादक को इससे कोई दिक्कत नही है। सम्पादक भी मूर्ख ही और कमेन्ट करने वाला भी मूर्ख ही। भारत की सामाजिक तथा राजनैतिक परेशानियों में इन मूर्ख सम्पादकों का बहुत योगदान है, इन सबने सामाजिक बुराईयों में वृद्धि की है। तभी इस रेप न्यूज पर किसी वैशाली दिल्ली ने कमेन्ट किया मानो कन्टेक्ट नम्बर ही दिया “हेलो मेरा नाम वैशाली दिवाकर है में एक आतिक़ नाम के लड़के से प्यार करती थी लेकिन उसने मेरे साथ शारीरिक सम्बंध बनाने के बाद मुझे छोड़ दिया. में क्या करूं?” इसका उत्तर शोले स्टाईल में एक ने दिया “वैशाली आप कौन हो? कहा रहती हो?॰….या पुनः क्या तुम द्वारका मे रहती हो? वास्तव में वह वेष्या ही ऑनलाईन नम्बर दे रही थी “नही में R M L हॉस्पिटल के पास रहती हूँ. ॰ और फिर क्या रेप स्टोरी की सेन्सिटिविटी गयी भाड में पुरूष ने कन्टैक्ट नम्बर मांग लिया। “अपना कॉंटॅक्ट नंबर दो , हम आपकी प्राब्लम सॉल्व करेगे”। यह कमेन्ट एक ऐसी न्यूज स्टोरी पर है जिसके बारे में समाज को बहुत चिंतित होना चाहिये लेकिन माहौल कुछ ऐसा है कि ऐसी खबर सुनकर कम पढे लिखे तथा असंस्कृत व्यक्ति कह सकते है “तेरी मां की रेप की खबर नही है! चल आगे पढ ” या यह कि ” दूसरे की मां होगी” या यह कि ” मां औरत ही है” ठीक वैसे ही जैसे असुर कहते थे कि मां -बेटी- बहन में कोई अन्तर नही करना चाहिये। आजकल सुन रहे हैं कि जेनयू जैसी जगहों में कई दलित भी इसी तरह की सोच का प्रचार कर रहे हैं। इनको अम्बेडकरी कानून की जरूरत ही नही है उनके बारे में कुछ और सोचिये। राक्षसों के लिये कानून नही सीधे फाईनल साल्यूशन होता है। इस पोस्ट के मुद्दे पर तथा इस भारतीय परवर्जन पर सोच रहा हूँ और किसी दूसरी पोस्ट में इस पर  विशेष लिखा जायेगा।

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Responses

  1. आपसे शत प्रतिशत सहमत. नवभारत टाइम्स में अक्सर ऐसे ही अक्ल से परे बेवकूफाना कमेंट्स छापे जाते हैं कि पढ़कर जी कैसा२ होने लगता है और अपने चंद लोगों कि सोच पर गुस्सा/ शर्म आती है कि ऐसे लोगों को भारतीय कहलाने का भी कोई हक नहीं है.


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