Posted by: Rajesh Shukla | October 25, 2012

कन्टेन्ट एक सनातन राजा है


पिछले दिनो मुझे दैनिक जागरण समूह तथा एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा आयोजित कान्क्लेव में जाने का मौका मिला था। कान्क्लेव में उपस्थित वक्ताओं की लिस्ट में केवल दो बिजनेस शख्शियत थे जिनके विचार सुनने की ज्यादा इच्छा थी- पहले टाईम्स इन्टरनेट लिमिटेड के सत्यम गजानी तथा दूसरे टीवी नेटवर्क-18 के ग्रुप सीईओ बी॰ साईकुमार थे। हलांकि तीसरे वक्ता  ईएमएम इन्टरनेशनल के संस्थापक चेयरमैन स्टीफेन व्हाईट ने मुझे  ज्यादा बहुत प्रभावित किया। उनके बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं था लेकिन जिस विषय को उन्होने सामने रखा उससे मेरे मन में अकस्मात कई तरह की जिज्ञासाऐं जाग उठी हैं। इन  तीनों वक्ताओं में  सत्यम गजानी को एक छोटी सडक दुर्घटना  वजह से नही सुन सका क्योकि मै देर से पहूंचा लेकिन बी साई कुमार को सुनने का मौका मिला। साईकुमार एक जोशीले नवयुवक हैं जिसका चालीसवां भी अभी पूरा नही हुआ है। उनमें  एक प्राग्मैटिक विजन  है। उन्होनें ब्रांड और कन्टेंट को लेकर कल जो कुछ सामने रखा उसमें एक प्राग्मैटिज्म के साथ दूर दृष्टि भी थी जो निःसन्देह किसी दार्शनिक की यूटोपियन दृष्टि न होकर एक सीईओ की व्यवहारिक दृष्टि थी ।
बी॰साईकुमार के प्रेजेन्टेशन में तीन बातें साफ साफ थी पहली बात यह उन्होंने यह रखी कि कन्टेंन्ट इज किंग लेकिन भारतीय मीडिया उद्योग के लिये वितरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होने स्पष्ट करते हुये कहा कि बनिस्बत इसके कन्टेन्ट इज किंग और यह किंग भारत में पुनः लौट आया है। दूसरा कन्टेन्ट वितरण का मीडिया के मद्देनजर सदैव ऊपरी हाथ है जहां तक इसके व्यापारीकरण और पहूंच  का सवाल है तथा तीसरा यह कि ब्रांड ही अन्ततोगत्वा सब कुछ है। यही मोटी मोटी तीन बातें थी जिसको साईकुमार नें ग्राफिक्स की मदद से श्रोताओं के सामने रखा। मुझे उनकी इस बात पर जरूर आश्चर्य हुआ कि ब्रांड का कोई निश्चित साम्राज्य नहीं होता। ब्राण्ड अपने पुराने साम्राज्य का त्याग कभी भी कर सकता है और ज्यादा लाभकारी साम्राज्य की तरफ बढ सकता है। उन्होनें ब्रिटेन के दो अंग्रेजी मीडिया के ब्रांड गार्जियन और एक किसी अन्य का शायद टेलीग्राफ का उदाहरण रखा जिसका नाम मुझे साफ साफ सुनाई नहीं पडा। इन अंग्रेजी ब्रांड्स नें अपना साम्राज्य बदल लिया है और अपने व्यापारिक कार्यकलापों को अफ्रिकी देशों पर केन्द्रित कर दिया है। मुझे आश्चर्य हुआ कि क्योंकर एक ऐसा ब्रांड जिसकी पहचान शायद मिटाई नहीं जा सकती ऐसा करेगा? गार्जियन ब्रिटेन का सबसे पुराना अंग्रेजी भाषा का समाचार पत्र है जो १८२१ में शुरू हुआ था,राजनैतिक, सामाजिक विमर्शों के बावत यह सबसे सशक्त ब्रांड है और अंग्रेजी के बुद्धिजीवीयों का पसंदीदा मुखपत्र है। कितने ही बडे दार्शनिकों तक नें इस समाचारपत्र में अपने कॉलम लिखे है। ब्रांड की एक सशक्त इमेज है,समाज का अच्छा खासा एक ऐसा वर्ग उसका पाठक है जो उस समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। ऐसे में क्या वजह हो सकती है कि गार्जियन जैसा मुखपत्र अपने साम्राज्य को छोड कर किसी अन्य साम्राज्य में शरण लें? बी साईं कुमार ने इसके बारे में कुछ विस्तार से नहीं कहा। सवाल निःसन्देह बहुत बडा है। एक मीडिया ब्रांड जिसको कन्टेन्ट के बावत ब्रिटेन में कोई चुनौती देने वाला नहीं है क्योंकर अपने ब्रांड के साम्राज्य को बदलने के लिये बाध्य हुआ? क्या अन्य ब्रांडो के दबाव में उसने ऐसा किया? या केवल इसलिये कि अफ्रिका में कम्पटीशन कम है और विस्तार की सम्भावनायें ज्यादा है! ब्रांड की एक अन्तर्राष्ट्रीय इमेज है फिर उसे अपनी नेटिव पहचान छोडने की जरूरत भी क्यों पडेगी? यदि ब्रांड अपनी एक अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बना लेता है तो वह वह एक अन्तर्यामी ब्रांड हुआ, उसे किसी साम्राज्य को छोडने की जरूरत नहीं होनी चाहिये। इससे जुडी एक तीसरी बात भी सामने आती है वह है इसका पूँजीवादी डायमेन्सन– ब्रांड मूलभूत रूप से टेरिटोरियल है इसलिये वह अपनी पुरानी सीमा का विस्तार कर सकता है उससे बंजारों की तरह पलायन नहीं। ब्रांड एक राजा है  अपनी सीमाओं का विस्तार करना उसका धर्म है और वह अपने धर्म का पालन सदैव बेहतर के लिये करता है। यह कोई बंजारा नहीं है जो एक तमाशबीन की तरह अपने किंगडम को बदलता रहता है। यदि ब्रांड बेहतर कन्टेन्ट का मालिक है तो उसे किसी तरह का दबाव किंगडम छोडने को बाध्य नहीं कर सकता है। यदि कन्टेन्ट राजा  है तो कन्ज्यूमर रानी है जिसकी सन्तुष्टि में राजा अपनी सारी सेना के साथ लगा हुआ है। अपने ब्रांड के बेहतर उत्पादों के साथ राजा को रानी के मनोभावो और व्यवहारों की  सबसे बेहतर जानकारी होनी चाहिये।बी॰ साई कुमार नें अन्य तत्वों की बात तो की लेकिन इस रानी की बात नहीं की थी। इस महारानी पर परिचर्चा ईएमएम इन्टरनेशनल के संस्थापक चेयरमैन स्टीफेन व्हाईट ने  विस्तार से की थी। स्टीफेन ने आडियन्स डाटा मीजरमेंट और मैनेजमेन्ट जैसी अवधारणा को सामने रखा। यह मीडिया उद्योग की उपभोक्ताओं के व्यवहारों के मद्देनजर आने वाली तमाम अडचनों को दूर करने में सहयोगी हो सकता है बशर्ते इसको एक व्यापक सिस्टम के रूप में विकसित किया जाय। जब तक उपभोक्ता के स्वभाव तथा उसकी रूचियों का सही सही आंकलन नहीं होता और उसका सशक्त डाटाबेस नहीं बन जाता तब तक नये मूल्य सामने नहीं आयेगे और बाजारीकरण या मोनेटाईजेशन के बावत कुछ भी प्रभावशाली ठंग से नहीं किया जा सकता है। स्टीफेन ने यह स्पष्ट किया कि बगैर आडियंस मीजरमेंट तकनीक के हम नहीं जान सकते कि कौन विज्ञापनों के मैसेज ग्रहण कर रहा है, कौन टेलीविजन, रेडियो ,इंटरनेट के सूचनाधारित मूल्यों को ग्रहण करता है। इस तकनीक के बगैर  उन मूल्यों को मोनेटाईज नही कर सकते और न ही उनके  मू्ल्य भी हम ठीक से निर्धारित कर सकते हैं। आडियंस डाटा  मैनेजमेंट मीडिया उद्योग के लिये एक ऊर्जा जैसी चीज है जो इसके व्यापारीकरण और विकास के लिये सही प्रकाश मुहैय्या करायेगी। स्टीफेन ने दो ऐसी तकनीक का जिक्र किया जिसका इस्तेमाल अभी भारत में बहुत सीमित प्रचलन में है जबकि हम पहले ही एक डिजिटल संसार में प्रवेश कर चुके हैं। कम्प्यूटर एसिस्टेड टेलिफोनिक इन्टरव्यूईंग (केटी) तथा कम्प्यूटर एसिस्टेड पर्सनल इन्टरव्यूविंग (केपी) दोनो ही डाटा  कलेक्शन के लिये प्रयुक्त होते है और दुनिया भर मे कम्पनियाँ बिजनेस टू बिजनेस तथा बिजनेस टू कन्ज्यूमर दोनों क्षेत्तों में इसका उपयोग करती है।  हलांकि भारत जैसे देशो में अब भी पेपर डाटा कलेक्शन के लिये वही पारम्परिक पेपर-प्रश्नोत्तरी तकनीक का प्रयोग किया जाता है। सरकार और प्राईवेट कम्पनियां इसमें पैसा, समय और श्रम तीनों का नुकसान  करती हैं। अब जबकि बहुत हद कमसे कम शहरो में मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण उपभोक्ता वर्ग डिजिटल प्राणी है हम इस तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग कर सकते है। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण डाटा कलेक्शन तकनीक है पीपुल मीटर है।

Stephen White, Chairman, London-based EMM International

यह एक छोटा इलेक्ट्रानिक बक्सा होता है जिसे ग्राहक या दर्शक के टीवी सेट पर लगा देते है जो साल भर चौबिस घन्टे दर्शक के टीवी देखने की आदतों को रिकार्ड करता है-मतलब उसके चैनल व्यूईंग व्यवहार को आंकडों के रूप में संग्रहित करता है। इस समय टीवी व्यूईग पर किये जाने वाले सरकारी या प्राईवेट  कम्पनियों जैसे नेलसन इत्यादि के हर तरह के रिसर्च इसी तकनीक पर आधारित है।

आडियंस मीजरमेन्ट की यही  एक सबसे प्रचलित तथा कारगर तकनीक है क्योंकि पैनल को अलग अलग जनसंख्या,जाति धर्म  के हिसाब से लगाया जा सकता है और फिर समयानुसार डाटा संग्रह कर  उसका आवश्यकतानुसार विश्लेषण किया जा सकता हैं। इस तकनीक से संग्रहित आंकडों से हम उपभोक्ता के बारे में वह सब कुछ जान सकते हैं जो उद्योग की जरूरत है। इसके सहयोग से उपभोक्ताओं की सही पहचान कर हम  उत्पादों तथा विज्ञापनो की बिक्री को बढा सकते है और  कम्पनी का घटा कम किया जा सकता है। स्टीफेन जिस कम्पनी को चलाते हैं वह मीडिया आडिट करती है अर्थात यह आडिट, कम्पनी द्वारा मीडिया पर किये गये खर्च को नियंत्रित करती है तथा डाटा मीजरमेन्ट जैसी तकनीक से उन्हें प्रभावशाली मीडिया चुनने तथा अपने आडियंस तक आसानी से पहूंचने का रास्ता बतलाती है। आडियंस के व्यवहार बहुत अलग अलग और काम्प्लेक्स होते हैं जिसका ज्ञान इन कम्पनियों द्वारा उपलब्ध कराये गये मीजरमेंट तकनीक द्वारा बेहतर ठंग से पाया जा सकता है। उपभोक्ताओ के व्यवहारों का सही ज्ञान होने के बाद  किसी भी उत्पाद को बेचना आसान होगा। इससे आनलाईन विज्ञापनो  को भी बेचना ज्यादा सहज हो सकता है क्योकि इस तकनीक से विज्ञापन बनाने वाले को पता होता है कि विज्ञापन के साथ उपभोक्ता का व्यवहार कैसा होगा। डिसप्ले एड, क्लिक-थ्रू-एड, सर्च एड, सोशल एन्ड वाईरल एडस को बेचना ज्यादा सहज हो सकता है। बिजनेस से सम्बन्धित बडे निर्णयों में डाटा मीजरमेंट और डाटा विष्लेषण ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अभी दो दिन पहले ही आईबीएम के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बडी  एनलिटिक डाटा साल्यूशन कम्पनी टेराडाटा नें एक टेरा डाटा यूनिफाईड एनवारमेन्ट और यूनिफाईड डाटा आर्किटेक्चर को बाजार में उतारा है जो  डाटा मैनेजमेन्ट और विश्लेषण के मद्देनजर किसी कोलाईडर से कम नहीं है। यदि उपभोक्ता ही अन्तिम टारगेट है तो  टेराडाटा का यह बिग डाटा कोलाईडर  उपभोक्ताओं की पल पल की गतिविधियों को गहराई से विश्लेषित करने का साधन मुहैय्या कराता है।  ऐसे डाटा मैनेजमेंट टूल और एनलिटिक साल्यूशन्स न केवल टारगेट कस्टमर को बल्कि कम्पनी की मार्केटिंग स्ट्रेटेजिज से लेकर मार्केटिंग और विज्ञापनो पर किये जाने वाले खर्च को  बेहतर नियंत्रित और आप्टिमाईज करने में सहयोगी होगें। कम्पनियों की मार्केटिंग से सम्बन्धित समस्याओं का द्रुत गति से समाधान के साथ खर्चो को कम करने में यह बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। टेराडाटा द्वारा एक कान्फरेंस में  सोशलमीडिया पर किये  केस स्टडी को देखने से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। हलांकि बहुत हद तक ऑनलाईन मीडिया अपने कन्टेन्ट क्लिक, पेज विजिट, पर मिनट स्टे ओन पेज इत्यादि द्वारा स्वयं ही थोडा बहुत डाटा मीजरमेन्ट कर लेता है लेकिन यह इस दौर में अपर्याप्त है जबकि  हाईड्रा के सहस्र सिर वाला डिजिटल मीडिया  अस्तित्व में हो और डाटा के प्रवाह की रफ्तार मीडिया के लिये सबसे बडी ताकत बन चुकी हो। डिजिटल समय में  कम्पनियों के लिये मीडिया आडिट एक बेहतर उपाय है लेकिन भारत में 10-15 प्रतिशत कम्पनियां ही इसे अपना सकी हैं। जब मीडिया ऑडिट को ही अपनाने वालों की संख्या कम है तो बिग डाटा के  प्रयोग के बारे में कितनी भारतीय कम्पनियाँ सोच रही होंगी? न के बराबर और उसमें भी  टेरा डाटा यूनिफाईड एनवारमेन्ट और यूनिफाईड डाटा आर्किटेक्चर को कितने लोग अपने व्यापार के लिये प्रयोग करने के बारे में सोचेंगे?

दूसरी तरफ कन्टेन्ट इज किंग के बावत यह  डाटा मीजरमेंट  बहुत महत्वपूर्ण साबित होता है। कन्टेन्ट क्रियेशन और उसके वितरण तक में यह डाटा मीजरमेन्ट और एनलिसिस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कन्टेन्ट वितरण अब बहुत पारम्परिक नही रह गया है। स्पेश के सिकुड जाने तथा उनके अन्तर्सम्बन्ध और परस्पर कन्वर्जन की वजह से यह अब ज्यादा आसान तथा कम खर्चिला हो गया है। निःसन्देह कोई भी बी साई कुमार से सहमत होगा कि “हमें कंटेंट की गुणवत्ता पर अधिक से अधिक ध्यान देना चाहिए लेकिन हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हम हर जगह मौजूद हों।” यह कन्टेन्ट की गुणवत्ता ही है जो अन्तिमतः निर्णायक है।
साईकुमार के अनुसार, “2000-01 में टीवी18 समूह एक प्रोडक्शन कंपनी थी और आज यह ब्रॉडकास्टर कंपनी है। उनके अनुसार कंटेंट हमेशा से किंग की भूमिका में है। टीवी18 ब्रॉडकास्ट और प्रिंट में आने से पहले इसे समझ चुकी थी। हमने महसूस किया कि कंटेंट महत्वपूर्ण है लेकिन हमारे सामने सबसे बडी चुनौती उसकी खोज और वितरण की थी।”लेकिन क्या बारह साल बाद वितरण की समस्या वही रह गई है? प्रिट में जरूर इसकी एक बडी समस्या रही है क्योकि उसका भौतिक वितरण होता है लेकिन डिजिटल समय में यह कोई बहुत बडी समस्या नही है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और तमाम प्लेटफार्म्स का अन्तर्सम्बन्ध और कन्वर्जन एक समस्या हो सकती है जो समयानुसार हर जगह अपनी रफ्तार से सुलझती जाती है। कन्टेन्ट डिस्ट्रीब्यूशन उतनी बडी समस्या निःसन्देह नही रह गई है क्योकि आज एक कम पढा लिखा व्यक्ति भी अपने कन्टेन्ट को बगैर किसी विशेष खर्च कें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पहूंचा सकता है और क्षणभर में उसकी वायरल उपस्थिति हो जाती है।
रेबेका ब्लॉक कोई टैलेन्टेड नही थी लेकिन यू-ट्यूब पर विडियो अपलोड कर रातो रात सेलिब्रिटी बन गई। डिस्ट्रीब्यूशन पर आधिपत्य जैसी अवधारणाये पिछडेपन की निशानी कहीं जा रही है क्योकि  कन्टेन्ट के एक जनतांत्रिक वितरण का रास्ता हमने खोल दिया है। डिजिटल का बादशाह गुगल अब भी है जिसकी सलाना आय कमोवेश $36  बिलियन से अधिक है, उसके सीईओ इरिक स्मिट ने एक साक्षात्कार मे कहा था कि फाईबर आप्टिक्स तथा वायरलेस विस्फोट के बाद वे कम्पनियां जो कन्टेन्ट और डिस्ट्रीब्यूशन पर केन्द्रित हैं पीछे चली जायेंगी क्योकि डिस्ट्रीब्यूशन खत्म हो जायेगा। नेटवर्क की विविधता के बाद कन्टेन्ट उत्पादन भी कहां एकरेखिय रह जायेगा। एक ही कन्टेन्ट अपने मल्टी-डायमेन्सनल स्वरूप में हर कही उपस्थित होगा। कन्टेन्ट  किंग है और रहेगा यह सबसे बडा सच है। गुगल से जब बुक पब्लिशर्स नें किताब वापस लेने का निर्णय लिया तो उसके होश उड गये थे क्योकि उस कन्टेन्ट से ही उसके रेवेन्यू का एक बडा हिस्सा आता है। गुगल ने कहा आपको डिस्ट्रीब्युटर की जरूरत है और हम आपको फ्री दे रहे हैं साथ साथ फ्री स्पेश और बेचने की सुविधा के साथ खरादार को आपके दरवाजे तक भी भेंज रहे है बस आप चार-छः लाईन अपने कन्टेन्ट से दिजिये, दोनो का  आर्थिक हित इससे सध जायेगा। इसके बाद ही पुनः एक नया समझौता हो सका।
डिस्ट्रीब्यूशन को डिजिटल समय ने खत्म कर दिया है। हम एक मुफ्ट वितरण युग में हैं जहां लाखों डिस्ट्रीब्यूटर हाथ फैलाये खडे है कि मुझे इस्तेमाल करो, कि मुझे आजमा कर देखो। कन्टेन्ट क्रियेट करने वाले कम हैं उसके डिस्ट्रीब्यूटर ज्यादा है। दुनिया के सबसे बडे ब्लाग प्लेटफार्म्स कन्टेन्ट वितरण तथा उसका मैनेजमेन्ट मुफ्त करते हैं और यहां तक एड-रेवेन्यू भी कन्टेन्ट साझीदार या रचनाकार के साथ आधा-आधा बांटते हैं। वर्डप्रेस के रेवेन्यू का आधा यदि उसके प्रिमियम प्लेटफार्म की सेवा बेचने से आता है तो आधा ब्लाग के विज्ञापनों से आता है। प्रिंट के स्वर्णिम यग में डिस्ट्रीब्यूशन पर आधिपत्य कन्टेन्ट से बडी चीज थी और बहुत पत्र और पत्रिकाये डिस्ट्रीब्यूशन के कारण ही बाजार के सबसे बडे खिलाडी थे। सबको पता है कि 5 हजार से 10 हजार तक की संख्या वाली पत्रिकायें कन्टेन्ट से ज्यादा यह बेचती थी कि उनकी कितने शहरों मे तथा कितने बुकस्टाल पर उपलब्धता है और विज्ञापनों की उन्हें कोई कमी नहीं होती थी। लेकिन अब ऐसा नही है।  अब 10 हजार कापियां प्रिंट की  पर्याप्त नही रही पहले जबकि इस संख्या पर विज्ञापनों की बाढ आ जाती थी। अभी सप्ताह भर पहले न्यूज विक ने अपने प्रिंट संस्करण को बन्द कर दिया और डिजिटल स्पेश में कदम बढाया है। मीडिया भी केवल अब न्यूज मीडिया तक सीमित नहीं है। वह फोटोशेयरिंग वेबसाईट जिस पर एक बडी जनसंख्या  घंटो अपना समय फोटो देखने में बिताती है भी एक मीडिया है, यू-ट्यूब और ट्वीटर भी एक मीडिया है तथा ब्लाग भी एक सशक्त मीडिया है। मीडिया के सामने कन्टेन्ट और उस कन्टेन्ट का विभिन्न प्लेटफार्म्स के हिसाब से कन्वर्जन ज्यादा बडी चुनौती है। डिस्ट्रीब्यूटर हर जगह हाथ पसारे खडे है कि मेरे साथ अपना कन्टेन्ट शेयर करो, कि मेरे साथ करो। डिस्ट्रीब्यूशन की मारामारी है। यदि जनतंत्र ने सच में कही स्वयं को स्थापित किया है तो वह है डिस्टीब्यूशन है-हम डिस्टीब्यूशन के जनतंत्र में हैं जहां कन्टेन्ट एक महाराजा है।
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