Posted by: Rajesh Shukla | October 19, 2012

डिजिटलयुग: यूटोपियन समय की वास्तविक उपस्थिति


“आइ एम ऑन ए माउन्टेन। ग्रेस इज इन दी बाथ टब। एड इज ऑन दी फोन”- मेयर की किताब “मुवींग” से

डिजिटल युग एक अमूर्तन का युग है लेकिन इसमे होना एक वास्तविक उपस्थिति है। यह एक अमूर्तन का युग इसलिये है कि टैक्स्ट, स्पीच और छवियां तीनों डिमेटिरियलाईज होकर शून्यता में प्रविष्ट करती हैं फिर वहीं से निःसृत होती है और हमारे सामने उपस्थित होती हैं मानो हम पुनः वैदिक ॠचा को दुहरा रहे हों। डिजिटल युग हमें एक यूटोपियन समय में ले जा रहा है जहां सम्भवतः स्पेश और टाईम दोनों की अवधारणायें बदल जायेंगी। हम इसका अनुभव भी शायद कर रहे हैं। मीडिया स्केप लगातार बदल रहा है, नये मीडिया प्लेटफार्म्स की सम्भावनायें परम्परागत मीडिया की तुलना में अपरम्पार हैं। हम एक उत्तर मीडिया लैण्डस्केप में प्रविष्ट हो रहें है जहां सूचनाओं के उत्पादन, वितरण तथा उपभोग तीनों पहले जैसा ही नहीं रहने वाला है। उत्तर मीडिया लैण्डस्केप एक इनटरेक्टिव मीडिया स्केप है जहां टैक्स्ट या छवि या मूवींग इमेजेज का स्वरूप वही नही रह जायेगा तथा इनके उत्पादन को अपने पुराने एकरेखीय विकास को छोडकर सोशल मीडिया, मोबाईल मीडिया, टैबलेट्स, अप्लीकेशन्स, इन्टरनेट टीवी इत्यादि के अनुसार विकसित होने की बाध्यता होगी। इनके इन्टरेक्टिव स्वरूप के बगैर उनके वितरण तथा उपभोग की सीमाये जस की तस बनी रहेंगी। इस बदलाव की दिशा में मीडिया बहुत तेज गति से भाग रही है।

इस मद्देनजर मीडिया में विचारो, भावनाओं इत्यादि का रिप्रेजेन्टेशन तथा अनुभवों का स्वरूप भी वही नहीं रहेगी, यह भी माध्यम के अनुसार अपना स्वरूप बदलेगा।  किसी भी तरह के कन्टेन्ट के सर्कुलेशन में ही हम देख रहे हैं कि वह किस तरह अन्त में अपना स्वरूप बदल देता है। एक छवि  सोशल मीडिया के यूजर्स हाथ में घूमते हुये इन नई छवि में तब्दील हो जाती है।  इन सब बदलावों के बीच उपभोक्ता भी अपने व्यवहार का मोड बदलेगा। उपभोक्ता और सूचनाओं के उत्पादन के बीच जो सम्बन्ध था डजिटल मीडिया उसे नये ठंग से परिभाषित कर रही है। इन सबके साथ निःसन्देह एक द्रुत सामाजिक बदलाव हम देख रहे हैं और इसे एक नया स्वरूप देने की तरफ अग्रसर है। जो नर्क परम्परागत मीडिया में सर्कुलेट हो रहा था उसका इस स्पेश में भी द्रुत गति से प्रवेश होना अवश्यम्भावी है। परम्परागत मीडिया का सारा ध्यान इस स्पेश पर केन्द्रित है। सोशल मीडिया, मोबाईल मीडिया, टैबलेट्स, अप्लीकेशन्स, इन्टरनेट टीवी यह मीडिया का एक नया जागरण है, नया क्षितिज है। इसे ही हम उत्तर मीडिया लैण्डस्केप कहते हैं। उत्तर मीडिया लैण्डस्केप एक एमबेडेड सिस्टम है, एकदूसरे में अन्तर्गुन्थित तथा एक दूसरे में प्रवाहित होता हुआ। सूचना के प्रवाह तथा एक दूसरे से परस्पर अन्तर्सम्बन्धित सम्वाद की नई सम्भावनाओं के साथ यह मीडिया का एक मेगा स्ट्रक्चर है। एक ही अन्तर्वस्तु के अनुभव की सम्भानायें कई गुनी बढ गईं है जो निःसन्देह बाजारीकरण की प्रकिया को एक नये युग में ले जाने वाली है। उत्तर मीडिया लैण्ड स्केप में बाजारीकरण की रफ्तार धीरे धीरे जोर पकडने लगी है। एक सप्ताह पहले ही यह खबर सामने आयी थी कि अमेरीका में मोबाईल मीडिया के उपभोक्ताओं की सख्या में कई गुना इजाफा हुआ है और सोशल मीडिया नें परम्परागत मीडिया को बहुत पीछे छोड दिया है। इन्टरनेट ने टीवी और प्रिंट मीडिया को कमोवेश समाहित कर लिया है और सबको समाहित कर लेने वाला मीडिया मोबाईल मीडिया होने वाला है। यह एक क्रान्तिक परिवर्तन है, केवल सूचना के उत्पादन और वितरण के बावत ही नहीं बल्कि बाजार के मद्देनजर भी है। बाजार की गति तथा उसका स्वरूप निःसन्देह बदला है, मार्केटिंग वही नहीं रह गई है। इस क्रान्तिक रूप से बदले परिवेश में क्या हम उसी तरह से पत्रकारिता कर पायेंगे? उत्तर मीडिया लैण्डस्केप के वर्तमान स्वरूप में पत्रकारिता का स्वरूप क्या होगा यह शायद हमनें अभी तक नहीं पूछा है। भारतीय पत्रकारिय लेखन में इस पर चर्चा एक दम नहीं हो रही है, प्रिट मीडिया में शायद ही कोई लेख इस महत्वपूर्ण विषय पर मिले। उत्तर मीडिया लैण्डस्केप में पत्रकारिता निःसन्देह भाषाई स्तर पर बहुत अलग है।

मसलन वर्तमान मीडिया समय में एक भाषा में लिखने वाला पत्रकार एक असफल पत्रकार होगा क्योकि उसकी गति इस उत्तर मीडिया में बहुत सीमित होगी। सवाल यहां गति का है, परस्पर माध्यमों के बीच सम्वाद को स्थापित करने का है और अधिक से अधिक लोगों तक पहूंच का है। मीडिया के विशेषज्ञों नें इस नये एम्बेडड मीडिया सिस्टम को एक ऐसा तंत्र माना है जो अपने स्वरूप में अतिक्रमणशील अर्थात ट्रांसग्रेसिव है। इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि इस स्पेश में भाषा भी स्वयं का अतिक्रमण करती है। इस बात की ताकीद हमें न केवल इंटरननेट की एक बेहतर भाषा से होती है बल्कि उस चैट की कोडेड भाषा से भी होती है मसलन चैट रूम मे घुसते ही टाईप किया जाता है “पिंग जॉन”। यह एक डिजिटल संसार का प्राणी है- आण्विक। दूसरी तरफ ऑनलाईन मीडिया स्पेश में  टैक्स्चुअल प्रोडक्शन एक ग्राफिक स्तर को भी समेटता है अर्थात आर्नामेन्टशन या अलंकरण भाषा में पुनः एक महत्वपूर्ण स्थान पाने लगा है। हम इस एस्थेटिक को नहीं समझ रहे हैं। एक वेबपोर्टल के बतौर हमें यह नहीं पता कि एस्थेटिक इन्टरेक्टिवीटी क्या होती है? जबकि टीवी वाले इसे अनजाने ही सही सबसे महत्वपूर्ण स्थान देते हैं। यदि इस लेख को यदि मैं ग्राफिक्स के साथ प्रस्तुत करूं तो सम्भवतः यह भाषाई स्तर पर ज्यादा कम्यूनिकेटिव होगी तथा अन्तर्वस्तु को जल्दी समझ लिया जायेगा। उन ग्राफिक्स के सर्कुलेशन की सम्भावना भी कई गुनी बढ जायेगी। एक लेख के उत्पादन तथा उसके रिप्रेजेन्टेशन की सम्भावना इस स्पेश में प्रिंट मध्यम की तुलना में सहस्र गुना अधिक है तथा सस्ता भी है। स्पष्ट है पत्रकारिता का अंदाज तथा ठंग पूरी तरह बदल जायेगा। ऑन लाईन मीडिया में पत्रकारिता उसी तरह नही रह सकती जैसा प्रिंट में होती थी। ऑन लाईन मीडिया में लेख अब भी उसी तरह अरूचिकर ठंग से प्रस्तुत किये जाते हैं जबकि चीजें बदल जानी चाहिये। लेखन का कलात्मक प्रस्तुतीकरण कई चीजों को बदल सकता है। इसमें अन्तर्वस्तु के साथ विज्ञापनों के लिये भी एक स्पेश बन सकता है जिसमें रेवेन्यू की एक अच्छी सम्भावना है। ऑन लाईन मीडिया वेबसाईट्स को इस पर ज्यादा ध्यान देनें की जरूरत है। दूसरी बात व्यापारिक लेखन की है जैसा फुडी शो वाले करते हैं। इस लेखन में एक कलात्मक पुट के साथ उस विषय में या उस उत्पाद के बारे में बेहतर ज्ञान की जरूरत रहती है। इस व्यापारिक पत्रकारिता का एक सौन्दर्यशास्त्र है जिसे भारत में ही कुछ लोगों ने बेहतर ठंग से किया है और इसे सीखने की जरूरत है।  फिल्म पत्रकारिता भी इसी व्यापारिक लेखन की कोटि में आती है क्योकि भारत में आलोचना सम्भव नहीं है। फिल्म यहां सिर्फ व्यापार है न कि “कला के अन्तर्गत व्यापार भी है” इसलिये उसमें लेखन की कोई सम्भावना नहीं है क्योकि लेखन सदैव आलोचनात्मक होता है। आलोचनात्मक लेखन सदैव नये की तरफ प्रस्थान के परिप्रेक्ष्य में होता है, यह स्वरूपतः एक वायलेन्स के साथ चलता जबकि हम मानते हैं “नथिंग इज न्यू अण्डर सन”। हमने पैसठ वर्षों में कोई प्रगति सिनेमा में नहीं की है, अब भी सिनेमा गाना-बजाना से उपर नहीं उठ पाया है। सब्जेक्टिव लेवल पर एक फोरजरी होती है और जनता को कुछ देने के की क्या जो कुछ भी सोचने समझने की सम्भावना उनमें है वह भी छीन लेने की कोशिस चलती रहती है। पश्चिम जगत में पूंजीवाद का जो स्वरूप विकसित हुआ उसमें एक बोधि थी, एक तरह का एनलाईटेनमेन्ट था लेकिन हमने उसे एक परजीविता में बदल दिया। एक अमेरीकी विचारक ने अभी हाल ही में कहा है कि वर्तमान आर्थिकमंदी वास्तव में दिन प्रतिदिन पूंजीवाद के अनुत्पादक और अरचनाशील बनते जाने के कारण है। एक सच्चाई निःसन्देह इसमें है क्योंकि पूंजीवाद के सबसे बेहतर क्षण आधुनिकता के दौर के क्षण हैं जब न केवल पूंजीवाद नें आर्थिक समृद्धि के नये इतिहास बनाये बल्कि तकनीकी विकास की ऊंचाईयों के साथ अन्य क्षेत्रों में अपूर्व सफलता अर्जित की थी। मैं उपरोक्त बातें बेहतर फिल्मो के बारे में कह रहा था जैसा कि थ्री इडियेट फिल्म थी। यह फिल्म मूर्खता को सीखने का आदर्श, जिनियश बनने का पैमाना के रूप में सामने रखती है जिसे अब तक के इतिहास में किसी गुरू ने शायद ही  सिखलाया होगा। वास्तव में यह फिल्म दब्बू होते जा रहे शहरी समाज के लडकों के लिये बनाई गई थी इस मद्देनजर की इसको देखकर वे थोडा “कमीना” हो जायेंगे। “कमीना” फिल्म भी उन्ही दब्बूओं के लिये बनाई गई थी।

ऑन लाईन मीडिया में इस तरह की पत्रकारिता की एक बडी सम्भावना है। तीसरी बात उस पत्रकारिता की है जिसे हम लोग करते हैं। यह पत्रकारिता मूलभूत रूप से किसी समाज के बीस प्रतिशत वर्ग को निर्देशित रहता है। इसका बौधिक स्तर उंचा रहता है इसलिये इस पत्रकारिता में गहरे अध्यवसाय के साथ लेखन में एक पैनापन, एक स्टाईल की जरूरत होती है। ऑन लाईन मीडिया के दौर में इस पत्रकारिय लेखन को वैचारिक धरातल पर बेहतर होना होगा क्योंकि जो कुछ वह लिखेगा वह प्रिंट की तरह दो तीन घण्टे नजरों के सामने नहीं रहने वाला, उसे दुनिया के किसी कोने में, किसी के द्वारा किसी समय पढा जा सकता है। कभी भी उसे गुगल किया जा सकता है। प्रिंट में हमारी बात को विश्व के लोग नहीं पढते थे लेकिन अब पढ सकते हैं। अब बौधिक फोरजरी भी नही की जा सकती है क्योकि जो कुछ छपेगा उसकी मिनट में अन्तर्राष्ट्रीय उपस्थिति हो जायेगी और करोड़ों लोगों तक सूचना पहूंच जायेगी। गौरतलब है हिन्दी पढने वालों की संख्या अमेरिका तथा यूरोप में कम नहीं है। शिक्षकों,विद्यार्थियों से लेकर ग्राहकों तक सबको इस लेखन में एक बेहतर कन्टेन्ट की तलाश रहती है। यह स्वयमेव एक फुडी है। चौथी बात यह है कि ऑन लाईन मीडिया में जिन मीडिया हाऊसेस के पास चैनल नहीं है उनके डिजिटल कन्टेन्ट नहीं है। वे इस कन्टेन्ट को एक अलग स्तर पर रेगुलर फिचर के बतौर ला सकते है। ऑनलाईन मीडिया इसे एक अलग इंटरनेट टीवी के रूप में सामने ला चुका है लेकिन इस क्षेत्र में पांव पसारने वाले नितान्त अलग रहकर अपना एक स्थिर स्पेश विकसित नहीं कर पायेंगे। आँनलाईन मीडिया की जो मेन न्यूज मीडिया है वह इसे समाहित करके स्वयं को विकसित करेगी। इसके लिये बहुत निवेश की भी जरूरत नहीं है। पांचवीं बात प्रिंट की तरह हम अब सोलह पेज तक सीमित नहीं रहे, अब कन्टेन्ट को विस्तार देना चाहिये। मीडिया को हर विषय पर एक कन्टेन्ट की बाढ लाने का मौका है। बेहतर की सम्भावना कई स्तरों पर बढ गई है। मसलन धर्म और आध्यात्मकता जैसे विषयों को स्पेश की कमी के कारण प्रिंट के दौर में खत्म कर दिया गया था लेकिन अब इसे एक बेहतर कन्टेन्ट के बतौर परोसा जा सकता है। ऐसे अन्य क्षेत्र भी हैं जिन्हें एक बेहतर कन्टेन्ट के साथ परोसा जा सकता है तथा अपने माध्यम का कलेवर बढाया जा सकता है। डिजिटल युग का अपना एक अलग ही सौन्दर्यशास्त्र है जिसपर भारत में बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। डिजिटल युग का यूटोपियन समय एक  अद्भूत रचनात्मक सम्भावनाओं से भरा हुआ है। बर्नांडेट मेयर की किताब मुवींग की “आइ एम ऑन ए माउन्टेन। ग्रेस इज इन दी बाथ टब। एड इज ऑन दी फोन” यह पंक्ति इस सौन्दर्यशास्त्र की एक बानगी है।

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