Posted by: Rajesh Shukla | October 19, 2012

जी-न्यूज की नवीन जिंदल के खिलाफ काऊंटर मुहीम


और मैं हमेशा सोचता था:
एकदम सीधे सादे शब्द पर्याप्त होने चाहिये
मैं जब कहूं कि चीजों की असलियत क्या है
प्रत्येक का दिल छलनी हो जाना चाहिये –ब्रेख्त

संस्कृति उद्योग बनाम पारम्परिक उद्योग । इस “बनाम” पर कुछ लिखा ही जाना चाहिये क्योकि इन दो  दुनियाओं में राजनैतिक-आर्थिक तथा सामाजिक वर्चस्व को लेकर ठनी हुई है। जी-न्यूज बनाम नवीन जिन्दल का जिन्दल ग्रुप के बीच जो लडाई सामने आई है वह वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृतिक उद्योग बनाम पारम्परिक उद्योग  है।  पिछले दिनों जी-न्यूज नें नवीन जिंदल  के लूट-व्यापार को  अपने एक कार्यक्रम “काला पत्थर” द्वारा सामने लाने की कोशिस की थी। यह कुछ दिन पहले सामने आये कोयला घोटाले  की एक दास्तान थी। सांस्कृतिक उद्योग में जी-टीवी एक बडा  ब्राण्ड है जिसका जी-खबर भी एक  एन्टरटेनमेन्ट उद्योग ही है जिसकी कमाई का स्रोत  न केवल विज्ञापन है बल्कि फिरौती भी है साथ साथ इसका तीसरा फायदा  तमाम  तरह का राजनैतिक-सरकारी लाभ भी है। सामाजिक धौंस अलग कि हम खबरिया पुलिस हैं कि हम मुखबिर हैं।  नवीन जिंदल एक स्थापित उद्योगपति है जो परम्परागत मेटल तथा अन्य खनन जैसे बिजनेस में है लेकिन उनका कोई न्यूज बिजनेस नहीं है। हलांकि एक छोटे  संस्कृति उद्योग  समकालीन कला  में उसका एक वर्चस्व है और  जिन्दल ग्रुप एक पत्रिका आर्ट इंडिया भी छापता है जिसमें कला का उद्योग करने वाली गैलरियां तथा समकालीन कलाकर विज्ञापन देते हैं। हर शब्द का पैसा लिया जाता है।  इसकी कमाई का स्रोत एक शुद्ध सांस्कृतिक एजेंटी है।  यहां सांस्कृतिक राजनीति करते हैं, अंग्रेज अपना सौन्दर्यशास्त्रीय सेन्स थोपते है,  दुर्गा जी,लक्ष्मी जी, सरस्वती जी को नग्न चित्रित करवाते हैं और उसके सर्कुलेशन से पैसा कमाते हैं। इस उद्योग में सांस्कृतिक कन्ट्रोवर्सी तथा एजेन्टी प्रमुख व्यापारिक साधन रहा है।  कम्पनी के मेटल से तीन सौ गुना कमाई कैसे हो सकती है यह जिन्दल ही बता सकते है। दूसरी तरफ जी-न्यूज का सांस्कृतिक उद्योग भी बहुत व्यापक है इस पर चर्चा  जल्द की जायेगी फिलहाल इस कार्पोरेट का खबर-उद्योग के बारे में जो कुछ सामने आया है उसे इस पोस्ट में देखते हैं ।

जी-न्यूज उद्योग में चैनल हेड सुधीर चौधरी  पर जब नवीन जिंदल ने क्राईम ब्रांच में एफआईआर करवाया तो वह करप्शन से रूबरू हो रही और थक चुकी जनता के लिये एक अन्य ब्रेकिंग न्यूज थी।  खबर उद्योग जो  ज्यादातर मामलो में कार्पोरेट दलाली पर ही जीवित है  केजरीवाल-अन्ना के बहाने राजनैतिक तबके तथा अन्य जिन्दल जैसे देसी उद्योगपतियों पर दबाव बनाकर अपनी छवि सुधारने की जो कबायद कर रहा था,  सकते में आ गया । चैनलों के सम्पादक आननफानन में सुधीर चौधरी पर एक अन्दरूनी जांच बैठाकर स्वयं को बचाने की कोशिस करने लगे। चैनल की फिरौती की जांच फिलहाल एनबीएसए नामक कोई छद्म तंत्र कर रहा है। करप्शन की महागाथा चल रही है लेकिन उसमे कमाल की एक हिपोक्रेसी है। मसलन कोयला घोटाला रातों रात गायब हो गया मानो कोई झंझावात आया हो और उसे उडा ले गया हो।

आज सुधीर चौधरी एक विद्रोही तेवर  के साथ नवीन जिंदल को सबक सिखाने तथा अपने चेहरे पर पुती कालिख को साफ करने  की नई कोशिस करते हुये एक नये कार्यक्रम के साथ नजर आया और अपने सहोदरो से ही पूछ लिया कि भाईयों एकायक यह कोयला घोटाला खबर से कैसे गायब हुआ? इसे तो होना ही था, भारतीय बुर्जुआ की पोंदी में  जनता को भगंदर दिख चुका था और उसे किसी हालत में तोपना था जिससे शोषण और लूट जारी रहे। कौन था जो उसमें काला नहीं था? क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, क्या मीडिया।  प्रिंट मीडिया की एक बडी हस्ती  शिकंजे में फंसती नजर आयी और अखबार ” लोकमत” की छिछालेदर हो गई । छिछालेदर हुई तो क्या हुआ?  छिछालेदर का ही नाम बुर्जुआजी है। जिस तरह एक वेष्या को कोई शर्म छिछालेदर से नही होती उसी तरह इस कार्पोरेट की और उसकी मीडिया की हालत है।

विद्रुप सभ्यता का एक लोभी संचालक दूसरे लोभी संचालक की लूटगाथा कैसे सुना सकता है? लेकिन यह भी एक सच के साथ चल रहा है, पूरा थियेटर है लेकिन ड्रामाटिक है। हमे बडा दुःख है कि  ट्रेजेडी नहीं है इसमें। हमलोगो को तो इस ड्रामा मे कोई मजा नहीं आता, हम लोग तो इस ड्रामा तथा बीच बीच में वेष्याओं का आईटम सांग से थक गये हैं।  जब तक यह एक ट्रेजेडी न बन जाय और पुनः एक टै्जिक कामेडी न बन जाये हमें आनंद न मिलेगा। जी-न्यूज के हेड सुधीर चौधरी ने निचे वाला फोटो विशेष रूप से नवीन जिंदल के भीतर बैठे कुरूप-बिद्रुप राक्षस को परदे पर दिखाने के लिये चुना है। मूलभूत रूप से एन्टरटेनमेन्ट बिजनेस में होने से चैनल काफी ड्रामेटिक है। नवीन जिन्दल  किसतरह जी-न्यूज के हीरो से पेश आते हैं यह इसमे दिखाया गया है। वास्तव में नवीन जिन्दल को मैने इतना कुरूप अब तक नही देखा था। मैने नवीन जिंदल को करीब से देखा है, एक उद्योगपति लगते है और इतना बुरा वह क्रोध मे भी नही लगते  है। यह चेहरा बहुत कुरूप है और डरावना है। ऐसा लगता कि उद्योगपति नही कोई मानव मांस भक्षक हो। लेकिन यह रूप जिन्दल ने दिखाया क्यों? क्यों किसी और चैनल ने उसका यह चेहरा नहीं देखा? शायद जिन्दल ने एक उद्योगपति के बतौर दूसरे उद्योग जी-ग्रुप के  खबरिया धौस से आजिज आकर यह रूप दिखाया था। साले तू अपनी औकात में रह।  तू भी वही हो हम भी वही। यह कोई करप्शन की लडाई नहीं थी बल्कि औद्योगिक वार है तथा लूट में वर्चस्व की लडाई है।  जी-न्यूज को समझना चाहिये कि वह भी इसी खेल का हिस्सा है इसलिये उसे दूसरे का खेल बिगाडने का अधिकार इसलिये नहीं मिल जाता कि वह खबर उद्योग में है।  वास्तव में यह अधिकार सिर्फ हम लेखको और आलोचकों का है जो मार्जिन पर खडे होकर इस वेष्यावृत्ति के साक्षी बने हैं।

खैर! इन सबके बीच सुधीर चौधरी नें जिन्दल का ईमेल भी आज सामने रखा, यह उसका एक साक्ष्य है। उसके अनुसार जिन्दल नें जी-न्यूज को खरीदने की पेशकश की थी । लेकिन इस  खरीद फरोख्त की कथा तब सामने आई है  जब खरीद फरोख्त में सुधीर फंस गया और क्रिमिनल केस फाईल हो गया।  जी-न्यूज पर सुधीर ने सफाई दी कि यह खरीदफरोख्त अंजाम तक नही पहूंचा क्योकि जो कन्ट्रैक्ट बनवाया गया था उसके पीछे की साजिश का नवीन जिन्दल को सुराग मिल गया था। नवीन जिंदल बडा पहूंचा हुआ गुरू है भाई जो उडती चिडिया के पंख तक गिन लेता है। यह कोई सीआईए का एजेंट तो नही है क्योकि भारत में ईमेल पर नजर उसकी ही रहती है। इसकी जांच पडताल कौन करवायेगा? जी-न्यूज ने नवीन जिन्दल से खबर रोकवाने के लिये 50 करोडं की फिरौती मांगी थी इसका केस फाईल किया जा चुका है। क्रिमिनल केस है तो ईमेल की भी जांच पडताल होगी और फोन कॉल्स की भी हो जायेगी। लेकिन यह 100 करोडं की विज्ञापन डील वाली कहानी नई है। हलांकि यह कोई बडी बात नहीं है। हर चैनल इस तरह की डील कम-ज्यादा करता ही है, पेडन्यूज भी एक डील ही है,पेड प्रोग्राम भी एक डील ही है।  जी-न्यूज ने जिन्दल के इम्पायर का पर्दाफास करने के लिये “काला पत्थर” कार्यक्रम बनाया था लेकिन उसका उद्देश्य यह फिरौती ही था न कि कोई पर्दाफाश। इस शब्द को भूल जाईये। यह शब्द हमारे तंत्र के लिये मुनासिब नही है। हम “पर्दाफास” नही कर सकते क्योकि हम जिस तंत्र में है वह एक सामंती-पूंजीवादी तंत्र है जिसका आधार ही करप्शनऔर लूट  है। बुर्जुआ सारी बुर्जुआजी पर्दे के पीछे ही करता है।  यदि बुर्जुआ पर्दाफास भी करेगा तो उसका रिहर्सल करने के बाद  की गई नौटंकी होगी। न्यूज की नौटंकी रोज आप देखते ही हैं वेबजह हाफता हुआ रिपोर्टर । इस नौटंकी में एक ट्रैजिक स्क्रिप्ट लिखने वाला हो जनता का कुछ भला हो सकता है। गांधी भले ही बहुत परवर्ट हो लेकिन उसे ट्रैजिक पसंद था -मरती हुई गाय को उसने बचाया नही जहर देकर मार दिया। भारतीय जनतंत्र सडक पर पालीथीन खाकर मरती हुई एक गाय है उसे  जहर का इंजेक्शन देने की जरूरत है। वही इस सदी में भारत का सबसे बडा नेता होगा। इस समय जो किया जा सकता है वह कोई नही करना चाहेगा–समग्र क्रांति या लाल क्रान्ति। जनतंत्र की एक नई लडाई लडने के बाद ही हम दलालों, लूटेरों और विदेशी ऐजेंटो से मुक्त हो पायेंगे । मीडिया अपनी हिपोक्रोसी जारी रखे, इस एन्टरटेनमेन्ट के भी दर्शक जरूर है लेकिन मीडिया यह न भूले कि वह मूलभूत रूप से क्या है। वेष्यावृत्ति जारी रखो और परवर्जन को फ्लाईट दो जिससे यह पहले से ही परवर्ट जनता को थोडा और सुख मिले। साफ सुथरा होने की अश्लीलता और वेष्याओं की लज्जाशीलता के साथ यूं ही चलते रहों, हम गिन रहे है वर्ष–1112 वर्ष हो गयें इस विद्रुप जीवन के । ईश्वरीय समय लौटने वाला है और जनता अपने विवेक की अग्नि से  नये जीवन को रचेगी।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Categories

%d bloggers like this: