Posted by: Rajesh Shukla | October 18, 2012

केजरीवाल टीवी मीडिया की टीआरपी


राजनैतिक पार्टियों और तमाम राजनैतिक सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले संगठन यह जानते है और हम भी यह जानते हैं कि अन्ना-केजरीवाल का राष्ट्रीय अवतरण  टेलीविजन मीडिया की देन है। ऐसा नहीं है अन्ना हजारे या केजरीवाल ही एक मात्र हैं जिसने सामाजिक राजनैतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की है, बहुत सारे संगठनों और राजनैतिक दलों ने भी उसको सदैव उठाया है और सडकों पर आये हैं। टीम अन्ना की सदस्य रहीं मेधा पाटकर नें न केवल भ्रष्टाचार बल्कि सरकारी दमन और गरीब किसानो के विस्थापन जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है लेकिन मीडिया ने उसे बहुत  तरजीह नहीं दी थी। गंगा  के प्रदूषण को लेकर अनशन कर रहे संत मर गये लेकिन मीडिया के लिये वह कोई मुद्दा नहीं था! क्या गंगा एक राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है? क्या यह देश की जनता के रग रग में नहीं बसी हुई है, क्या इससे देश की अर्थव्यवस्था, खेती, पर्यावरण नही जुडे हुये हैं? लेकिन मीडिया को इनसे बहुत लेना देना नही है।  चाहे वो वायु प्रदूषण हो, जल प्रदूषण या समाज प्रदूषण इससे पूंजीपति जुडा है -करप्शन भी इसी की देन है इसलिये यह मुद्दा नहीं है। नेता तो उत्तरदायी भी है लेकिन यह हर चीज के प्रति अनुत्तरदायी  है । मीडिया को इस अनुत्तरदायी, एनलीकरण करने वाले देशवीहीन गलोबल लूटेरों की लूट पर भी एक कार्यक्रम  करने का साहस करना चाहिये। मीडिया के लिये बाजार ही सबसे पवित्र है और उसमें जो भी कुछ हो रहा है वह वैध से भी वैध है। टीवी मीडिया ने अन्ना-केजरीवाल को संसद से भी ऊंचा क्यों उठा दिया? जन्तरमंतर संसद कैसे बना?  इसका जबाब बहुत आसान है- पहला यह की टेलीविजन मीडिया का 24×7 खबर के लिये अन्ना-केजरीवाल टीआरपी हैं  ऐसा लगता है मानो स्टूडियों में ही बैठे हों। जंतरनंतर या केजरीवाल-अन्ना का घर राष्ट्रीय न्यूज सेन्टर है। मीडिया वाले इससे बाहर कुछ देख ही नहीं पा रहे हैं। बुडापेस्ट में इंटरनेट पर जो वार्ता हुई उसपर एक चर्चा नहीं हुई जो   देश की अर्थव्यवस्था  का एक बडा क्षेत्र है। दूसरी बात यह कि केजरीवाल मूलभूत रूप से अमेरीकी पिट्ठू है, फोर्डफाऊंडेशन द्वारा पालित एक अमेरीकी राजनैतिक हस्तक्षेप है।  यह जो तीसरे मोर्चे से भी अलग एक अल्टर्नेटिव की बात मीडिया कर रही है वह वर्तमान राजनैतिक परिवेश से इतर एक एसे परिवेश की  बात है जिसमें केजरीवाल जैसे एनजीओ के जोम्बी नेता होंगे। वास्तव में यह वर्तमान करप्शन की होली, दलालों की राजनीति  है तथा यह अमेरिकी राजनैतिक हस्तक्षेप है। इसका मूल स्वरूप अनार्किक है तथा  इसका उद्देश्य  एनकेन प्रकारेण वर्तमान जनतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर एक कार्पोरेटिज्म की स्थापना करना है । यह  एक अलग ही फासिज्म है। इन नये फासिस्टों के अनुसार देश के दोनो प्रमुख दल मूलभूत रूप से करप्ट हैं, लूटेरे है तो कौन होगा देश का नायक? फोर्डफाउंडेशन का एजेंट। वाह! यह मुनीब बडा चालबाज निकला भाई, बाकी तो राजनीति करने वाले चुतिया हैं।  सभी मीडिया कर्मियों को पता है कि टेलीविजन मीडिया का ज्यादातर तबका अमेरिकी है। ज्यादातर न्यूज चैनल अमेरिका द्वारा नियंत्रित हैं तथा मीडिया में एफडीआई के बाद यह नियंत्रण और भी अधिक हो गया है। इसलिये यह अमेरकी पिट्ठू देश के चुने हुये करप्ट नेताओं से भी महत्वपूर्ण हो गया है। इस शहरी मध्यवर्गीय दलाल नें मायावती के करप्शन या मुलायम के करप्शन पर कोई प्रेस कांफ्रेस अब तक नही की है, यदि की होती तो कब का जुतियाया गया होता। मीडिया के लिये यह एक बेहतर खबरिया माल है जिससे मीडिया को बगैर कुछ सोचे समझे एक परमानेन्ट बतकूचन करने का विषय  मिल गया है । खबर जुटाने के झंझट से मुक्ति हो जाती है, 24×7 कट जाता है, जनता बेवकूफ बन जाती है और कैपिटल बगैर किसी निवेश और परिश्रम के खडा हो जाता है।
दूसरी तरफ हमे इस बात को नजर अंदाज नहीं करना चाहिये कि जो छोटे मोटे भारतीय क्रोनी कैपिटलिस्ट्स इस क्षेत्र में अमेरीकियों के साथ गठबंधन बनाये हुये वे एक मात्र पैरासाईट है ठीक वैसे ही पैरासाईट जैसा हमने उपनिवेशवादी दौर में देखा था। यह वर्ग मीडिया में रहकर हर चीज से आंख मूदे रहता है क्योकि उन्हें अपनी बुद्धि से अमेरिकियों की बुद्धि पर ज्यादा विश्वास है। मीडिया ने जिस तरह की चीजो का प्रचार तथा दुष्प्रचार किया है वह इस वर्ग के कारण हैं। आज भी भारत की वह मीडिया जो अब भी भारतीय है अकडमबकडम खबर नहीं उत्पादित करती, वह अपना राष्ट्रीय उत्तरदायित्व समझती है।  जिस तरह सरकार ने अमेरिकीकरण को बहुत द्रुत गति से बढावा दिया है उसी का परिणाम अब उन्हें ही भोगना पड रहा है। यह कुछ भस्मासुर जैसा बन कर सामने आया है। कांग्रेसियों नें सोचा कि मीडिया में एफडीआई लाकर अंग्रेजों को मीडिया में वर्चस्व मिल जायेगा और उन्हें उनका  नेचुरल साथी लेकिन वे साम्राज्यवादी हैं कांग्रेस यह भूल गई। साम्राज्यवादी पहलें उसे पेलता है जिसके साथ गठबंधन बनाता है फिर किसी और को जैसा हमने पूरे उपनिवेशवादी दौर में देखा कि कैसे निजाम तथा छोटे राजा सेलरी तक समेट दिये गये थे। यह भी मजेदार है कि  सरकार नें जब केजरीवाल के वेब-एक्टिविज्म के बाद वेब नियंत्रण की बात की तो हम सबने देखा कि उसका सबसे बडा विरोध अमेरीका केन्द्रित टीवी मीडिया ने ही किया। यह अलग बात है हम सबने भी उसका विरोध किया था। हमने केजरीवाल के कारण नही बल्कि हमे अंदेशा था कि कही उसके नाम पर सरकार हमारी बची खुची स्वतंत्रता भी न छीन ले।  लेकिन वास्तव में यह तब तो छिनी जा सकती है जब हो , जब यह है ही नही तो छिनी कैसे जा सकती है। हमारे वेब पर हमारी सरकार का नही अमेरीकी नजर है, हम अमेरीकी इंटरनेट नियंत्रणकारी संस्था के अधीन हैं। सरकारी इन्फर्मेशन तत्काल मीडिया तक या केजरीवाल जैसे ऐजेण्टो तक जिस तरह पहूंच रहा है उसमे इस इंटरनेट का भी हाथ है। इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि आपके ईमेल गन्तव्य तक पहूंचने से पहले अमेरिकी ऐजेण्टो द्वारा पढ लिये जाते है। हमें यह सब सोचना पडगा।

केजरीवाल के बारे में भल ही यह मीडिया पेटीबुर्जुआ अकडमबकडम कर रहा हो लेकिन सोशल मीडिया जैसे ट्वीटर पर ही केजरीवाल को लेकर थोडे समझदार लोगों में बहुत मतभेद है। ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि केजरीवाल एक अनार्किस्ट है जिसे यह पता नही कि जिस राजनैतिक ठांचे में हम हैं उसकी बुनावट क्या है? महात्मा गांधी के दौर में भी यह लूट और भ्रष्टाचार उतना ही था लेकिन गांधी को हमने इसके लिये कोई आंदोलन करते हुये नहीं देखा। गांधी को पता था कि जिस व्यवस्था को वे अपनाने जा रहें हैं उसमें इस तरह का आदर्शवाद बेईमानी है। गाधी को बुर्जुआ सिस्टम की सही समझ थी कि यह करप्शन और हिपोक्रेसी से ही चलता है। गांधी खुद हिपोक्रेसी का चरम आदर्श था।   केजरीवाल का यह एक बदतर मूर्खतापूर्ण आदर्शवाद  है जिसकी नजर में हर राजनैतिक दल  का मुखिया लूटेरा है तथा ज्यादातर राजनेता लुटेरे हैं। यदि हैं भी तो यह हमारी व्यवस्था थी जिसको हमने स्वतंत्रता के बाद चुना था। यह व्यवस्था गाधी की देन है न की अंबेडकर, भगत सिंह और बालगंगाधर तिलक की देन।  नितिन गडकरी पर जो आक्षेप लगाये गये उसकी सत्यता जो भी हो लेकिन जो कुछ गडकरी ने कहा वह भी एक सच है कि केजरीवाल के आरोप ” चिल्लर” हैं। लो, तब जबकि वेदान्ता की महालूट हो, टाटा की लूट अलग हो, जिन्दल अलग ही कोयला लूट रहा हों ऐसे में यह तुच्छ आरोप चिल्लर ही है। क्या केजरीवाल इस घोर कलियुग में नेता  को प्लेटो जैसा साधु राजा के रूप में  देखना चाहता है? जबकि खुद मुनीबी की नौकरी छोडने के बाद भी बडी कार से चलता है? भारत में नौकरी छोडने के बाद लोगों को खाने के लाले पड जाते है लेकिन केजरीवाल की उन्नति ही हुई है। यह चालबाज अन्ना हजारे से अलग होते होते कई करोडं का ऐजेन्टी चेक  ले उडा था। इसकी भी जांच पडताल होनी चाहिये थी। इन  मध्यवर्गीय ऐजेन्टो  से ही भारत सबसे ज्यादा त्रस्त है, एकबारगी कोई घोटाला तो सहन हो जायेगा लेकिन यह जो मध्यवर्गीय एजेन्टी है वह नही चलेगा। हमे इससे निजात सबसे पहले पाने की जरूरत है। केजरीवाल की सबसे बडी मूर्खता है कि उसे यह पता  नही कि सारे शोषण, लूट और करप्शन के पीछे  पूंजीपति हैं। उनके काले कारनामो की फाईल केजरीवाल क्यों नहीं बनाता? कोकाकोला  का ही कमसे कम बना  ले लेता!  लेकिन कैसे बनाये जबकि खुद अमेरीकी दलाल है। इस  हिपोक्राईट को केवल मूर्ख ही सच मानकर उसके पीछे चल सकता है।
इधरबीच गडकरी पर लगाये आरोप की धज्जियां खुर्सापुर के रहने वाले गजानन घडगे ने ही उडाई है , उसका कहना है कि गडकरी से उसका कोई  झगड़ा नहीं है बल्कि उनकी वजह से तो हमें फायदा ही हुआ है और उन्होंने हमेशा हमारी मदद की है। दूसरी तरफ यह भी खबर है  कुछ मीडिया वाले केजरीवाल के लिये सूचनाये इकट्ठा करते है जिससे कहानी बन सके और चैनल चल सके। केजरीवाल-मीडिया गठबंधन कोई एण्टी-करप्शन गठबंधन नही है यह करप्शन का ही गठबंधन है। सोनिया गाधी का मै अति तक जाकर आलोचना करता हूं लेकिन उसने ठीक ही कहा कि जबकि पूरा सिस्टम ही करप्ट है यह परिवार का डिफेमेशन किया जा रहा है। मतलब राहुल गांधी पर रेप का आरोप ! किसको हजम होगा? रेप का आरोप कोई आडवानी पर लगाये तो हजम होगा क्या? वढेरा जैसे लाखो नेता है, हर पार्टी में है लेकिन वढेरा की कालर पकडी गई और परिवार के सफेद मुंह पर भ्रष्टाचार की कालिख पोती गई।  यह राजनीति नहीं है यह एक साजिश ही है।  यह अमेरिकियों की साजिश है लेकिन सोनिया जानकर भी नही कह सकती है, यही दुर्भाग्य  है। अमेरीकियों  का  देश की अन्दरूनी  राजनीति में बहुत गहरा प्रभाव पड चुका है, चाहे  किसी विशेष कम्पनी के खिलाफ  एनजीओ का धरना प्रदर्शन  हो या केजरीवाल जैसे एजेण्टो की मीडिया राजनीति हो।  मध्यवर्ग का इस हद तक अमेरकनाईजेशन हो गया है कि  अब उसके चरित्र को बदलने के लिये एक व्यापक पैमाने पर आंदोलन की जरूरत होगी। यह कम आश्चर्य नहीं है कि  भारत का सबसे आगे बढ चुका वर्ग भारत की आलोचना तो सुन सकता है लेकिन अमेरिका की आलोचना वह  नही सुन सकता है।  वास्तव में राजनीति इसकी है ही नहीं कि देश का क्या होगा या जनता का क्या होगा। राजनीति इसकी है कि कौन बेहतर कोलोनाईजर है अर्थात कौन बेहतर ठंग से अमेरीकी हितो का संम्बर्धन कर सकता है या अन्तर्राष्ट्रीय पूंजीपतियों का जिनके लिये भारत एक सनातन उपनिवेश है।
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