Posted by: Rajesh Shukla | October 17, 2012

इंटरनेट पर ईविल आई


बुडापेस्ट में यूनाईटेड नेशन्स के सदस्य देशों नें इंटरनेट पर नियंत्रण के लिये साईबर स्पेश कान्फरेंस किया गया जिसमे भारत भी प्रमुख देशों मे शरीक रहा। यह इंटरनेट पर सरकारी नियंत्रण के लिये एक नई पहल कही जा सकती है। यदि जनतांत्रिक ठंग से इंटरनेट पर ही चुनाव करवायें तो बहुमत नेटीजन यही कहेगा कि इंटरनेट एक स्वतंत्र स्पेश है इसपर सीआईए का या किसी तरह का सरकारी-प्राईवेट पहरा नहीं होना चाहिये। फेसबुक या अन्य सोशलमीडिया जिन्हें पूंजीवाद के झंडावरदार भी कहा जाता हैं किस हद तक लोगो के एकाऊंट्स में ताकझाक करते हैं, उनकी गुफ्तगूं को सुनते हैं तथा उनके मैसेज पढते है । आपका सबकुछ डिजिटल स्पेश में सार्वजनिक है और अमेरीका स्थित आईसीएएनएन की उसपर नजर है भले ही आपको इसका पता नहीं है। हर कोई एकाऊंट साईनइन करता है, लॉगआउट करता है लेकिन यह एक दिखावा मात्र है। आपके द्वारा नेट-स्पेश में भेजी गई हर चीज पर नजर है। इन सबके बीच सरकारों नें इस नियंत्रण को और सशक्त करने की पहल शुरू कर दी है।

हम अपने पाठकों को बतला दें कि अमेरीका स्थित आईसीएएनएन ही  इंटरनेट का दरोगा है, इंटरनेट से सम्बन्धित हर मुद्दा चाहे वो ट्रेड का हो या नियंत्रण का इसके अधीन है और यह अब तक अमेरीकी सरकार की ऐजेंसी है। यह एक दूसरा सीआईए है। बुडापेस्ट में हुई बैठक में यूनाईटेड नेशन्स के देश दो फाड में बंट गये थे,  एक वे जो अमेरीका के पिछलग्गू हैं तथा दूसरे वे जो विश्व प्रभुत्व में अमेरिका के वर्चस्व को नही मानते। रूस और चीन नें  आईसीएएनएन को खत्म कर इंटरनेट नियंत्रण के लिये नई संस्था की बात की है जिसे यूनाईटेड नेशन्स कें देश समझौता के द्वारा आस्तित्व में लायेंगे तथा जो यूएन की निगरानी में ही कार्य करेगा। जबकि दूसरी तरफ अमेरीकी आईसीएएनएन द्वारा प्रस्तावित मसौदा भी है।  बुडापेस्ट में 4-5 अक्टूबर को सम्पन्न हुई बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व सचिन पायलट ने किया था जिन्होने कुछ बाते ही साफ की है। उनका कहना है कि भारत दोनों  ही मसौदों को नहीं मानेगा, हमारी नीति यह है कि हमने  “”आईसीएएनएन” के हेड से बातचीत की है कि उसमें हमारा सशक्त प्रतिनिधित्व मिले तथा दूसरी तरफ हमने  भारत का एक अलग मसौदा भी तैय्यार किया है। हलांकि भारत इंटरनेट संबन्धित पॉलिसी के लिये यूएन कमेटी(यून-सीआईआरपी) को ज्यादा तवज्जो देगी जो वर्तमान में यूनाईटेड नेशन्स के नियंत्रण में काम करता है।

इसबात को समझना जरूरी है कि क्यों रूस तथा चीन जैसी शक्तियां यूएन कमेटी(यून-सीआईआरपी) के पक्ष में नहीं है? क्योंकि यह संस्था पहले से ही आस्तित्व में है तथा यूनाइटेड नेशन्स के अन्य संगठनों की तरह इसमें भी अमेरका की चलती रही है इसलिये इसके इतर एक नयी संस्था को बनाने पर जोर दिया गया है। भारत का पक्ष अमेरीका केन्द्रित है और एकबार पुनः उसका पिछलग्गू बनने की दिशा में हमारी नितियां जा रही हैं। अमेरीकी नियंत्रण में हमारा सब कुछ खतरे में है वैसे ही गुगल से लेकर याहू तक अमेरीकी प्रोपागाण्डा करते है, इंटरनेट कंटेन्ट को फिल्टर करके उसे ही सामने लाते हैं जो अमेरीकी पक्ष को मजबूत करता हो। गूगल सर्च की तो यह हालत हैं कि यदि इंटरनेट कंटेंट में अमेरीका शब्द थोडा भी आलोचनात्मक रूप  प्रयोग किया गया है तो वह छान कर अलग एविल कटेगरी मे डाल दिया जाता है। यदि गूगल सर्च रेटिंग  देखे तो बदतर ही टॉप टेन में होंगे, वे बेहतर आलोचनात्मक कन्टेंन्ट नहीं होंगे। फेसबुक यूजर जो राजनैतिक क्रियाकलाप करते है इस बात जानते है कि किस तरह के स्टेटस के लिये फेसबुक हिटलर की तरह बैन करता है। एक हफ्ते तो आप न तो लाईक कर सकते हैं, न शेयर कर सकते है और न पोस्ट कर सकते हैं। मार्क्सवादियों पर इनकी विशेष शैतानी दृष्टि होती है।

दूसरी तरफ गुगल अलग तरह का देहद्रोही काम करता है, किसी देश के मैप या सूचनाओं को फेक करना, पोर्न का विशेष रूप प्रचार करना, उस देश की संस्कृति को खत्म करने के लिये विशेष रूप से प्रयत्नशील होना इत्यादि। गुगल की जांच पडताल करें तो इंडिया को गरियाने वाले कन्टेन्ट टॉप सर्च में होंगे जबकि एक स्वच्छ छवि वाला कन्टेन्ट की भीड मे लापता हो जायेगा। चीन ने फेसबुक, याहू और गूगल को ऐसे ही नही बैन किया है। इनकी एक मोनोपली भी बाजार इंटरनेट संसार में है जिसे चीन ने खारिज किया है। हमारे देश के सर्च इंजिन, सोशल मीडिया साईट, वेबपोर्टल्स का क्या? सरकार किस तरह अपने देश से गद्दारी कर सकती है?  अमेरीकी एजेंसी “”आईसीएएनएन” वास्तव में सीआईए की एक  मशीन बन कर रह गई है। जिससे भारत जैसे देश को मुक्त होना जरूरी है।

जेनेवा में हुई बैठक के बाद यह आशा की जा सकती है कि इंटरनेट आनेवाले दिनो में अंकल सैम की गिद्ध दृष्टि से मुक्त होगा और ज्यादा स्वतंत्र होगा। एक नये पारदर्शी सिस्टम को आस्तित्व में लाने के लिये देशों के बीच आम सहमति बनाई जायेगी। हलांकि आज की ही खबर यह भी है कि अमेरिका ने इंटरनेट पर यूएन नियंत्रण को खारिज कर दिया है। अमेरीकी सीनेट ने वोट करके बहुमत से यूनाईटेड नेशन्स के नियंत्रण को खारिज करने को कहा है और अमेरीकी राष्ट्रपति ने सहमति भी जताई है। भारत को भी अपना स्पष्ट रवैय्या अपनाने की जरूरत है क्योकि यह भविष्य की इमर्जिंग इकनॉमी होन के साथ साथ भविष्य का सबसे बेहतर मीडिया भी है।

-पोस्ट लिखे जाने तक इसपर हिन्दी समाचार पत्रों में कोई विस्तार से खबर नही छपी मिली। मैने तीन की वर्ड सर्च किये “यूएन कमेटी(यून-सीआईआरपी)”,  साईबर स्पेश कान्फरेंस, जेनेवा बुडापेस्ट में भारत, बुडापेस्ट में सचिन पायलट लेकिन कोई सर्च नहीं मिली। हिन्दी समाचार पत्रों में समाचार तथा इस तरह की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दो और खबरों को कवर करने की यह हालत है।

 

इसे भी देखें विदेशी हाथ कहां है

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