Posted by: Rajesh Shukla | October 16, 2012

विद्या शक्ति की उपासना का महत्व


आज नवरात्री है इसलिये सोचा कि एक छोटी पोस्ट लिख दूँ। राक्षसों के इस मायावी समय में महामाया जगदम्बा की उपासना में ही सार है। हमने दुर्गा की उपासना न तो शक्ति के लिये की और न ही  विद्या के लिये की है।  एक समय था जब  शिवाजी ,महाराणाप्रताप तथा चन्द्रशेखर आजाद इत्यादि ने वीर भाव से शक्ति के लिये उनकी उपासना की थी और उन्हें यथेष्ट देवी की कृपा प्राप्त हुई। भगवान श्री राम मां दुर्गा के बहुत बडे उपासक थे । राम ने शक्ति पूजा करके ही रावण का विनाश किया था। महाकवि निराला ने राम की शक्ति पूजा शिर्षक से एक लम्बी कविता लिखी है जिसमें अन्त में उन्होनें लिखा कि देवी ने श्री राम को विजय का वरदान दिया और उनमें शक्तिरूप से अवस्थित हो गईं।
“होगी जय, होगी जय. हे पुरूषोत्तम नवीन!।
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।।
जिस छण सीता का रावण ने अपहरण किया उसी दिन वह शिवद्रोही हुआ क्योकि शिव देवीउपासक हैं। महादेवी जगदम्बा ने राज्यलक्ष्मी को उसी दिन उसके साम्राज्य का त्याग करने का  आदेश दिया था और उसकी उलटी गिनती शुरू हो गई थी। हम इस बार देवी से याचना करेंगे की देवी राज्य लक्ष्मी को रावणी नेताओं और रावणी देशद्रोहियों का घर त्यागने का आदेश दें। रावण कमसे कम इन देशद्रोहियों जैसा भी नही था। उसकी  हमारा सनातन संस्कृति और जीवन में ॠषियों जैसी ही आस्था थी । भारत एक हजार वर्षों से देवीउपासना नहीं कर रहा है इसलिये वह कमजोर, लाचार और दास चेतना सम्पन्न बना हुआ है। यह एक महानतम आश्चर्य है कि कुछ सौ लोगो नें राम के इस देश को तीन सौ वर्षो तक गुलाम बनाये रखा।

हम देवोपासना अपनी तुच्छ वासनाओं के लिये करते हैं। मां दुर्गा  की उपासना भी ज्यादातर लोग अपनी इच्छाओं के लिये ही करते हैं न कि शुभत्व के लिये।  हम निःसन्देह अज्ञानी हैं, हम नहीं जानते की सबके निःश्रेयस का मार्ग एक शुभत्व  ही है। इसमें कोई संशय नहीं हे कि सत्य के मार्ग से ही श्रेय और प्रेय दोनो समुचित रूप से प्राप्त होता है  और उनका विस्तार भी होता है। उपनिषदों में ॠषियों नें इसको कितना स्पष्ट कहा है ‘सत्येन पन्थाः विततो देवयानः’ । भारत ने भारती की उपासना भी शायद नहीं किया है क्योकि एक हजार वर्षों में हमने किसी मौलिक विचारक को जन्म नहीं दिया। जो भी तथाकथित विचारक इधर बीच हुये हैं वे केवल पुनरूत्पादन और पुनरावत्ति करते रहे हैं।  भारती भी हमसे रूष्ट है और दुर्गा भी हमसे रूष्ट है, यही तो हमारा दुर्भाग्य है। कलिकाल में देवी की उपासना विद्या के रूप में करना चाहिये जिससे अशुभ  बुद्धि का विनाश हो धर्म का विस्तार हो सके। आज जो यह संसार पैशाची आतंक,भ्रष्टाचार,लूट और तमाम तरह की परेशानियों से जूझ रहा है उसका कारण यह हैं कि व्यक्ति ज्ञान तत्व की साधना नहीं करता। हर तरफ भागमभाग है सिर्फ उन चीजों के लिये जो अनश्वर और क्षणिक कही जाती है। लोग साधन की परवाह ही नहीं करते हैं। हम  धर्म और आध्यात्म का एक ठोंग करते रहते हैं। देवोपासना देवत्व के लिये की जानी चाहिये न कि धन इत्यादि प्राप्त करने के लिये।  देवत्व प्राप्त होने पर सब कुछ स्वयमेव उपलब्ध हो जाता है। बाईबिल में भी इस सच को जीसस नें कहा था कि ” सीक ये फर्स्ट दी किंगडम ऑफ गॉड एण्ड आल शैल फालो यू” । नवरात्रि  के नौ दिन देवी के विद्या स्वरूप की उपासना के लिये होती है इन दिनों में साधक देवी से ज्ञान की याचना करता है क्योकि विद्या ही उनका स्वरूप है। देवी उपासको ने लिखा है “विद्याऽनुसंहति” अर्थात देवी उपासक सदैव उनके विद्या स्वरूप की ही चिंतना करता रहता है। उनकी चिंतना करने से सबकी चिंतना सम्पूर्ण हो जाती है-
विद्यारण्य मुनि ने लिखा है :
” सर्वदेवमयी या हि सर्वमंत्रस्वरूपिणि।
 सर्वकर्मस्वरूपा च सर्व लोकमयी तथा।।”

साल भर तो मनुष्य अविद्या द्वारा ही वशीभूतरहता है, इन नौ दिनों में उसे विद्या की ही याचना करनी चाहिये। आज यदि जनता में यह विद्या तत्व उचित परिमाण में होता तो उन्हें विवेक होता कि किस तरह का नेता देश व समाज के लिये ठीक है। विद्यातत्व की उपस्थिति पर्याप्त होती तो  हम निःसन्देह इस भयंकर लूट, व्यभिचार और भ्रष्टाचार में नहीं होते, हम सभी ज्ञान सम्पन्न, धन सम्पन्न और शक्ति सम्पन्न होते। विवेक की कमी में लोग गुण्डों व मवालियों के हाथों में राज्यशक्ति सौप देते हैं। अरविन्द घोष ने एक बार ठीक ही कहा था कि अज्ञानियों के हाथों में राज्यशक्ति व धन शक्ति देश के विनाश का कारण बनती है। हमे देवी के विद्या रूप की ही प्रधानतया उपासना करनी चाहिये, यही शक्ति की सही सही उपासना है। आध्यात्मिक लोगों नें उन्हें इसी रूप में प्रमुखता से देखा है।

विद्याः समस्तास्तव देवि रूपाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमबयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपारा परोक्ति।।

वे संसार की चिति शक्ति है सब कुछ उनके अधीन है। वे सब कुछ प्रदान करती है जो उनके इस विद्या स्वरूप की पूजा करता है। सारे महामंत्र उनका स्वरूप हैं। विष्णुपुराण जो एक सबसे प्राचीन पुराण माना जाता है  के अनुसार-

यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभते।

आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी।।

जिन्होने उनके इस विद्या रूप की उपासना की है उनके लिये सब कुछ सम्भव है, वे ही जगत को धन्य करते है। ॠषि लोग उनके विद्या रूप को ही नमन करते हैं क्योंकि यही वास्तव में उनका वास्तविक स्वरूप है।

।।श्रीरूपा या कला नित्या सर्वेषां प्राणरूपिणी।पूर्णा परा पराकारा सा पायाच्छारदाम्बिका।।

फिलहाल देवी का यह पूरबिया ग्रामिण भजन ॰’जगदम्बा घर में दियरा’ ॰सुनकर आनंद ले सकते हैं

ॐश्रीर्मस्तु ।

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