Posted by: Rajesh Shukla | October 15, 2012

खबरों की विश्वसनीयता और प्रोपागाण्डा से परे मीडिया


एक पाश्चात्य निर्देशक ने कहा  था कि जिस दिन पैसा खत्म उस दिन एन्टरटेनमेन्ट खत्म। तो कौन सा ऐसा एन्टरटेन्मेन्ट है जिसमें पैसा का पेड लगा होता है और जो शदियों तक पैसा झाडता रहता है? एन्टरटेनमेन्ट का यही पैसे वाला रूप तलाशना निर्देशको और निर्माताओं का  विषय है। दूसरी तरफ यही प्रश्न कहीं न कहीं मीडिया के सामने भी होता है। कौन सी ऐसी खबर हो जिससे दर्शक चैनल विशेष पर आयें, कैसा कन्टेन्ट हो जिसके लिये पाठक समाचार पत्र पढे, कैसा मसाला हो जिससे नेटीजन वेबसाईट को क्लिक करें? इसी पर इस उद्योग का सब कुछ टिका है अर्थात इसका अर्थशास्त्र। जो अर्थशास्त्र एन्टरटेनमेन्ट उद्योग का है वही न्यूज उद्योग का भी है। हॉट एण्ड कोल्ड दोनो मीडिया तंत्र पर एक ही व्यक्ति का कब्जा है क्योकि दोनों परस्पर एक साथ अपनी गत्यात्मकता में अवस्थित हैं। मीडिया के ये दों क्षेत्र दो तरह कें प्रभाव समाजिक और व्यक्तिगत चेतना पर डालते है जिसका उद्देश्य वास्तव में एक ही है। हम भले ही एक को एन्टरटेनमेन्ट कहते हों और दूसरे को न्यूज मीडिया लेकिन दोनों ही मूलभूत रूप से प्रचार तंत्र हैं तथा दोनों का एकमात्र उद्देश्य पूंजीनिर्माण करने के साथ सामाजिक नियंत्रण में अपनी भूमिका निभाना है।

एन्टरटेनमेन्ट और न्यूज मीडिया उद्योग दोनों पूँजीनिर्माण की प्रक्रिया के साथ एक प्रचार तंत्र के रूप में काम करते है जो कई बार किसी फेक खबर के साथ एक घोखेबाजी भी होता है। यह एक ठगी विद्या  तंत्र भी है। ऐसा नहीं है कि ठगी विद्या केवल ठोंगी फकीर ही करते है, यह ठगी विद्या ज्यादातर चैनल करते रहते हैं और ठगी को प्रमोट भी करते है।  भारत कभी ऐनलाईटेनमेन्ट  का देश था अब यह एक घोखेबाजों, लूटेरों, ठगों, देशद्रोहियों और भ्रष्टाचारियों का देश है। यह सामंती-बुर्जुआ तंत्र है जो पूंजीवाद से भी ज्यादा ऐनलाईटेनमेंट विरोधी है।  ऐसा क्यों हैं इस सवाल का उत्तर किसी अन्य पोस्ट में । इतना जरूर स्पष्ट है कि अब चाहे वह वामपंथी विचारक हो या पूंजीवादी विचारक दोनों  ही बुर्जुआ तंत्र को ऐनलाईटेनमेंट विरोधी मानते हैं। यह पूंजीवाद आधुनिकता के दौर का पूंजीवाद नहीं है, यह पूंजीवाद का एक रिग्रेसिव तथा एक सबसे विकृत स्वरूप है।  खैर, हम मीडिया पर पोस्ट बना रहे थे तो मेरा कहना यह है कि  भारतीय मीडिया अभी एकदम नैसेन्ट स्टेज में है। अभी भी यह पूंजीवादी स्वरूप नहीं ग्रहण कर पाई है इसलिये इसका अप्रोच मीडिया के बावत भी बहुत ही रूढिवादी  तथा बैकवर्ड है। हमने भारतीय मीडिया विमर्श को जन्म ही नही लेने दिया ठीक वैसे ही जैसे हमने आधुनिकता के दौर में अन्य कला क्षेत्रों में इसे जन्म नही लेने दिया-हमने परजीविता के दर्शन को सबसे ज्यादा तरजीह दी। मीडिया ने अपनी रूढिवादिता में इस बात को भी  कि मीडिया एक  प्रचार तंत्र है, एक प्रोपागाण्डा मशीन है  कमोवेश सेन्सर कर दिया है।  न्यूज मीडिया एक उद्योग है, ज्यादातर मीडिया कंम्पनीयां एक कार्पोरेट रूप रखती है तथा  पाश्चात्य-पूंजीवाद के अन्तर्गत ही उसकी नैतिकता और गत्यात्मकता के अनुसार चलती हैं। मीडिया पूंजीवादी मशीन है लेकिन  इसके ठोंग का आलम यह है कि इसने शब्द “पूंजीवाद” को भी सेन्सर कर दिया गया है। मीडिया को एक प्रोपागाण्डा मशीन इसलिये कहा गया है क्योकि यह शासक वर्ग के द्वारा नियंत्रित है तथा उसकी दमनकारी विचारधारा को प्रचारित करती है। यह बात शायद मीडिया के झूठे अहं को चोट पहूंचाती है इसलिये यह आसानी से हमें नहीं पचती है। लेकिन यही बात कुछ ब्रिटिश अखबारों या कुछ अन्य के बारे में नही कही जा सकता है। आलोचना की जगह हरएक विकसित समाज में रहना चाहिये क्योकि बगैर इसकें उसका विकास सम्भव नहीं है। यह सवाल पूंजीवाद के अस्तित्व में आने के साथ उठ खडा हुआ था। मीडिया को सदैव शासक वर्ग के सम्बन्ध में ही समझा जा सकता है। मॉस मीडिया बडे कार्पोरेशन्स का एक बडा नेटवर्क है जो विभिन्न स्तरों पर एक तरफ तो अन्य कार्पोरेशन्स से अन्तर्संम्बन्धित रहता है तो दूसरी तरफ राज्य से नाभिनालबद्ध रहता है। मॉस मीडिया का कार्पोरेट चरित्र ही इसका सबकुछ तय करता है। न्यूज मीडिया उद्योग भले ही अपनी हिपोक्रेसी में स्वतंत्रता के “बोल कि लब आजाद है तेरे” जैसा गीत स्क्रीन पर लिखती रहती हो लेकिन सच यही है।

दूसरी तरफ हम मीडिया में न्यूज कन्टेन्ट पर बडी बहस करते हैं लेकिन शायद ही हमने कभी पूछा होगा कि इस न्यूज कन्टेन्ट का चरित्र क्या है? इसका चरित्र मीडिया का विमर्श तय करता है या वे भौतिक सम्बन्ध जिस पर मीडिया का सच टिका होता है? जिन भौतिक सम्बन्धों पर मीडिया का सच टिका होता है बह बहुत भयावह है।  मीडिया के लोग अपने सच को जानते हैं और रण्डीयों की तरह उस सच के साथ जिंदा रहते है। यह एक शुद्ध  परवर्जन है, एक बदतर हेपोक्रेसी है जिस पर मीडिया को मानव के रूप में गर्व नहीं करना चाहिये।

मीडिया अपनी सहुलियत से सत्य का पक्षधर है। मसलन खबर की अन्तर्वस्तु या न्यूज कन्टेन्ट पर सबके अपने अलग अलग पक्ष रहते हैं लेकिन वास्तव में मुझे कोई ट्रूथ कन्टेन्ट की बात करता हुआ नजर नही दिखता जिसका आधार निःसन्देह सत्य है। एक बिकाऊ न्यूज कन्टेन्ट क्या हो इसपर सबके पक्ष रहते है। सबका निदिध्यासन इसी बाजारू पक्ष पर रहता है। एक सफल सम्पादक वही है जो एक बिकाऊ खबर बना सकता है और ग्रुपएडिटर वह है जो  समाज को पथभ्रष्ट करने,  देश की संस्कृति को विनष्ट करने के बारें में कोई सुझाव दे सके। एक सफल सीईओ वह है जो किसी भी तरह उसका प्रसार कर सके। उस सीईओ के लिये पत्रकारिता के मूल्यों को समझना कठिन होगा जिसका कहना हो कि “हम न्यूज बिजनेस में नहीं है हम विज्ञापन बिजनेस में है”। यह सोच किसी भी हद तक जा सकती है, स्कैण्डल या प्रयोजित रेप कार्यक्रम तक भी जैसा कि पिछले दिनों असम की रेप स्टोरी रही थी। या कल का इंडियाटूडे खुर्शीद प्रकरणं के स्तर तक। या वे खबरिया चैनल जिनका सारा खेल अमानवीय धरातल पर होता है, अधविश्वास और भूतप्रेतात्मक कन्टेन्ट पर टिका होता है। इसकी आयु बहुत अल्प होती है। पत्रकारिता बनियागिरी नहीं है वह पत्रकारिता है। एक बिकाऊ तथा विनष्टकारी खबर के कारण बहुधा चैनल या कोई भी मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो देता है। मीडिया विनष्टकारी तथा जनता को भष्ट करने वाली कन्टेन्ट विदेशियों के दबाव में परोसती है। भारत में विनष्टकारी तथा विदेशी विकृतियों का प्रचार करने में मध्यवर्गीय पेटी-बुर्जुआ की एक ऐतिहासिक भूमिका रही है।  यदि न्यूज उद्योग के सीईओ यह समझते हों कि ब्राण्ड को किसी भी तरह प्रसारित करने से उसका बहुत भला कर रहे है तो न्यूज और उसकी विश्वसनीयता के वावत यह एक धोखे में रहने वाली बात है। यदि कन्टेन्ट बेहतर हो तो उसे प्रसारित करने में मार्केटिंग मैन को बहुत मेहनत नही करनी पडती है और न ही उसे किसी प्रायोजित रेप स्टोरी की सहायता नही लेनी पडती है। एक दौर में टाईम्स ऑफ इन्डिया का “दी स्पींकिंग ट्री” एक ऐसा कन्टेन्ट था जिसके कारण उसे कई लाख पाठक बगैर किसी श्रम के मिल गये थे। कॉलम नें इस विषय में एक आथेन्टिक कन्टेन्ट की मांग को पूरा किया तो पाठक स्वयं आये। मधु रहता है तो मधुमक्खियां आती हैं,बनावटी मधु के छत्ते पर मधुमक्खियां एक दो बार बरगलाने पर आ सकती है लेकिन सदैव नही आयेंगी। समाचार उद्योग में कन्टेन्ट मधु जैसा ही है।

यदि हम खबर के बावत अन्तर्वस्तु की बात करें तो यह खबर की विश्वसनीयता में निहित है तथा साथ साथ उसे उसी दिन की खबर होनी चाहिये, यह समय का तत्व खबर का सबसे प्रमुख तत्व है। महाभारत का “मै समय हूँ” राही मासूम रजा ने शायद इसीलिये शुरू मे रखा था कि समय ही खबर का रचयिता है। क्योकि ऐसा नही कहा जा सकता कि भूत प्रेत या अन्य सुरसुरी वाली खबरे एक कन्टेन्ट के रूप मे विश्वसनीय तथा बिकाऊ नही है। उसकी विश्वसनीयता एक मनरोरंजक कन्टेन्ट के बतौर सदैव है यदि उसमे खबर का ट्रूथ कन्टेन्ट या ट्रूथकन्टेन्ट न देखें। कन्टेन्ट का मतलब ट्रूथ कन्टेन्ट है। एक उपन्यास का ट्रूथ कन्टेन्ट उसका फिक्शन है जबकि एक न्यूज का ट्रूथ कन्टेन्ट उस न्यूज का उसी दिन किसी देश काल मे घटित होना है, परिघटना की अन्तर्वस्तु क्या है इससे खबर का चरित्र तय होता है। तो सदैव यह बात की जानी चाहिये कि न्यूज कन्टेन्ट मे ट्रथ कन्टेन्ट है कि नही है। ट्रथ कन्टेन्ट वाली खबर ही न्यूज चैनल की विश्वसनीयता को बनाती और बिगाडती है। जिस तरह व्यक्ति के चरित्र की विश्वसनीयता है उसी तरह चैनलों की भी विश्वसनीयता होती है।

मीडिया में कई तरह का संकट है, जिसमे मूलतः दो है- पहला खबर को जुटाने की तथा दुसरी न्यूज उत्पादन और किसी भी तरह की अन्तर्वस्तु का न्यूज के रूप मे पुनरूत्पादन का प्रश्न है। क्योकि रोज न्यूज पकडी नही जाती या रोज कोई राष्ट्रीय खबर होती नही तो अ-न्यूज को न्यूज कैसे बनाया जाय? न्यूज का उत्पादन नही किया जा सकता है, हाँ यदि एक परिघटना को जन्म दिया जा सके तो वह खबर बन सकती है-जैसे क्रिकेट मैच आर्गनाईज करवाना या कुछ ऐसा ही। लेकिन खबर उद्योग के पैमानो के हिसाब से यह एक जुर्म कहा जायेगा सिवाय उन परिघटनाओ के जो सौन्दर्यपरक कोटि मे आती है-पार्टी टाईप की है। व्यूअरशिप और चैनलो के व्यूरशिप पर कब्जा करने का कम्पटीशन तो इससे जुडा हुआ एक अलग ही मुद्दा है। इसकी सारी कठिनाईयां हल हो सकती है जब चैनल स्वयं को लाभकारी तंत्र माने लेकिन मात्र लाभकारी तंत्र और मिडिया उद्योग इसको इसका थियेटर न माने।इसमे एक दूसरी महत्वपूर्ण बात जो मै जोडूंगा वह यह कि मिडिया उद्योग मे तमाम तरह के संकट इसलिये ज्यादा है कि संकटो के हल तात्कालिक खोजे जाते है-तात्कालिक प्रागमैटिज्म किसी उद्योग के लिये घातक होता है। तथा न्यूज सेक्टर यदि केवल फौरी समस्याओ का समाधान केन्दित बन कर काम करेगा तो वह बहुत उत्पादक नही हो पायेगा। समस्याओ के समाधान के इतर नई सम्भावनाओ, वे जिनकी अभिव्यक्ति अभी हुई नही है की तरफ देखने की जरूरत है। दूसरी तरफ शिफ्टिंग की प्रवृति से बचने की जरूरत है-मसलन मान लो किसी चैनल की कोई विचारधारा है या न्यूज कार्यक्रम प्रस्तुति के लिये कोई संकल्पना विशेष का प्रयोग करता है तो उसे अन्य उसी धरातल पर काम करने वाले बेहतर चैनलो की संकल्पनाओ के परप्रेक्ष्य मे विकास करने से ज्यादा सम्भावनाये खोजी जा सकती है बनिस्बत इसके की लागातार शिफ्ट करते रहे। अन्तर्वस्तु के बावत यह ध्यान रखना चाहिये की एक कम मूल्यवान अन्तर्वस्तु भी अपने स्वरूप मे दूरूहता लिये होती है तथा उसका उत्कर्ष किया जा सकता है। बहुत सारे चैनल जिनके कोई विचार नही है, कोई सोच नही है वह लागातार अन्यों के पिछलग्गू बने रहते है, इससे वे अपनी पहचान- एक ब्राण्ड नही बना पाते। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ज्यादतर चैनलो में काबिल और विदूषको का अनुपात कमोवेश ३०-७० का है अर्थात जो ७० प्रतिशत वर्कफोर्स है वह बेकार है, इससे ब्राण्ड पर बहुत प्रभाव पडता है। वास्तव मे मीडिया में  परजीवियों का उत्पादन की प्रवृत्ति मीडिया मालिक की जानकारी के बगैर विकसित हुई है। एक मध्यवर्ग है जो अनुत्पादक है लेकिन चालाक बहुत है इसलिये मीडिया में अपनी जगह सुरक्षित करने के लिये अपने इदगिर्द वह पैरासाईटों की फौज खडा करता है और सिस्टम को ही अनुत्पादक बना देता है। हमने इसे एक पोस्ट में ग्रुप आफ पेटीबुर्जुआ ग्राउसेज लिखा था। कांग्रेस का पूरा राजनैतिक व्यभिचार-भ्रष्टाचार  तंत्र ऐसा ही है। मीडिया में विदूषक  सम्पादक या विदूषक लीडर कभी नही चाहता कि उनसे काबिल व्यक्ति उस मीडिया मे प्रविष्ट हो इस भय से वह क्रमशः और भी पतित होता जाता है और कम्पनी की वर्कफोर्स की शक्ति को खत्म सा कर देता है। यह उनकी वैचारिक तथा रचनात्मकता की कमी के कारण होता है। मीडिया मालिको को सक्षम सम्पादको पर विश्वास  करना चाहिये और उन्हें पूरी स्वतंत्तता भी दी जानी चाहिये तभी वह कुछ अच्छा कर सकता है। अक्सर मीडिया मालिक जो अच्छा विजनेस जनरेट तो करना जानता है लेकिन वह स्वयं को विचारक भी मानने लगता है और हर चीज मे उसका हस्तक्षेप होने लगता है जिससे विशेषकर ज्ञानाधारित उद्योगो की क्वालिटी पर बहुत बुरा प्रभाव पडता है।

लाभकारी तंत्र में भी खबरिया चैनलो के मद्देनजर लाभ की प्रतियोगिता में भी लाभकारी होने का दबाव उन्हें पूरी तरह ध्वस्त कर सकता है। मीडिया उद्योग यदि लाभकारी थियेटर बनेगा तो क्रमशः वह मनोरंजन की तरफ बढता जायेगा। वैसे भी यदि देखें तो ज्यादा चैनलों पर बहस वाले प्रोग्राम एक मनोरंजन से ज्यादा नहीं है। यदि बहस के बारे में बात करें तो बहस मे हिस्सा लेने वाले पैनल के लोगो की विषय पर कोई समझ नही होती है और न ही बहस के संयोजक की होती है। कई बार तो बहुत अच्छे चैनलो पर बहस का स्तर बहुत सतही होता है। हर विषय के मर्मज्ञ एक ही चेहरे होते है और एक ही ऐंकर बैठी रहती है बहुधा लडकियाँ जिनकी आँखे सूजी हुई उल्लू की तरह होती है। यह कामगार दिनभर ब्रेकिंग न्यूज पढते पढते खुद ही पढ ली जाती हैं। इन्हें बाद में शायद ही गम्भीरता से कुछ मनन करने का मौका मिलता होगा। थोडा बहुत सबकुछ समझते है इसलिये सर्वज्ञानी है यह ऐटिट्यूड मीडिया उद्योग के लिये खतरनाक है। यह बात आजकल हर जगह देखने को मिलती है, प्रकाशक के यहां लेखक जाता है तो प्रकाशक ही उसे बताने लगता है लेखन क्या है। यह एक फासिस्ट प्रवृत्ति है। कोई भी विषय बहुत गम्भीर होता है, अमेरिकी विचारक जॉन डिवे के अनुसार यहां तक कि एक छोटे से छोटा डाटा भी इनफाइनाईट सम्भावनाओं से भरा होता है इसलिये हर कोई हर विषय का ज्ञानी नही हो सकता है। खबरिया चैनल की सम्वेदनशीलता तथा विश्वसनीयता केवल इसी शर्त पर बच सकती है जब वह खबर को मात्र भौतिक उगाही का विषय अन्य उद्योगो की तरह न बनाये। यदि खबरिया चैनल मनोरंजन वाले चैनलो से लाभ के बावत प्रतियोगिता करना चाहेगे तो वह सम्भव नही है। लाभ का ज्यादा लालच अन्ततः यदि लाभकारी मन मे से धन निकालते निकालते कही मन ही निकल गया तो चैनल उसी दिन डेबिट हो जायेगा। इसलिये अन्त में गायत्री मंत्र का प्रचोदयात् शब्द याद रखे जिसका अर्थ है “उस (desired) दिशा मे नियुक्त रखे” जिससे कि सत्य अन्तर्वस्तु को बिना खोये खबर कल्पवृक्ष की तरह अधिकतम लाभ प्रदान करती रहे।

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