Posted by: Rajesh Shukla | October 14, 2012

वाष्पीभूत होगा तुम्हारा पाप


सचमुच में मैं अंधेरे में जी रहा हूँ।
मैं उजाले में जीता
मैं बुद्धजीवी होना पसन्द करता
ग्रंथ बतलाते हैं कि क्या है बुद्धिमत्ता!
दुनिया के टंटो से खुद को दूर रखना
और छोटी सी जिन्दगी दूसरे की जिन्दगी की शर्तों पर जीना
अहिंसा का पालन करना
गांधीवादी होना!

कठिन है मेरे लिये यह सब
तुम अपने भ्रष्टाचार और हिपोक्रेसी से उबरते रहे
हम डूबते रहे हर दिन  हर रात
तुम्हारे उबरने में।
तुम जूतों की तरह देश बदलते रहे
भाषा की दलाली करते रहे
तुम विदेशी संस्कृतियों के एजेण्ट बने
मकबूल फिदा हुसैन बने।

हम संघर्ष करते रहे
वर्गसंघर्षो के बीच हम गुजरते रहे।
जब प्रतिरोध के स्वर नही थे, हमने उसे स्वर दिया
हम जानते हैं की कमीनागरी थोबडा बिगाड देती है
हमारा गुस्सा हमें विरूपित करता है
आह हम होते रहे,
यही हमारी नियति थी।

वे जानते थे गांधीगीरी सदैव गाण्डूगीरी थी
फिर भी वे चलते रहे सुविधा से उसपर
नैतिकता से गदामैथुन करते रहे
गाधीवादी पाखंड और धूर्तता
लूट और बलात्कार करते रहे
नोचते रहे हमारा मांस
बने रहे सियार।

वे सांस्कृतिक हिजडे भी खडे रहे लूटेरों की फौज में
भयानक अधेरे के बीच
करते रहे हुऑ हुऑ।
हम विवेक की पंखुरियों पर
जा लेटे
भगवान विष्णु की तरह
रचने को एक नया ब्रह्मा।

हम अपनी आस्थाओ के उद्रेक से
वैष्णवी विवेक से
बनायेगे नया भारत
भ्रष्टाचारमुक्त, वेष्यावृत्ति मुक्त , गांधी मुक्त।
वाष्पीभूत होगा तुम्हारा पाप
मनोग्रंथियाँ खुलेंगी
दास चेतना के बंधन कटेंगे
जयनशाली होगी हमारी चेतना
भारती।।

–ब्रेख्तियन-मुक्तिबोधियन कविता  

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