Posted by: Rajesh Shukla | October 10, 2012

मीडिया भ्रष्टाचार और नैतिक स्वनियमन


मीडिया में भ्रष्टाचार, मीडिया का नैतिक पतन, मीडिया में लॉबिईंग, मीडिया में स्कैन्डल, मीडिया द्वारा संरचित स्कैन्डल यह अब कोई बहुत नई बात नहीं रह गई है और न ही यह केवल भारत तक सीमित है। मीडिया की स्कैन्डल और भ्रष्टाचार की कथा अन्तर्राष्ट्रीय बन चुकी है। वस्तुतः भारत में मीडिया भ्रष्टाचार विदेशी मीडिया में पतन पर हो रहे प्रयोगों का ही परिणाम है। हम हर चीज में विदेशियों के पिछलग्गू हैं, चाहे वो नैतिक पतन ही क्यों न हो। ब्रिटिश मीडिया मुगल, रूपर्ट मर्डोक को अपना समाचार पत्र स्कैन्डल के कारण बंद करना पडा है।
राडिया टेप प्रकरण और हाल ही में चर्चा में आए कोलगेट घोटाले में मीडिया ग्रुप की खबर मीडिया के सामने एक अदृश्य प्रेत की तरह खडा है। राडिया प्रकरण के बाद मीडिया ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये, सब चलता है मानसिकता के कारण, यहां कुछ भी चलता रह सकता है। जब-जब मीडिया नैतिकता के सवाल खड़ा करेगा तब-तब वह भूत उसके सामने आ खड़ा होगा और आंखो में आंखें डाल उसके हृदय को बेधते हुए सवाल करेगा। भई जबकि आप एक कॉर्पोरेट के पिछल्ग्गू बन गये हैं तो क्या आप उसी तरह संतो की भाषा बोल सकते हैं? जबकि आपकी सारी अर्थव्यवस्था विज्ञापनों पर आधारित है। यहां तक कि आप विज्ञापन की नैतिकता का अतिक्रमण करते हुये पेड न्यूज़ तक पहुंच गये थे, संपादकीय तक को विज्ञापन का विषय बना डाला था, ऐसे में क्या नैतिकता का ठोंग अब भी बना रहेगा? बाजार और लाभ के सिनिसिज्म में नैतिकता का प्रश्न बड़ा कठिन है, नैतिक बने रहना बड़ा कठिन है। सिनिसिज्म में स्वनियमन वास्तव में एक बेईमानी है जब तक कि सिनिसिज्म एक परा-स्तर तक नहीं पहुंच जाता। सिनिसिज्म अपने परा-स्वरूप में सिनिसिज्म नहीं रह जाता।
स्वनियमन तथा सरकारी नियमन से इतर मीडिया किस चीज से नियंत्रित हो? किसी भी तरह का नियंत्रण घटिया बात होती है तब जबकि कोई सेक्टर अभिव्यक्ति आधारित है, मानव जीवन के उच्चतम मूल्यों को सामने रखने का काम करती है। चेतना के बाबत किसी भी तरह का नियमन उसकी उड़ान को बाधित करता है, दूसरी तरफ विकास बगैर इसके संभव नहीं है। अनुभवी संपादक इस बात को जानते हैं कि एक छोटे पत्रकार की संभावना तब तक सामने नहीं आ सकती जब तक उसे उसके अनुसार न लिखने दिया जाय।
वात्स्यायन अज्ञेय, धर्मवीर भारती जैसे संपादकों ने अपने समय में कितने ही ऐसे पत्रकारों की संभावनाओं को टटोला और उन्हें सामने ले आये। अभिव्यक्ति या पत्रकारीय अभिव्यक्ति स्वयं में एक नैतिकता धारण करती है, उसकी एक अपनी नैतिक गत्यात्मकता है इसलिये उसे किसी तरह के नियमन की जरूरत नहीं होती बशर्ते वह अपने मूल्यों को धारण करती हो। महात्मा गांधी के लिये पत्रकारिता एक बड़ा मूल्य रखती थी, उन्होंने बहुत लिखा और ‘हरिजन’ जैसे पत्र का संपादन कर उन्होंने बतलाया कि राष्ट्रनिर्माण में इसकी क्या भूमिका है। दूसरी तरफ मीडिया की अभिव्यक्ति विशेष स्तर से सामान्य स्तर तक उतरती है, इसमें एक द्वन्द्वात्मक गत्यात्मकता है।
हिन्दी भाषा के परिष्कार का जो प्रश्न मीडिया में उठता रहा है, उसे इस द्वन्द्वात्मक संबंध के स्तर पर ही समझा जा सकता है। यह संबंध मीडियास्कोप को लागातार बदलता है। जहां मीडिया तमाम कॉर्पोरेट प्रभावो में और उनकी मांग पर जनता की सेन्सीबिलिटी को लागातार बदलने की जिद करती रहती है, वहीं जनता कई बार इसका प्रतिरोध जोरदार ढ़ंग से करती है। इन दोनों के बीच एक सांस्कृतिक-वैचारिक घर्षण होता है, जिससे एक विमर्श जन्म लेता है जो न केवल मीडिया को बदलता है बल्कि उसके उपभोक्ताओं को भी बदलता है। जब तक मीडिया उद्दात्त मूल्यों के पक्ष में खड़ी रहेगी तब तक उसे किसी तरह के नियमन की जरूरत नहीं होगी लेकिन ज्योंहि वह उसका त्याग कर तुच्छताओं के धरातल पर उतरेगी और जादू-टोना, भूत-प्रेतात्मक बैकवर्ड सेन्सिबिलिटी का प्रचार करेगी उसको नियमन की जरूरत होगी। ऐसा कदापि नहीं है कि मीडिया घटिया सामाग्री परोस कर ही टीवी न्यूज़ चैनलों की टीआरपी या समाचार पत्रों की बिक्री बढाने मे सफलता अर्जित कर सकती है।
हमारे समक्ष अनेकों ऐसे उदाहरण है जो यह बतलाते हैं कि एक बेहतर कंटेंट भी टीआरपी या रेटिंग को उसी तरह बढ़ा सकता है। यदि हम रामायण को लें तो उसके कंटेंट में कुछ भी नया नहीं है, एक अनपढ़ भी इस कथा को पूरा पूरा जानता है लेकिन इसमें सदैव टीआरपी को बढ़ाने की शक्ति है। यह कथा अकथ्य है, यह निर्भर करता है कि यह कैसे किस स्तर की धार्मिक त्वरा में कही जाती है। यदि चाणक्य जैसा सीरियल अपनी एक परिष्कृत साहित्यिक भाषा के बाद भी अपनी छाप छोड़ गया या गॉडफादर जैसी फिल्म अब भी विश्व कॉमर्शियल सिनेमा में टॉप टेन में शरीक है तो हम यह नहीं कह सकते कि भूत-प्रेतात्मक या मुन्नी बाई के आईटम कंटेंट वाली चीजें ही सफल होती है।
पूंजीनिर्माण के इतर मीडिया को अपने राष्ट्रीय-सामाजिक-सांस्कृतिक उत्तरदायित्वों को भी समझना होगा। मीडिया का काम जनता को पतित करना या परवर्ट करना नहीं है बल्कि उन्हें उससे उपर उठाना है। कॉर्पोरेट युग में मीडिया की एक कॉर्पोरेट विचारधारा है जो सबसे उपर अवस्थित है और जो भी विचारधारायें पूंजीवाद को स्वीकार करती है यह उन पर अंतिम रूप से प्रभावी है। इस मद्देनजर हमें यह देखना होगा की कहीं पूंजीवाद के तुच्छ हित में हम सम्पूर्ण मानवता या मानव के सांस्कृतिक मूल्यों को खत्म तो नहीं कर रहें है! यदि बुद्धिजीवी पत्रकार या मीडिया समाज चेतना का ड्रामेटाईजशन या उसके पतन या उसके परवर्जन को बढ़ावा देता है तो अन्तिमतः मानवता को घोर अंधकार में धकेलता है, यह हम सबको जर्मन कॉर्पोरेट नाजिज्म के इतिहास से ज्ञात हैं। या मार्क्सवादी वस्तुवाद से भी हम यह जानते हैं कि किस तरह चेतना के मशीनीकरण का अंतिम निकष गुलग हो सकता है।
मीडिया से क्या कुछ सोशल क्षेत्र में ट्रांस्मिट हो रहा है इसपर सदैव विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये, चाहे वो कोई शब्द ही क्यों न हो क्योंकि समाज के जिन अमूर्त तत्वों को यह प्रभावित करते हैं उससे उसके मजबूत भावनात्मक-बंधनों के टूटने का भी खतरा है। कोई भी समाज जब एक भावनात्मक संबंध में बंधता है तो उसके पीछे शताब्दियों के सांस्कृतिक विमर्श होते हैं, उन्हें तुच्छ आर्थिक स्वार्थों के लिये तोडना एक सांस्कृतिक अपराध ही है। न्यूज़ उद्योग के इस दौर में मीडिया को नियमन नही बल्कि अध्यवसाय की जरूरत ज्यादा है।
मीडिया में स्व-नियमन या सरकारी नियमन का सवाल पहले इस तरह सामने नहीं आता था, यह मीडिया के कॉर्पोरेटीकरण और न्यूज़ उद्योग के अस्तित्व में आने के बाद आया। पहले पत्रकार बुद्धिजीवी थे, उनका अध्ययन और वैचारिक स्तर बेहतर था जबकि अब पत्रकार दो-साला पत्रकारिता का कोर्स या डिप्लोमा करके पत्रकारिता में आने लगे हैं। यह एक अनपढ़ों की बाढ़ है जो मीडिया के औद्योगिक स्वरूप धारण करने के बाद आई है। पत्रकारों की यह खेप दो-तीन साल मीडिया तकनीक जानकर तमाम मीडिया के क्षेत्रों में हर साल आती है और उद्योग की मांग को पूरा करती है।
न्यूज़-मीडिया उद्योग बहुत बड़ा हो चुका है, इसके समक्ष पत्रकारीय गुणवत्ता को पूरा करना सबसे बड़ी चुनौती है। इस बाबत मीडिया उद्योग कोई खास निवेश नहीं कर रहा है। दो-तीन साला पत्रकारिता कोर्स वाले पत्रकारों का किसी तरह का कोई पत्रकारीय अध्ययन नहीं होता इसलिये वे अपनी सोच में तथा अप्रोच में अरचनात्मक और विध्वंशकारी होते हैं। इनके पास न तो कोई दूरदृष्टि होती है न ही कोई अन्तर्दृष्टि इसलिये इनसे मीडिया में एक विकृति का प्रवेश हुआ है। यदि मीडिया में हिन्दी की भाषा विकृत हुई है तो यह इनका ही प्रभाव है, ये पैरेन्ट लिखना तो जानते है लेकिन उसकी जगह अभिभावक या माता-पिता लिखना इनके लिये कठिन होता है। मीडिया का सरकारी नियमन या स्व-नियमन दोनों इस तबके के लिये ही है, न कि उन संपादकों या पत्रकारों के लिये जो जिस भाषा में भी काम करते हैं उसमें अपनी पत्रकारीय आभा बिखेरते रहते हैं।
मीडिया में पूंजीनिर्माण की पेड न्यूज़ जैसी अवधारणायें वास्तव में अनुत्पादक पत्रकारिता का परिणाम है। जब पत्रकारिता उत्पादक तथा रचनात्मक होती है तो उसे इस तरह की तुच्छताओं मे पतित नहीं होना पड़ता। पिछले दिनों, यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, राजीव शुक्ल ने कहा कि मीडिया को अब पवित्र गाय नहीं माना जा सकता, क्योंकि अब पत्रकार, पत्रकार के दायरे से बाहर निकल कर सीईओ, बिजनेस हेड व चैनल मालिक बन रहा है। एक बिल्डर अपना न्यूज़ चैनल क्यों ला रहा है क्योंकि उसे अपनी जमीन भी सरकार से पास करवानी है, नक्शा भी पास करवाना है। कई तरह के लाभ लेने हैं। और यह लाभ लेने का रास्ता उसे पत्रकार ही सुझा रहा है। साफ है, उनका सीधा हमला मीडिया की नैतिकता पर ही है। वे न्यूज़ चैनल, पत्र-पत्रिकायें जिनको शुरू ही सरकार पर मीडिया का दबाब बनाकर अवैध काम करवाना या आर्थिक लाभ लेना होता है उनके साथ मीडिया क्या करे? कैसे उनकी मीडिया फिरौती का इस अप्रत्यक्ष जुर्म से निपटे? यह सब सवाल बहुत कठिन हैं।
मीडिया की नैतिकता का सवाल विदेशी निवेश के बाद और भी बड़ा बन कर सामने आया है। नीरा राडिया प्रकरण में लॉबीईंग का प्रश्न सामने आया था अब मीडिया में विदेशी निवेश के बाद वह एक सुरसा राक्षसी की तरह मुंह बाये खडी है। विदेशी निवेश धारकों का एकमात्र निहित स्वार्थ लॉबिईंग लगता है। जिस तरह कॉरपोरेट लॉबीइस्ट नीरा राडिया ने समाचार, मीडिया और उनके स्टार संपादकों-पत्रकारों की मदद से कई लाभ के क्षेत्रों जैसे  प्राकृतिक गैस के स्वामित्व और कीमत पर अपने क्लाइंट रिलायंस इत्यादि के पक्ष में परोक्ष रूप से जनमत बनाने की कोशिश की। उसी तरह ये मीडिया हाउस भी लॉबीईंग कर रहे हैं।
वाशिंगटन पोस्ट द्वारा प्रधानमंत्री पर की गई स्टोरी कॉरपोरेट की लॉबिईंग की ही स्टोरी है और विपक्ष इस पर आक्रमण भी कर रहा है। उस स्टोरी को छाप कर प्रधानमंत्री की छवि को खराब करने की कोशिश की गई, यह कमोबेश धमकाने जैसा ही था और आश्चर्य है कि उसके छपने के सप्ताह के भीतर ही रीटेल सेक्टर में एफडीआई को लागू करने का निर्णय ले लिया गया। फिर, विदेशी मीडिया नें उनका छवि निर्माण किया और द इकॉनामिक ने दो शब्द लिखे कि अंडरअचीवर प्रधानमंत्री का मोजो बैक हो गया है, रिफार्म का जादु पुनः पटरी पर है। मीडिया इस तरह छवि प्रबंधन से लेकर मुद्दा प्रबंधन तक कर रही है जो और कुछ नहीं बल्कि पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया खत्म करने जैसा है। इस तरह निहित स्वार्थो से स्टोरी बनाकर जनतांत्रिक प्रक्रिया को खत्म करने वाली यह मीडिया निःसन्देह गाय नहीं रह गई है।
मीडिया पहले जैसा ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई नहीं दे सकती। इसके बावजूद की मीडिया एक कॉर्पोरेट मीडिया है उसे नैतिकता और पॉलिसी के बारे में गहराई से चिंतन करना होगा। भारतीय मीडिया को राष्ट्र के निर्माण और राष्ट्रीय पूंजीवाद के उत्थान में सहयोगी होना चाहिये और अपनी पॉलिसी को इसी के मद्देनजर बनाना चाहिये क्योंकि इसमें एक व्यापक दृष्टि है। व्यक्तिगत और सामूहिक का कोई बहुत बडा भेद नहीं है। वास्तव में, प्रॉपर नाउन, एक कलेक्टिव ही है बशर्ते वह उच्चतम मूल्यों पर अवस्थित हो।
इस बात को भगवदगीता में भगवान कृष्ण ने जानकर ही कहा था “यद्यद्दाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः” अर्थात श्रेष्ठ पुरूष जो-जो कर्म करता है। दूसरे सामान्य जन उसका अनुसरण करते हैं, जिस-जिस प्रथा को वह प्रमाणिक मानता है, उसी को लोग प्रमाणिक मानते है।
article originally appeared  at samachar4media read it here too
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Categories

%d bloggers like this: