Posted by: Rajesh Shukla | October 2, 2012

एफडीआई पर ममता की दूरदृष्टि



देश में रीटेल-एफडीआई का विरोध सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को छोडकर कमोवेश सभी पार्टियां कर रहीं है। खबर उद्योग में इस विषय पर दो फाड है और दो तरह की प्रतिक्रियायें हैं, ज्यादातर मामलों में हिन्दी पत्रकार रीटेल-एफडीआई के विरोध में ही लिख रहें हैं। न्यूज चैनलों में हलांकि एकाध अंग्रेजी चैनलों को छोडकर सभी चैनल कहीं न कहीं इस साम्राज्यवाद का विरोध कर रहें है। सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सर देसाई नें कल इस मुद्दे को और भी साफ करने के लिये ममता बनर्जी का विस्तृत साक्षात्कार किया जबकि करन थापर नें भारती एयरटेल कें राजन भारती मित्तल को यह पूछते हुये लपेटा कि जबकि सारी दुनिया में कहा जा रहा है कि वॉलमार्ट से साठ प्रतिशत से ज्यादा रोजगार खत्म हुये आप कैसे कह सकते हैं कि वॉलमार्ट के भारत में आने से छोटे किराना दुकानदारो का रोजगार खत्म नहीं हो जायेगा? राजन भारती को कोई जबाब नही सूझा। क्या जबाब देगें सिवाय इसके कि अन्यों की तुलना में भारत के लोग कम चेतन है, समय की चेतना उनमें कम है इसलिये यहां कुछ भी चल सकता है? या यह कि अन्य देशों में दोहन की सम्भावना कम है जबकि यहां ज्यादा है इसलिये कुछ उस तरह का नकारात्मक प्रभाव यहां नही पडेगा?

शिकागो के लोयला विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह साफ हुआ है कि वॉलमार्ट से अमेरिका में ही कमोवेश ८२ प्रतिशत स्थानीय स्टोर कारोबार से बाहर हो गये हैं। एक अन्य शोध “दी इफेक्ट्स आफ वॉलमार्ट ऑन लोकल मार्केट” के अध्ययन में बात स्पष्ट हुई कि वॉलमार्ट  एक रोजगार के लिये औसतन तीन रोजगार खत्म करता है।

भारत की प्रतिष्ठित मार्केटिंग और कम्यूनिकेशन कम्पनी आर के स्वामी ग्रुप के सीईओ शेखर स्वामी के अनुसार रीटेल की बहुत बडी कम्पनिया टेस्को, सेन्सबरी और एएसडीए ब्रिटेन के रीटेल उद्योग का दो तिहाई हिस्से पर कब्जा है। किसानों को जो मूल्य दिये जाने की शुरूआत हुई वह कुछ ही दिनों में बदतर होती हई और उन्हें कमोवेश तबाह करनें की कोशिस की गई है। ब्रिटेन के किसान राज्य की सब्सिडी पर निर्भर हैं। उनके अनुसार ६ करोड लोगों के इस देश ब्रिटेन में मात्र चार हजार खुदरा किराना स्टोर बच गये हैं। जानकारों के अनुसार ज्यादातर खुदरा व्यापार स्टोर इसलिये खत्म होते जाते है क्योकि ये बडी कम्पनियां बाजार पर एकाधिकार के लिये उन्हें हर तरह से बाजार में काम करने से रोकती है, कई तरह के बाजारू षडयंत्र करती हैं। भारत के प्रधानमंत्री  शायद इन तथ्यों से आंख मूँद कर स्वयं को बचाने के लिये बगैर सोचे कुछ भी कर गुजरने की कोशिस में है। कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार में डूबी कांग्रेस सरकार ने यह फैसला आननफानन में और अमेरीकी दबाव में किया है। ममता बनर्जी ने रीटेल में एफडीआई मुद्दे पर यूपीए-२ से समर्थन वापस लिया और जन्तर मन्तर पर केंद्र सरकार को खूब खरीखोटी सुनाते हुये कहा कि सरकार ने रिटेल में एफडीआई लागू करके देश को बेच दिया है। जबकि फेसबुक पर उन्होनें सन्देश लिखा कि “हम डीजल के दाम बढ़ाने और रसोई गैस पर सब्सिडी में कटौती का समर्थन नहीं कर सकते हैं. आज खुदरा क्षेत्र में एफडीआई को भी मंजूरी दे गई गरीब आदमी के खिलाफ किये जाने वाले किसी भी फैसले के खिलाफ हैं। यह लूट हो रही है।“ अन्य विरोधी दलों के तेवर भी रीटेल में एफडीआई के खिलाफ कम नहीं है, वाम, सपा सहित एनडीए अपने अपने ठंग से आक्रामक हैं। हलांकि एनडीए उस तरह का विरोध नहीं कर पायी जो ममता बनर्जी ने यूपीए में रहते हुये किया है। ममता बनर्जी का यह निर्णय  उनकी दूरदृष्टि का परिचायक है। वह जानती है कि पहले ही महंगाई तथा भ्रष्टाचार को  झेल रही जनता के लिये यह एक अन्य बडा विदेशी खतरा है।  कांग्रेस ने अब तक कोई भी आर्थिक निर्णय न तो देश हित में और न ही जनता  के हित में किये हैं। मनरेगा इस देश के संसाधनो तथा जनता की लूट में से लॉलीपाप  बांटने से ज्यादा नही है।

पिछले दिनों रविशंकर प्रसाद ने यह कहकर एफडीआई का विरोध कर रहे लोगो को असमंजस में डाल दिया था कि यदि भाजपा सरकार आयेगी तो एफडीआई रिटेल के निर्णय को बदल देगी। मतलब इसे रीटेल में एफडीआई को होने देंगे? सत्ता में आने के बाद आप  क्या करेंगे यह किससे छुपा है-आपकी मंसा बदलती रहती है? रिटेल मे निवेश का मन बनाये पूँजीपति अलग घबरा गये और खबर निकली कि इससे निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड सकता है।

देश के खुदरा व्यापारियों में रीटेल में एफडीआई से एक भय सहित रोष व्याप्त है जिसे संघ नें समर्थन देते हुये एफडीआई का पुरजोर विरोध किया है। एफडीआई के पक्ष में कौन है? केवल कांग्रेस है उसके सभी सहयोगी कमोवेश इस मुद्दे पर साथ छोड चुके हैं। घोर विरोधों के इस राजनैतिक समय में क्या वॉलमार्ट कांग्रेस को डूबा देगा? यह सवाल एक बडा है। कार्पोरेट के अपने व्यक्तिगत हित हैं दुर्भाग्य से भारतीय कार्पोरेट पाश्चात्य कार्पोरट की तरह न तो वर्ताव करता है और न ही उनकी तरह ग्लोबल होने के बावजूद देशज ही है। पश्चिम के किसी देश का कार्पोरट मूलभूत रूप से उस देश की चेतना से जुडा हुआ रहता है भले ही पूँजीनिर्माण के बावत वह बहुत व्यक्तिगत हो। पिछले दिनो सर संघ चालक के  भागवत नें एक पुस्तक विमोचन के मौके पर कहा कि कार्पोरेट को देश के हित में सोचना चाहिये। उन्होने ठीक ही कहा कि वास्तव में  यही एक चीज है जो हमारे पूँजीपति नहीं सोचते। जहां वे स्थित हैं उसके विकास में ही उनका भी विकास है, वे पाश्चात्यों की तरह उपनिवेशवादी सोच का नहीं हो सकते। अभी तक यह उपनिवेशवादी सोच हमारे भीतर है चाहे वह पूँजीपति हो या मध्यवर्ग हो। अरे भाई, कहां जाओगे? लूट कर लंदन! यहीं बसो मेरे दोस्तों, यहीं विकसित होओ और यहीं आनंद मनाओ। सब सुखी होंगे।

एक लेखक संदीप वासलेकर हैं जिन्होने मराठी में एक किताब लिखी थी “नये भारत का निर्माण” उसमें जिक्र है कि भारत ही एक मात्र ऐसा देश हैं जहां का पूँजीपति बहुत कम पैसा सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्यों पर खर्च करते हैं जबकि विदेश में पूँजीपतियों ने पूरा का पूरा धन दान कर दिया है। आस्ट्रलिया के स्टीह्व किलेलिया नें साफ्टवेयर कम्पनी से अरबो कमाये और उस सम्पत्ति को अफ्रीका के गरीबो को दान कर दिया, करोडों डालर विश्व शान्ति पर खर्च किया और उनके बच्चे साधारण नौकरी करते है ,विद्यालयों मे पढाते है। ऐसे कई उदाहरंण विदेश के उद्योगपतियों के है। हमारे यहां उद्योगपतियों का पेट ही मानो नहीं भरता। उपनिवेशवादी मानसिकता ने उनकी आत्मा को कमोवेश मार डाला है, उन्हें कुछ दिखलाई नहीं पडता है। यह कम आश्चर्य नहीं कि रीटेल सेक्टर में एफडीआई में वॉलमार्ट को बुलाने के लिये मझौले तथा थोडे बडे भारतीय व्यापारी ही जोर लगा रहे है। भारतीय व्यापारियों में भी एक पैरासाईटिज्म है, उनके भीतर एक लूटवादी अंग्रेज बसता है इसलिये वे अग्रेजपरस्त हैं। यदि अनिल अम्बानी कमोवेश बर्बाद हैं तो वह उनका पैरासाईटिज्म है, उन्होने रीटेल के बडे स्टोर खोले लेकिन बर्बाद हुये, पेट्रोल टंकियां उत्तरप्रदेश में खोलीं लेकिन बर्बाद हुये, इन्टरनेट बिजनेस में भी बर्बाद है क्योकि उनकी प्रवृत्ति व्यापार की कम लूटवादी ज्यादा है। किंगफिशर के विजय माल्या बर्बाद हैं क्योकि वह व्यापारी नही एक लूटवादी क्रोनी कैपिटलिस्ट है। उसे मॉडलो के साथ इतना व्यस्त रहा कि उसे पता तक नही चला की उसका जहाज कर्ज में डूब रहा है, उसे यह बात भी पता नहीं रहती कि उसकी एयरलाईंस (हास्पिटेलिटी उद्दोग) में यात्रियों को भरपूर पैसा देने के बाद भी कष्ट उठाना पडता है।

उद्योगपतियों में जो लूटवादी है वे अंग्रेजपसंद हैं उनके मिलकर साथ लूटवाद सहज कर लेना चाहते है क्योकि वे ऐतिहासिकतः लूटवादी रहे है और इसमे निष्णात हैं। एफडीआई का सबसे बडा खतरा यह लूटवाद ही है हमें इस पर गम्भीरता से सोचना होगा। ममता बनर्जी नें बहुत बडा कदम उठाया है और उन्होनें एक साक्षात्कार में एक बडी बात कहा कि “ कभी कभी आईडियोलॉजी जनता के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।“ निःसन्देह यह लेफ्ट और कांग्रेस दोनो के लिये के शर्मसार करने वाला वक्तव्य है। समाजवादी पार्टी की तो कोई विचारधारा कभी नहीं थी इसलिय उनसे यह आशा करना कि वह ममता बनर्जी की तरह दहाडेंगे मुर्खता होगी। सपा के मुलायम जी वास्तव में एक बिना पेंदी के लोटा हैं कई मामलो में मायावाती उनसे बेहतर हैं। भारतीय राजनीति कमोवेश एक ऐसे मुकाम पर हैं जहां से दो रास्ते हैं पहला कांग्रेसी उपनिवेशवादी सोच और जीवन पद्धति, उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था, तथा दूसरा अपना एक ताकतवर भारतीय अम्पायर अपनी जडों में पैठा हुआ, जहां व्यापार की अनुमति सबको है लेकिन बस व्यापार की अनुमति है लूट की नहीं। हम चीन से कम ही सीखते हैं, कन्फ्यूशियस चीन में किसी भी बडे राजनैतिक चिंतक से बडे है। चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी नें पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मैकियावली, लाक और हाब्स को नही पढाया बल्कि कन्फ्यूशियस को पढाया, कन्फूशियस की विचारधारा को अपने पूँजीवादी शासन के ईथिक्स की के रूप मे स्थापित किया है। यह कम आश्चर्य नहीं है कि छः हजार  पुराने हमारे देश में न तो शासन का कोई विज्डम और नैतिकता थी, न राजनीति का कोई शास्त्र था, न अर्थव्यवस्था थी और पांच सौ साल के पश्चिमी राजनैतिक विचारधारा जीवन के बारे में हमसे ज्यादा अनुभवी हो गई? हमने जितने बडे साम्राज्यों की रचना की थी उतना बडा साम्राज्य विश्व के बहुत कम देशों के राजाओ नें खडा किया होगा, यह क्या बगैर राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के सम्भव था? यह कांग्रेसी उपनिवेशवादी मानसिकता के कारण हुआ कि विदेशियो की विष्ठा भी राजभोग मानकर उपभोग की जाने लगी और अपना अमृत भी मुत्र हो गया। हमे इसको बदलना चाहिये। यह एफडीआई एक नई उपनिवेशवादी संरचना है यह न केवल हमारी देशज अर्थव्यवस्था को खत्म करेगा, बेरोजगारी बढायेगा बल्कि यह वेष्यावृत्ति की संस्कृति को भी बढावा देगा। कांग्रेस की हार अब इस मुद्दे पर होनी ही चाहिये और यह निर्णायक हार होनी चाहिये।

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