Posted by: Rajesh Shukla | September 29, 2012

जो कहा जाना चाहिए



गुंटर ग्रास की विवादास्पद कविता

जो कहा जाना चाहिए
गुंटर ग्रास की विवादास्पद कविता
मैं क्यों खामोश रहा, क्यों लंबे समय से छिपाता रहा,
उसे जो प्रत्यक्ष है और युद्धों की कवायदों में
आजमाया जाता रहा है, जिसके अंत में बचे हुए हम लोग
हद से हद एक फुटनोट की तरह होते हैं?
यह पहले हमला करने का वह कथित अधिकार है,
जो खत्म कर सकता है ईरान के अवाम को,
-जो एक बड़बोले व्यक्ति के अधीन है
और जिसे संगठित उल्लास मनाने को कहा गया है
-क्योंकि ऐसा अनुमान है कि वहां एक परमाणु बम बनाया जा रहा है
हाय, मैं खुद को क्यों रोकता रहा
उस दूसरे देश का नाम लेने से,
जहां कई साल से- भले ही गुपचुप तरीके से-
एक बढ़ती हुई परमाणविक ताकत मौजूद है,
लेकिन जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं
क्योंकि वह जांच से परे है?
इस तथ्य के बारे में एक आमफहम खामोशी,
जिसमें मेरी खामोशी भी शामिल रही,
मुझे लगता है एक तकलीफदेह झूठ है
और एक दमन, जिसकी सजा तय है,
जैसे ही उसे मानने से इनकार करें;
“यहूदी-विरोध’ का फतवा तुरंत हाजिर है।
तब भी, जब कि मेरा देश
जिसे अपने उन अपराधों से रू-ब-रू होना पड़ा हो,
जिनकी कोई मिसाल मिलनी कठिन है,
और बार-बार सफाई देनी पड़ी हो,
बदस्तूर और पूरी तरह व्यापारिक तरीके से,
और इसे एक तेज जुबान में पश्चाताप का नाम देते हुए,
इजरायल को एक और पनडुब्बी भेजने वाला है,
जिसकी खूबी यह है
कि वह सर्वविनाशक हथियारों को
उस जगह दाग सकती है,
जहां एक भी परमाणविक बम का होना साबित नहीं हुआ,
सिर्फ उसका हौआ “साबित’ हुआ है,
मैं वह कह रहा हूं, जो कहा ही जाना चाहिए।
लेकिन मैं अब तक खामोश क्यों रहा?
इसलिए कि मैं सोचता था मेरा देश,
जिस पर एक कभी न मिटने वाला दाग लगा है,
मुझे यह साहस करने से रोकता है
कि जिस इजरायल से मैं जुड़ा हूं और जुड़ा हुआ रहना चाहता हूं,
उसके सामने वह तथ्य रखूं जो कि एक जाना-माना सच है
और मैं अब जाकर यह क्यों कह रहा हूं,
बुढ़ापे में और स्याही की आखिरी बूंद के साथ –
परमाणविक ताकत वाला इजरायल एक खतरा है
सबसे नाजुक हो चली विश्व-शांति के लिए?
वह कहा ही जाना चाहिए,
जिसे कल कहने पर मुमकिन है बहुत देर हो जाये,
और क्योंकि हम-एक भारी बोझ से लदे हुए जर्मन-
एक ऐसे अपराध के सौदागर बन सकते हैं
जिसका पूर्वानुमान करना आसान है,
और यह भी कि कैसे उसमें हमारी मिलीभगत को
किन्हीं रस्मी दलीलों से अनहोना नहीं किया जा सकेगा।
और मान लिया – अब मैं खामोश नहीं हूं,
क्योंकि मैं पश्चिमी पाखंड से आजिज आ गया हूं,
और फिर एक उम्मीद भी है कि
शायद इस तरह बहुत से दूसरे लोग चुप्पी की
इस गुलामी से अपने को मुक्त कर सकेंगे,
इस जाने-पहचाने खतरे के सूत्रधारों से मांग कर सकेंगे
कि वे तमाम हिंसा का त्याग करें
और साथ ही इस बात पर जोर दें
कि एक अंतरराष्ट्रीय इकाई का गठन हो,
जिसके जरिये इजरायली परमाणविक सामर्थ्य
और ईरानी परमाणविक ठिकानों की
बेरोक और स्थायी निगरानी हो सके
और जिसे दोनों देशों की हुकूमतों की अनुमति हो।
सिर्फ यही रास्ता है जिससे सभी, इजरायली और फिलस्तीनी,
इससे भी बढ़कर, तमाम मनुष्य, जो पागलपन से ग्रस्त इस क्षेत्र में
एक-दूसरे के साथ शत्रुओं की तरह रह रहे हैं,
बच सकते हैं- और अंततः हम भी।
अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर हिंदी अनुवाद – मंगलेश डबराल

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