Posted by: Rajesh Shukla | September 22, 2012

ऑनलाईन मीडिया की रफ्तार


ऑनलान मीडिया के बदलते स्वरूप और अन्य पहलूओं जो मीडिया विमर्श के दूसरा हिस्सा है उस पर यह पोस्ट डाल रहा हूँ।  मैने कभी मीडिया के बारे में लिखा नहीं इसलिये सोचा की ऑनलाईन मैं खुद ही रहता हूं तो क्यों न एक नया मेनू बना दूँ और इस तरह का भी कुछ समय समय पर लिखता रहूँ। मीडिया विमर्श के अन्य पहलू नाम से इस मीनू में ऐसे पोस्ट समय समय पर घूसेडता रहूंगा।  यदि आप सर्च करें तो आपको  इंटरनेट पर इसतरह का आर्टिकल शायद उपलब्ध नहीं मिलेगा, मिल जाये तो मुझे भी बतलाईये। विश्व इन्टरनेट साख्यिकी के अनुसार दिसम्बर 2011 तक भारत में इन्टरनेट का इस्तेमाल करने वाली जनसंख्या 12.2 करोड हो चुकी थी और इन्टरनेट का पेनेट्रेशन तकरीबन 10.2% के करीब हो चुका है। जैसे जैसे इन्टरनेट का पेनेट्रेशन बढेगा और अन्य तकनीकी तथा मीडिया डिवाईसेज में बदलाव आयेगा, जनता की दुनिया को देखने और समझने का बोध परिवर्तित होता जायेगा। यह परिवर्तन न केवल भाषा को बदलेगा बल्कि मीडिया के सेन्स को भी परिवर्तित करेगा जाहिर मीडिया लेखन भी बहुत कुछ परिवर्तित हो जायेगा। मोबाईल डिवासेज का विस्तार से हमारे अनुभव में यह बात आ चुकी है कि एक बडी कामकाजी जनसंख्या खबर के लिये कम ही प्रिंट मीडिया या टीवी सेट पर आश्रित हैं। पढन-पाढन के स्तर भी यह इन डिवाईसेज पर आश्रित है। मोबाईल कम्पनियों में मोबाईल टीवी जैसे नये मीडिया विस्तार को पकडने की एक होड सी मची हुई है। मोबाईल एक मोबाईल मीडिया है और इसकी सम्भावनायें अन्य पारम्परिक मीडिया के लिये एक बडा खतरा है, और खतरा देखा भी जाने लगा है। वर्तमान इलेक्ट्रानिक मीडिया क्षेत्रों के विस्तार से प्रिंट मीडिया या टेलीविजन न्यूज मीडिया में जल्द से जल्द अपनी ऑनलाईन उपस्थिति बढाने की होड बढ गई है। टीवी-18 जैसी मीडिया कम्पनियां  मोबाईल  जैसे क्षेत्रों के लिये कमर कस कर खडी है। कौन सा ऐसा क्षेत्र है जिसमें टीवी-18 यदि बहुत सक्रिय नहीं है तो कमसे उपस्थित नहीं है?   जैसे वर्तमान में कमोवेश सभी प्रमुख हिन्दी-अंग्रेजी दैनिक अखबारों की ऑनलाईन डिजिटल उपस्थिती है और जो अभी तक अपनी उपस्थिती दर्ज नही कर पायें हैं इस दिशा में काम कर रहें हैं। दूसरी तरफ वेब मीडिया पोर्टल जिसने मेनस्ट्रीम मीडिया से स्वतंत्र रूप में अपना विकास शुरू किया था अपने विस्तार में लगे हैं। इन्टरनेट टीवी और इन्टरनेट कन्वर्सेशन ने इस माध्यम की सम्भावना को काफी बढा दिया है तथा इसे एक प्रभावी माध्यम के रूप में सामने रखा है। अभी कुछ ही दिन पहले गुजरात के नेट सैवी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुगल प्लस पर चैट द्वारा लाखो लोगों से सीधा सम्पर्क स्थापित किया और वार्तालाप कर इस उद्योग में खलबली मचा दिया है। नरेन्द्र मोदी का नेट सैवे होना उनके लीडरशीप और सोच के बारे में बहुत कुछ कहता है। भारत में किसी राजनेता द्वारा की गई इस तरह की तकनीकी पहल ने इन्टरनेट मीडिया मे महत्व को और भी बढा दिया है। मीडिया उद्योग इन सम्भावनाओं की तरफ बहुत आशा के साथ देखने लगा है।

अभी तक यह माना जाता था कि इन्टरनेट एक निश मार्केट है इसकी सीमायें हैं लेकिन यदि हम टेलीविजन मीडिया उद्योग से तुलना करें तो इसे किसी भी तरह निश नहीं कहा जा सकता है तब जबकि इसने अपनी उपस्थिती को गाँवों तक में दर्ज किया है जहां अभी भी टेलीविजन में दूरदर्शन ही चल रहा है। इन्टरनेट मीडिया अब निश नही रह गया है, यह एक मेनस्ट्रीम मीडिया बन चुका है तथा कई मामलो में मेनस्ट्रीम मीडिया से आगे भी है। कुछ ही वर्षो के भीतर हम यह देखेगे कि मेनस्ट्रीम मीडिया इसकी रफ्तार को नहीं पकड पायेगी और इसके पीछे चलना उसकी मजबूरी हो जायेगी। वर्तमान समय में कमोवेश हम यह देख भी रहे हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात इसकी अन्य क्षेत्रों में सम्भावनाओं की है- जैसे विज्ञापन बाजार। इन्टरनेट न्यूज उद्योग में विज्ञापन अभी अन्य माध्यमों की तुलना में सबसे सस्ता है जबकि विज्ञापनों की प्रभावोत्पादकता में यह कई मामलों में सबसे बेहतर है। मसलन यदि हम एक विज्ञापन को लें तो प्रिंट में एकदिन-एकबार ही यह उपभोक्ता की नजर के सामने आता है, टेलीविजन में यह विशेष समयानुसार सर्कुलेट होता है जबकि वेबन्यूजपोर्टलों में हरएक वेबपेज डाउनलोड, हरएक इम्प्रेशन में यह उपभोक्ता की नजर में बना रहता है। विज्ञापित उत्पादों या सेवाओं का एक्सपोजर जितना लम्बे समय तक वेब न्यूज पोर्टल्स पर बना रह सकता है उतना न तो प्रिंट मे और न ही टीवी न्यूज कार्यक्रमों में सम्भव है। उपभोक्ता की स्मृति को प्रभावित करने की जो क्षमता वेबन्यूज पोर्टल की है उसकी तुलना अभी एकमात्र टेलीविजन से ही की जा सकती है। प्रिंट मीडिया तो इसके समक्ष कहीं नही ठहरता है। इससे जुडी एक अन्य प्रमुख बात यह है कि वेबन्यूज पोर्टल्स पर विज्ञापन किसी सीमित स्पेश-टाईम में स्थित नहीं होता, यह कमोवेश सार्वभौम रूप से हर कहीं उपस्थित होता है-चाहे वह पोर्टल का कोई भी सेगमेन्ट हो, चाहे उसका ब्लाग ही क्यों न हो। वेबन्यूज पोर्टल्स के स्पेश की सम्भावना अन्य किसी भी माध्यम की मीडिया से ज्यादा बडी है,बस हमने इसका विस्तार अभी तक ठीक से नहीं किया है।

वेबन्यूज पोर्टल्स की तुलना में जहां प्रिंट मीडिया पूरी तरह लोकल मीडिया के रूप में सिकुडता नजर आता है वहीं टेलीविजन भी उपभोक्ताओं तक पहूँच के मद्देनजर इससे पीछे ही नजर आता है और यदि अभी नहीं है तो जिस रफ्तार से यह विकसित हो रही है उसको देखते हुये पांच एक वर्षों में ही यह सबसे आगें दौडती हुई, सबसे बहुमुखी इन्फार्मेशन मशीन होगी। टाईम्स इन्टरनेट नेटवर्क्स जैसी स्पेशलाईज्ड कम्पनियों नें इसमें अपनी गति को काफी बढा दया है। विस्तार की गति बहुत द्रुत है। फिलहाल वेबन्यूज पोर्टल ही एक मात्र ऐंसा मीडिया है जिसकी पहूँच लोकल और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों है।  भारतीय विज्ञापनदाता अब भी कन्जर्वेटिव है या इस सच्चाई को शायद नही समझता और अन्यों की तुलना में इसे वरीयता नहीं नही देता। जबकि अमेरीका में वेब विज्ञापनों नें 2010 में कमोवेश दो गुना से अधिक छलांग लगाई है और रेवेन्यू में पारम्परिक मीडिया प्रिंट, पत्रिका, टीवी को काफी पीछे छोड दिया है। एक अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सी प्राईस वाटर हाउस कूपर ,एल एल पी की एक न्यूज रिपोर्ट के अनुसार अमेरीका में वेब रेवेन्यू में 15% की दर से वृद्धि हुई है और पिछले साल यह $26 बिलियन तक पहूँच गई है। गौरतलब है कि आनलाईन विज्ञापनों में रीटेल सेक्टर से सबसे ज्यादा विज्ञापन मिले हैं जो कि सम-टोटल रेवेन्यू का 20% रहा था। अलग अलग उद्योगों के एडवरटाइजर्स की स्ट्रेटेजिज वर्तमान परिदृश्य में बहुत तेजी से बदली है ‍और सबकी एक जैसी नहीं है –विज्ञापन देने का ट्रेन्ड जैसी कोई चीज शायद अब नही रही।

वर्तमान में मीडिया का एक भाषाई नारा है कि “कोई मातृभाषा नहीं है” क्योंकि इन्टरनेट का यह समय एक हाईब्रिड समय है। टीवी और वेबन्यूज चैनलों के इस दौर में हिन्दी एक परिष्कृत भाषा के बतौर अपनी पहचान लागातार खोती जा रही है, इसको शुद्ध बनाये रख पाना अब काफी मुश्किल है। इन्टरनेट पर अंग्रेजी और हिन्दी ने मानो सात फेरे ले लिये हो। इससे भाषा की कैसी सन्तान पैदा होगी यह एक दशक बाद ही कुछ ज्यादा स्पष्ट हो पायेगा, फिलहाल तो प्रिंट से लेकर टीवी और इन्टरनेट तक एक हाईब्रिड हिन्दी भाषा ही प्रचलन में है। यदि आप दी इकनाँमिक टाईम्स को एक उदाहरण के बतौर देखें तो वह अब बस लिपि के बतौर ही हिन्दी रह गई है शेष तो अंग्रेजी ही है। इसका भी एक दूरगामी प्रभाव मीडिया सेन्स पर पडने वाला है। भाषा के परिष्कार के बगैर किसी बेहतर कन्टेन्ट की आशा शायद नहीं की जा सकती क्योकि अभी तक तो यही माना जाता है विमर्श सदैव भाषा का विमर्श है। भाषा के इस हाईब्रिड चरित्र में न केवल मीडिया मे कार्य करने वाले मीडियाजन का श्रम से बचना झलकता है बल्कि जनता में एक तरह की असाक्षरता भी है। या कहें कि कहीं न कही दो भाषाओं के बीच फंसा मीडिया एक सामंजस्य बनाने में अपनी ही भाषा से स्खलित हो गया है। मैं भी अंग्रेजी से हिन्दी तथा हिन्दी से अंग्रेजी के बीच डोलता हूँ तो कई बार पतित हो जाता हूँ लेकिन संभलने की कोशिस करता हूँ। यह परिवेश का कुप्रभाव होता है। हिन्दी की इंटरनेट भाषा को अपनी पहचान बनाये रखने की जरूरत है अन्यथा हिन्दी अंग्रेजी मे समाहित कर ली जायेगी। हमें इसपर ध्यान देते हुये वेबन्यूज मीडिया को विकसित करने पर बल देना चाहिये और यह जान लेना भी जरूरी है कि “डिफरेन्सियेशन इज दी की”। यह बात उन सारे क्षेत्रों पर लागू होती हैं जहां सम्भावनाओं की सीमा नहीं है यहां तक कि जो सीमित(फाईनाईट) हैं, वह पहलें ही असीमित सम्भावनाओं से भरपूर है, बस पहचानने की जरूरत है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि वेबन्यूज मीडिया की असीम सम्भावनायें इस लिये हैं क्योकि यह एक अन्तर्गुन्थित या एम्बेडेड सिस्टम है। यह एक एब्स्ट्रेक्ट मेगा मीडिया मशीन है जिसमें सब कुछ समाहित कर सकने की शक्ति है। इन सबके मद्देनजर वेब न्यूजमीडिया अन्य किसी भी मीडिया से ज्यादा समय सापेक्ष तथा ज्यादा विकसित तंत्र है, सवाल इसके व्यापारिक पहलूओं के विकसित करने का है। यह इकनाँमी का सबसे महत्वपूर्ण ईंजन बनने की दिशा में आगे बढ रहा है।

–इस विषय पर अन्य पोस्ट समय समय पर होंगी।

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Responses

  1. Very good article


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