Posted by: Rajesh Shukla | September 10, 2012

खबरिया चैनलों के काँमेडी कार्यक्रम


खबर के बावत एक व्यंगकार, एक कार्टूनिस्ट या एक हास्य कलाकार नैतिक, राजनैतिक धरातल पर विषयनिष्ठ होते हुये एक उभयचर स्वरूप ग्रहण कर उससे उपर खडा रह सकता है और मानव जीवन के उच्चतम मुल्यो की सेवा कर सकता है। एक राजनैतिक-सामाजिक व्यंगकार एक कटु आलोचक होते हुये भी अपनी विनम्रता बनाये रख सकता है हलांकि विनम्रता उसका एक आवश्यक गुण हो यह जरूरी नहीं । बहुत से व्यंगकार बहुत गर्ममिजाज होते है यह भी सहज मानव स्वभाव है। स्वभाव की अनुरूपता वास्तव मे उनकी मांग रहती है जो मूलतः व्यक्ति की स्वतंत्रता के विरोधी होते तथा ज्यादातर मामलो मे अमानवीय होते है। हर राजनेता, हर एक पूँजीपति यह आचरण की अनुरूपता चाहता है सबको एक जैसा बनाकर रखना चाहता है। हमारे समाज में व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास शायद इस वजह से नही हो पाता बहुसंख्यक कमोवेश एक जैसे ही व्यक्तित्व होते है। काँमेडियन या कोई भी कलाकार, या लेखक सबसे अलग व्यक्तित्व होता है। दूसरी बात यह है कि ज्यादातर मामलो मे व्यंगकार या कार्टूनिस्ट किसी न किसी वैचारिक फोल्ड मे फंस जाता है और फिर राजनीती का शिकार हो जाता है। इधर बीच राजनैतिक व्यंगकारो पर राजनैतिक पार्टियो और नेताओ के हमले सम्भवतः इसी कारण बढ गये है। पहले राजनेता ज्यादा विनम्र तथा विचारो की स्वतंत्र्रता को तरजीह देने वाले होते थे लेकिन अब क्योकि विचारधारा ही नही रही तो विचार ही सबसे बडा दुश्मन हो गया है। आज के समय मे एक स्वतंत्र विचार तो बडा ही दुश्न है क्योकि बुर्जुआ एक नियंत्रित समाज, एक नियंत्रित जीवन की मांग करता है। यह केवल राजनेता या पूँजीपति के बावत ही सच नही है बल्कि कलाकारो या खिलाडियो के बारे मे भी यही सच है जिन्हे आलोचना एक दम पसन्द नही क्योकि यह उनके व्यापार के लिये खतरा है। सचिन तेन्दुलकर जैसे खिलाडी आलोचको पर सदैव आंखे तरेरते रहते है क्योकि आलोचना कही उनकी ब्रांड वैल्यू न खत्म कर दे। सवाल उद्दात्त का अब नही रह गया है अब सब कुछ केवल व्यापार है इसलिये आलोचना, विचार, कोई नयी बात परजीवीता की सबसे बडी दुश्मन है।  एक व्यंगकार, एक कार्टूनिस्ट या एक हास्य कलाकार मूलभूत रूप से एक आलोचक है भले ही उसकी आलोचना लोगो का मनोरंजन करती है। ये तब तक पसन्द किये जा सकते हैं जब तक ये शुद्ध मनोरंजन करते रहे तथा सच के कन्नी काटते रहेगें। जिस दिन ये आलोचनात्मक रूख अख्तियार करते है और जनता की सम्वेदनाओ को झकझोरते है उसी दिन ये दुश्मन बन जाते है। एक हास्यकलाकार या एक व्यंगकार अपने सुपर ईगो पर अवस्थित हो तुच्छ अहं का साक्षी बन कर अपनी बात कहता है इसलिये कई बार वह ब्लैक ह्यूमर ( ज्यादा उपहासपूर्ण ,ज्यादा खलपूर्ण,ज्यादा निंदा वाले हास्य ) को पैदा करता है जो लोगो को नागवार गुजरती है बनिस्बत इसके कि वह मानवता को कही न कही किसी न किसी स्तर पर मुक्त कर रही होती है।

भारतीय न्यूज उद्योग( मुझे यह शब्द ही हास्यास्पद लगता है-news industry खबर उद्योग) मे वैसे तो गधो की कोई कमी नही है लेकिन उन गधो मे भी गधे यदि खोजे जाये तो सहज ही मिल जायेंगे। न्यूज उद्योग मे ज्यादातर चैनलो का मोटा मुनाफा वास्तव मे खबरिया गधो और गदहियो के कारण ही है। गिने चुने चैनलो जैसे एन डी टी वी के दोनो चैनल, सी एन एन आई वी एन, टाईम्स नाऊ को यदि छोड दिया जाय तो ज्यादातर चैनल न केवल न्यूज के बावत बल्कि अन्य प्रोग्रामो के कारण भी हास्यस्पद स्थिति मे ही है। न्यूज उद्योग को एक लाभकारी तंत्र के रूप मे देखा जा सकता है लेकिन खबरिया चैनलो के मद्देनजर लाभ की परस्पर प्रतियोगिता मे लाभकारी बने रहने का दबाव उन्हे ध्वस्त कर सकता है। मिडिया उद्योग यदि लाभकारी थियेटर बनेगा तो क्रमशः वह मनोरंजन की तरफ बढता जायेगा। वैसे भी यदि देखे तो ज्यादा खबरिया चैनलो पर कार्यक्रम एक मनोरंजन से ज्यादा नही है। खबरिया चैनल को मनोरंजन चैनलो या धार्मिक अस्था इत्यादि चैनलो से किस आधार पर अलग किया किया जाता है? न्यूज कन्टेन्ट के आधार पर ही किया जाता है। खबरिया चैनलो का अन्यो से डिफरेन्सियेशन का आधार खबरकेन्दित होना है और यह डिस्कवरी चैनल की जैसी खबर नही दिखा सकता क्योकि उसके लिये कमोवेश आधेदर्जन से अधिक चौबीस घंटा चलने वाले चैनल है। इसका मतलब है इन्हे दिन प्रतिदिन की राजनैतिक खबर को प्रमुखता देना है, राजनैतिक-सामाजिक विषयो को लेकर काम करना है। काँमेडी मे भी इन्हे मूलतः राजनैतिक ही बने रहना होगा नही तो सब एक दिन गडमड हो खिचडी चैनल मे बदल जायेंगे।
भारतीय टेलीविजन के मनोरंजन प्रधान चैनलो पर व्यंग, काँमेडी तथा हास्य आधारित “ग्रेट ईन्डियन काँमेडी शो” जैसे कार्यक्रम तो बहुत है लेकिन खबरिया चैनलो पर भी जो कुछ कार्यक्रम आते है वे उनसे कई मामलो मे महत्वपूर्ण है। खबरिया चैनलो पर काँमेडी या व्यंगाधारित कार्यक्रमो का अभी बेहतर त्पादन नही हुआ है। लेकिन जो कार्यक्रम आते है उनका खबरिया चैनलो की टी आर पी मे एक महती योगदान है क्योकि एक बडी जनसंख्या उन्हे पसन्द करती है और नित्य प्रति देखती है। शेखर सुमन का पोल खोल यह बतला चुका है कि इसकी सम्भावना बडी है बस उसको तलाशने की बात है। खबरिया चैनलो के काँमेडी शो ज्यादातर राजनैतिक खबरो के इदगिर्द बुने गये है इसलिये शुद्ध काँमेडी का मनोरंजन की अपेक्षा इनसे नही की जानी चाहिये। यह काँमेडी जेनर का सबसे महत्वपूर्ण तथा सबसे ज्यादा सम्भावनाओ वाला प्रकार है। स्टार न्यूज पर आने वाला शेखर सुमन का विशुद्ध राजनैतिक व्यंग का पोलखोल काफी सफल कार्यक्रम था । अब शायद यह कार्यक्रम नही आता, गुगल पर खोजा तो पता चला स्टार यूके पर शायद अब भी चलता है। शेखर सुमन का यह कार्यक्रम न केवल अपने व्यंगात्मक संवादो मे बल्कि अपनी प्रस्तुति मे भी काफी बेहतर था। इसके इतर जो कार्यक्रम मुझे दिखाई पडते हैं या मेरी टीवी पर आते है वे है साईरस ब्रोचा तथा कुनाल विजयकर का सी एन एन पर “ द वीक दैट वाजन्ट”, एन डी टी वी का पापेट शो “गुस्ताखी माफ”,और आई बी एन-७ का नावेद-बबलू और ओपी का कार्यक्रम “२ जी”। मेरा खयाल है खबरिया चैनलो पर यही ऐक्सक्लूसिव प्रोग्राम राजनैतिक व्यंग और काँमेडी को लेकर आते है। सबसे पहले सी एन एन पर आने वाले कार्यक्रम “ द वीक दैट वाजन्ट” को लेते है जिसे मेरे पसंदीदा शो दी फुडी के मिस्टर कुनाल विजयकर तथा दूसरे साईरस ब्रुचा ले कर आते है। साईरस MTV पर अपने कार्यक्रम “बाप आफ बकरा” से पहले ही बहुत नाम कमा चुके है लेकिन उनका विशुद्ध राजनैतिक-न्यूज के इदगिर्द घूमता यह कार्यक्रम काफी बेहतर है। साईरस एक मजे हिये कलाकार है इसलिये अपने राजनैतिक सटायर को अच्छी नौटंकीबाजी के साथ पेश करते है। कुनाल विजयकर का दी फूडी शो पर मै एक ब्लाग पोस्ट डालने वाला हूँ वैसे भी विजयकर भोजनियाते समय कम काँमिक करेक्टर नही लगते है। कई बार विषय की तह मे जाने के बाद कोई कोई काँमिक करेक्टर बन ही सकता है-मसलन रोज खाने का रिचुअल करते करते एक दिन आप को स्वयं एक गदे का तुच्छ अनूभूति हो सकती है या आप उसके जैसा ही महसूस कर सकते है। पता नही यह  समय का ट्रैजिक प्रभाव है कि लोग कांमिक करेक्टर बनते जाते है या कुछ और, बहुत सारे ऐकर भी विदूषक से ज्यादा नही लगते। एक विदूषक या काँमिक करेक्टर वह है जिसने अपना स्व खो दिया है और दिन प्रतिदिन वह एक मूर्खतापूर्ण हंसी बनता जाता है । हर कोई जो नकलची है विदूषक है-एक काँमिक करेक्टर है। फिलहाल इन दोनो गधो (अन्यथा न लें ये गधे स्मार्ट हैं) का यह काँमिक शो कई मामलो मे नायाब है मसलन कुनाल विजयकर जिन शख्शियतो का ईमिटेशन करता है और जिस तरह राजनैतिक विषयो पर अपना पक्ष रखता वह व्यंगात्मक होने के साथ मनोरंजक भी होता है। साईरस और विजयकर ऐपिसोड वाईज विषयो मे ठीक से पैठने की कोशिस करते है तथा उनकी ट्यूनिंग भी काफी अच्छी है रहती। फूहड़ता से बचने की कोशिस करते हुए दोनों अपने नटखट व्यवहार,द्विअर्थी  सटायरिक संवादो के बावत भी काफी बेहतर दे सकने मे सक्षम होते है हलांकि अभी इस जेनर की सम्भावनाये ठीक से नही तलाशी गई है। हर व्यक्ति मे एक छवि हारपो मार्क्स, चैपलिन या मिस्टर बीन की होती है जिसका उद्रेक दर्शक में किया जा सकता। साईरस कहता है कि वह बहुत भाविक नही है तो यह स्वाभाविक है, काँमेडी के बडे कलाकार कई मामलो में अतिमानव कहे जा सकते है क्योकि वे तुच्छ भावनाओ से उपर उठे होते है। वे तटस्थ रहकर ही कुछ अच्छा कर सकते है क्योकि तभी वे दृष्टा होते है, वह सुक्ष्म अवलोकन कर पाते है। कोई भी यदि एक मिनट के लिये स्वयं तटस्थ रखकर सडक के किनारे खडा हो जाय और देखे तो जीवन के सामान्य क्रियाकलापों को देख कर वह हंसे बिना नही रह सकता। यदि आप देखे तो ज्यादातर लोग सडक पर ऊंघते हुये चलते है, हर आदमी न जाने कहां भाग रहा है लगता है उसे कुछ दिखाई नही पडता है। कोई एक अदृश्य वासना है जो उसके अवचेतन से उसे संचालित कर रही है। कभी कभी प्रेम का तमाशा ही एक बडी काँमेडी लगता है। एक काँमेडियन दृष्टा बन कर जीवन की तुच्छताओ को देखता है फिर उसे प्रस्तुत कर देता है जो अकेले उसकी नही बल्कि सभी उसमे साझेदार होते है।  इसीलिये हंसी के हंसगुल्ले ज्यादातर सदैव सम्मिलित होते है—सब उस तुच्छता की अनुभूति मे साझीदार हैं। अकेले भी एकान्त मे जेन गुरूओ की तरह या अवधूतो की तरह आप ठहाके लगा सकते हैं। आज लोग ज्यादा परवर्ट है इसलिये काँमेडी के कार्यक्रम एक बडी भूमिका निभाते सकते है। कई बार कोई ऐपिसोड थोडा सच की परतो को ऊघाडने वाला थोडा डिसरप्टिव होकर भी बहुत सम्मोहित करने वाला हो सकता है। बिग बाँस की सफलता का राज थोडा उसका डिसरप्टिव होना ही था। भारतीय इससे बहुत बचते है। वास्तव मे एक बेहतर व्यंगात्मक कार्यक्रम वही होता है जिसमे कलाकार समय की विसंगतियो की हस्तमैथुनवत उल्टी करता है और दर्शक को न केवल हंसाता है बल्कि उनके तुच्छ अहं को झकझोरता है तथा उन्हे विषय की एक बेहतर समझ भी देता है। नई चेतना का उद्घाटन मे ही इस तरह के कार्यक्रमो का वास्तविक तात्पर्य होना चाहिये। ऐसे काँमेडी के कार्यक्रमो से प्रस्तोता हँसी-ठहाको मे ही सत्य का उद्घाटन कर सकता है बशर्ते वह एक ऐसा विदूषक न हो जो मालिक के लिये सच से विडम्बनात्मक ठंग से आँख मारते हुये कन्नी काट ले।

दूसरी तरफ एन आई वी एन -७ पर चलने वाला तीन प्रस्तोताओ नावेद, ओपी और बबलू द्वारा प्रस्तुत काँमेडी का कार्यक्रम “२ जी” है। यह भी राजनैतिक खबरो के इदगिर्द बुना गया काँमेडी सरकस है जो अपने हल्के फुल्के कटाक्ष के कारण एक ठीक ठाक कार्यक्रम बन जाता है। नावेद, ओपी, बबलू द्वारा जो राजनैतिक कटाक्ष या ईमिटेशन किया जाता है वह थोडा सतही होता है लेकिन कलात्मक रहता है। ये चरित्र विदूषक है चरित्र नही इसलिये भी उनमे एक रस मिल सकता है। बबलू नामक विदूषक पत्रकार शायद प्रभु चावला की नकल करता है, उनके व्यक्तित्व का कमोवेश ईमिटेशन करता है। यह कई मामलो बीजेपी है डम्ब करेक्टर है। २ जी का बीजेपी अपने साक्षात्कारो से व्यक्तियों के चरित्र को सामने रखता है तथा उसे मजेदार बनाकर पेश करता है। बी… जे… पी वास्तव मे कई मामलो मे टैजिकली अमूर्त है कमसे कम सम्वाद को जब वह विखण्डित करता है तब तो वह कुछ ऐसा लगता है मानो विस्मृति मे या शून्य मे ही भटका गया हो। मनमोहन सिंह का ईमिटेशन बहुत ट्रैजिक लगता है। एक तो वैसे ही वह किरदार अजीब उदास आत्मा होता है दूसरे जब वह मनमोहनी-सायरी कहने लगता है या अपनी दुर्दशा का वर्णन करता है तो वह झंट ही करता है। नावेद और ओपी के आपसी सम्वाद भी काफी रोचक हो जाते है हलांकि कई बार फार्म गडबडा भी जाता है। काँमेडी की अन्तर्वस्तु के उत्पादन की बारीकियो पर ध्यान देना जरूरी है जिससे दर्शक के दिमाग में संक्षोभात्मक गति पैदा की जा सके महज काँमेडी के किश्च उत्पादन से कोई लाभ नही। ठहाका, हंसी एक दिमाग की संक्षोभात्मक गति है, यह एक सोबिंग या एक आर्गेज्म जैसा है। वास्तव मे व्यक्ति जब हंसता चाहे स्वयं पर या दूसरो पर तो उसके पीछे व्यक्तित्व का डिजनरेशन, उसकी तुच्छता ही होता है जिस पर हंसी आती है और व्यक्ति स्वयं को पहचानता है दूसरे को आईना दिखलाता है। ईतालवी मे कहा जाता है कि एक ठहाका व्यक्ति को दफन कर सकता है।
दुनिया मे सारी ईश्वरीय शक्तियो मे आस्था सबसे बडी चीज है, फिर थोडा नीचे आईये तो आशा है फिर नीचे आईये तो हंसी ही एक बडी चीज है। दार्शनिक कान्ट ने लिखा है कि वाल्तेयर ने कहा था कि स्वर्ग से सारे दुखो के एवज मे मनुष्य को दो चीजे मिली थी आशा और निद्रा लेकिन उसमे तीसरी चीज भी उन्हे जोडना चाहिये था ठहाके। इसमे चौथी चीज आर्गेज्म भी जोडा जाना चाहिये जो दुर्लभ है। पोर्न तो हर कही भरपूर है, सेक्स मे ,चिंतन, कला मे, काँमेडी, लेखन, सिनेमा इन सब मे लेकिन आर्गेज्म नही है । दिन भर की खबर तथा राजनैतिक उठापटक के बाद यदि उसी पर शाम को एक चित्त को विदारित करने वाला व्यंगात्मक कार्यक्रम हो तो नेताओ को तथा राजनैतिक जानवरो को थोडा सकून मिल सकता है। आई बी एन के २ जी वाले देखने से घोटालेबाज भी लगते हैं, वे दोनो है या नही ये तो बीजेपी को पता होगा। लेकिन वे हर एपीसोड मे किसी न किसी का बैण्ड बजाते हैं जो कि भारतीय मनोरंजन उद्योग के पहले ऐकर साईरस ब्रूचा के बकरा बनाने वाले प्रोग्राम “बाप आफ बकरा” की तर्ज पर है लेकिन इसमे थोडा मजा है क्योकि यह सिर्फ बेवकूफ बनाने तक नही सिमटता बल्कि उससे ज्यादा से ज्यादा मनोरंजन पैदा करने की कोशिस करता है। २ जी वास्तव मे उस अर्थ मे काँमिक नही है जिस अर्थ मे काँमिक होना चाहिये। यह कार्यक्रम ज्यादातर मामलो मे परिघटनात्मक न होकर सेमेन्टिक्स पर आधारित रहता है-मतलब यह टैक्सचुअल ज्यादा है, बाल की खाल निकालने पर ज्यादा जोर होता है। इसी कारण यह कई बार बहुत सतही बन जाता है क्योकि सेमेन्टिक्स बहुत भाषाई स्तर बहुत उद्दात होने के बाद ही काँमेडियन को कुछ विशेष दे सकता है। यदि ज्यादातर काँमेडियन को देखे तो ईमिटेशन भी अपनी उद्दात्तता मे सामने नही आता। काँमेडी का उद्दात्त स्वरूप जीवन के क्रियाकलापो तथा उसकी विसंगतियो के बारीक अवलोकन से, सत्ता के अपरिष्कृत स्वरूप को पकडने से, भाषा की समझ तथा वाक्पटुता से, जीवन की आलोचना से, काल्पनिकता से,अन्यमनस्कता मे किसी बिन्दु पर दुर्घटनात्मक होने मे, शैतानियत से, तथा स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति से बनता है। २ जी की काँमेडी बहुधा राजनेताओ के कहे पर कुछ कहने, किसी की थोडी नकल, किसी को बकरा बनाना तक ही सिमट जाती है। राजनीति की वर्तमान विसंगतियो को न तो ये समझ पाते न ही उसे अपनी काँमेडी मे सामने रख पाते है।
एन डी टी वी के “गुस्ताखी माफ” पर इस पोस्ट मे कुछ नही लिख पाया एक कोई दूसरी पोस्ट को एक्सलूसिवली इसी के नाम से शुरू करने की कोशिस करूंगा। मिडिया या मनोरंजन उद्योग की मेरी समझ बहुत थोडी है इसलिये उसी नजर से पोस्ट को पढे।

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