Posted by: Rajesh Shukla | September 5, 2012

ब्यापारी, राजनैतिज्ञ और माचू पीचू में टैंगो-टैंगो


टाईम्स नाऊ के अर्णव गोस्वामी की टी वी पत्रकारिता का एक गुण यह है कि वह बहुत गम्भीर मुद्दो को छूता है साथ मे कुछ ऐसा भी जिसे हम सामान्यतः सामान्य मानते है लेकिन वह वास्तव मे असमान्य रूप से सिरियस होता है। मसलन उसका कर्नाटक सांसदो का “अध्ययन टूर” एक बडी ब्रेकिंग न्यूज स्टोरी थी जो दिखने मे तो हम भारतीयो के लिये “यह तो चलता है’ वाली बात लगती है। लेकिन वास्तव मे यह बहुत गम्भीर मामला है। यह भारतीय राजनेताओ की सवेदनहीनता तथा जनता के प्रति उनकी उत्तरदायित्वहीनता को उजागर करता है। यह मामला यह बतलाता है कि राजनेता यह मानता है पांच साल के लिये उसे कुछ भी बगैर किसी उत्तरदायित्व के करने का अधिकार है। राजनेताओ को इस बात की कत्तई कोई परवाह नही कि उसकी जनता किस हाल मे रह रही है, उन गरीबो का क्या हो रहा होगा जिनके कोई रोजगार नही, उन किसानो का जिनके सूखा पडने के कारण खेत मे बीज ही नही पडे है जो देश को रोटी देते है। आज किसान गेहूँ उत्पादन छोड दे तो शहर मे किसी को रोटी नही मिलेगी। राजनेता घनानंद की तरह क्रूर,सेन्सलेस,अकंठ भ्रष्टाचार मे डूबे हुये तथा विलासी है। जनता के प्रति सारे उत्तरदायित्वो से मुंह मोडकर कर जनता के लूटे हुये धन से ये आधुनिक लूटेरे अपने व्यक्तिगत भोगसुख मे रमे रहते है। ये जोम्बी लागातार जनता का खून चूसकर खतरनाक बनते जाते है और सभ्यसमाज के लिये बहुत बडा खतरा है। कर्नाटक का “अध्ययन टूर” वास्तव में टैंगो-टैंगो टूर था। इसे एक महाभोग यात्रा कहा जा सकता है जिसे कर्नाटक की गरीब जनता के टैक्स से किया जा रहा था। स्टोरी के ब्रेक होने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री जगदीश शेट्रर ने उन्हे तत्काल बुलावा भेजा लेकिन कहा जा रहा है वे भोग मे इतने मस्त है कि वे आना ही नहीं चाहते। यह “स्टडी टूर” वास्तव में जिस माचू पीचू मे हो रहा था वह पिचू पिचू के लिये ही था। हो॒! हो॒ ! नाम भी कमाल का है, उच्चारण में बडी अजीब सी बात है इसलिये मैने इसे अर्थ देने में देर नही किया। जनता के धन तथा भारत के प्राकृतिक संसाधनो को लूटने के बाद यह माचू पिचू मे पिचू पिचू तो होना ही मांगता है-हर नेता को मांगता है। एक राजनेता कह रहा था कि पिचू पिचू के लिये ज्यादातर कम कमाऊ नेताओ की पसंदीदा जगह थाईलैण्ड की थाईज हैं और थाईज इन जनरल। एक दो बाबा भी थाईलैण्ड की थाईज मे प्रवचन करते हुये पकडे जा चुके हैं।  भारतीय नेताओ का यह टैगो टैगो वास्तव मे प्लीजर के लिये नही है यह एक भारतीय बुर्जुआ परवर्जन है-अतिवाद है। भारतीय शहरी मध्य वर्ग मे भी यह टैगोमैनिया है, कभी पबमैनिया, कभी ड्रग-मैनिया, कभी रेवा मैनिया कम नही है मतलब सबसे आधुनिक होने का अर्थ है अटको-मटको नितम्ब झटको… फिर टांग उठाकर पैंट अपना फाड दो इत्यादि। जो नेताओ के सपने है वह शहरी उच्च वर्ग मे भी कम नही है। यह भी कम आश्चर्य नही है कि ये भारतीय जनता पार्टी के सांसद थे जो पिचू पिचू और टैंगो के लिये गये थे जो कि भारतीय संस्कृति के प्रवक्ता कहे जाते है। भारतीय जनता पार्टी के सांसदो ने कुछ दिन पहले ही परवर्जन का कांग्रेसी रिकार्ड तोडा और कर्नाटक विधानसभा में पोर्न ले गये थे। ये बाहर से चंदन-टीका लगाकर अन्दर पोर्न पसंद होते है अब लोगो को पता चल रहा है। यह हिपक्रेसी बहुत खतरनाक है, पता नही महिला भाजपाईयो का क्या हाल-खबर है। माचू पीचू के“अध्ययन टूर” में तीन कांग्रेसी भी थे-इन पर तो कुछ कहना बेकार ही है। पैसठ साल से कांग्रेस यह सब कर रही है और जनता सह रही है। जब राष्ट्रपति रहते समय प्रतिभा पाटिल बेशर्मो की तरह जनता के टैक्स पर सैर-सपाटा पर जा चुकी है तो छोटे नेताओ का कहना ही क्या। सरकार का जो राजकोष है उसमे जनता अपनी गाढी कमाई मे से टैक्स इनके पिचू पिचू और थाई स्टडी के लिये ही तो जमा करवाती है? पूरे देश की जनता को एक महीने २०१२ की परम लूट के बाद टैक्स न देकर राष्ट्रव्यापी विरोध करना चाहिये। खैर, इस टैगो टैगो का लिंक राजनीति के व्यापारीकरण तथा व्यापारियो के राजनीतिकरण से जुडा है। दोनो प्रकार के बुर्जुआ लूट तथा थाई लूट में एक-सम है। वास्तव में किसी चिन्तक ने तो यह लिखा है कि पूंजीवाद की यह लूट लागातार बडे से बडा होती जाती है, वह और भी लूट की तरफ बढती जाती है अर्थात अन्यो की इन्टेन्सिटी की लूट फिर इन्टेन्सिटी की भी इन्टेन्सिटी की लूट। पूंजीवाद का यह भारतीय रूप एक क्रिमिनालिटी, एक बदतर डकैती से ज्यादा नही रह गया है। पूंजीवाद एक सिनिसिज्म है लेकिन भारत मे यह लूट का सिनिसिज्म है जो टैगो-टैंगो पर खत्म हो जाता है। पूँजीवाद का वृहत्तर मानवता से कोई सरोकार कभी नही रहा है।

मैने पता नही क्योकि अपने कई पोस्ट मे इस पर जोर दिया है शायद इसलिये कि भारतीय पूँजीवाद ने जितना रोजगार नही पैदा किया उससे ज्यादा वेष्याओ को पैदा किया है। इसका एक साक्ष्य दिल्ली को ही लिया जा सकता है जहां कमोवेश दस लाख वेस्याये और कालगर्ल है मतलब कमोवेश जनसंख्या का ५ प्रतिशत। किसी अन्य सत्यवस्तु, सत्य चेतना के उत्पादन से जिससे मानव का कल्याण हो वेष्याओ का, परजीवियो का, जोम्बियो का, क्रोनियो का उत्पादन ज्यादा हुआ है। उसी तरह अशुभ का उत्पादन भी किया गया है-डाकूओ ने यदि धर्म मे निवेश किया है तो उन डाकूओ मे निवेश किया है जिनका धर्म की चेतना से दूर दूर तक लेना देना नही है। इस तरह का निवेश एकदम सेलेक्टिव है। मै धर्म का एक बेहतर ज्ञान रखता हूँ तथा एक लम्बा समय मठो मे व्यतीत किया है और शास्त्रो का भी एक बेहतर ज्ञान रखता हूँ लेकिन अशुभ मुझमे एक पैसा निवेश नही करेगा। इसलिये कि मै जगत् का कल्याण करने मे लग जाऊँगा, और उसे तो लूट की चेतना को बनाये रखना है, उसे लोगो मे अंधविश्वास बनाये रखना है इत्यादि। ठोंग को बडा संगठित ठंग से प्रचारित किया गया है। लूटेरा तथा व्यापारी दोनो अशुभ की पराकाष्ठा है इसलिये बुद्धिजीवी को सन्त के रूप मे स्वीकार करने से ईकार करते है और ढूंढ कर एक अबरकडबरा बोलने वाला निर्मल बाबा या गंजेडी अबरकडबरा साई बाबा जैसा कोई अनपढ ले आते है। अनपढ से उसको अपने अशुभ के खत्म होने का खतरा नही है और फायदे कई है लेकिन बुद्धिजीवी सन्त से बडा खतरा है। यदि आदिशंकराचार्य जैसा महावीर या बुद्ध जैसा कोई आ गया तो सारा लूट का व्यापार ही खत्म कर डालेगा इसलिये चुनाव सदैव बेवकूफो, अज्ञानियो, गंजेडियो का रहता है। हिन्दुओ के लिये वैदिक धर्म से इतर किसी चीज का कोई महत्व नही है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने कहा है जो परम अक्षर तत्व ॐ है वह वेद मे ही प्रतिष्ठित है। भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा कि सारे कर्म यज्ञ इस वेद से उत्पन्न होते है तथा उसी मे ही प्रतिष्ठित है और विष्णु ही वह सर्वगत ब्रह्मतत्व है जो इसकी आत्मा हैं। उदर-शिश्न परायण लोग इस तत्व को नही जानते है। हमारे लिये शुद्ध नैष्ठिक सन्यासी का बडा महत्व हो जाता है क्योकि उसमे और परमात्मा मे बहु फर्क नही-वह उन्ही की तरह धर्म की स्थापना के लिये कर्म करता है। एक सही सही सन्यासी अपने धर्मदण्ड के साथ निडर होता है क्योकि उसे किसी से कुछ नही चाहिये। सन्यासी किसी सत्ता के लिये काम नही करता उसका एकमात्र उद्देश्य ज्ञान का प्रकाश फैलाना तथा प्रभु के सनातन धर्म को स्थापित करना होता है जिससे जनता को अशुभ से छुटकारा मिल सके।

यदि हम ध्यान दें तो पूरे विश्व भर मे बुर्जुआ वरीयता शुभ की नही है अशुभ की ही है जो अतिवाद से हो कर जाता है—हर चीज का पैमाना बडा हो मसलन बडी लूट, बिग थिंग, बिग नितम्ब जिसकी कल्पना न की गई हो, जिससे वह स्वयमेव अशुभ की तरफ जायेगा क्योकि वह मानव जीवन के सामान्य नियम के अतिक्रमण से सम्भव है। वह ग्राफिक्स भी जिसमें अमेरिकियो ने बिना आधार यह कल्पना नही की थी कि न्यूयार्क जैसे शहरो को को तमाम बिग नितम्बिनीयो तथा जोम्बियो ने मानो अपने कदमो से अतिक्रान्त कर रखा है और एम्पायर बिल्डिंग ध्वस्त होने वाली है। भारतीय पूँजीवादी लूटवाद का सिनिसिज्म इस हद तक है कि कई बार खुद लूटेरा ही बाबा बन जाता है और अन्य लूटेरे उसमे निवेश करने लगते है जैसे निर्मल बाबा। हर एक क्षेत्र मे यह चुनाव की प्रवृत्ति देखी जा सकती है जिसका परिणाम बेहतर तथा मानवीय की उत्पादकता का लागातार घटते जाना है। भारत मे जुर्म तथा अन्य अमानवीय प्रवृत्तियाँ जैसे ईंडिफरेंस, न केवल अपनो के प्रति बल्कि देश के प्रति भी- लागातार बढते जाने का यह एक बडा कारण है। बुर्जुआ अशुभ ने संवेदना को ही कमोवेश खारिज कर दिया गया है।

कर्नाटक के सांसदो तथा मंत्रियो का माचू पिचू की तीर्थ यात्रा देश को दिशा देने वालो की संवेदनहीनता को ही सामने रखता है। ऐसे समय मे जबकि राज्य की जनता सूखे के कारणं आत्मदाह कर रही है शासक निरो की तरह भोग मे रमा हुआ है। सन् २०१२ जनतंत्र के इतिहास का सबसे घिनौना तथा महालूट का साल कहा जा सकता है। यह ऐसा समय है जिसमे देश का सबकुछ कमोवेश खत्म नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि हम किसी जनतंत्र मे नही बल्कि क्रोनिज, लूटेरे, वेष्याओ तथा जोम्बियो द्वारा संचालित एक घोर लूटवादी समय मे हैं। भाजपा के तीन सालो के शासन मे ही कर्नाटक मे आंकडा सही पता नही लेकिन डेढ हजार से ज्यादा किसानो ने अत्महत्या की है। हर राज्य की गरीब जनता त्राहि त्राहि कर रही है। जनता की त्राहि-त्राहि के बीच नेता माचू पिचू मे पिच्चू पिच्चू और टैंगो टैंगो कर रहे है—यह तो राजनीति मे शुद्ध दानवीकरण है। माचू पिचू के टैंगो में बार गर्ल के नाच मे, अमेजन की रोमांटिक रोमांचक सैर मे, शैम्पन मे क्या अध्ययन किया गया होगा उसका विश्लेषण भाजपा सरकार करे और बतलाये कि उससे कर्नाटक के किसानो का कितना भला होने वाला है। मै तो यह भी पूँछूगा कि टैंगो-टैगो से भारतीय संस्कृति का कितना उत्थान हुआ? हरएक राजनेता एक बडा व्यापारी है और यदि नही है तो अपरोक्ष रूप से जनता को लूटकर व्यापारियो के तंत्र मे उसने निवेश किया है। कल सीबीआई ने जिन पांच कम्पनियो पर छापे मारे उसमे कांग्रेस के नेता विजय दारदा का नाम आया है जो राजनैतिक लाभ उठाकर एक बडा व्यापारी बन गया है। भाजपा ने नवीन जिंदल का भी नाम घसीटा है जिनके स्टील उद्योग को कांग्रेस सरकार ने कितना लाभ पहूँचाया है यह पता नही लेकिन कम्पनी को कोयला ब्लाक के आबंटन मे भी ब्लांक आबंटित किये गये है। जिंदल ने सफाई दी है कि उनको कोयला ब्लांक इसलिये मिले है कि उनको इस उद्योग का अनुभव है। तर्क एकदम ठीक है, यदि उद्योग का पर्याप्त अनुभव है तो किसी को ब्लांक मिलने चाहिये लेकिन फिर भी सवाल तो बना ही रहता है कि ऐसे मे जबकि नवीन जिंदल कांग्रेस के नेता है क्या सरकार से उन्होने नाजायज फायदा नही लिया? क्या आवंटन मे पक्षपात नही किया गया होगा? क्या आवंटन मे कांग्रेस का एक प्रमुख आदमी होने के कारणं स्क्रिंनिग कमेटी को अपना काम ठीक से करने दिया गया होगा? गौरतलब हो कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के नजदीक पार्क मे स्टील से बनी अंकुरण जैसी जो सजावटी कलाकृतियां जिन्दल ने लगवाया था उसमे भी शीला दिक्षित सरकार का सहयोग था जिसमे लागत से कई गुना लाभ कमाया गया। सरकार ने कला का यह प्रोजेक्ट कम्पनी को दिया कलाकारो को नही दिया था और सवाल खडा हुआ था कि कोई स्टील बनाने वाली कम्पनी किस तरह यह आधुनिक कला उत्पादन कर सकती है। टाईम्स आफ ईन्डिया ने उस समय यह खबर छापी थी और इस पर बवाल हुआ था तथा बाद मे शीला सरकार ने शायद कुछ भुगतान नही होने दिया था। इस पूरे प्रोजेक्ट में स्टील को स्टील की तरह न बेच कर एक घटिया कलावस्तु की तरह बेचा गया और आधुनिक कला जैसा दाम वसूला गया। यह सब जनता के टैक्स से किया गया। कांग्रेस के नेता विजय दारदा ने कितना माल बनाया इसका अभी खुलासा नही हुआ है। सीबीआई के छापे मे कितना कुछ साफ होगा या होगा या नही होगा यह किसी को पता नही है। विजय दर्डा के नाम नौ कोल ब्लाक आबंटित किये गये है। विजय दर्डा , उसका भाई राजेन्द्र दर्डा जो कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार मे शिक्षा मंत्री है जनता के लिये दर्द ही है इसलिये मैने लिखा दरदा। आश्चर्य यह है कि ये लूटेरे शिक्षा मंत्री या संस्कृति मंत्रालय मे बैठ जाते है। दारदा से अर्णव ने पूछा कि “किस तरह तुम्हे कोल ब्लाक मिल सकते है जबकि तुम्हे इस उद्योग मे कोई अनुभव नही’? तो उसका कहना था कुछ ऐसा था “हम लोग जानते है इस बिजनेस मे कोयला कैसे निकलता है”। सारे कोयला चोर जानते थे कि बगैर किसी हर्रे फिटकरी के इसमे माल-ही माल है। लेकिन यदि पुष्प स्टील जैसी १ लाख मे रजिस्टर्ड कागजी कम्पनी ने यदि कई सौ करोड कोल ब्लाक के राईट बेच कर ही कमा लिये तो यह तो स्पष्ट है कि नेताओ ने जनता के पैसे से अपना अम्पायर बनाया है। नेताओ के क्रोनियो ने उद्योग स्थापित कर लिये है। ब्यापारी या राजनैतिज्ञ मे कोई फर्क नही है और नेता स्वयं को सी ई ओ ही कहता है। आजकल राजनैतिक दल स्वयं कम्पनी की तरह काम करते है। यदि छोटा नेता है तो पद पर नियुक्ति के लिये उससे कम्पनी की तरह ही सीवी मांगा जाता है। इसमे कोई आश्चर्य की बात नही है कि पी चिदम्बरम जब भी वित्तमंत्री होते है तो निवेशको के लिये उनकी भाषा होती है “हिस्सेदार”? वास्तव मे भारतीय क्रोनी कैपिटलिज्म में यह लूट मे हिस्सेदारी है। एक बार सरकार को ठेके का भुगतान होने के बाद हिस्सेदार सारे उत्तरदायित्वो से मुक्त हो जाता है। उसे लूट का लाईंसेंस दे दिया जाता है। लाईसेंस देनेवाला नेता और लाईंसेस देने वाला व्यापारी दोनो भयंकर लूट को क्रमशः अंजाम देकर सीधे माचू पिचू मे ही नजर आते है। उन्हे लगता है कि अब तो वे ईश्वर से भी उपर पहूंच गये है लेकिन देर सबेर अंधेरे मे किये गये पाप उजाले मे लाये ही जाते है क्योकि वह ईश्वर इस कर्म का नियन्ता है। इन अधर्मियो, जनता के दुश्मनो को कठोर दंण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिये।

 

–>Republished by Visfot.com and Saamna in Marathi

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