Posted by: Rajesh Shukla | September 1, 2012

ईस्थर का सम्राट


बाईबिल का बुक आफ ईस्टर (या ईस्थर  नाम का उच्चारण जो भी हो)  इन पंक्तियो से शुरू होता है “ In the days of Ashau-erus, the Asha-urus who reigned from India to Ethiopia over one hundred seven provinces “ अर्थात अशाउरस या आशाशुरस के दिनो मे, आशाशुरस जिनका साम्राज्य भारत से ईथियोपिया तक एक सौ सात राज्यो या देशो के बीच फैला हुआ था। अपने तीसरे साल के शासन मे वह राजधानी सुसा की गद्दी पर बैठा, उस समय उसने परसिया और मीडिया के तमाम राजकुमारियो, सेनापतियो, गवर्नरो, संभ्रांत लोगो और सेवको को एक बडी दावत पर बुलाया। एक सौ आठ दिनो तक उसने उसने अपने बैभव और राजकीय महिमा को प्रदर्शित किया।  इन पंक्तियो के साथ इस सम्राट की महिमा का बखान ईस्टर करता है। बहुत संजीदगी से उसके महल के बारे मे वर्णन करता है जिससे लगता है कि वह सम्राट कितना शक्तिशाली रहा होगा। ईस्थर उसके धर्मोप्रवण तथा बहुत नैतिक होने का भी जिक्र करता है, वह कितना संभ्रात रहा होगा इस पंक्तियो से स्पष्ट होता है “…royal wine was lavished according to bounty of the king. And drinking was compelled according to the law, no one was compelled; for the king had given orders to all the officials of his palace to do as every man desired. “ सम्राट की रानी का नाम वास्थी था जो भारतीय नाम है तथा बहुत हद तक यह नाम मौर्य काल के नामो से मिलता है। जिस काल मे ईस्थर लिखा गया होगा वह समय कमोवेश ईसा के जन्म के पहले का रहा होगा या उनके जन्म का दौर रहा होगा BC 10 से AD 15। क्योकि इसके पूर्व के अध्याय उस क्षेत्र मे हो रहे उथलपुथल का बहुत जिक्र करते है। ईसा के जन्म के पूर्व ईज्राइल के आसपास का दौर बहुत अशान्त था, अधर्म बहुत बढ गया था, अत्याचारियो ने जनता का जीना हाराम कर दिया था। व्यापारियो द्वारा बाजार मे किये जा रहे लूट से लोग जनता बहुत तंग थी। ईस्थर मे हम देखते है कि यह सम्राट वहां एक न्यायप्रिय शासन की स्थापना करता है। इस राजा पर भारतीय होने मे कोई सन्देह मुझे नही लगता क्योकि उस समय तक न तो रोमन साम्राज्य था और कोई इस्लामी साम्राज्य, वह दौर भारतीय सम्राटो का दौर था। भारत का इतिहास भी किसी ऐसे राजा का वर्णन नही करता हो आशासुरस हो जिसका राज भारत पर रहा हो। इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय सम्राटो का बहुत गहरा प्रभाव ईज्राइल तक रहा है। ईसाई धर्म पर बौध धर्म तथा वैष्णव धर्म के प्रभाव से इतिहासकार ईंकार नहीं करते। अभेदानन्द ने लिखा है कि दोनो का प्रभाव ईसाई धर्म पर है और इरान से ईज्राईल तक के आसपास बहुत से बौध शिलालेखो के अवशेष मिले है। इरान तक कनिष्क का राज्य रहा है इसका कोई इन्कार नही करता लेकिन क्या उसके आगे ईज्राईल तक कनिष्क पहूँचे होंगे? भारत से ईथियोपिया तक उसका शासन का जिक्र स्पष्ट करता है कि यह या तो कनिष्क रहे होंगे या मौर्य साम्राज्य का कोई सम्राट। इसे देखना पडेगा, मैं थोडा स्पेक्यूलेटिव इतिहास की समझ रखता हूँ इसलिये इस ईसाई कथा को इस तरह पढ रहा हूँ J । ईसाई धर्म वालो ने बडा प्रयत्न कर लिया हिन्दु धर्म को समाहित करन का , हम भी प्रयत्नशील हैं हो सकता है अपना ही काम बन जाये। हिन्दू धर्म वटवृक्ष जो है :-)। बहुत से बाईबिल इतिहासकार इसकी पहचान किसी अन्य राजा से करते है। भारत का प्राचीन इतिहास को हिन्दु धर्म के ग्रंथो के बगैर नही पढा जा सकता, इन ग्रंथो मे ही वो ट्रेस खोजे जा सकते है जो बाहर नही है। प्राचीन मठो के इतिहास जो अभी तक छपे नही है मे भी वह खोजा जा सकता है। हिन्दू धर्म मे तो किसी ऐसे राजा का जिक्र नही मिलता, यदि कोई आशासुरस राजा रहता तो उसके शासन का प्रभाव हिन्दुस्तान पडता, जैसा अग्रेजो का पडा। हिन्दुस्तान पर थोडा भी विदेशी राज करने वाले का प्रभाव पडा जरूर है। ईस्थर का समय भी बहुत प्राचीन नही है इसलिये दावा और भी सशक्त है।  ईस्थर के कुछ अध्यायो के बाद ही न्यू टेस्टामेन्ट शुरू हो जाता है। न्यू टेस्टामेन्ट मतलब ईश्वरीय उदेशको का नया अवतरण,नव विधान जिसे ईसा लेकर आये। न्यू टेस्टामेन्ट मतलब नये साक्ष्य है लेकिन पुराने का ईंकार नही है। जीसस ज्यादा समझदार थे आधुनिकवादियो से क्योकि आप पुराने का ईंकार नही कर सकते, आप उसकी पैदाइश है। आप बस जीसस की भाषा मे कह सकते है कि “यह उससे आगे की बात है। अर्थात मैं जहां सभ्यता ने हमे छोडा था उनको समाहित करते हुये आगे की बात कहता हूँ। “ ईसू ने जो कहा कि “जाँन पानी से बपतिस्मा देता था मै चेतना की आग से दूगा” तो उनके कहने का मतलब सिर्फ यही था। मेरे आधुनिक का अर्थ मे कमोवेश यह भी समाहित रहता है। कांग्रेसी समय में आधुनिक का अर्थ था विश्व की प्राचीनतम और श्रेष्ठतम सभ्यता को गरियाना. और जितना कोसा जा सकता है कोसना। साठ साल मे स्वयं को शायद पढा तो गया ही नही है।

न्यू टेस्टामेन्ट का दौर ईसाई एपिस्टल का दौर है जिसका वर्णन रोमन्स, एक्ट्स, कुरीन्थियन्स इत्यादि करते हैं। जिसका एक काल निर्णय पाश्चात्य विचारको ने २० ईसा पूर्व  के आसपास माना है क्योकि सेन्ट पाल का जन्म १-५ एडी है जो बीस साल बाद एपीस्टल बनते है और न्यूटेस्टामेन्ट मे कुरीन्थियन और रोमन्स इत्यादि अध्यायो मे उनके उपदेशो का संकलन है बल्कि वे उसके लेखक कहे जाते है। न्यू टेस्टामेन्ट ईसाई धर्म प्रचार का एक नया दौर है, सेन्ट पाँल के आने के बाद ही न्यू टेस्टामेन्ट का अवतरण किया गया होगा। ईस्टर कब लिखा गया होगा यह तय होते ही हमे ज्ञात हो जायेगा कि किस भारतीय साम्राज्य का वह समय रहा था।  

फिलहाल इस ऐतिहासिक मुद्दे को छोडकर आगे बढते है और ईस्टर के कुछ अन्य पहलूओ को देखते है। ईस्टर कहता है कि एक दिन सम्राट अपनी रानी वास्ती को दरबार मे बुलवाने का आदेश देता है लेकिन वह उस आदेश को नही मानती, तिसपर सलाहकार कहते है कि यह तो गजब हो जायेगा क्योकि तब कोई भी राजा का आदेश की अवज्ञा करेगा। वास्ती को दण्टित करने का आदेश दिया जाता है । उसके बाद राजा के लिये एक नई रानी की तलाश शुरू होती है और एक यहूदी लडकी ईस्टर से उसकी शादी कर दी जाती है। ईस्टर एक यहूदी MORDECAI की लडकी है जो परसिया के राजा की कैद से छूटकर ईज्राईल पहूँचा है। ईसाईयो की वह कम्यूनिटी तथा प्रसिद्ध नामो का जिक्र बाईबिल मे कई जगह आता है, एजरा मे इस यहूदी का नाम है जो बेबीलोन से जेरूसलम होता हुआ अपने पवित्र देश पहूँचता है। ऐसा लगता है कि यह पहले कोई बडा आदमी रहा होगा जिसे अन्य शासको के दौर मे विस्थापन का सामना करना पडा था। जो भी नाम बाईबिल मे वर्णित हैं वे ईसाई समुदाय मे प्रमुख स्थान रखते होंगे क्योकि बाद मे जहां कहीं उनके नाम आते हैं वे कोई न कोई बडे पद या बडा काम करते हुये दर्शाये गये है। इसके परिवार के नाम से यह अध्याय बगैर किसी कारण नही लिखा गया है, इसे महत्व दिया गया है क्योकि इसका परिवार ईसाई धर्म को पुनः स्थापित करने तथा देश मे शान्ति लाने मे सहयोगी बनता है। ईस्थर इसी यहूदी की बेटी है। सम्राट की वह बडी प्रिय रानी बनती है तथा बहुत कुशल प्रशासक भी है। ईस्थर ईज्राइल के आसपास आशाशुरस के खिलाफ जो छिटपुट यहूदी प्रतिरोध होते हैं उसे खत्म करने मे मदद करती है क्योकि उसे उस समाज का बेहतर ज्ञान है। हम्मान नामक यहूदी जो उसके परिवार का उत्थान नही चाहता उसे वह खत्म करती है और अपना एकक्षत्र राज स्थापित करती है। ईस्थर वास्तव मे आशाशुरस के  सामाज्य को न केवल स्थायित्व देती है बल्कि उसे विकसित भी करती है। ईस्थर मे उसकी महिमा का भी बखान है साथ इसका भी बखान है कि कैसे उसके इस कार्य के लिये स्रम्राट न केवल बहुत बडा उत्सव करता है बल्कि यदूदी जनता के टेक्स को भी माफ करता है। ईस्थर वास्तव मे एक भारतीय सम्राट की विजय गाथा लगती है जो बहुत न्यायी है क्योकि ईस्थर कही भी उसे क्रूर नही कहता,अन्तिम पंक्तियो में ईस्थर यह कहता है “ सम्राट आशासुरस ने ईस्थर के यहूदी पिता के द्वारा यहूदी जनता की भलाई के लिये काम किया तथा शान्ति की स्थापना की”।

 

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