Posted by: Rajesh Shukla | August 29, 2012

खबरिया चैनलो कें बहसबाज ऐंकर


भारतीय खबरिया चैनलों ने इन सालों मे काफी प्रगति की है, उन्होने अपना स्तर उठाया है। यदि सभी न्यूज चैनल नहीं तो कुछ न्यूज चैनलो ने अपनी अन्तर्वस्तु पर बहुत ध्यान दिया है तथा कुछ न्यूज ऐंकर्स नें अपनी एक बौधिक धौस बनाने मे अच्छी सफलता पाई है। केवल एकदशक पहले तक खबरिया चैनलो और मनोरंजन प्रधान चैनलो मे कोई विशेष फर्क नही हुआ करता था। हलांकि अब भी बहुत से खबरिया चैनल मनोरंजन प्रधान है तथा बहुत सी बकवास चीजो को परोसकर वक्त काटते है। टी आर पी को लेकर जो दौड थी जिसके कारण न्यूज चैनलो ने अपने स्वरूप को विकृत कर लिया था उससे बडी जद्दोजहद के बाद वे मुक्त हो पाये। आत्मनियंत्रण के बगैर जब मानव जीवन भी वेष्यावृत्तिमुख हो जाता है न्यूज उद्योग की बात ही क्या है। खैर! इसपर आगे न बढते हुये मै कुछ दूसरे दिशा में चलूंगा और देखने की कोशिस करूंगा कि न्यूज चैनलो के वर्तमान स्वरूप में न्यूज ऐंकरो का क्या योगदान रहा है। सारे न्यूज चैनलो में कुछ नाम मुझे पसंद है वे इस प्रकार है- अर्णव गोस्वामी (टाईम्स नाऊ), बरखा दत्त (एन डी टी वी २४-७), अभिज्ञान  प्रकाश (एन डी टीवी हिन्दी) , राजदीप सर देसाई (आई बी एन), आशुतोष(आई बी एन ७), पुण्य प्रसून बाजपेयी (जी न्यूज) और रवीश मिश्र (एन डी टीवी हिन्दी), मेहराज दुबे ( एन डी  टीवी ) , सागरिका घोष ( सी एन एन आई बी एन ) इक्का दुक्का और नाम हो सकते है। ये नाम कमोवेश ज्यादातर लोगो की पसन्द हैं और न्यूज विश्लेषण तथा बहस के बावत इनके नाम ही ज्यादातर लोगो को समझ मे भी आते है। इनमें कुछ ऐसे हैं जिनको मैं देखना पसन्द करता हूँ तथा यदि चैनल शिफ्ट भी करता हूँ तो विषयांतर के लिये। ये मेरे ऐंकर है- अर्णव गोस्वामी (टाईम्स नाऊ), बरखा दत्त (एन डी टी वी २४-७), अभिज्ञान  प्रकाश (एन डी टीवी हिन्दी) , राजदीप सर देसाई (आई बी एन) इनमें मेरे समय का विभाजन विषय और प्रोग्राम के अनुसार होता है। अर्णव गोस्वामी और बरखा दत्त सम्भवतः मेरा सबसे ज्यादा समय खाने वाले ऐंकरो मे शरीक है। अभिज्ञान  प्रकाश और राजदीप सर देसाई भी अपने प्रोग्रामो से मुझे कम आकर्षित नहीं करते, सब कुछ विषय और अन्तर्वस्तु तय करती है। बरखा दत्त बेशक एक अच्छी ऐंकर और पत्रकार हैं लेकिन नीरा राडिया प्रकरण से उन्होने मेरा दिल तोड दिया था। यह कोई जुर्मभाव से किया गया कृत्य नही था बल्कि एक फिसलन थी, ऐसा कई बार बुद्धिजीवियो द्वारा हो जाता है। महर्षि विश्वामित्र तक फिसल गये थे। हलांकि लम्बे समय तक मेरा मन उचटा रहा और मैने उसके कार्यक्रम नही देखे सम्भवतः इसकी वहज मेरा विश्वास है कि कोई पत्रकार बगैर सत्यनिष्ठा के सत्य अन्तर्वस्तु (ट्र्थ कन्टेन्ट) को पैदा नहीं कर सकता। बरखा दत्त एक सेक्यूलर सोच रखती है, वैचारिक स्तर से बेहतर है लेकिन सत्यनिष्ठा और पत्रकारिता की नैतिकता के आदर्श को उन्होने अपनी फिसलन से थोडी ठेस तो पहुंचाया ही था। खैर, मनुष्य गलतियाँ करता ही है-सुधरने के मौके सबको दिये जाने चाहिये। इसके के बाद बरखा शायद काफी बदली भी है, वैचारिक स्तर पर भी उसमे काफी बदलाव दिखता है। न्यूज ऐंकरो में वह बहुत बेहतर संयोजक तथा एक बहुत अच्छी साक्षात्कारकर्ता है और कहा जा सकता है कि महिला ऐंकरो मे अभी भी उसका शानी कोई नही है। बरखा दत्त के बगैर न्यूज ऐंकर या न्यूज चैनल की बात सदैव अधुरी मानी जायेगी। सम्भवतः वह पहली प्राईवेट न्यूज चैनल की ऐंकर है जिसे एक राष्ट्रीय पहचान मिली तथा लम्बे समय तक शहरी नवयुवको तथा नवयुवतियो में न्यूज ऐंकर के बतौर वही आदर्श बनी रही। न्यूज ऐंकर मतलब बरखा दत्ता-कुछ ऐसा था। बरखा दत्त अपनी भाषा के बतौर परिपक्व है, परिष्कृत है और शायद ही गडबडाती है। उनका बौधिक धरातल भी रिलेटिवली न्यूज चैनल उद्योग के हिसाब से बेहतर है और अपने उम्र के अनुसार उनमे और परिष्कार आयेगा। विषय की गहरी समझ तथा जिन विषयो को  पत्रकार छूता है उसमे अनुस्यूत विमर्श को उद्दात्तता देने की क्षमता का होना उसे एक बेहतर ऐंकर बनाता है। यदि पत्रकार ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक पहचान बनाई है तो उसके कन्धे पर निःसन्देह बहुत बडा उत्तरदायित्व है। जिन न्यूज चैनलो के पत्रकारो पर हम लिख रहे हैं उनमे सभी कमोवेश इस बात को समझते है, भले ही चैनल मालिक या अन्य दबावों में कई बार बहक जाते हों। उपरोक्त बाते तीनो स्तरो पूँजीवाद, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व और उनके व्यक्तिगत विकास के बावत महत्वपूर्ण है। देश और इसके जनता के प्रति उनका विशेष उत्तरदायित्व है विशेषकर ऐसे समय में जब क्रोनी कैपिटलिज्म नें एक लूटवादी महौल बनाया है। अर्णव गोस्वामी की पत्रकारिता का स्तर कमोवेश उपरोक्त सभी पत्रकारो से उपर दिखता है शायद इसलिये की वह सत्यनिष्ठा को सबसे बडा पैमाना मानते हें। अर्णव का जोर मूल्यो पर भरपूर है- वह राष्ट्रीय, जनतांत्रिक, मानवतावादी सोच पर विशेष बल सदैव देते हें। “ इन्डिफरेन्स” पर उनका आन्दोलन स्वयं बहुत कुछ कहता है। हलांकि टाईम्स नाऊ के अपने शुरूआती दिनो में वह राजनैतिक विचारधारा के स्तर पर गडबडाते हुये दिखते थे लेकिन बहुत तेजी से उनकी मानसिक बुनावट मे क्रान्तिक परिवर्तन आया। उन्होने स्वयं को लागातार परिष्कृत किया और इस समय वह न्यूज ऐंकरो में सबसे बेहतर है। उसकी कई वजहे है, मसलन जो निर्भीकता उसमे है वह शायद बहुत कम टीवी पत्रकारो में है। उनको इसकी परवाह शायद ही रहती है कि पैनल में कपिल सिबाल बैठे है, प्रणव मुखर्जी या नरेन्द्र मोदी, उन्हे यदि हस्तक्षेप करना है और कहना है कि आप गलत तथ्य सामने रखते है तो वे कहते हैं। टाईम्स नाऊ की अपनी बहसो में विमर्श को उद्दात बनाने के लिये वह तमाम सीमाओ को लांघने से भी नही हिचकते। अर्णव गोस्वामी की टीम न्यूज की सत्य अन्तर्वस्तु को सामने लाने मे कम महत्वपूर्ण भूमिका नही अदा करती है विशेषकर उनकी सहयोगी नाविका कुमार। गोस्वामी में कई तरह की पत्रकारिता की सुन्दरता है, वह गम्भीर होते हुये भी बहुत सहज और एक बाल सुलभ हंसमुंखता बनाये रखते है, बहस को ऊंचाई देने की कोशिसों के बीच भी वह अपना चकल्लस नही छोडते, अपने तर्को से नेतागणो को कई बार फ्रस्ट्रेट करने से भी बाज नही आते और वे हिदायत भरे लहजे में उसकी प्राईवेट चैनल की सीमा और मर्यादा की याद दिलाते हुये नजर आते है। हलांकि वही नेता उसकी बडाई भी कम नही करता। वह बहस को उद्दात्त बनाने की हर सम्भव कोशिस करता है साथ में उसके आब्जेक्टिव आयाम को भी स्खलित नहीं होने देता। अपनी सीमा में अर्णव गोस्वामी सबसे बेहतर सामने रखने की कोशिस करता है। उनमें जो एक कमी नजर आती है वह है उनका आदर्शवादी होना, यह अच्छी बात है लेकिन राजनैतिक धरातल पर सत्ता के बावत बहुत आदर्शवादी होना ठीक नही होता। यह अतिआदर्शवादिता कई पत्रकारो में दिखता है जो कई बार सच के घातक होता है। इसके इतर गोस्वामी में बहुत कुछ नकारात्मक नही दिखता। मेरी नजर मे शायद ही कोई उसके जैसा न्यूज कन्टेन्ट पैदा करने की क्षमता रखता है। अर्णव गोस्वामी की पत्रकारिता की अनुपस्थिति में भ्रष्टाचार का यह राजनैतिक इतिहास शायद ही देश के सामने आता। गोस्वामी ने यह सिद्ध तो किया ही है कि किसी न्यूज चैनल की टी आर पी को नम्बर वन बनाने के लिये, बिजनेस जनरेट करने के लिये भुत-प्रेत या बकवास की मसालेदार कहानियो की जरूरत नही होती। दूसरी तरफ राजदीप सर देसाई, अभिज्ञान  प्रकाश की न्यूज ऐंकरिंग भी स्वयं मे विशेष है। सर देसाई मे भी बहुत परिपक्वता है, वे बहुत आदर्शवादी नहीं है लेकिन उनकी राजनैतिक समझ पर सवाल नही उठाये जा सकते। यहां तक कि उनके गोधरा पर किये गये प्रोग्राम पर भी जिसमे उन्होने बनिस्बत इसके की गोधरा हुआ था मोदी की तारीफो के पुल बाधे थे। मैने शुरू में उसको बडे आलोचना ठंग से देखा था लेकिन राजनैतिक गत्यात्मकता मे आदर्शवादी होना ठीक नही होता यह समझ राजदीप में है। मसलन केवल गोधरा के लिये नरेन्द्र मोदी का नकार नहीं किया जा सकता क्योकि तब आपको कांग्रेस का भी ईंकार करना पडेगा-गोधरा उनके साथ भी जुडे है। पत्रकार को अपनी सब्जेक्टिव भूमि पर खडा होकर समय की वस्तुगत समझ के अनुसार ही अपना पक्ष रखना चाहिये। देसाई के विश्लेषणो में भी एक परिपक्वता दिखती है, राजनैतिक गत्यात्मकता की नब्ज की घडकन को ठीक ठीक समझते है, ऐसे टीवी पत्रकार कम ही हैं। एन डी टी वी ईन्डिया के अभिज्ञान  प्रकाश  की न्यूज ऐंकरिंग मे एक अलग धार है। अभिज्ञान के राजनैतिक विश्लेषण या मुद्दो के विष्लेषण आब्जेक्टिव तो होते ही हैं लेकिन उनमे एक स्पेक्यूलेटिव तर्क की भी गंजाईश सदैव रहती है। शायद आब्जेक्टिव और मीमांसात्मक होते हुये बहसो को एक ऐसे मुकाम पर छोडना जिससे दर्शक अटकले लगाता रहें अभिज्ञान  प्रकाश  की एक अपनी खासियत है। वह एक अलग ही कलात्मक ऐकरिंग करते है। उनकी संवाद की भाषा भी परिष्कृत है भले ही उसमें एक अमूर्तन नजर आता हो। बहस को भटकाव से बचाने तथा उसे सदैव ऊंचाई देते रहने की कोशिस वे करते रहते है जिससे अन्त में कुछ सारगर्भित बात सामने आये। बहसो मे कुछ निष्कर्ष निकले लेकिन उससे दर्शक की चेतना का परिष्कार हो, सत्य से वह अवगत हो, यह बात सदैव ध्यान मे रखनी चाहिये। अभिज्ञान  प्रकाश  में निष्पक्ष बने रहकर बात को सामने रखने की काबिलियत है इसलिये उनके विश्लेषणो तथा टीवी बहसो में एक ताकत बनी रहती है। उसी एन डी टीवी इन्डिया के रवीश कुमार ने स्वयं को काफी बेहतर किया है-रवीश की रिपोर्ट से लेकर ऐकरिंग तक का सफर उनके विकास का ही सफर है। हलाकि रवीश की रिपोर्ट मे वह जितना बेहतर थे उतना बहसो मे शायद नहीं है। बहसो को वे बेहतर नही बना पाते जिसकी एक वजह उनका पैनल होता है। राजनैतिक बहस या मुद्दो की बहसे तभी बेहतर हो सकती है जब उनमे भाग लेने वालो की समझ परिष्कृत हो, उनकी चेतना का स्तर समुन्नत हो। राजनैतिक सोच के बावत यदि हम कहे तो रवीश मे एक आचलिक संकीर्णता रहती है इसलिये बहस संकीर्ण बनी रहती है। हलांकि उनकी राजनैतिक समझ खराब नही कही जा सकती है बनिस्बत इसके कि क्षेत्रीय सामंतवादी पार्टियो बसपा और सपा इत्यादि के प्रति उनका झुकाव ज्यादा रहता है। मेरी नजर में हिन्दी टीवी पत्रकारिता ने सामंतवादी तथा बैकवर्ड सोच वाली क्षेत्रीय पार्टियो को बहुत बढावा दिया है। यह कम आश्चर्य नही कि ये बैकवर्ड जातिवादी क्षेत्रीय पार्टियां जिन्होने अपने समाज तक को विकसित नही किया सेक्यूलरिज्म का चैम्पीयन बन कर देश को लूट रहे हैं। उन चैनलो में जो कमोवेश राष्ट्रीय स्वरूप रखते हो राजनैतिक विमर्श को आचलिक संकीर्णता तथा इस तरह की वैचारिक संकीर्णता से उपर होना चाहिये। सेक्यूलर वही बेहतर हो सकता है जिसकी विषयीगत चेतना या सब्जेक्टिवीटी विकसित हो।हमारे न्यूज ऐकरो की लिस्ट मे आशुतोष भी हिन्दी चैनलो में काफी चर्चित है, ऐंकरिंग करने के अलावा वे लिखते भी है। दैनिक भाष्कर के लिये रेगुलर कुछ न कुछ लिखते रहते है। आशुतोष की अपनी राजनैतिक सोच सेक्यूलर है लेकिन वे बहुत पक्षपाती है-वे मूलतः कांग्रेसी है। मसलन उन्हे यह तो लगा कि राज ठाकरे मुसलमानो को भीड जुटा कर डरा रहे थे लेकिन असम में असमियो को बेदखल करके उनमे खौफ कौन पैदा कर रहा है? वे साफ साफ नही कह सकते थे कि बंगलादेशी मुसलमान! वे साफ साफ कभी नही कह सकते की उनको संरक्षण देने वाली कांग्रेस। मसलन सोमवार २७ अगस्त को उन्होने लिखा कि आयोध्या के बाद सारा साम्प्रदायिक सौहार्द का ताना बाना टूट गया, विभिन्न समुदाय एक दूसरे को शक की निगाह से देख रहे है, असम के बोडो क्षेत्र मे हिन्दु मुसलमान एक साथ नही रह सकते, राज ठाकरे ने हिन्दूओ को ईकट्ठा कर मुसलमानो को डराने का काम किया, लेकिन उन्होने यह एक लाईन नही लिखी की आजाद मैदान मे ईस्लामी कट्टरपंथीयो ने पाकिस्तान के झण्डे लहराये तथा जेहादी ब्रदरहुड के लिये सोलिडारिटी दिखा कर देश में माहौल बिगाडने की कोशिस की, कि उन्होने दंगे किये और शहीद की मूर्ती तोडी। और उन्होने सेक्यूलरवादी होते हुये जो कुछ लिखा वह सिर्फ किसी अदृष्य सेक्यूलर नेता “वो है” के लिये जो डरे हुये समुदायो का भरोसा बने। “वो है”  है ही नही, पर पुरा लेख है और मुझे नही लगता कि जो “वो है” इतनी आसानी से मिलने वाला। आशुतोष को शायद यह ऐहसास नही कि भारत मे मुसलमान अल्पसंख्यक नही है और वह हिन्दुओ से ज्यादा चौडा होकर रहता है। उनकी बहसो में भी कुछ यही सब रहता है। जहां तक ऐंकर के वैचारिक और भाषागत परिष्कार का सवाल है वह बहुत सतही है। वाणी स्खलित और कम स्पष्ट रहती है जबकि लेखन में भाषा किसी भी स्तर से देखा जाय तो अच्छी नही कही जा सकती है। पत्रकारो मे राजनैतिक सेक्यूलर को लेकर एक हिपोक्रेसी है –मसलन गोधरा पर मोदी तो दिन भर घेरे जा सकते है लेकिन सिख दंगो की अपराधी कांग्रेसी नही, काश्मीरी हिन्दुओ को देश विहीन यहूदी बना देने वाली कांग्रेस को नही? यदि हम सच में देखे तो कांग्रेस कम साम्प्रदायिक नहीं है । उसकी साम्प्रदायिक और सेक्यूलर चरित्र राज्यवार है-मसलन जिन राज्यो मे हिन्दू अल्पसंख्यक मुसलमान ज्यादा है वहां वह घोर साम्प्रदायिक होती है और उनको खत्म करने के सारे उपाय करती रही है। उसका सेक्यूलर वोट बैक से सम्बन्धित है। टीवी पत्रकारो को राजनैतिक दृष्टि से सेक्यूलर आदर्शवाद से बचना चाहिये। अन्त मे यदि जी न्यूज के पुण्य प्रसून बाजपेयी को लें तो मेरी नजर मे वह वाणी और लेखन दोनो स्तरो पर आशुतोष से मुझे बेहतर लगते है। वह अपने प्रोग्राम की रोचक प्रस्तुति करते है, यदि आपको बहुत गम्भीर बहस नही चाहिये और न्यूज को कलात्मक ठंग से देखना हो तो पुण्य प्रसून बाजपेयी का प्रोग्राम देखिये। उनका फ्रेज “इस बीच “ आपको आनन्दित कर सकता है। उनका “इस बीच” सारे न्यूज प्रोग्रामो के बीच एक दस्तक ही है। मै जब जी न्यूज की तरफ जाता हूँ तो सिर्फ “इस बीच” क्या हो रहा है इसके लिये। पुण्य प्रसून बाजपेयी वैचारिक स्तर पर भी बहुत स्खलित नही दिखते भले ही वे थोडे कांग्रेसी थोडे भाजपाई नजर आते हो। कुल मिलाकर ऐंकरो पर जो भी हमने  ब्लाग पोस्ट मे लिखा वह बगैर किसी द्वेष या बैर के लिखा-जो मुझे लगता है वही मैने टिपटिपा दिया। इसे एक ठीक ठाक पोस्ट बनाया जा सकता था यदि मै इस पर एक दिन का समय देता- दो घण्टे मे इससे ज्यादा लिखना मुश्किल है। अन्त में मैं यह साफ साफ कहूँगा कि हिन्दी अंग्रेजी दोनो न्यूज चैनलो में मेरी लिस्ट चार तक सिमट जाती है- अर्णव गोस्वामी (टाईम्स नाऊ), बरखा दत्त (एन डी टी वी २४-७), अभिज्ञान  प्रकाश(एन डी टीवी हिन्दी) , राजदीप सर देसाई (आई बी एन), इनका कोई शानी नही है।  हलाकि रवीश ने अपनी क्षमता को परिष्कृत नही किया है जबकि उनमे एक अच्छे पत्रकार के अनेको गुण है, वह मूल्यों की उद्दात्ता में गहरा विश्वास रखते प्रतीत होते है। हिन्दी टीवी खबरिया चैनल पर रवीश एक प्रतिमान स्थापित कर सकते है। टी वी माध्यम की व्यापकता के कारण ऐंकरो के कन्धो उपर अन्य बुद्धिजीवियो की तुलना मे ज्यादा उत्तरदायित्व है। इसलिये उन्हे दोनो तरह के बुर्जुआओ- पूँजीवादीयो और राजनेताओ के आब्जेक्टिव तुच्छ स्वार्थकेन्दित विचारो से स्वयं को बचाने की जरूरत है।

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