Posted by: Rajesh Shukla | August 10, 2012

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का मधुमंगल जन्मप्रसंग



जन्माष्टमी का पर्व आज देश भर मे जोरशोर से मनाया जायेगा, हर साल मनाया जाता है । उनके जन्म उत्सव के दिन हर बार मैं एक पोस्ट लिखता हूँ। यह उनसे जुडने का एक मेरा तरीका है। इसे ज्ञान यज्ञ में सम्मिलित किया जा सकता है। इससे मेरे मनःप्रसाद होता है तो दोस्तो को भी उस प्रसाद का कुछ प्रसाद मिल जाता है। सोचा कि कृष्ण जन्माष्टमी पर थोडा उनके जन्म की दिव्य कथा कह देते हैं। भगवान कृष्ण ने कहा है कि “जन्म कर्म च मे दिव्यं” अर्थात मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य होते है। उनके जन्म और कर्म रहस्य को केवल वे ही जानने मे सक्षम है जो धर्मरहस्य को जानने वाले है। लेकिन सामान्यतः यह एक सहज आस्था है तथा मानव द्वारा अनूभूत सच है कि ईश्वर का अवतार तभी होता है जब भारत भूमि पर राक्षसी प्रवृत्तियां बढ जाती है। दैवी तथा राक्षसी प्रवृतियां, ये दोनो ही प्रकृति का विकार है लेकिन एक पतित करती है तथा दूसरी ईश्वर की तरफ ले जाती है। दोनो ही ईश्वर के अवतार मे हेतु हैं। सत्य तथा धर्म ही ईश्वरीय शक्तियों का एक मात्र रास्ता है। तप के द्वारा सत्य की प्रतिष्ठा होती है, सत्य के द्वारा धर्म का विस्तार होता है और धर्म के विस्तार से ईश्वरत्व की उपलब्धि होती है। यही एक सनातन सच है। भगवान कृष्ण यदि अवतार नही लेते हैं और धर्मस्थापनार्थ किसी को अपना माध्यम चुनते है तो उसे जन्म से ही दैवी सम्पद को धारण करने वाला होना चाहिये। या कई बार प्रभु उसे तप मे नियुक्त करते है जिससे सत्य और धर्म उसमे प्रतिष्ठित हो सके जिससे वे उन्हे शक्ति सम्पन्न कर सके। जिस तरह सूक्ष्म ज्ञान का आलोक भी उनके हृदय मे नही उतरता जिनके हृदय शुद्ध न हो, उसी तरह रंच मात्र भी ईश्वरीय प्रकाश बगैर दैवी सम्पद के सम्भव नही है। इसलिये हमारे उपनिषदो  के प्रारम्भ शान्ति पाठ मे कहा जाता है “ॠतंवदिष्यामि सत्यंवदिष्यामि “। चैतन्य महा प्रभु ने कितना सुन्दर ठंग से इस आध्यात्मिक तथ्य को सामने रखा है “ अन्येर हृदयमन मोरामन वृन्दावन । मने वने एक करि जानि। तहां तोमार पाद दव्य करह यदि उदय। तवे तुम्हार पूर्न कृपा मानी” मेरा मन और वृन्दावन एक हो गया है।मैने मनको वृन्दावन बना लिया है और क्योकि तुम्हे वृन्दावन प्रिय हे कृष्ण इसलिये क्या तुम उसमे अपने चरण रखोगे। तभी मै तुम्हारी पूर्ण कृपा मानूंगा।“ शुद्ध सत्य मे प्रतिष्ठित होने के बाद ही प्रभु की कृपा मिलती है। दुष्ट लोग दिन रात मन्दिर जाते है लेकिन दुष्टता नही छोडते, राक्षस नेता जनता का धन लूटकर दान करते है कि भगवान और भी लूटने के लिये शक्ति देगा लेकिन भगवान अंधेरे मे किये गये पाप को उजाले में करने से बाज नही आता। यही उनका सच है।

भगवान का जन्म तब होता है जब पृथ्वी पर असुर बढ जाते है, उनके असुरकृत्यो से प्राणी त्राहि त्राहि करने लगता है, साधुप्रवृत्ति लोग बडी मुश्किल से जीवन यापन कर पाते है या बहुधा राक्षसो के अन्याय से वे आत्मदाह कर लेते है या किसी गुफा इत्यादि की शरण लेते है। गाय विष्ठा खाने लगती है तथा कुत्ते बिल्ली घरो में विस्तर पर सोते है। इस प्रकरण पर  बहुत लोग ध्यान नही देते कि जब असुर प्रवृत्ति बढती है तो वही तत्व भी जीवन मे स्थान पाने लगते है जिनमे पतित करने की क्षमता होती है। भगवान ने गौ को अपना स्वरूप बतलाया कुत्ते को या बिल्ली को क्यो नही? क्योकि उसमे उनकी चेतना सबसे अधिक प्रकट है। गाय का रम्भाना भी एक स्तुति है, उसका श्रवण करना भी धर्म की वृद्धि करता है। गौ माता को प्रणव या ॐकार का एक विग्रह माना जाता है। जिस समय असुर बढ गये उस समय पृथ्वी गाय माता का रूपधारण ब्रह्मा जी के पास गई और करूण स्वर मे अपने कष्टो को कह सुनाया। भगवान के जन्म का प्रकरण गऊ माता के कष्टो से शुरू होता है। जिस माता पिता से हुआ वे धर्म मे पगी आत्माये थी और असुर के घर मे ही विराजमान थी। इसका अर्थ यही है कि असुरत्व के बीच ही धर्मप्रवण अत्माये भी अपने मार्ग पर आस्था के साथ चलती रहती हैं। देवकी असुर कंस की बहन ही थी जिनका ब्याह उसने दैव योग से ब्राह्मण वासुदेव से कर दिया था। यह सब दैवी योग होता है जिसको सामन्य बुद्धि नही समझती। हर कोई अपनी बहन से प्यार करता है तो असुर कंस भी बहुत प्यार करता था और व्याह करके दोनो को रथ पर सवार कर विदा करने जा रहा जब उसे आकाशवाणी सुनाई पडी। “अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यां वहसेऽबुघः” अरे मुर्ख जिसे तू बडी प्रसन्नता से विदा करने जा रहा है, वह तेरी बहन के गर्भ से पैदा हुआ पुत्र तेरा ही संहार करेगा। यह सृष्टि अहम का प्रसार है और सारे अहं से उपर व्यक्ति का अपना अहं है। याज्ञवल्क्य ने यहीयही तो सबसे बडी शिक्षा मैत्रेयी को दी थी “ न वा अरे पत्यूः कामाय पतिप्रियो भवति अर्थात् कोई पति पति के लिये नही अपने स्व के लिये ही प्रिय होता है”। जहां वह आत्यान्तिक स्व थोडा सा स्खलित होता दिखता है, अविस्तरित हुआ प्रतीत होता है हम देखते है तुरन्त दोनो अपना अलग रास्ता लेते हैं। इस स्व के विस्तार के बीच जब अहं तुष्ट नहीं होता तो संहार ही है चाहे वह भर्तृहरि की अतिविरक्ति में प्रकट हो या आत्महंता आस्था में और वही से अध्यात्म प्रकरण का प्रारम्भ होता है। इस रहस्य को भी जानना चाहिये कि जब प्रभु ने प्रवृत्ति का यह सनातन मार्ग प्रेरित किया है तो क्या इसलिये कि अहं तुष्ट न होते ही सृष्टि संहार हो जाय? यह संहार न हो जाय इसलिये उन्होने इसके साथ कर्म को प्रकट किया जिसमे एक सांसारिक बंधन भी बनाया और कहा कि ईच्छित्व का विहित कर्मो के पूर्ण होने तक त्याग न करते हुये इस सनातन बंधन को स्वीकार कर सृष्टि कर्म के साथ मुझे भजो। महामाया या शक्ति को ब्रह्म की प्रतिष्ठा कहा गया है, उसी में प्रतिष्ठित हुआ वह जगत् व्यापार में रत है। उसी तरह लोक में यह प्रसिद्ध हुआ कि पत्नी पुरूष की प्रत्तिष्ठा है। समाज में कहा भी जाता है कि परिवार की बहु या बेटी परिवार की प्रतिष्ठा है। प्रतिष्ठा का नाश नही होना चाहिये क्योकि इसी से दैवी कर्म सम्भव है। प्रतिष्ठा का नाश होते ही वेष्यावत्ति शुरू होती है और मानवता पतित हो जाती है। तो कह रहा था कि अपनी आत्मा ही सबको प्रिय होती है क्या राक्षस क्या देव! वही कंस जो बहन को इतना प्रेम करता था उसे अपनी मृत्यू का कारण जान उसी पल उसकी जान का दुश्मन हो गया। तलवार खींच ली और मारने को उद्धत हुआ लेकिन महात्मा वासुदेव की बुद्धि से वह शान्त हुआ। वासुदेव की धीर प्रशान्त वाणी से उसका चित्त थोडा स्थिर हुआ।

परमात्मा की ईच्छा के बगैर तथा कर्मो के विपाक के बिना क्या हो सकता है? देवकी तथा वासुदेव को कर्म का भोग  भी भोगना था और उसके उपरान्त ईश्वर का अवतरण भी इसलिये प्रभु ने लीला रच दी थी। विधाता के विधान को कौन जान सकता है? धर्मप्रवण परम भक्त वासुदेव को पता था कि सब ईश्वर की लीला है इसलिये उन्होने देवकी के प्राण बचाने के लिये कंस को वचन दिया कि जो भी पुत्र होंगे उन्हे कंस को सौप दिया जायेगा। जो भक्त हैं वे जानते है कि नियति के दो छोरो के बीच अदृष्ट ही एक मात्र कारण होता है। अदृष्ट अगम्य है, ईश्वर की दैवी शक्ति है। हवाई जहाज क्रैश करता है और सब मर जाते है लेकिन एक बच्चा बच जाता है, इसमे एक अदृष्ट ही कारण है। यह कर्म का ही एक रहस्य है। वासुदेव सत्यवादी थे इसलिये कंस को उन पर विश्वास हो गया और देवकी को उसने छोड दिया। शेष कथा तो सब जानते है इसमे उनकी लीला के रहस्यो को जानना चाहिये। ईश्वर के अवतरण या आंशिक अवतरण मे भी सब कुछ मानो सुनियोजित होता है, वैसी ही शक्तियां प्रकट होने लगती है। धर्म की बुझी हुई लौ पुनः जल उठती है। ईश्वरीय सन्देश धीरे धीरे फैलने लगता है और असुर क्रोधित होने लगते है, विध्वंश और आतंक मचाने लगते है। कांग्रेसी तथा अन्य सेक्यूलरिस्ट भी तो यही कर रहे हैं। उपदेश करते साधु के आसन को गिरा देना, धर्मसुचि लोगो को सीबीआई से प्रताणित करवाना, उनके खिलाफ षडयंत्र करना, धर्म उपदेश सुनती जनता पर पुलिस का आक्रमण करवाना, यह सब राक्षस करते थे। जब धार्मिक शक्तियां बढती है तो असुर दुखी होने लगते है, वेष्याऐं वैसा ही व्यवहार करती है जैसे ताडका। बुद्धिजीवी तथा संस्कृति के क्षेत्रो मे काम करने वाली वेष्याये भी राक्षसियो की तरह पेश आने लगती है। धर्म के शब्द ही सबसे कटु लगते है। मनोविकृत व्यक्ति को जिस तरह कोई भी नैतिक बात बहुत बुरी लगती है उसी तरह राक्षसो को सनातन धर्म सबसे बडा दुश्मन लगता है।

जब भगवान कृष्ण का अवतार हुआ तो उनके विभव सहित तमाम देवी देवता अंश धारण कर व्रज में जन्म ग्रहण करते हैं। इसमे कोई बहुत मिथकीय जैसी बात नहीं है, कर्म के रहस्य को सभी नहीं जानते। सत्य तथा धर्म मे अवस्थित लोग ही इन्हे ठीक ठीक यथार्थतः जानते है। श्री कृष्ण अपने व्यूह, विभव तथा अर्चावतार विभूतियो के साथ जन्म ग्रहण करते है, उनके अवतरण से पूर्व उन सभी ईश्वरीय शक्तियो का अवतार होता है। उनकी प्रकृति का स्पष्ट वर्णन शास्त्रो मे है, जिनसे प्रज्ञ लोग उन्हे पहचानते है। शुद्ध मंत्रमय देह तथा उनके शस्त्र होते है शुद्धसत्व तथा सत्यधर्म मे अवस्थित वे दिव्य शक्तियां भागवती शक्तियां है। उनके अवतरित होने से पूर्व चारो तरफ धर्म का माहौल बनने लगता है, वैसे ही शुभ ग्रह नक्षत्र होते है, सब कुछ शुभ शुभ होता है। रामायण मे तो महर्षि बाल्मिकी ने रावण के मारे जाने से पूर्व अपशकुन पर पूरा अध्याय ही मानो लिख डाला है। भगवान प्रकट होते या धर्म का प्रभाव बढता है और ॠषियो के आशिर्वाद फलीभूत होते है तो असुरो के लिये अपशकुन होने लगते है। आजकल कांग्रेस तथा अन्य सेक्यूलरवादियो को अपशकुन हो रहे, रोज ही उनके पाप का घडा फुट रहा है, रोज रोज कोई न कोई महात्मा उनके दरवाजे पर खडा होकर श्राप दे रहा है। शास्त्र कभी गलत नही होते, हमारे शास्त्र कहते कि जब महात्मा, सन्यासी, साधु प्रवृत्ति लोग किसी के खिलाफ हो जाये तो उसका विनाश तय समझो। यह कम महत्वपूर्ण संकेत नही है कि सनातन धर्म के कमोवेश सारे साधु महात्मा कांग्रेसी असुरो के खिलाफ हो चुके है। एक सन्यासी का जो स्वार्थ होता है वह धर्म ही होता है, वह कभी जनता के अहित की नही सोच सकता। उसे धर्म यह नही सिखाता। सनातन धर्म के सन्यासियो की तो बात छोडिये, वे हर काल में इस जगत् मे श्रेष्ठ है। बाबा रामदेव रामलीला मैदान मे असुरो को ललकार रहे है, असुर भयभीत हो रहे है। भगवान की जब थोडी भी दृष्टि फिरती है तो पृथ्वी पर महात्मा जन दण्ड लेकर निर्भिक राक्षसो से भिड जाते है। भगवान ॠषियो के बगैर भी पृथ्वी पर अवतरित नहीं होते। कलुयग चल रहा है और शास्त्रानुसार भगवान का जनम होगा लेकिन उससे पहले तमाम ॠषि महात्मा आयेंगे, छोटे बडे सेवक आयेंगे और धर्म की वृद्धि करेंगे। धर्म की वृद्धि का मतलब असुरो का घोर समय के दिन थोडे हैं। भगवान ने त्रेता युग में रामावतार मे भी अपने व्यूह, विभव के साथ एक परिवार में जन्म लिया था लेकिन उससे पहले सप्त ॠषियो सहित तमाम ॠषिमहर्षि पधार गये थे। ॠषिमहर्षियो ने जनता को पहले बतला दिया था प्रभु असुरो का बध करने के लिये अवतार ग्रहण करने वाले हैं। देवकी और वासुदेव स्वयं एक शुद्ध कर्म यज्ञ कर रहे थे, जब देवकी ने भगवान को गर्भ मे धारण किया तब उनकी बुद्धि शुद्धसत्वमय हो गई थी। शुद्धसत्व की देह और बुद्धि मे ही ईश्वर को धारण किया जा सकता है। यह आठवां पुत्र था और गुप्तचरो ने कंस को सूचित किया कि देवकी के गर्भ मे आठवा पुत्र है। जब कोई स्त्री श्रेष्ठ पुरूष या किसी ॠषि को गर्भ मे धारण करती है तो उसके स्वभाव मे वैसा परिवर्तन होता है, उसे सिद्धो के तथा देवताओ के दर्शन तब तक होते रहते है जब तक वह पुत्र को जन्म नहीं दे देती। देवकी की कायाकान्ति सुवर्णमय हो गई थी और इससे कोई भी जान सकता था कि कुछ अद्भुत घटित हुआ है तो गुप्तचरो से यह बात कैसे छुप सकती थी? कंस मारने के लिये भागा हुआ आया लेकिन जिसके गर्भ मे भगवान ही है उसे कैसे छू सकता था। देवकी के मुखमण्डल से निःसृत दैवी प्रकाश से उसकी बुद्धि चौधिया गई और उसमे एक धर्म बुद्धि का उत्थान हुआ कि “एक तो यह स्त्री है दूसरे मेरी बहन और तीसरे गर्भवती” इसे मारना बडा पाप होगा। वह क्रूर था लेकिन यह धर्म भाव जागृत हुआ। उसने जन्म के बाद भगवान का बध करने का विचार किया और कारागार मे और भी कडा पहरा बैठाकर चला गया। उसके दरवाजे पर मृत्यू ने दस्तक दी थी तो दिन रात उसे अपनी मृत्यू के सपने आते थे। भगवान ने कहा है न ““ सदा तद्भावभावितः इसलिये वह उसी भाव से भावित हुआ मरने से पूर्व ही मृत्यू को प्राप्त हुआ था। धर्मभाव सन्तो के लिये सुखदायी होता है लेकिन असुरो के लिये अमंगलमय होता है। धर्म की शक्ति असुरो का विनाश करती है। भगवान कृष्ण का जन्म मुहूर्त उपस्थित हुआ तो प्रकृति वशीभूत हो गयी, सब कुछ उनके अनूकूल हो गया। आकाश मे ग्रहो तथा नक्षत्रो ने अपनी वक्रता का त्याग कर दिया, सबके मन को भाने वाले प्रभु के आने की आहट से सुमन खिल उठे, दशो दिशाओ के क्षेत्रपाल अपनी अपनी जगह स्थिर हो राह देखने लगे। देवताओ ने मंगल गीत गाये, देवी सरस्वती ने गायत्री से निःसृत सप्तस्वरो के फूल बरसाये, देवताओ ने दैवी नृत्य किया,ॠषियो के मन सहसा प्रसन्नता से भर गये। भाद्रमाह की कृष्ण रात्रि उनकी ह्लादिनी शक्ति की अंशरात्री होती है, उसी दिव्य वीररात्री मे श्रीपति असुरो का काल बनकर अवतरित हुये। भगवान ने कहा है कि “प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्म मायया” मै अपनी प्रकृति को वश मे कर जन्म लिया हुआ सा हो जाता हूँ” –वे जन्म नही लेते, वे जन्मरहित हैं तथा सम्पूर्ण जगत् को धारण करने वाले है लेकिन अपनी लीला से शरीरधारण करते है। देवकी भी जब उनकी स्तुति करती हैं तो यही कहती हैं –
विश्वं यदेतत् स्वतनौ निशान्ते
यथावकाशं पुरूषः परो भवान्।
बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू-
दहो नृलोकस्य बिदम्बनं हि तत्।।

प्रलय के समय आप इस सम्पूर्ण विश्व को अपने शरीर में वैसे ही धारण करते हैं जैसे कोई मनुष्य अपने शरीर मे रहने वाले छिद्र रूप आकाश को। वही परम पुरूष आप मेरे गर्भवासी हुये, यह आपकी अद्भुत मनुष्य लीला नही तो और क्या है?

प्रभु की जो योगमाया हैं वे ही उनकी ह्लादिनीशक्ति हैं । श्रीसूक्त में उन्हे ही हिरण्यवर्णांहरिणिं कहा गया है तो अन्य आगम शास्त्रो में उन्हीं के बारे मे कहा गया है-
विभ्राजमानां हरिणीं यशसां सपरौवृतां ।
पुरं हिरण्यमयीं ब्रह्मा विवेशापराजिता।।

विभ्राजमानमयी अन्नंतकोटि किरणो से प्रकाशित, यश तथा कीर्ती से परावृत्त वह विवेश अपराजिता सदाख्या महाशक्ति लक्ष्मी जिन्हे “हिरण्यवर्णां  हरिणि” कहा गया है, वे विष्णु के साथ अवस्थित हैं। भगवान अजन्मा हैं लेकिन असुरो का संहार तथा संतो को परमसुख देने के लिये जन्म ग्रहण करते। अपने निजजन को सुखी करने के लिये ही तो प्रभु गोकुल मे पधारे थे। गोपीजन बल्लभ की संज्ञा से विभूषित रसस्वरूप कृष्ण के प्रेम में पगी विदुषी गोपांगनाये भक्ति का परमआदर्श स्थापित कर गई । कृष्ण यदि सारी गतियो के गति है, सारी पराकाष्ठाओ की पराकाष्ठा है तो गोपियां प्रेम की पराकाष्ठा हैं। श्री कृष्ण को यह स्वीकार करना पडा कि “ न पारेयऽहं निरवद्यसंयुजां। स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः “ मै तुम्हारे स्वार्थहीन प्रेम से  ब्रह्माजी के समय तक उॠण नही हो पाऊगा अर्थात उसका कर्ज नही उतार पाऊंगा”। और तो और सारे धर्म की मर्यादा को धारण करने वाले पुरूषोत्तम को उनकी भक्ति और प्रेम को पुष्ट करने के लिये धर्म का अतिक्रमण करना पडा। धर्म को धारण करने वाले सर्वसामर्थ्यवान प्रभु से ही यह अपेक्षा की जा सकती है। गोपियां श्रीशक्तियां थी तो सहज ही वे मानिनि थी लेकिन उसका परित्याग कर वे कृष्णभाव में प्रतिष्ठित हुई। राधा तो साक्षात कृष्ण ही हैं “… सा स एवास्ति सैव सः” इसलिये राधा और कृष्ण मे भेद देखने वाला उन्हे नहीं जानता। राधा उनकी ह्लादिनी शक्ति कही गई है इसलिये भागवत धर्म इस बात को स्पष्ट करता है कि वगैर उनके कृपा कटाक्ष के श्री हरि का दर्शन दुलर्भ है, यथा “अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः” । हरएक गोपी अपने भाव मे प्रेम की पराकाष्ठा थी। कृष्ण का जन्म रहस्य क्या, कोई भी रहस्य अगम्य है, लीला रहस्य तो केवल उनके परमभक्त ही जानते है। भगवान के भक्त परमप्रेम की दिव्य अवस्था मे प्रकृति का अतिक्रमण कर जाते है। आधुनिक विज्ञान तो भौतिक चिडफाड करके देह का अतिक्रमण करना चाहता है लेकिन एक भक्त, योगी और तत्वविद तो उसका भी अतिक्रमण सहज रूप से करता है जो देह को उत्पन्न करता है। रूद्राणुओ को वशीभूत करता हुआ वह शुद्धब्रह्म शक्ति बन जाता है। गोप कन्याओं की परावस्थिति, पराभाव दुर्लभ है। यह श्लोक क्या ही सुन्दर है–
आभीरपंक्जदृशां बत साहसिक्यं याः केशवे क्षणमपि प्रणयन्ति मानम्।
मानेति वर्णयुगलेऽपि मम प्रयाते कर्णाङ्कणं वहति वेपथुमन्तरात्मा।।

अहो! कमलनयना आभीरियों का साहस तो देखो, वे क्षणभर के लिये श्रीकृष्ण के प्रति मान धारण करने में समर्थ है, किन्तु मेरे कानो में “मान” यह दो अक्षर पडते ही अन्तरात्मा कम्पायमान हो जाती है।
हर आत्मा के नायक, प्राणबन्धु, सबके सखा श्री कृष्ण मधुमंगल है। वे ही भुवनाश्रय, उनमे ही मन बुद्धि तथा चित्त का निवेश कर भक्ति से परिपुष्ट करना चाहिये। श्री मधुसूदन ही भक्ति मे नायक तथा नायिका दो है जैसा कि वैष्णव आचार्य कहते है “ स्वयमेव नायिकारूपं विधाय समराधनतत्परोऽभूत्.. “। वही परमसौभाग्य है और हमारी आत्माये ही उसे धारण करने वाली सुभगायें हैं।

भगवान कृष्ण के दिव्य जन्म तथा कर्मलीला की थाह तो सप्तॠषियो को भी नही है लेकिन उनकी दुरत्य माया का पार भी क्या बगैर प्रभु की कृपा के सम्भव है। जो उनकी शरण जाता है उसे ही निर्भयता प्राप्त होती है, राक्षसी प्रवृत्तियो वाले भी उनकी शरण मे जाकर समस्त पापकर्मो से मुक्त हो जाते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी पर उनके इसी वनमाली विग्रह का ध्यान करे-

बर्हापीडं नडवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं।
बिभ्रद वासः कनक कपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद गीतकीर्तिः।।
श्री कृष्ण के सिर पर मयूर पिच्छ है और कानो पर कनेर के पीले पीले फूल (असुरो के असुर समय मे कनेर भी पृथ्वी पर बहुत खोजने पर ही दिखता है), शरीर पर पीताम्बर तथा गले में पंचपुष्पो की वैजयंन्ति माला है। ये पंच पुष्प मानो कामदेव के पंचपुष्पो के बाण ही हो। यह नटवर नागर सा वेष क्या ही सुन्दर है। अधरामृत से बांसुरी पर जगत को वशीभूत करने वाली तान छेड रहे है और पीछे पीछे ग्वाल बाल उनकी दिव्य कीर्ती का गान कर रहे है। इस तरह वृन्दावन उनके पावन चरणो से वैकुण्ठ से भी दिव्य हो गया है।

अपनी मधुर मंगलकारी लीलाओ से ब्रजवासियो को चिच्चमत्कार से भर देने वाले उन षडैश्वर्यशाली श्रीकृष्ण महानुभाव की जय बोलो।

श्रीर्मस्तु !

———————

उद्बोधन–मेरे प्रिय ब्लाग पाठक इधर बीच मेरी प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन अंग्रेजी से बचने की तरफ बढती गई है। शायद मन मे यह भाव पैठ गया है कि यह कहीं न कही हमारे विकास मे बाधक है। इसे पढा जा सकता है तथा कभी कभी विश्व समुदाय तक पहूँचने के लिये उसमे लिखा जा सकता है लेकिन इसे हिन्दुओ को अपना स्वभाव नही बनाना चाहिये। भगवद गीता के शब्दो “ सदा तद्भावभावितः अर्थात उसी भाव से भावित होता है” को ईश्वर का आदेश माने। यदि पाश्चात्य दार्शनिको की बात को भी मानने का आग्रह ज्यादा हो तो उन्ही के अनुसार व्यक्ति अपनी भाषा की सन्तान है। हम हिन्दू सनातन वेद के स्वासों से पैदा हुये है, उसी मे रहते है और अन्त मे उन्ही वेदो की ॠचाओ द्वारा दी गई आहूतियो द्वारा हमारी आत्माये अपने नये जीवन की तरफ अग्रसर होती हैं। इसलिये ब्लाग पर कोशिस रहती है कि अंग्रेजी से बचूँ। हिन्दी में ही या अन्य भारतीय भाषाओ मे ही लिखने की जरूरत ज्यादा है। हमे पाश्चात्यो के रिजन का ईंकार करना चाहिये क्योकि यह हमारे संस्कारो सहित हमारी सांस्कृति तथा आध्यात्मिक आस्तित्व को खत्म कर देता है।

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