Posted by: Rajesh Shukla | August 8, 2012

अयी! तव चरण चारणम्



प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतिः।
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने।।-भागवतम्
हे मुने! उस समय प्रेमभाव मे अत्यन्त उद्रेक से मेरा रोम रोम पुलकित हो उठा था। हृदय अत्यन्त शान्त और शीतल था, उस आनन्द के प्रवाह मे मुझे अपने ध्येय का भी ध्यान नही रहा।

उपहार वह है जो आपका ही था। वह जो आपकी ही राह देख रहा था -आपकी ही उपस्थिति की बाट जोह रहा था। जब वह आपको आश्चर्यचकित करेगा और आप सोच मे पड जायेगे, अरे मैने तो यह सोचा न था और बहुत गहरे आप उसकी आस लगाये बैठे थे। उपहार एक रहस्यमय सन्दर्भ समेटे हुये उपस्थित होता है। वे उपहार भी एक रहस्य के परदे में लिपटे हम तक पहूँचते हैं जिन्हे हम सामान्य जीवन में ग्रहण करते हैं। लेकिन जिस उपहार के सन्दर्भ की हम बात करने जा रहे हैं वह   वास्तव में चित्त के उन्माद की उस दशा में उपस्थित होता है जब आप सब कुछ नौछावर कर देने को उद्धत होते है। रामकृष्ण के जीवन का वह क्षण, निर्णय की वह दशा, जब अकस्मात् कटार लें वे स्वयं की बलि देने को उद्धत हुये, वह परिघटना जब उन्होने समय के चक्र को पूरा किया बल्कि उसका अतिक्रमण किया, तब उसी छण परापरामर्शमयी महादेवी का आगमन हुआ। जीवन के बहुमूल्य उपहार ऐसे ही आपको मिलते है जब निर्णय के एक उद्दात्त क्षण में आप सहसा समय का अतिक्रमण कर जाते है। चेतना के निम्न सोपानो का अतिक्रमण किये बिना परम जीवन नही प्राप्त होता। चेतना के उच्चतम सोपानो पर ही व्यक्ति पापराशि का द्वित करने की प्रक्रिया अपनाता है। वास्तव मे मुद्रा इसे ही कहा गया है न कि हाथ इत्यादि की भंगिमाओ को। महामाया की शक्तियां ही मुद्राये है जिनका उद्बोधन व्यक्ति की चेतना को द्रवित करता है और उस लायक बनाता जिससे पराभट्टारिका का पदार्पण हो सके। श्रीकाली महाविद्या है इसलिये उनकी उपासना बहुत कठिन है। उनके पुत्र ही परमहंस होते है जो शताब्दियो में एकाधबार धरती पर अवतरित होते है। उनकी संख्या विरल है। सारी विद्याये जिनकी रश्मियां हो उन्हे जानने के बाद क्या शेष रहता है? सारी विद्याये उन्ही का विकास है-सप्तशती यही तो कहती है “विद्यासमस्तास्तव देवि भेदाः”। यह भी कहना सही नही है कि उन्हे जाना जा सकता है। परानन्द का स्वात्म में साक्षात्कार करने वाली अम्बा खुद स्वयं को ही जानती है,  उसको जानने वाला कोई नही “तस्यानान्योस्ति वेदिता”- भगवद्पाद आदि शंकराचार्य ने अन्त में यही तो लिखा था।  महामाया हमे धारण करती है, उसी मे हम अवस्थित है, वह हममे है लेकिन हमारा अतिक्रमण करके अवस्थित है। यही परम सच है, जिसे श्री कृष्ण ने भी कहा है “परातस्मात्त्” जो सर्वदा विलक्षण मेरा परम भाव है वही परम पद, परम धाम है। यह ट्रांस-ट्रांन्सेन्टडेन्टल शक्ति भाव है जिसमे बोध के आवेश से योगी विश्वात्मकता के व्यामोह का आत्यान्तिक निरोध कर डालता है। रामकृष्ण ने परमहंसो के परम आदर्श को पाया, उनका शुरू से एकमात्र यही शब्द था “श्यामा पदे आस नदीतीरे वास”। वे जन्म से ही परमहंस थे। उनके कहे सरल शब्दो मे जो मधुरता और शुद्धता है वह भी आश्चर्यचकित करता है। सरलता की पराकाष्ठा उनमे मिलती है और जब मे मां के गीत गाते तो वे चार साल का बच्चा होते-
ऐ श्यामा! शवारूढा माते मेरी सुनो, मै तुम्हारे पास अपने हृदय की आन्तरिक कामना व्यक्त करता हूँ। जब मेरी अन्तिम सांस इस देह को छोड चलेगी तब, ऐ शिवे, तुम मेरे हृदय मे प्रकाशित होना। उस समय, मां, मै मन-मन-वन-वन घूमकर सुन्दर जवा कुसुम चुनकर ले आऊंगा और उसमे भक्ति चन्दन मिलाकर तुम्हारे श्रीचरणो में पुष्पांजलि दूंगा।
परमहंस शुकदेव और उनमे कोई फर्क नही था। ब्रह्मभाव की अपने हृदय मे प्रतिष्ठा की थी  इस महान ॠषि ने, इसके  बगैर क्या कुछ भी उद्दात सम्भव है? नहीं! याद नही आ रहा है लेकिन किसी ने आश्चर्यजनक ठंग से उनके बारे लिख डाला था कि उनका व्यक्तित्व ॠचारूप हो गया था। कुछ महान ॠषियो के बारे मे कहा गया है कि वे ॠचा में  ही समाहित हो गये थे। सही भी है न, प्राण प्राण में ही तो समाहित होगा, ॠचाये श्रीहरि का श्वास कही जाती हैं। “ ते ध्यानयोगानुगता अपश्यनओ । देहात्मशक्तिः स्वगुणैर्निगुढाम्” इसे वही समझ सकता है जो इस वेदवचन के निहित गुढार्थ को समझ सकता है

भारतीय मानव का आदर्श सदैव उच्चतर मूल्यो की प्राप्ति रहा है, हम अपनी चेतना से स्खलित हुये है जिससे  आधुनिक मनुष्य उदरपीडित तथा शिश्न पङित हो गया है और केवल इसी के इदगिर्द उसका सारा व्यापार है। पूँजीपति किसी उच्चतर सांस्कृतिक मूल्य के बावत कोई निवेश नही करता, दर्शन हमारे देश से खत्म ही हो गया है। कांग्रेसीयो के वेष्यावृत्ति परायण दौर तक आते आते सब कुछ गुदा-शिश्न केन्द्रित हो गया। खैर, छोडिये इसको। तो कह रहे थे कि रामकृष्ण के जीवन का वह क्षण, वह परिघटना जिसमें उन्होने स्वयं को समर्पित किया, उस क्षण “था क्या‍”? उस महाकाली का आविर्भाव जिसकी वर्षो से प्रतिक्षा की थी या समय की शून्यता,खेचरता और अहम् का पराप्रत्याहार,( यह शब्द थोडा रहस्य समेटे हुये है और पतंजलि के योग से परे अवस्थित है) एक मौन जिसके टूटने के बाद उन्होने कहा “कुछ न था चेतना का आबाध सागर था और मैं एक मछली की तरह पराभूत, शून्यचित्त फिर भी एक बोध-शेष।” श्रुति का वह सच साक्षात् “तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ”. दोनो में क्या कोई अन्तर था?  शायद था और नहीं भी, क्योकि वह सब कुछ विस्मयकारी था। रामकृष्ण ने ऐसे पवित्र शक्तिमयी सौन्दर्य की कल्पना ही न की थी। कि वह उनके ही हृदयाकाश में अवस्थित है और वह अनूभूत न था, वह विमर्शमय गतिमयता जिसनें अकस्मात् सबकुछ बदल दिया, जिसके प्रसार ने चिन्मय अहंभाव को एक पल के लिये मानो खत्म ही कर दिया हो। उस परम सौन्दर्य (सुन्दरम्) का साक्षात् ही तो था जिसके बारे में लिखा है “सर्वेभ्यस्त्वतिसुन्दरी” तुम्ही सबसे सुन्दर हो हे सौन्दर्यमयी देवि! संवित्ति का सूरज जब विकसित होता है तो उसी की समुज्वल किरणो पर उनका आह्वान और तर्पण होता है, वे उल्लसित सहस्र्रो सूर्यो का प्रकाश समेटे इस महती चिदभूमिका पर ही उतरती हैं। यही शक्तिलाभ है तथा स्वशक्ति का परिज्ञान है जो व्यक्ति को सत्य में प्रतिष्ठित करता है । चिद् मे शक्ति का यह उल्लास स्थायीभाव तब तक नहीं बनता जब तक उनकी ही कृपा न हो जाये। रामकृष्ण का पुनः चेतनावस्था मे आने के बाद का रूदन, उन्हे पुनः देख लेने की, हमेशा के लिये साक्षात् कर लेने की व्याकुलता यह बतलाता है कि वह परमभट्टारिका सचमुच सबसे सुन्दर हैं तथा जिसका वरण वे करती है वही उन्हें प्राप्त कर सकता है। उपनिषद की यह ॠचा भी तो यही कहती है कि ”येमेवैष वृणुते तनू स्वाम् “। जिन्हें अकस्मात् उस क्षण में रामकृष्ण ने साक्षात् कर लिया था, एक अनदेखा सच थीं, एक क्वाँरा सौन्दर्य जो सबकें लिये एक सा ही नही होता फिर भी सभी यही कहते हैं “वही” निर्बाध आनन्दमयता, वह शून्य भूमिका “मेरा हृदय” जो व्यापक है जिसे वेदान्ती लोग “अहम्” कहते है। यही “अहं ब्रह्मास्मि” का अहम् है। मैने जो इधर बीच जो नाम को लेकर पोस्ट लिखे है उसमे लिखा है कि यह “अहम” वाक् की परम भूमिका है।

 प्रदाता के उपहार देने और ग्रहणकर्ता के लेने की बीच कोई सामन्जस्य नहीं होता-समन्वय एक बेईमानी है। समन्वय वास्तव मे एक भयंकर अज्ञानता से उपजा विचार है, जिसने मानवता को पतन के गर्त मे धकेल दिया है। कुछ उत्तरआधुनिकतावादियो ने भी सच को पहचाना है। प्रभु कृष्ण ने कितना स्पष्ट उपदेश किया है अर्जुन को कि हे अर्जुन! लोक मे दो ही निष्ठाये है“ लोकेऽस्मिन द्विविधा निष्ठा …ज्ञान योगेन साख्यानाम कर्म योगेन योगिनाम”। संसार की सारी निष्ठाये इन दो अनादि निष्ठाओ के अन्तर्गत ही है ‍और तो क्या प्रभु यह भी स्पष्ट कर गये है अन्त मे सिर्फ एक ही बच जाता है- हे पार्थ! सारे कर्म ज्ञान मे समाप्त हो जाते हैं। यह सत्य मूर्ख सामंजस्यवादियो को समझ नही आ सकता क्योकि वे उदर-शिश्नपीडित जमात हैं। उस दैवी “क्षण” का परिघटित होना एक रहस्यमय परिघटना है जिसमें प्रदाता आपको जीवन का उपहार देता है। यह जीवन जिसको शक्ति के उद्रेक ने ग्रसित कर लिया है, अन्य दृष्टि से शिव का ही परम उल्लास है। जो याचक है उसे तब तक नही मिलता जब तक वह याचक बना रहता है। अमूर्त से उपहार लेने के अपने खतरे है, अमूर्त को साक्षात करना ही बहुत बडा खतरा है। समय को अतिक्रान्त करना असत्ता मात्र मे अवस्थिति है-यह शुद्ध अमूर्तन है। अमात्र वही है जिसे मैने नाम विमर्श मे लिखा है प्रणव का प्रथम पाद, यह सारी भाषाओ की अरणि है जिसका साक्षात्कार होने के बाद व्यक्ति नामरूप से परे चला जाता है। उसे भाषा के बावत कुछ भी जानना शेष नही रहता। महर्षि पाणिनि के सूत्र “अइउण्” को सिर्फ व्याकरण का सूत्र मानने वाले बहुत मूर्ख है। उन्हे माहेश्वर का प्रसाद प्राप्त था इसलिये उन्होने यह स्फुट प्रणव ही कहा है जिसमे सृष्टि का यह महाविमर्श हो रहा है। यह सूत्र सम्पूर्ण सृष्टि के रहस्यो को समाहित करता है इसे ॐकार मे अपने चित्त को समाहित करने वाला ही समझ सकता है और उसकी ठीक से व्याख्या कर सकता है। हमारे महान ॠषियो द्वारा लिखित सूत्र चित्चमत्कार हैं, पराचेतना मे अवस्थित होकर सूत्रो को उन्होने मानव कल्याण के लिये लिखा था। रामकृष्ण परम हंस शिक्षित नहीं थे लेकिन उन्हे जब शास्त्रो को या सूत्रो को पढ कर सुनाया जाता था तो वे उनकी व्याख्या उस तरह करते थे मानो उसके रचयिता वही हो। इससे वह सारस्वत श्लोक चरितार्थ होता है “पंगुं लंघयते गिरिं”। जो सारी विद्याओ की जननी है उसका उपासक किस विद्या को हस्तगत नहीं कर सकता! महामाया की पराभूमिका को जानने वाले उनके चरणो को जानते है –वही कैसे एक पदी है, दो पदी है, तीन पदी और सप्तपदी है। जगदम्बा इन चरणो के ध्यान मे निमग्न एक योगी जानता है कि उन्ही चरणो मे लोकमंगल है, इसलिये कन्या पूजन के उपरान्त कितनी सुन्दर प्रार्थना करता है–
“…चरणं नो लोके सुधीतान् दधात्विति मन्त्रोऽपि लोकस्य ब्रह्मलोकस्य द्वारं”
“हे देवि! मंत्रस्वरूप आपके चरण कमल जो दिप्तिमान,कान्तिमान तथा प्रतापी है और ब्रह्मलोक में अवस्थित हैं, हमे शान्ति प्रदान करें”

रामकृष्ण की शक्तिसाधना बहुत अद्भुत थी। वे मां काली के परम उपासको मे एक है, अमृतत्व को उपलब्ध है। उनका यह कहना झूठ कदापि नही है कि “मै यही हूँ” वे परमहंसो की तरह अवस्थित है तथा योगियो तथा साधको के बीच उपस्थित होते रहते है। निरतिशय ब्रह्मभाव मे अवस्थित वे ब्रह्म हो गये थे। लोग अब उनका दर्शन कर सकते हैं । मुझे लगता था सभी सपने दबी वासनाओ की अभिव्यक्तियां है पर धीरे धीरे मेरा विश्वास बदल गया । दैवी दर्शन का मनोविज्ञान भी आधुनिक मनोविज्ञान की समझ मे नही आता क्योकि उनके लिये यह मन मे दबी कुण्ठाओ और ईच्छाओ की अभिव्यक्तियो से ज्यादा नही होती है। भारत की सरल हृदय नारियो से पूछिये जो अपने प्रिय पति जिससे उन्हे बहुत प्यार रहता है या पुत्र के दूर देश होने पर कैसे जब उनके साथ कुछ अशुभ होता है उन्हे सपनो मे ज्ञात हो जाता है? कई बार जो आपका प्रिय है आपके घर आने बिना बताये आने वाला है और आपको सपने मे ज्ञात हो जाता है, यह भी कम आश्चर्य नही है। रामायण मे राक्षसी त्रिजटा को लंका विध्वंस के सपने कैसे आये होगे, उसने राम को कभी देखा नही था और उन्हे वैसे ही देखा जैसे वे थे? ॠषि वाल्मिकी प्रज्ञ थे उन्होने पूरा अध्याय इसको लेकर लिखा। सपनो मे कुछ प्रातिभज्ञान नही होता तो क्यो मैडम क्यूरी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सवाल का उत्तर खोज पायी होती जिस पर उन्हे नोबल पुरस्कार मिला? तो इस बात को पुनः तलाशने की जरूरत है। रामकृष्ण भी कहते थे की सपनो मे हुये दैवी दर्शन सच होते है क्योकि दैवी दर्शन किसी देखी हुई मूर्ति का नही होता। विवेकानन्द बहुत तर्क प्रधान थे लेकिन वे बार बार सिद्धो के दर्शन का जिक्र अपने प्रवचनो मे करते है। सिद्ध योगियो तथा सन्यासियो का सपनो मे अना कोई नई बात नहीं है। योग सूत्र गलत नहीं है “ मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्” मूर्धा मेज्योति का ध्यान से  सिद्ध का दर्शन होता है और वहीं मूर्धा की दिवारो पर स्वप्न का भी प्रकटन होता है। योगसूत्र मनोविज्ञान पर लिखा गया अब तक का सबसे महान ग्रंथ है इसको आधुनिक मनुष्य अभी तक थोडा भी नही समझा है। भारत मे योगी लोग मौनव्रती तथा कम भाषी थे तथा अपनी दैवी दुनिया मे रहते थे इसलिये उन्होने इसको इस दुनिया को समझने लायक विस्तृत करके नही लिखा। शायद इसलिये भी वे जानते थे कि कलियुग मे मनुष्य बहुत राक्षसी प्रवृति का होगा और यदि इसके रहस्यो को वह जान लेगा तो वैसे ही जनता उनसे पीडित है और इनका दुरूपयोग करके वह उन्हे और भी पीडित करने लगेगा। मंत्रशास्त्र के रहस्य भी कोई नही जानता। जो उनके रहस्यो को जानता है वह महानता को उपलब्ध होता है। उच्च ज्ञान दैवीकोटि मे गिना जाता है इसलिये इनके सूत्र रूप मे लिखे जाने पर भी सत्यपथ चलने वाले लोगो को मार्गदर्शन मिलता है, योगीगण स्वयं उन्हे रास्ता बतलाते है। मंत्रो की कई रहस्यमय दीक्षाये योगीजन कई बार सपनो मे भी देते है। सपने पर आधुनिक मनोविज्ञान का ज्ञान बहुत पिछडा है। कभी इस पर चर्चा की जायेगी। फिलहाल सीता जी के रूप मे महाकाली का ही स्मरण करना चाहिये, हनुमान जी ने कहा था—
यां सीतेत्यभिजानासि येयं तिष्ठति ते गृहे।

कालरात्रिति ता विद्धि सर्वलंकाविनाशिनी।।
हे रावण! जिन्हे तुम सीता समझ रहे हो उन्हे कालरात्रि ही समझो। वह सर्वलंकाविनाशिनी हैं।
उनकी शक्ति , ज्ञान तथा क्रिया का कोई ओर छोर नही। दानव उनकी उपासना करके अपनी मृत्यू का ही वरण करते है। देवो के लिये वे सदैव अमृततत्व हैं यही दैवी तत्व का रहस्य है।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रुयते। स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।

–मैं आधात्यामिक पोस्ट नहीं लिखना चाहता .. लेकिन लोभसंवरण नही कर पता। आनंद्म्स्तु

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