Posted by: Rajesh Shukla | August 5, 2012

वेष्याये, पोर्न स्टार्स,भारतीय बुर्जुआ और संस्कृति के सवाल


ऐसा क्यों है कि संस्कृति मे जो कुछ रंगीन तथा बेहद रूमानी होता है वह वेष्याओ से सम्बन्धित है? यदि सभी नहीं तो ज्यादातर मामलों मे ऐसा है। मसलन एक टीवी चैनल ने प्रेम को लेकर बनाये गये प्रोग्राम को पेश करने के लिये एक ऐसी महिला ऐंकर को खोज निकाला है जो शुद्ध वेष्या दिखती, उसकी भाषा तथा हाव भाव बनारस की दालमण्डी की रण्डियो जैसा है। यह स्वाभाविक हाव भाव है या वह नकल करती है पता नहीं। मजेदार बात यह है कि यह ऐंकर मुसलमान  है। यह क्यों कर है कि प्रेम या रूमानियत हर हालत मे एक घिसेपिटे रण्डियाना अन्दाज में ही मिल सकता है? न्यूज टी वी चैनलों से इस तरह के घटिया ऐस्थेटिक सेन्स की अपेक्षा कमसे कम मुझे नही रहती है। समकालीन संस्कृतिक चिंतन में शायद ही इस बात पर भारत में चिंतन किया गया है। यह प्रश्न बहुत विकट है और इसका उत्तर बहुत कठिन। बुर्जुआ संस्कृति में ज्यादातर मामलो में गीत तथा संगीत मूलतः वेष्यामूलक हैं या यह कहें की रण्डियाना है अर्थात उसकी रूह वेष्याओ की है। ज्यादातर मामलो में सिनेमाई संगीत की रूह का वेष्याओ से गहरा सम्बन्ध है तथा वह सदैव बाहरी है। गीत तथा संगीत का जो शायराना रूप भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा प्रभावी है उसका रूप ईस्लामिक है इससे भी शायद ही इन्कार किया जा सकता है और इस सच से भी कि उसकी रसिकता कमोवेश वेष्यावृत्ति प्रधान है। फिल्मी गीत संगीत के जो बोल है वह रण्डियाना बोल है और अब तो बहुत हद तक काँलगर्लाना हो गया है। भले ही उसमें विदेशी संगीत का तडका लगा हो या शुद्ध शास्त्रीय संगीत का पुट हो। यह कम आश्चर्यजनक बात नही है कि ज्यादातर मामलो में रसिकता ही मूलतः वेष्यावृत्तिप्रधान है। यदि नही है तो कमोवेश मान तो ली ही गई है। रसिकता का वह रूप जो कुछ राजश्री के शुरूआती फिल्मो मे सामने आया था वह जल्द ही उबाऊ हो गया था या वेष्यावृत्ति प्रधान रसिकता ने उसे विस्थापित कर दिया। संस्कृति मे ॠगारिकता तथा रसिकता इरोस से सम्बन्धित है लेकिन इसे सदैव बाह्याचार, स्वच्छन्दाचार, वेष्यावृत्तिमुखता, तथा आधुनिक समय में पोर्नस्टारो की पोर्न रूमानियत मे ठूँठा गया। मध्ययुगीन सभ्य समाज मे रसिकता या रूमानियत का आदर्श वेष्याये या तवायफे थी तो आधुनिक समय मे पोर्न स्टार है, यह संस्कृति के सन्दर्भ मे बहुत आश्चर्य करने वाली बात नही है। ऐसा क्योंकर है कि रूमानियत का आदर्श तवायफे या पोर्न स्टार हैं? आश्चर्य इस बात का भी है कि परिवारिक जीवन इससे कमोवेश रिक्त है इसलिये पत्नी से भी उस रूमानियत की अपेक्षा रहती है। यदि भारतीय समाज मे परिवार अर्थात पति-पत्नी तथा बच्चा सारी गतिविधियो के केन्द्र में है तो परिवार की संस्कृति भी केन्द्र में होनी चाहिये थी और यही सबसे प्रभावी होनी चाहिये लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसा क्यों नहीं है यह एक बडा प्रश्न है।

संस्कृति के बावत जो कुछ उद्दात्त है वह बाहरी है, और उसे ही बेहतर कहकर प्रचारित भी किया जाता है। दूसरी तरफ संस्कृति के सन्दर्भ मे जो कुछ उद्दात्ततम बताया जाता है वह बुर्जुआ समाज से भी बाहर का ही है और बुर्जुआ समाज के बाहर ही विकसित होता है। मिशेल फूको ने लिखा है कि महानतम विचार बुर्जुआ समाज के बाहर की सूदूर सीमाओ पर पुष्पित और पल्लवित होता है। तो क्या दोनो स्थितियां एक जैसी हैं कि न तो परिवार मे उद्दात्त के विकसित होने की सम्भावना है और न ही बुर्जुआ समाज मे? हमारे परिवार मे बच्चे तो बहुत पैदा होते है लेकिन मानव मे जो उद्दात् कहा जाता है वह पैदा नही होता। नित्शे ने कहा कि उद्दात्त तवायफो से नही बल्कि तब पैदा होता है जब पिता पुत्री से सेक्स करता है। मतलब सारे प्रगतिशील मत परिवार के बाहर से आते है। पिता पुत्री से सेक्स कर डाले तथा पुत्र माता से तो परिवार स्वयंमेव नही बचता और मनुष्य भी नही बचता (पता नही उद्दात्त कैसे बच रहता है? इसे तो इण्ड आफ उद्दात्त होना चाहिये)। अन्तिम मत यह है कि उद्दात्त तब पैदा होता है जब मनुष्य पूर्णतः पतित हो जाये यानि पशुता मे ही उद्दात्तता और पूरी पूरी रचनात्मकता की सम्भावना है। कमोवेश सभी समकालीन बुर्जुआ विचारधाराये इस बात पर एकमत है कि ‘मनुष्य के पतन मे ही उसका उत्थान है” इसलिये ज्यादातर समकालीन विचारधाराये परिवार विरोधी है। हलांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि व्यवहार मे तो यह देखा जाता है कि शराब पीकर नाली मे पतित व्यक्ति कमोवेश मृत होता। दूसरी तरफ सेक्यूलर तथा प्रगतिवादी रूमानियत का आदर्श भी परिवार से बाहर ही मिलता है अर्थात अवैध मे अवस्थित मिलता है। मार्क्स ने मेनिफेस्टो मे बुर्जुआ तथा सामन्ती समाज की पत्नियो को वेष्या करार दिया था। पत्नि और वेष्या मे कोई ज्यादातर फर्क प्रगतिवादी भी नहीं मानता इसीलिये तो जिनियश का जन्म नित्शे मां के साथ सम्भोग के बाद ही सम्भव मानता है। जिनियश दार्शनिक, चिन्तक, कलाकार वह है जो किसी तरह के सम्बन्ध तथा सामाजिक -पारिवारिक नियम या टैबू नही मानता।

पुरूष अपनी पत्नी में अपनी रसिकता या रूमानीयत की सन्तुष्टि नही कर पा रहा है इसलिये उसे उन्मुक्त प्रेम की दरकार सदैव बाहर ही होती है, सदैव अवैध में होती है। सन्तुष्टि अवैध में प्रतिष्ठित है। क्या व्यक्ति घर में ठीक ठंग से पतित न हो पाने के कारण बाहर पतित होने का जुगाड करता है? सम्भव है। यही बात स्त्री के साथ भी हो सकती है और यदि विवाहेतर अवैधसम्बन्ध का प्रचलन बढा है तो यह इसका एक अस्वाभाविक विकास कहा जा सकता है। लेकिन ऐसा क्यों है? उन्मुक्त संवादहीनता! यह एक बडा कारण हो सकती है। एक काँल गर्ल या वेष्या के पास जो मुक्ति का अनुभव पारिवारिक पुरूष करता है वह है उसकी उन्मुक्तता। एक बात करती हुई वेष्या अपनी उन्मत्तता तथा उन्मुक्त भाषा के आवेश में पुरूष को ग्रसित करती है फिर उसे तमाम दुखो से शायद मुक्त कर देती है। पत्नियाँ पतियो को या पति पत्नियो को सारे दुखो से मुक्त करने में सक्षम क्यों नही हो पाते ? पत्नीयो में शायद उन्मुक्त भाषा और आवेशहीनता की कमी रहती है और पुरूष को सम्भवतः वह चीज नही मिलती हो जो वेष्या में मिल जाती है। काँल गर्ल या तवायफ की देह में कोई बात निश्चित ही नही होनी चाहिये क्योकि उसकी देह बहु पुरूष मर्दन के कारण बजबजाती है। यहाँ सारा खेल रचनाशीलता तथा भाषा का है। सवाल यहां यह भी है कि क्या उन्मुक्ता तथा आवेश या काममधुर्य केवल काँल गर्लो या मुक्त वेष्याजीवन जीने वालो मे ही  होती है? यह एक सच हो सकता है लेकिन यह एक यूनिवर्सल सच नहीं है। वास्तव मे एक सच यह भी है कि ज्यादातर मामलो में तवायफो के बावत वह एक झूठ तथा नाटक ही होता है। वेष्याओ पर दगाबाज होने का आरोप सदैव से लगाया जाता रहा है, वह प्रेम नहीं प्रेम का नाटक करती है। वेष्यायें या काँलगर्ल एक कुशल कलाकार हैं, उनकी ललितभाषा तथा उन्मत्ता दोनो एक कला है जिसे ये सीखती है। तवायफों के कोठो पर इन दोनो तत्वो के साथ नाच गाना इत्यादि सिखाने का काम सदियो से ही होता रहा है, पहले की तवायफों का मूल्य उनके लालित्य पर ही निर्भर रहता था। उसी तवायफ की नथ उतराई सबसे ज्यादा होती थी जो सुन्दर होने के साथ पुरूष को अपनी कलाओं के महाजाल में कैद करने मे सक्षम होती थी। सामंत के लिये नथ उतराई केवल सील भंग का मूल्य नहीं था, यह उसको अपने रूपजाल के साथ अपने कला जाल मे कैद करने की क्षमता का मूल्य था।

तवायफे अपने रूपजाल में फंसा कर मार डालती है शायद यह मरण का जो अनुभव है एक कारण हो सकता है वेष्यागमन का। वास्तव में उपरोक्त गुण सदैव प्रेम या रति का सहज गुण है। नृत्य आदि कलाये तो सीखी जाती है लेकिन रतिकला, श्रृंगार, रम्यवाक्, विनीतपूर्णता, लज्जाशीलता, सुविलासिता, इत्यासि रति के सहज गुण है जिसे स्त्रियाँ विशेषकर बहुधा पत्नियां रिप्रेस कर देती हैं। ह्रीमति नारियां में बहुत सारे काम तो सिर्फ लज्जा ही सम्पन्न कर देता है, इसकी अपेक्षा रहती है। लज्जा बहुधा उन्मुक्त प्रेम मे बन्धन बन जाता है क्योकि पत्नियां इस मायात्मक गुण का रति मे उपयोग नही कर पाती। लज्जा स्त्री का भूषण है इसमे एक बहुत रहस्य है जिसे फेमिनिस्ट नारियां शायद नही समझती। नृत्य संगीत प्राचीन काल से भारत के घर घर मे सीखाये जाने की प्रथा थी, भले ही उत्तरभारत मे यह न दिखता हो लेकिन पश्चिम बंगाल, दक्षिण भारत तथा बहुत हद तक पश्चिम भारत मे तो परिवार की लडकियाँ को यह सब सीखना उनकी अनिवार्य शिक्षा का अंग थी। शेष लालित्य प्रेम स्वयंमेव भर देता है। प्रेम मे पडी नायिका मे उपरोक्त गुण स्वयंमेव परिलक्षित होते है यह उसे सीखना नही पडता। मसलन इस कवि के भाव को देखे –“ अहो प्रिये! केवल एक ही कैरव की कलिका तीन पुष्पो के विलास को धारण कर रही है” यह एक ही पुष्प मे तीन पुष्पो का विलास प्रेम के प्रस्फुटन से ही सम्भव है। एक ललित भाषा का प्रस्फुटन भी बगैर इसके सम्भव नही होता। रति के वे गुण जो पत्नियाँ सदैव रिप्रेस कर देती है वह है रसाक्रान्तता अर्थात पति से अपने अनूकूल प्रेम का आग्रह करना । पत्नियो का यह हक है कि वे अपने अनुसार पति से वह करवाये जिसकी वे ईच्छा करती हैं। यह श्लोक देखिये जिसमे पत्नि पति से यह याचना करती हैं-
“ अवचिनु कुसमानि प्रेक्ष्य चारूण्यरण्ये।
विरचय पुनरेभिर्मण्डनान्युज्ज्जवलानि।
प्रियवयं मदंगे कल्पयाकल्पमैतै-
र्युवतिषु मम भीमं रौतु सौभाग्यभेरी।।“
हे प्रियवर! तुम वन मे जाकर सुन्दर पुष्पो का चयन करो उससे परमोज्जवल भूषण बनाओ और उसके द्वारा मेरे अंगो को इस प्रकार से मण्डित करो जिससे समस्त युवतियो के बीच मेरी सौभाग्य भेरी प्रचण्ड रूप से बज उठे।
ऐसा ही कुछ सिनेमा मे रति प्रसंगो मे जब सिनेमा का हीरो आईसवर्ग से  पोर्न स्टार हिरोईन या किसी वेष्या के अंगो का मण्डन करता है तो हमे बडा नया लगता है। जिस्म जैसी ग्रेड थ्री फिल्मे वस्तुतः ऐसे बिम्बो को ही बेचती है, शुरू मे जब कुछ फिल्मो मे ऐसे शीन आये तो नवयुवक उस शीन के कारण ही उसे देखने गये, फिल्म के कारण नही। गौरतलब है कि बहुत सारी फिल्मे जिनका सब कुछ गानो या आईटम सांग पर टिका होता है वह वास्तव में वेष्याओ या कालगर्लों की सांसो की गरमी को ही सभ्य समाज को बेचती हैं। मुन्ना भाई ऐम बी बी एस फिल्म का “ देख ले ..“ वाला सेक्सी गाना नवयुवको के जीवन की रिक्ता को ऐड्रेस है।  वेष्यासंस्कृति का जो प्रकोप सभ्य समाज पर है वह बहुत परिवार के भीतर रचनाशीलता तथा लालित्य के जीवन मे समावेश न होने के कारण ही है।  यदि यह वास्तव मे सच है कि रसिकता सदैव बाहर है तो परिवार नामक संस्था का होना निश्चय ही कोई अर्थ नही रखता। रचनाशीलता तथा लालित्यविरहित परिवार एक यातनागृह से कम नही है, इसे मिलजुलकर खत्म करना चाहिये। यह यातनागृह रहे ही क्यो? काँल गर्ल ही बेहतर बच्चे पैदा कर सकती है,उसके लिये यातनागृह की जरूरत नही?

पूँजीवाद परिवार के इदगिर्द ही घूमता है लेकिन बुर्जुआ जो सदैव परिवार को लेकर रूदन करता है स्वयं वेष्यावृत्तिमुखता को बढावा देता है। वह उद्दात्त प्रेम तथा रसिकता को सदैव वेष्या के कोठे पर ठूँठता रहा है। बुर्जुआ समाज में कहीं न कहीं यह अवधारणा अवचेतन में जरूर क्रियाशील रहती है जो यह मानती है कि औरत वही सुख दे सकती है जो तवायफ जैसी है या तवायफ ही है। यदि ऐसा नहीं होता तवायफो के कोठे नही बनते और तवायफो के प्रति यह क्रेज नहीं होता। हिरोईन भी वही बेहतर मानी जाती है जो शुद्ध तवायफ हो। हालीवुड की सबसे बडी हिरोईन मर्लिन मुनरो को नंम्बर एक की तवायफ कहा जाता है। उसकी डायरी मे यह प्रसंग भी है कि हर रात पार्टी के बाद हमबिस्तर होने के उपरान्त वह देह मल मल करके नहाती थी, उसका मानना था कि उससे वह रात के पाप धुलती थी। रसिकता का एक रचनात्मक आयाम है शायद वह परिवार मे मिसिंग है जो उनके आकर्षण की एक बडी बजह हो सकती है। तो क्या पारिवारिक स्त्रियो विशेषकर पत्नियो की तुलना मे वेष्याये ज्यादा रचनात्मक होती है? यह सच है कि संस्कृति मे जो सबसे प्रभावशाली माध्यम है उनमे संगीत और नृत्य का सबसे रंगीन हिस्सा कोठे से आता है और जो मूलतः ईस्लामिक है। ईस्लाम और वेष्यावृत्तिमुखता का बहुत गहरा सम्बन्ध है। ईस्लाम वेष्यावृत्ति से ही शुरू हुआ था इसलिये तवायफहुड उनकी सांस्कृतिक विरासत है। यदि मुसलमान औरतों में रसिकता हिन्दू औरतो की तुलना में ज्यादा होती है तो उसका कारण यह है कि तवायफहुड से उनका गहरा नाता भी रहा है।
इस पर चर्चा फिर कभी बाद में किसी अन्य ब्लाग मे किया जायेगा, यह बहुत मजेदार प्रसंग हो सकता है। ऐसे पोस्ट कुछ यूं ही शुरू हो जाते हैं।  फिलहाल हमें मूल मुद्दे पर पुनः लौटना चाहिये और पूछना चाहिये कि क्या हिन्दू परिवार जो भारतीय समाज का आधार है कम रचनाशील रहा है? क्या परिवार एक इकाई के रूप में रचनात्मक नहीं है? यह हमें स्पष्ट रूप से दिखता है कि हमारा समाज रचनाशील नही है। यहाँ जो सबसे बेहतर कहकर पेश किया जाता है वह भी इससे रिक्त है। टीवी इत्यादि सबसे बेहतर का ही प्रदर्शन करते है, परन्तु जो चिक-चाक सुन्दर मुखडे प्रदर्शन मे रखे जाते है और तोतों की तरह बोलते है उनमे कोई भी रचनात्मक सोच नहीं दिखती। स्त्री ऐंकरो की भाषा और वाणी जिसपर टीवी का कमोवेश सब कुछ आश्रित है, वह भी एकाध को छोडकर ज्यादातर मामलो में बहुत भद्दा दिखता है, किसी रचनात्मक सोच की तो बात ही क्या कर सकते है। सोच या विचार का तो अकाल ही है। अंग्रेजी चैनलो पर कुछ स्थिति बेहतर जरूर है। भारतीय समाज मे रचनाशीलता का अकाल है इस बात से इन्कार नही किया जा सकता। यदि पौने दो अरब लोगो का यह देश्. जिसकी संस्कृति का शानी दुनिया मे कोई न रहा हो, वह यदि ओलम्पिक मे दो कास्य पदक और दो रजत पदक पा कर सैतीसवे स्थान पर गिरता हो तो सोचिये! यह रचनाशीलता का महाअकाल है। भारत की जनता अपनी रचनात्मक शक्ति का उद्रेक कर सकने मे पूर्णतः अक्षम दिखती है। मनमोहन सिंह सरकार ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को तोपने के लिये अग्नि मिसाईल दागकर बतलाती है कि हम विश्व की महाशक्ति बनने की तरफ है। यह एक सफेद झूठ है क्योकि जिस देश की मेधा तथा रचनात्मकता ही खत्म हो गई हो वह कोई शक्ति नही बन सकता। जब कोई देश महाशक्ति बनता है तो शक्ति का उद्रेक हर स्तरों पर दिखता है। किसी भी महाशक्ति का संस्कृति और स्पोर्ट्स ध्वजवाहक होते है क्योकि इसीमें उस देश की चेतना और रचनात्मक शक्ति का रेफ्लेक्शन होता है।

हमारे संस्कृत साहित्य में भी हमारा समाज इतना पिछडा नही दिखता है, पहले हम बहुत रचनाशील थे और वर्तमान समय से ज्यादा प्रगतिशील भी। संस्कृत वांगमय में जो कुछ हम पढते है वह सिर्फ साहित्य नहीं है, वह समाज में भी दिखता होगा, रागात्मकता में पगी स्त्रियां हर कहीं रही होंगी । यह पत्नी विलास देखिये–
शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किञ्चिच्छनै-
र्निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वण्र्य पत्युर्मुखम्।
विस्रब्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलीं।
लज्जानम्रमुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता।
सूने शयन गृह को देख कुछ धीरे पलंग से उठकर नीद की ठोंग किये हुये पति के मुख को देर तक निहार कर, विश्वास के साथ जोर से चुम्बन कर, तत्पश्चात् उत्पन्न रोमांच वाली पति की गंण्ड्स्थली को देख कर लज्जा से झुके मुख वाली बाला हंसते हुये प्रिय द्वारा देर तक चुम्बित हुई।
कुछ स्मित मुग्ध, जिनकी आँखे के विभव तरल हो ऐसी विलास-सहित मुस्कानो के तमाम भेदो वाली हो, कलापूर्ण, ह्रीमति स्त्रियो के गुणो की संख्या अगणित मानी गई है वैसे कमसे कम दो सौ इक्यावन गुण तो मै ही बतला सकता हूँ। अतिभौतिकवादिता तथा दैहिकता ने इसे व्यक्तित्व से खत्म कर दिया है जिससे स्त्रियो सहित पुरूषो मे भी गुणो का अकाल है। जीवन की इस रिक्तता को पैसे से भरा जाता है। व्यक्ति हर तरह से रिक्त होता गया है इसलिये वह लूटोन्मुख हो गया है, उसे लगता है जितना लूटकर जमा कर लेगा उतना ही पूर्ण हो जायेगा। रसिकता को परममूल्यो मे एक माना गया था अन्यथा इस तरह के श्लोक नही लिखे गये होते। यदि मानवजीवन को रचनात्मक नही माना गया होता तो प्रवृत्ति मार्ग का प्रवर्तन क्यो होता? मार्ग तो वही है जिसमे व्यक्ति जीवन के परम मूल्यो को पा सके, जिसमे रचनाशील बने रहना ही सबसे परम मूल्य है क्योकि इसी मार्ग से उद्दात्त आध्यात्मिक मूल्यो तथा अन्त मे ईश्वरत्व की तरफ प्रस्थान होता है। हिन्दू समाज की हर गतिविधि के केन्द्र मे एक रचनात्मक बात रही है, चाहे वह ब्याह हो, बच्चे का जन्म हो, फसल की बुआई हो, तमाम त्यौहार हो—मंगल गीत, संगीत तथा कला इसमे बहुत गहरे पैठी रही है। फिर एकायक हिन्दू परिवार इससे रिक्त कैसे हो गया? समाज की रचनाधर्मिता को किसने खत्म किया? यह संस्कृति का एक प्रमुख सवाल है। पाश्चात्य चिन्तको ने अपने समाज को रचनाधर्मी बनाने पर जितना जोर दिया हमने क्यो नही दिया? बगैर रचनाधर्मिता के क्या कोई समाज विकसित तथा महान बन सकता है?
चौसठ कलाओ को धारण करने अपेक्षा भारत मे मनुष्य से की गई थी, जिसमे निश्चय ही सब कुछ समाहित था और जिसको प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य रिक्तता का अनुभव नही करता। हिन्दू समाज स्वयं मे बहुत रसिक तथा उत्सवधर्मी रहा है, फिर यह किस तरह उससे रिक्त हुआ कि संस्कृति पर वेष्याओ तथा पोर्नस्टारो का कब्जा हो गया? यह आधुनिक मनुष्य की चेतनागत रिक्तता ही है जिसके कारण वह वेष्यावृत्ति परायण होता है और बुर्जआ समाज की रिक्ता को दूर करने का उत्तरदायित्व पोर्नस्टार्स के कन्धे पर होता हैं। यदि पोर्नस्टार्स रूमानियत का आदर्श प्रस्तुत कर रही है (मनुष्य का वास्तविक जीवन) तथा उनके द्वारा प्रवर्तित संस्कृति सारे समाज की प्रमुख संस्कृति बन गई है तो यह परिवार खत्म हो जाना चाहिये। सारी औरतो को वेष्याधर्मिता अपना लेना चाहिये। वेष्याधर्मिता ही सबसे प्रमुख धर्म होना चाहिये क्योकि इसी से देश विकसित हो सकता है तथा इसी मे सबका आत्यान्तिक कल्याण है। वेष्याओ की संस्कृति परिवार की संस्कृति पर प्रभावी है इस बात से ईंकार नहीं किया जा सकता। वेष्याधर्मिता तथा वेष्यासंस्कृति का प्रकोप एक मुद्दा है, इसको अभी इस सामान्य ब्लाग पोस्ट मे रखा है, बाद मे समय मिलने पर इस पर विस्तार से बात की जायेगी फिलहाल वाल्टर बेन्जामिन द्वारा लिखित एक वेष्या और जिनियश के बीच यह सम्बाद देखिये:

जिनियश – मैं तुम्हारे पास विश्राम के लिये आया हूँ।
वेष्या – बैठो, फिर।
जिनियश- मैं तुम्हारे संग बैठना चाहता हूँ—मैने तुम्हे अभी अभी छुआ है और ऐसा लगता है कि मानो मै वर्षो से विश्रामरत हूँ।
वेष्या- आप मुझे असहज कर रहे हैं। यदि मै आप के बगल मे सोऊ तो मै सो न पाऊँगी!
जिनियश- हर रात लोग तुम्हारे पास आते हैं। मै महसूस करता हूँ कि मैंने उन सबका स्वागत किया है, परन्तु सबने मुझे उदास नजरो से देखा और अपने रास्ते चले गये।
वेष्या- अपना हाथ मुझे दो—तुम्हारे ठंडे हाथो से लगता है तुम अपनी सारी कविताये भूल गये हो।
जिनियश- मै केवल अपनी माता के बारे मे सोच रहा हूँ। क्या मै तुम्हे उनके बारे मे बतलाऊं’?उसने मुझे जन्म दिया। तुम्हारी तरह, उसने जन्म दिया– सैकडो मृत कविताओ को । तुम्हारी तरह, उसने अपने बच्चो को नही जाना। उसके बच्चे अजनबियो के साथ वेष्यागमन पर गये।
वेष्या- मेरे बच्चो की तरह!
जिनियश- मेरी मां ने सदैव मेरी तरफ देखा, मुझसे प्रश्न पूछे, मुझे लिखा। मैने उनसे सीखा अन्य औरतो के प्रति उदासीन होना। मेरी आखो में सभी मां थी। सभी औरतो ने मुझे जन्म दिया, किसी पुरूष का इसमे कोई योगदान नही।
वेष्या- यह उन सभी पुरूषो की प्रशंसा है जो मेरे साथ सोते है। जब वे मेरी नजरो से अपनी जिन्दगी की तरफ देखते है तो उन्हे कुछ नही दिखलाई पडता सिवाय एक राख के एक गुबार के जो उनके चेहरे पर गिर रही है। किसी ने उन्हे नही जना, और वे मेरे पास आते है जनन न करने के लिये।

जिनियश- सारी औरते जिनके पास मै अब तक गया तुम्हारे जैसे थी। उन्होने मुझे जन्म दिया और मै मृतजात था,और सभी मुझसे मृत चिजो को प्राप्त करते हैं।

वेष्या- लेकिन मै वह हूँ जिसे कमसे कम मृत्यू से डर लगता है ( वे हमविस्तर होते है)

वेष्या और पत्नी के बीच कितना फासला है? वाल्टर बेन्जामिन का मां की वेष्या से तुलना कुछ विशेष तत्वदर्शन की तरफ ईंगित करता है। इस पर बाद मे ब्लाग पोस्ट डालूंगा।

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