Posted by: Rajesh Shukla | July 23, 2012

रायसीना हिल का राजनीतिकरण और भाजपा की विफलता


इस पूर्वअवधारणा के उलट की राष्ट्रपति पद भी एक राजनैतिक पद है क्योकि कुछ भी अराजनैतिक नही होता कांग्रेस के नेता टीवी न्यूज चैनलो पर विपक्षी दलो को यह नैतिक पाठ पढाने से नही चूक रहे है कि इस पद की गरिमा को नही गिराया जाना चाहिये। शुरूआती राष्ट्रपतियो राधाकृष्णन इत्यादि के बाद कभी भी यह पद अराजनैतिक नही रहा है भले ही वह संवैधानिक पद कहा जाता हो। ज्यादातर राष्ट्रपति कांग्रेस के स्टाम्प से ज्यादा नही रहे तथा उन्होने पद पर रहते हुये कांग्रेस की राजनैतिक सेवा की थी। इस बात से शायद कम लोग ही असहमत होंगे। मुझे इस बात से कोई ऐतराज नहीं कि राष्ट्रपति राजनैतिक नही होना चाहिये, लेकिन वह राजनैतिक है तो फिर उसको राजनिति का विषय भी बनाया जायेगा इस बात से भी ऐतराज नहीं होना चाहिये। प्रणव मुखर्जी देश के तेरहवे राष्ट्रपति बन गये, उन्होने प्रतिपक्षी पी ऐ संगमा को कमोवेश ७०-३० के अनुपात मे हराया, उन्हे इसके लिये बधाई है। संगमा एक पराजित योद्धा है जिन्हे बडे राजनीतिक तिकडम से पराजित किया गया है। प्रणव मुखर्जी राजनैतिक व्यक्ति है इसलिये उन्हे भले ही अपनी जीत बहुत प्यारी लगती हो और वे जश्न मना रहे हो लेकिन उनकी जीत साम-दाम-दण्ड-भेद द्वारा ही हुई है। यह जीत एक सम्माननीय राष्ट्रपति की जीत नही है हलाकि उन्हे पार्टी लाईन से हटकर सांसदो तथा विधायको के वोट मिले । यदि कोई भी दूसरा उम्मीदवार होता जिसमे नैतिकता शेष होती तो वह इस वोट खरीदी को कभी स्वीकार नही करता, वह उसकी आलोचना करता लेकिन प्रणव जी ज्यादा मतो से जीतना चाहते थे इसलिये उन्हे राज्यो को खैरात बांट कर वोट की खरीदारी भी संवैधानिकतः-राजनैतिकतः सही लगा। वे एक सधे राजनैतिक व्यक्ति है इसलिये राष्ट्रपति का पद ज्यादा खतरनाक हो जाता है क्योकि यह नेता सत्ताधारी उपनिवेशवादी दल का नेता है। प्रणव बहुत पढे लिखे, बडे अनुभवी बडे धार्मिक तथा व्यक्तिगत स्तर पर बडे अच्छे व्यक्ति हो सकते हैं लेकिन वे है तो एक ऐसे दल के नेता जिसकी विचारधारा उपनिवेशवादी विचारधारा है। साठ साल का कांग्रेस का इतिहास हिन्दुविरोधी रहा है तथा देश विरोधी भी रहा है। प्रणव अच्छा होने के बाद भी उसी देहद्रोही उपनिवेशवादी परम्परा के वाहक है तथा उस भ्रष्ट सरकार के वित्तमंत्री थे जिसके राजकोश से उनके रहते कांग्रेस के तथा गठबंधन के मंत्री दलालो ने लाखो करोड डकार लिया और वे अपनी संभ्रांत मुस्कान विखेरते रहे। प्रणव मुखर्जी की अंतरात्मा ने एकबार भी उन्हे नहीं झकझोरा कि उनके वित्तमंत्री रहते दुनिया की सबसे बडी जनतांत्रिक लूट हुई तथा जनविरोधी तथा देशविरोधी परिघटनाये घटित हुई। क्या इसे ही बुर्जुआ संभ्रांतता तथा बुर्जुआ ठोंग नहीं कहते है? इससे इतर बुर्जुआ क्या होता है? वामपंथी जिस बुर्जुआ जीवात्मा की करप्ट आत्मा पर इतना शोर मचाते हैं क्या उन्होने ही इस बुर्जुआ को बेहद पसंद नहीं किया? प्रणव मुखर्जी कांग्रेस परिवार के वफादार मंत्री रहे है जिसका उन्हे पुरस्कार मिला। प्रणव की संभ्रान्त मुस्कान के पीछे एक खतरनाक चेहरा किसी को क्यों नहीं दिखता? खैर, अब जबकि सारे सेक्यूलरवादी लूटेरो के दल ने एकजुट होकर उन्हे राष्ट्रपति भवन मे भेंज ही दिया है तो वहां भी प्रणव मुखर्जी क्या करते हैं, वह भी देखने की बात है।

 

संगमा जी को संविधान के दायरे मे चुनावआयोग के नांमांकन रद्द न करने के निर्णय को चुनौती देने का पूरा हक है। कांग्रेस इसे पद की गरिमा की दुहाई देकर नही बदल सकती। कांग्रेस सब कुछ अनैतिक करने के बाद नैतिकता की दुहाई देना खूब जानती है। जब कर्ण का रथ कींचड मे फंस गया था तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कहा अब इस पापी को मारने का सही वक्त है तो कर्ण ने नैतिकता की दुहाई दी कि तेरी नैतिकता उस समय कहां थी जब तुमने अभिमन्यू को निहत्था करके मारा? कांग्रेस को उसकी अनैतिकता का ऐहसास कराकर ही बध किया जाना चाहिये। रायसीना हिल की रेस कई मायनो बडी महत्वपूर्ण है। पहली यह कि इससे एक बात तो साफ हुई कि बीस प्रतिशत मुसलमानो के वोट के लिये कोई कही भी जा सकता है। दूसरी यह की राष्ट्रपति चुनाव ने सेक्यूलरिज्म के बहाने भ्रष्टाचार को वैधता प्रदान किया क्योकि जिन्होने प्रणव को समर्थन दिया उसने पूर्णतः भ्रष्ट कांग्रेस को सत्ता मे बने रहने की वैधता प्रदान किया। सेक्यूलरिज्म के बहाने कांग्रेस ने सारे भ्रष्टो को एकजूट किया और कहा को देखो यदि भ्रष्टाचारविरोधी भाजपाई सत्ता मे आयेगे तो हमारे महल और स्विस बैंक के खाते तो बनने से रहे। यह भी गौरतलब है कि वे ही दल भ्रष्ट कांग्रेस के एकसूत्र मे मणियो की तरह पिरोने के लिये एकत्रित हुये जो मूलतः हिन्दुत्वविरोधी,राष्ट्रविरोधी तथा उपनिवेशवादी मानसिकता से अतिक्रांत हैं। इन सबके बीच भाजपा का संकट यह रहा कि उसने किसी भी चीज मे अपना ईनिशियेटिव नही लिया, वह हर बात मे कांग्रेस के निर्णय की बाट जोहती रही। राजनीति में फस्ट ईनिशियेटिव भी कोई चीज होती है, कई बार बाजी उसी की होती है जो इस दाँव को साहस के साथ खेलता है। मुझे अब शक है कि सब कुछ कांग्रेस के विरूद्ध होने बाद, जनता की बौखलाहट तथा रोष के बाद भी भाजपा हाथ पर हाथ धरी बैठी रहेगी और २०१४ उनके हाथ से खिसक जायेगा। डगरते डगरते –डरते डरते भाजपा नरेन्द्र मोदी को केन्द्र मे लाने पर सहमति बना पायी। भाजपा को सेक्यूलरिज्म का भूत सता रहा है। भाजपा को यह पता होना चाहिये कि कि वह एक हजार बार गंगा नहा ले या साक्षात अग्नि मे अपनी आहूति दे तो भी मुसलमान उसको वोट नही देने वाला है। इस निरर्थक आशा मे एकदिन मुसलमान वोट दे देगा भाजपा अपने को खत्म न करे। भाजपा को हिन्दुत्वा राष्टवाद के साथ विकास तथा राष्ट्रीयपूजीवाद का परचम फहराने का प्रयास करना चाहिये। भाजपा को कांग्रेस तथा उसकी नीतियो का पिछलग्गूपन छोडकर अपनी विचारधारा की सच्चाई के साथ कमर कस कर आगे बढना चाहिये। यह हिपोक्रेसी का वक्त नहीं है, नरेन्द्र मोदी को प्रधानंमत्री का उम्मीदवार घोषित करके आगे बढने की जरूरत है। कांग्रेस ने अपना प्रधानंमंत्री मुस्लिम सगुन करके आगे कर दिया है(मस्लिम सगुन, क्योकि मुसलमान खुर्शिद ने गुहार लगाई कि अब वक्त आ गया शाहजहां को सिंहासन पर बैठाने का), देश ने जान लिया है कि २०१४ मे कांग्रेस का युवराज राहुल गांधी हैं। भाजपा यदि निर्णय लेने मे देर करेगी तथा यह सोचेगी कि सहयोगी भाग न जायें तो इस दफे भी कांग्रेसियो कां यह ईनिशियेटिव भारी पड सकता है। सहयोगी ले देके एक जदयू है जिसने दिखा दिया है कि वह कभी भी भाग सकता है, अकाली दल नही भागन वाला क्योकि उसकी विचारधारा एक है, ऐसे मे यह संशय का वक्त नहीं है। अकेले लडो फिर २००४ जितनी सीटे लेकर आओ फिर सहयोगियो की भी कमी नहीं होगी। कमजोरो का कोई सहयोगी भी नहीं होता है। राष्ट्रपति चुनाव ने भाजपा को कमसे को सच्चाई से तो अवगत कराया ही है। समय है सचेत होकर आगे बढने का, अन्यथा पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

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