Posted by: Rajesh Shukla | July 17, 2012

यक्षी ताडका के बहाने



वाल्मिकी रामायण मे ताडका नामक राक्षसी के बध का प्रसंग बहुत महत्वपूर्ण प्रसंगो मे से एक है। यह घटना सरयू-गंगा के दोआव मे घटित हुई थी। आज का बलिया जिस दोआब मे स्थित है उसी दोआब मे इस राक्षसी का बध हुआ है। वाल्मिकी रामायण के अनुसार जब विश्वामित्र दोनो भाईयो को लेकर चलते हैं तो वे इस दोआब मे एक रात बिताते है। जब सुबह होती है तो मुनि राजकुमारो को उठाते हैं तथा आज्ञा देते हैं कि वे अपने नित्य तथा नैमित्तिक कर्म पूरा करें। राम तथा लक्ष्मण दोनो गंगा सरयू के संगम पर पहूँच कर त्रिपथागा के दर्शन करते है। वाल्मिकी का यह श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है-
तौ प्रयान्तौ महाविर्यौ दिव्यां त्रिपथगां नदीम्।
ददृशाते ततस्त्र सरय्वाः संगमे शुभे।
जाते जाते महाबली राजकुमारो ने गंगा और सरयू के संगम पर पहूँच कर वहां दिव्य त्रिपथगा नदी गंगाजी का दर्शन किया।

रामायण के अनुसार यह दोआब एक घोर जंगल था । रामायण के अनुसार यहां ऋषियो के अनेक आश्रम थे जिसमे तपस्वी मुनि साधना रत रहते थे। उन आश्रमो को देख कर राम ने विश्वामित्र से उनके बारे मे पूछा भी था। विश्वामित्र के अनुसार वह जंगली इलाका मलद और कूरूष दो जनपदो के अन्तर्गत आते थे। मलद और कारूष नाम इन जनपदो का इसलिये पडा था कि  वत्रासुर का बध करने के बाद ईन्द्र को जो गुरूहत्या का दोष लगा था उसकी निवृत्ति यहां हुई थी। इन्द्र को पाप निवृत्ति के लिये गंगा के जल से नहलाया गया था जिससे उनके मल निवृत् हुये इसलिये इसका नाम  पडा मलद और कारूष पडा अर्थात जिसका मल छुडा दिया गया है। यह जनपद बहुत धन्य धान्य पूर्ण था। ताडका नामक हजारो हाथियो के बल के बराबर बलवान ईच्छाधारी यक्षिणी ने इस इलाके को अपना बसेरा बना लिया था और इस जनपद का विनाश करने लगी। वह अपनी इच्छानुसार जिसको चाहती उसको खा जाती थी जो चाहती उसे तहस नहस करती थी। इससे लोग बहुत त्रस्त थे। ॠषियो का यज्ञ तथा धर्म पूरी तरह इसके भय से रूक गया था, मुनियो का ज्ञान अन्वेषण खत्म सा हो गया था। ताडका ने कमोवेश इस जनपद को विरान तथा भयत्रस्त कर दिया था। जब राम ने पूछा कि यह स्त्री इतनी बडी राक्षस कैसे बन गई तो विश्वामित्र ने यह कथा बतलाई है। राक्षसी ताडका सुकेतु नाम के किसी यक्ष की सन्तान थी जिसे उसने ब्रहमा जी से वरदान मे प्राप्त किया था। ब्रह्मा जी ने यक्ष की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे कन्या रत्न दिया लेकिन उसे पुत्र चाहिये था इसलिये उन्होने उसे दस हाथियो का बल प्रदान कर दिया जिससे यक्ष को पुत्र की कमी न महसूस हो। यक्ष ने इसका ब्याह सुन्द नामक राक्षस से किया जिससे मारीच नामक पुत्र हुआ था। यही मारीच रावण के लिये हिरण का रूप धारण किया था। कथा के अनुसार सुन्द राक्षस एक बार अगस्त ॠषि को मारने को उद्धत हुआ था लेकिन उनके प्रचण्ड तपो बल से नष्ट हो गया। पिता की मृत्यू के बाद ताडका उसका बदला लेने की बाट जोहती रही। एक दिन मौका देख कर इह राक्षसी ने अगस्त्य मुनि के आश्रम पर आक्रमण कर दिया और उन्हे खाने के लिये दौडी। मुनि ने  उसे नरभक्षिणी राक्षस होने का श्राप दे दिया जिससे वह तत्काल पतित हो गई और मुनि को किस प्रकार का नुकसान नहीं कर पाई।

भारतीय संस्कृति में यक्ष देव योनि मे माने जाते है। इनका सबसे पहला वर्णन जैमिनिय तथा शतपथ ब्राह्मण मे आता है फिर लागातार गृह्य सूत्रो मे आता है जिसमे इन्हे देव योनि माना गया है तथा इनकी पूजा की जाती थी तथा बलि इत्यादि भी दिया जाता था। ये अपने आध्यात्मिक बल से देवता की तरह विशेष शक्तियां प्राप्त कर लेते थे जिसके कारण सामान्य मानव इनसे लाभ लेने के लिये इनकी पूजा इत्यादि करता था। इनकी गृह्य सूत्रो मे भूतो के रूप मे पूजा होती थी। जैमिनिय में कुबेर यक्षो के अधिपति कहे गये है हलांकि शतपथ कुबेर को डाकूओ का सरदार बतलाता है। साख्यायन सूत्र मे कुबेर के बाद मणिभद्र यक्ष का नाम आता है जो बहुत ताकतवर यक्ष था इससे पता चलता है कि यक्ष बहुत ताकतवर रहे होंगे। यक्षराज कुबेर को गुह्यको का अधिपति कहा जाता है। गुह्यक पृथ्वि लोक पर विचरण करने वाली एक विशेष प्रजाति थी जिसको कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त थी, इनके रहन सहन यक्षो जैसे ही थे लेकिन कर्म कई बार राक्षसो जैसे हो जाते थे। बौध ग्रन्थो तथा जैन ग्रंथो मे भी इनका जिक्र देवयोनि के रूप मे हुआ है। बौध तथा जैन ग्रंथो मे इन्हे कुल तथा ग्राम की रक्षा करने वाला देवता कहा गया है। जैन तथा बौध शिल्पो विशेषकर मन्दिर द्वार पर उकेरे गई देवाकृतियो मे इनको विशेष रूप से स्थान दिया गया है। बौध धर्म ने अपने उत्तरमूर्ति पूजा के विकास के दौर मे इन्हे संरक्षक देवता के रूप मे जगह दिया था। ऐसा लगता है कि यक्ष और राक्षस दोनो जातियां थी जिनमे यक्ष कमोवेश अच्छे कर्म करने वाले थे जबकि राक्षस क्रूर कर्म करने वाले। दोनो की अपनी संस्कृतियाँ तथा परम्पराऐ रहीं होंगी। ताटका परिवार का अगस्त्य पर आक्रमण वास्तव में आर्यो सस्कृति का इन राक्षस संस्कृतियो के टकराव का परिणाम रहा होगा। यह टकराव रावण के काल तक पूरी तरह बडा रूप ले लेता है और हम देखते हैं कि सीता का अपहरण करने के लिये रावण ताटका के पुत्र मारीची से सहयोग मांगता है। वह अपनी मां का बध का बदला लेने के लिये प्रेरित करता है। मारीची यक्ष है इस लिये उसे पता है कि राम भगवान है उनकी शक्तियां अपरम्पार है इसलिये वह मना करता है लेकिन बाद मे सहमत होकर स्वर्ण हिरण का रूप धारण कर लेता है। यक्षो का कर्म बहुत आध्यात्मिक हुआ करता था, ये बहुत तपस्वी होते थे तथा कलाओ मे भी निपुण हुआ करते थे। यक्षो का देवताओ तथा ॠषियो से वैर के प्रसंग पुराणो-इतिहास मे बहुत कम ही देखा जाता है। बौध ग्रन्थो मे यक्षो को तो स्थान मिलता है लेकिन गन्धर्व नाच गानो के कारण बहुत हेय माने गये थे शायद बुद्ध का मार्ग ही ऐसा था जो गन्धर्वो को समाहित नहीं कर सकता था। हिन्दू धर्म मे सबका एक स्थान है, यहां हेय कुछ भी नहीं था, सबके लिये रास्ता था। राक्षस भी देवता बन सकता था और राक्षस-यक्ष राज कुबेर इसके एक बहुत बडे उदाहरण हैं। दूसरी तरफ एक ॠषि और देवता भी राक्षस होकर पतित हो सकता था और वह हिन्दु संस्कृति में त्याज्य था। रावण ॠषिपुत्र था तथा विद्वान और बहुत तपस्वी था लेकिन उसकी तपस्या सिर्फ राक्षसत्व के लिये थी, अन्यो पर विजय के लिये थी “ जगज्जयाय जायताम्”। इसलिये उसका पतित और विनष्ट होना इसका एक अवश्यम्भावी परिणाम था।

यक्षो का विवाह राक्षसो तथा गन्धर्वो दोनो में होता था जिससे यक्षो के चरित्र मे बदलाव दिखता है। गन्धर्वो की संस्कृति का इनपर प्रभाव का ही परिणाम रहा होगा था कि ये जातियां भी कलात्मक हो सकी थी। पुराणो के अध्ययन मे एक बात और स्पष्ट होती है कि गन्धर्व अर्थात संगीत, गीत, नृत्य इत्यादि विद्याओ मे निपुण जातियां हलांकि देव कोटि मे गिनी जाती थी (क्योकि ये दैवी सम्पदा के मालिक होते थे) लेकिन यक्षो तथा राक्षसो की संस्कृति मे मिलने तथा विवाह इत्यादि के कारण गन्धर्व भी कभी कभी राक्षसी कर्म मे प्रवृत होकर जनता तथा ॠषियो को प्रताणित करने लगते थे। इनका बध राक्षसो ने भी किया तथा कई बार देवो ने भी किया था। संगीत, गीत, नृत्य इत्यादि स्वाभिक रूप से आध्यात्मिक गतिविधियां मानी गई है इसलिये इनसे राक्षसत्व की अपेक्षा नहीं की जाती लेकिन भौतिक शक्ति प्राप्त करने बाद कई बार ये पतित हो जाते है, हम आज भी देखते है कि इन कला के क्षेत्रो में लोग वेष्यावृत्ति, रेप, ड्रग, अधर्म,जनविरोधी गतिविधियाँ जैसे तमाम राक्षसी कृत्य करते दिखते है। इन क्षेत्रो मे तमस का गहरा प्रभाव पडा है और पाश्चात्य तामसिकता के कारण इनके विचार मे जन विरोध, राष्ट्रविरोध, चन्द रूपयो के लिये अन्यो की संस्कृति के लिये अपनी ही संस्कति का विरोध, इस तरह की तमाम गन्दगियां ही दिखती है। दूसरी तरफ संस्कृति मे सिनेमा इत्यादि कलाओ मे रचनात्मकता का अकाल ही है, उद्दात्ता तथा किसी मौलिक चिन्तन कोई अपेक्षा ही क्या कर सकता है। यदि कहे तो संस्कृति यत्र-तत्र से पुनरूत्पादन या कहे फूहड़ता  तो है ही कमोवेश विकृत भी है। यह शायद इसलिये है कि यह अंध लूट का दौर है जिसमे हर क्षेत्र मे लूटेरे सक्रिय है, राजनीति से लेकर संस्कृति तक अर्थात स्ट्रक्चर तथा सुपरस्ट्रचर दोनो पतित है। आज भी राक्षसी ताडका हर क्षेत्र मे मिलेगी, राजनीति मे मायावती जैसी ताडकाये हैं जिसके शासन में उत्तरप्रदेश मे सब कुछ कमोवेश खत्म हो गया, केवल घोर राक्षसो का बोलबाला है जो जैसी मर्जी वैसे लूट रहे है। राक्षसी प्रवृति प्रकोप वह सब कुछ नष्ट कर देती है जो कुछ मानव जीवन मे श्रेष्ठ है, जिसको प्राप्त कर मनुष्य स्वयं को धन्य करता है तथा सभ्यता को भी नई ऊँचाईयो पर ले जाता है । वल्गर भौतिकवाद अर्थात वह जो व्यक्ति धन इत्यादि तक सीमित कर दे भी एक राक्षसी प्रवृत्ति है। राजा, कलमाडी, मायावती, कोडा तथा अन्य राजनीति से जनता का धन लूटने वाले डाकू आधुनिक राक्षस है । सोनिया या मनमोहन सिंह किस नैतिकता या राज-नैतिकता के आधार पर उन पार्टियो से अब तक सम्बन्ध बनाये हुये है जिन्होने जनता का धन लूटा? क्या कांग्रेस ने इसतरह भ्रष्टाचार को वैधता नही दी? यह राक्षसी समय है, एक उदासीन समय, जिसमे बडे से बडा बुद्धिजीवी भी हार कर चुप हो किसी कोने मे खो जाता है या स्वयं ही लूटतंत्र का हिस्सा बन जाता है या ईश्वर से उद्धार की कामना करता है। इसमे कोई आश्चर्य नही कि कुछ महिनो पहले उच्चतम न्यायालय के शीर्ष न्यायाधीश ने कहा था कि इस देश का भला सिर्फ ईश्वर ही कर सकता है। ब्लाग पाठक बुरा मत मानिये, इस ब्लाग पोस्ट मे गलत कुछ भी नही लिखा है मैने भले ही थोडा पौराणिक भाषा लगे क्योकि पोस्ट मैने शुरू ही ताटका बध की कथा से किया था। मै अपनी पोस्ट कई तरह की भाषा मे तथा कई तरह की त्वरा मे लिखता हूँ इसलिये आपको मेरी पोस्ट बहुत अलग दिखती होगी।

राजनैतिक सामाजिक अधः पतन का प्रभाव हर क्षेत्र मे दिखता है। लूट की संस्कृति जिसका विकास कांग्रेस ने किया उससे कोई क्षेत्र अछूता नही रह गया है। ऐसे भ्रष्ट समय मे संस्कृति मे सिनेमा के क्षेत्र मे नाचने तथा गाने वाले कला से गन्धर्व से देवत्व की तरफ जाने की जगह पतित कर्म मे लिप्त हो जाते है, राष्ट्र तथा उसकी जनता के अहित की दिशा मे काम करने लगते है। नायिकाये वेष्यावृत्ति को अभिनय से ज्यादा आसान कर्म मानती है तथा झट पैसे कमा कर भोग कर लेना चाहती है, नायक, नायको तथा विर्देशको के बेटे बलात्कारी तथा ड्रग मे लिप्त मिलते है तथा उसके अण्डरवर्ल्ड से ताल्लुकात रहते है। इनका भी एकमात्र प्रयोजन लूट ही है भले ही वे कहते हो कि वे कलाकार है लेकिन ऐसा कुछ है नही जिसे कला कहा जा सके। आप सोच सकते है कि सिनेमा का इतना विशाल उद्योग जिसमे लाखो लोग काम करते हो वह साठ साल मे एक नई पटकथा तक नही लिख पाया, वही सडा गला नाच गाना के बीच खत्म होती सडी कहानी, फिर भी कहते है हम कलाकार है। सिनेमा तथा नाच-गानो का फूहड़ता अन्य कलाओ के फूहड़ता से ज्यादा उबाऊ तथा उबकाईदार है। इनकी रचनात्मकता भी वेष्याओ जैसी है जो जनता को एक आटमसांग पर लूट लेना चाहती है। अभिनय या सिनेमा का यह पतन ही है जब पूरा सिनेमा आईटम सांग पर निर्भर हो जाये।

भगवदगीता मे यक्ष को राजसिक गुणो से संचालित माना गया है वहीं राक्षस को तामसिक गुणो से जबकि गन्धर्व राजसिक तथा सात्विक मनोभावो के बीच मे अवस्थित माना गया है। हलाकि ये तीनो भारतीय संस्कृति में निम्न कोटि की आत्माये ही मानी गई है क्योकि इनमे यदा कदा ही सत्व की पूर्ण प्रतिष्ठा हो पाती है। ये यदा कदा ही सब्लाईम या उद्दात् की तरफ जा पाते है। गन्धर्वो मे उपर उठने की क्षमता रहती तो है लेकिन घोर राजसिक शक्तियां उसे सदैव पतित करती है। गन्धर्वो मे कुछ ऐसे गन्धर्वो का वर्णन मिलता है जिन्होने ईश्वर की घोर अराधना कर देवयोनि प्राप्त किया था जैसे नल-कुबेर या उर्वशी इत्यादि अपसराये थी। साहित्य में बहुत श्रेष्ठ गन्धर्व तथा आचार्य पुष्पदन्त का नाम कौन नहीं जानता जो ॠषितुल्य बन गये थे॰ उनके द्वारा रचित शिवमहिम्न स्तोत्र एक श्रेष्ट आध्यात्मिक तत्वज्ञान से परिपूर्ण कविता है। शिव का कैसे अद्भूत स्वरूप वे खींचते है!
वियद् व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरूचिः।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद्वीपाकारं जलविलयं तेन कृतमि-
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः।।
शिव के सिर से गिरती गंगा की कल्पना तथा उसकी जल की बूँदो की वे आकाशगंगा से तुलना करते है जिसके चमकते हुये तारागण मानो चमकती हुई धवल जल की बूंदे हो ! यह स्तोत्र अभिषेक इत्यादि के बाद शिव मन्दिरो में बहुत सुन्दर ठंग से गाया जाता है। तो कहने का अर्थ है कि गन्धर्व तथा यक्ष दोनो देव कोटि तक उठ सकते थे क्योकि तमस से भावित कम थे जबकि राक्षस शायद ही स्वयं को श्रेष्ठता की तरफ उठा पाते थे। राक्षस बल तथा तमाम क्रूर कर्मो से शक्ति प्राप्त करते थे लेकिन शिघ्र ही उनका विनाश हो जाता था क्योकि शक्ति शायद उसके पास देर तक नहीं रहती जो अशुभ के साथ खडा होता है। शक्ति सदैव ईश्वरीय प्रेरणा से चलती है और वेदान्त कहता है कि यह ईश्वर की दुरत्य माया उनकी भ्रूभग मात्र है। माया दुरत्य है लेकिन उसे अशुभ श्रेय नही, बल्कि जिसका विनाश करना होता है उन्हे वह अशुभ का रास्ता दिखलाती है। अरविन्दघोष इस बावत एक बात सही कहते हैं कि धन की शक्ति उसके पास होनी ही नही चाहिये जो उसके वर्चस को धारण न कर सके। लोक मे यह अनुभव मे आता भी है कि लक्ष्मी के वर्चस को जो मनुष्य धारण नही कर पाता उसे वह नष्ट ही कर डालती है। यदि वह इसके भौतिक स्वरूप को येनकेन प्रकरेण संरक्षित भी कर ले तो वह उसे एक निकृष्ट प्राणी तो बना ही देती है। आध्यात्मिक बात तो यह है कि थोडा धन भी यदि धर्म के साथ धारण किया जाय तो हर तरह के सुखो का वह हेतु बन जाता है। धर्म के अविरूद्ध धन संरक्षण ईश्वरीय नियम की अवहेलना है, इस बात का अनुभव सबको हो जाय तो यह घोर लूटवादी समय खत्म हो जायेगा ।

श्री राम द्वारा ताडका का बध, राक्षस बध का पहला प्रसंग है। बलिया के दोआब मे उसका बध होना इस बात को पुष्ट करता है कि रावण का प्रभाव उत्तरभारत में होने की शुरूआत हो चुकी थी। यक्षो का राक्षसो से गहरा नाता था और सम्भवतः यक्ष भी एक तरह के राक्षस ही थे। यक्षो के तीन तरह के वर्णन मिलते हैं—यक्ष-भूत, यक्ष-राक्षस तथा यक्ष-देवयोनि। मेरी नजर में इनका देव योनि मे उत्थान बहुत बाद मे हुआ जब ये वैदिकसंस्कृति से एक हुये तथा धर्म मार्ग पर चलने लगे। यक्षो की पूजन पद्धति बडी भूतहा तथा राक्षसीय थी इसलिये इनका भूत तथा राक्षस कहा जाना ज्यादा समीचीन लगता है। ताडका का विवाह राक्षस से हुआ था इसलिये उसकी प्रवृत्ति उसी तरह बन गई और वह अपने यक्षत्व को भूल कर राक्षसी कर्म करने लगी थी और श्राप के बाद पूर्णतः नरभक्षी बन गई थी। विश्वामित्र ने राम को इसका बध करने का आदेश दिया बनिस्बत इसके कि हिन्दू धर्म मे किसी भी स्थिति मे स्त्री बध करने का अधिकार नही दिया गया है। विश्वामित्र कहते है कि यदि प्रजा की रक्षा तथा धर्म संकट खडा हो जाये तब स्त्री का बध भी उचित है। यदि वह राक्षस भाव को प्राप्त हो नरभक्षी हो गई हो तब भी उसका बध ही श्रेष्ठ है। राम ताटका का बध करके उस दोआव क्षेत्र बलिया को राक्षस मुक्त करते है और हमे अब आधुनिक ताडका से इसे मुक्त करना चाहिये। रामयण को पलटते समय यकायक वह दोआब वाला श्लोक सामने आया तो लगा अरे यह तो मेरी जनमभूमि का वर्णन है, तो यह पोस्ट लिखने बैठ गया। बहुत सारे पोस्ट इसी तरह लिख डालता हूँ। पांच पन्ने की पोस्ट किस तरह खत्म हो जाती है पता भी नही चलता।  🙂

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