Posted by: Rajesh Shukla | May 20, 2012

दो शून्यो के बीच


वह आज सुबह जब अपनी जांघों के बीच घने जंगली विस्तार को रेजर से साफ करने की कबायद कर रहा था तभी उसका रेजर एकाएक थम गया, वह देखता है और सोच मे पड जाता है। क्या मैं दो शून्यो के बीच एक तरल आस्तित्व से ज्यादा नहीं हूँ?

ओह! ओह!

जब महर्षि अगस्त्य नें इन्द्र को शाप दिया था तो उन्होने क्या उसे उसके इस तरल अस्तित्व से ही वियुक्त नहीं किया था?

क्या कहा था अगस्त्य ने?

“विफलस्तवं भविष्यसि” तू वि-फल हो जा (तू अण्ड कोश विहीन हो जा/शक्तिविहीन हो जा ..तेरा वीर्य कोष पतित होवे )

परम विर्यवान इन्द्र का दैवी अस्तित्व क्षण भर में पृथ्वी पर धाराशायी हो गया था।

अस्तित्वहीन इन्द्र को भेडे के दो शून्य आपरेशन से पुनः जोडे गये और पुनः देवताओ के अनुनय-विनय पर पितरो ने उसे स-फल किया था जिससे देवो का काम न रूके।

सफल बने रहना दो शून्यो के बीच तरल आस्तित्व को बनाये रखना है। विर्यवान बने रहना ही परमजीवन है। यहां तक कि योनि प्रवेश में भी इसकी मृत्यू का खतरा रहता है। निॠतेः उपस्थे –योनि मृत्युदेवता की बलि वेदी है। योनि एक मरघट है।

वह फिर सोच मे पडं गया कि दो शून्यो के बीच तरल अस्तित्व के लिये पर्यावरण को किसी प्रकार की कोई क्षति ही क्यों पहूँचाया जाय, ये घने बाल उसके मुहाने पर खडे दरख्त ही तो हैं। यह जंगल उस तरल आस्तित्व के सद्यः प्रवाह के लिये जरूर कुछ न कुछ उपयोगी होगा कोई चीज सृष्टि में बेकार नही होती।

जब से वह आध्यात्मिक हुआ है अपने जैविक आस्तित्व को लेकर कुछ ज्यादा ही सचेत हो गया है या कह लिजिये ज्यादा ही सन्देह करने लगा है। उसका मानना है कि सन्देह एक तरह का आध्यात्मिक निवारक है जो  आध्यात्मिक  जीवन को सफल करता है।

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