Posted by: Rajesh Shukla | May 18, 2012

दलित विमर्श का दब्बूपन


दलित विमर्श एक जातिवादी विमर्श है इसलिये उसकी अपनी सीमाये  है। दूसरी महत्वपूर्ण बात जो इस विमर्शवादियों की है वह है उनकी दकियानूसी, उनके लिये इस देश में आज तक जो कुछ भी चिंतना की गई है वह सब कुछ ब्राह्मणवादी है। दलित विमर्श की दकियानूस सोच को सामने रखने वाले दो कमोवेश बौधिकतः दलित बुद्धिजीवी कान्चा ईलईया तथा एक अन्य चन्द्र भान ने अम्बेडकर के कार्टून के बावत जो कुछ भी टीवी पर कहा वह किसी भी बुद्धिजीवी को स्वीकार नहीं है। कान्चा ईलईया को बौध ब्राह्मणवाद का शायद थोडा भी भान नही है, बौध ब्राह्मणवाद तो इस हद तक गया था कि वह ज्ञान के वर्चस्व के बावत परिवारवादी तक बन गया था। हलांकि कान्चा कोई अनपढ नही लगता है उसे इतिहास का थोडा बहुत ज्ञान जरूर होगा। यह कि जो कुछ भी ब्राह्मणवादी वह मानता है उसमे एक बडी हिस्सेदारी दलित चिन्तकों की भी है। सभ्यता के बावत निषेधवादी रूख विध्वंसक होता है। दलित बुद्धिजीवीयो का जातिवादी विद्वेष की राजनीति से उपर उठने पर ही दलितो का विकास सम्भव है। अम्बेडकर के कार्टून को जिस तरह दलित विरोधी मानकर पाठ्यपुस्तको से निकालने की राजनीति की गई है उसकी भर्त्सना की जानी चाहिये। यह अभी भी साफ नहीं कि साठ साल बाद यह एकायक कैसे सामने आया? क्या कांग्रेस कार्टून पर कुछ राजनीति कर रही थी? कार्टून को आननफान मे निकालने का प्रस्ताव तथा कपिल सिबाल की दलित जनता से माफी तो यही बतलाता है कि कांग्रेस यह सन्देश देना चाहती थी कि देखो तुम्हारे लिये हम कितने चिंतित है कि कार्टून तक को हमने किताब से हटा दिया है? दूसरी तरफ कान्चा जैसे बुद्धिजीवी दलितो के मध्यवर्ग के प्रतिनिधि है तथा इनकी एक मात्र राजनीति है कि किस तरह वे दलितो को कूपमण्डूक तथा दकियानूस बनाये रखे जिससे उनका दोहन किया जा सके। दलितो के भीतर एक पेटीबुर्जुआ वर्ग पैदा हो गया है जो बहुसंख्यक दलितो का शोषण कर रहा है, इन्ही मे से थोडा खाये पीये ऐसे भी है जो सामाजिक जुर्म करते है। ये ही अपने दलित वर्ग की स्त्रियो का रेप करने वाले है। जिस तरह ब्राह्मणो में एक पेटीबुर्जुआ वर्ग साठ सालो से ब्राह्मणो के नाम पर, ब्राह्मणो की राजनीति करके उनका शोषण कर रहा है उसी तरह दलितो में भी है। हर वर्ग मे यह शोषण करने वाला वर्ग मौजूद है इसीलिये मार्क्सवादी कहते है कि इस वर्गीय शोषण से बहुसंख्यक का उद्धार मार्क्सवादी राजनीति से ही सम्भव है। बुर्जुआ-सामंतवादी दल वर्गीय शोषण की राजनीति पर चलते है तथा उसका संरक्षण करते है।

दलित बुद्धिजीवी रामायण के शम्बूक बध को घोर दलित विरोधी प्रकरण मानते है लेकिन यह हर तरह से वैध दिखता है। किसी भी तरह का ज्ञान चौर्यवृत्ति से नही पाया जा सकता, और जब किसी ऐसे रहस्य ज्ञान की बात हो जैसे शास्त्रीय संगीत को ही ले जिसे सीखने के लिये गुरूशरण आवश्यम्भावी हो तो चौर्यवृत्ति एक बहुत बडा अपराध है। ज्ञान के लिये एक शिष्य की तरह विनय के साथ एक गुरू के प्रति शरणागत होना पडता है। यही परम्परा है। पश्चिम मे भी ग्रीक काल से यही परम्परा रही है। शम्बूक को दण्डित किया जाना एक सीख है, इसे गलत नही ठहराया जा सकता। हां कहा जा सकता है कि उस पर दया की जा सकती थी क्योकि वह ज्ञान प्राप्त करने आया था लेकिन राम ने दया नही की क्योकि उसने किसी मिशाईल प्रोग्राम का रहस्य सुनने का घोर अपराध किया। हम किसी आतंकवादी को भाभा रिसर्च सेन्टर मे चल रहे गुप्त राष्ट्रीय प्रोग्राम को गुप्त ठंग से सुनने की इजाजत आज भी कहां देते है? क्या एक आतंकवादी ज्ञान पिपासा लिये हुये नही जाता?  दूसरी बात, यह जरूरी नही कि गुरू अभ्यागत शिष्य की ज्ञान पिपासा को देख कर ही ज्ञान देने के लिये बाध्य है, वह शिष्य के ज्ञान को धारण करने की योग्यता तथा उसकी लोकहित करने की योग्यता की भी सम्यक परीक्षा करता है। दलित लेखक किसी ऐसे प्रकरण को अपने  दलित विमर्श की जातिगत सीमाओ के अन्तर्गत लाकर हेय बना देते है। संस्कृत हेय है क्योकि यह ब्राह्णणवादी है बौद्धिस्टो ने तो ऐसा नहीं माना बल्कि वे ब्राह्मण शिक्षको, तथा जैन शिक्षको के पास इसे सीखने गये जिससे बुद्ध देशना को संस्कृत भाषा के विमर्श के दायरे में रख सकें।

कान्चा ईलईया कार्टून को दलित विरोधी सिर्फ इसलिये कहता है कि अम्बेडकर को घोंघा पर बैठा हुआ दिखाया गया है, उसका मानना है कि कार्टून अम्बेडकर को गलत प्रकाश मे दर्शा रहा है अर्थात वे रफ्तार वाले शक्शियत थे लेकिन कार्टून में उन्हें धीमी गति से रेंगने वाले जीव के रूप मे दर्शाया गया है। यानि जाति धीमी जाति बताया गया है। यह हास्यास्पद है। सम्विधान रेंगती गति से आगे बढ रहा था इसलिये उन्हे घोंघे के प्रतीक से दर्शाया गया यह उसे समझ नहीं आता या इसे वह स्वीकार ही नहीं करना चाहता। दूसरी बात कार्टून कार्टून है , उसे उसी तरह लिया जाना चाहिये यह बात उसे क्यो नही समझ आती है। तमाम लोगो ने नेहरू का स्मरण दिलाया कि उन्होने किसी कार्टूनिस्ट द्वारा की गई घोर आलोचना की भी बडाई की और कार्टूनिस्ट से उसकी स्वहस्ताक्षरित एक प्रति की मांग की थी। दलित बुद्धिजीवी दलितो का प्रतिनिधित्व करते हुये भूल जाते हैं कि उनका काम दलित चेतना का विकास करना है न कि उन्हे दब्बू बनाये रखना। अम्बेडकर का पूरा राजनैतिक आन्दोलन दलितो का सर्वांगीण विकास था जिसमे सबसे प्रमुख था उनकी चेतना का विकास करना। दलित गुण्डो द्वारा शिक्षाविद सुहास पलिसकर के कार्यालय मे तोडफोड इस बात का एक पक्का सबूत है कि दलित राजनीति घोर रूढिवादी, दब्बू तथा अप्रगतिशीलता की तरफ जा रही है। इसका दोष मायावती को ही दिया जाना चाहिये जिसने एक दलित समंती सोच के साथ एक गुण्डावाद को बढावा दिया है। दलितो मे एक नये तरह का सामंतवाद तथा कन्जर्वेटिव सोच परिलक्षित हुआ है जो दलित बहुसंख्यक के राजनैतिक तथा सामाजिक विकास मे  निःसन्देह बहुत बडी बाधा है। जिस दिन कार्टून प्रकरण सामने आया था उस दिन टाईम्स नाउ पर एक अन्य चन्द्र भान नाम का  दलित बुद्धिजीवी टाई लगाये हुये बैठा था, अलबत्ते टाई मे एक दब्बू बैठा था जो कमोवेश बुद्धि को ताक पर रख आया था। जब कार्टूनिस्ट तैलंग ने अम्बेडकर के कार्टून पर यह कहा कि “ यह कार्टून जिसने बनाया है वह पदमविभूषण है तथा राजनैतिक चेतना सम्पन्न एक विरला सेक्यूलर शख्सियत जो किसी भी तरह अम्बेडकर से कम नही था “ तो इस बात पर वह पांच मिनट तक राक्षसी अट्टाहास करता रहा जिसमे कमोवेश टीवी स्टूडियो ही ग्रसित हो गया था। टाईम्स नाऊ के लिये वह राहू काल था या कोई और ही काल पता नही परन्तु राक्षसी अट्टाहास का उससे बेहतर उदाहरण कोई अन्य नही हो सकता था (जिसने भी देखा होगा उसे उसका एहसास होगा), इसी तरह के अट्टाहास से ही प्राचीन काल के साधु दुखी रहा करते थे। ब्राह्मण कोई जाति नही थी जो इस तरह के अट्टाहासो से भयभीत रहते थे, वे ज्ञान अन्वेषी लोगो का वर्ग था जिसमे ज्ञान के हर तबके के लोग थे। ज्ञान का पक्षघर कोई भी व्यक्ति ऐसे अट्टाहासो से भयभीत हो सकता है, उस दिन तैलंग थे जो सहम गये थे। निहित व्यक्तिगत स्वार्थो के कारण ज्ञान विरोधी या ऐन्लाईटेनमेनट विरोधी प्रवृत्ति जिस तरह इस देश में इधर के दो दशको में बढी है वह चिन्ता का विषय है। दलित का मतलब असुरत्व तो नही है? यदि है तो असुरत्व का दलन ही किया जाना चाहिये यही लोक नीति है। ये बुद्धिजीवी दलित समाक को असुर प्रकाश में सामने रखते है कि हम असुर है जिसका काम ज्ञान विरोध है, प्रगतिविरोधी होना है तथा साधुता का भक्षण करना है। बुद्ध असुर तो नही थे न ? बुद्ध ज्ञान, प्रज्ञा तथा करूणा का अवतार थे। दलित बुद्धिजीवीयों को बुद्ध के पदो से यह सीखना चाहिये कि मुर्ख या अज्ञानी वह नही होता जिसे अपनी मुर्खता की चेतना होती है बल्कि वह होता है जिसे ज्ञान की मिथ्या चेतना होती है” यो बाला मञ्चति वाल्यं, पण्डिततो चापि तेन सो । बालो च पण्डितमानी स वे बालोति वुच्चति ।”

कार्टूनिस्ट एक कलाकार है उसका अपना ऐस्थेटिक्स भी है उसे केवल एक राजनैतिक स्तर पर नही पढा जा सकता। जिसको ऐस्थेटिक सेन्स है वही उसकी आलोचना भी कर सकता है। शंकर, आर के लक्ष्मण या तैलंग जैसे कार्टूनिस्ट हमारे लिये सम्मानित कलाकार है तथा मानवता के लिये उनका किसी राजनैतिक शख्शियत से कम महत्व नहीं है। कुछ असहिष्णु राजनेताओ के साथ साथ ऐसे दब्बू बुद्धिजीवी भी व्यापक स्तर पर सामने आये है जिससे हमारी प्रगतीशीलता बाधित हुई है।

मुझे लगता है कि एक वर्ग ऐसा भी है जो इस तरह के लोगो का सोच विचार कर चुनाव करता है तथा समाज को असहिष्णु तथा दब्बू बनाने के लिये उन्हे जगह देता है। इससे उन लोगो का निश्वय ही कोई नुकसान नही होगा जो अपनी प्रगतिशीलता को किसी भी तरह बाधित नही होने देते बल्कि उस बहुसंख्यक का होता है जिन्हे मुक्त कर आगे ले जाना सबका साझा उत्तरदायित्व है।

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