Posted by: Rajesh Shukla | May 12, 2012

वेदान्त की परम भावभूमि


कमले कमलोत्तपत्तिः श्रुयते न च दृष्यते
दृष्टं शंभोः पदाम्भोजे विष्णुलोचन पंकजम्।
कमल मे कमल की उत्पत्ति तो कही भी नही दिखती किन्तु मैने तो शंभो के चरणकमलो में विष्णु नयन कमल खिलते देखा है।

जब भी कृष्ण जन्माष्टमी आती है मैं सोचता हूँ क्यों जनता हर साल कृष्ण को बुलाती है? जैसा पहले भी मैं लिख चुका हूँ कि भागवत के कृष्ण वेदव्यास की एक  काव्यमय तथा दार्शनिक अभिव्यक्ति हैं जिसमें निश्चय हीं एक सम्पूर्णता लगती है,  उनमें कुछ भी छूटता नहीं, वे देवत्व की पराकाष्ठा हैं। लेकिन यह बहुत आश्चर्यचकित करने वाला है कि एक सन्त आचार्य जिन्हें सारी दुनिया में गायत्री महायज्ञ करने वाला माना जाता है का कहना है कि कृष्ण से ज्यादा कलाओं को धारण करने वाले मार्क्स थे।  उनका तर्क है कि कलायें वे पराशक्तियाँ है जिनसे दैवी व्यक्तित्व जगत को प्रभावित कर सत्य और धर्म की स्थापना करता  है। इस बावत मार्क्स किसी भी अवतार या भगवान से कम महान नही हैं। जिस तरह से मार्क्स ने दुनिया में क्रान्ति की लहर पैदा की उस तरह किसी अवतार ने नहीं की, जिस तरह मार्क्स के विचार तरंगो ने जगत को प्रभावित किया उतना किसी के विचारों ने नही किया। मार्क्स में जो मानवीयता है जो परम चेतना है वह किसी अन्य अवतार में नहीं दिखता।  हलाँकि कृष्ण को अवतार की संकुचित परिभाषा में नहीं देखा जा सकता, वे इस परिभाषा से परे है कमोवेश वेदव्यास की मीमांसा में तो वें एकदम अलग तत्व हैं ।  कृष्ण में मानव बहुत पीछे छूट जाता है, वे मानव नहीं महामानव के रूप में सामने आते है जो हर मानवीय दुःख और दर्द का समाधान रहस्यमय ठंग से रहस्यमय दैवी शक्तियों द्वारा करते है। कृष्ण का जगत उपचार कमोवेश योगीयों जैसा है जो अपनी योगशक्ति या योगमाया से आपके दुःखों को हर लेता है । कृष्ण एक ऐसे परमात्मा है जो वेदान्तिक परिकल्पना को साकार करते  हैं, यह परमात्मा-योगी जगत में रहता हुआ भी, उसके कार्य का संचालन करता हुआ भी उससे परे है।  इस अर्थ में वे मानव की परम सम्भावना  हैं वेदव्यास कमोवेश यही प्रस्थापना करते  हैं। जिसतरह कृष्ण युद्ध के मैदान में अर्जुन को परम ज्ञान का उपदेश करते है तथा जिस भावभूमि पर खडे होकर देते  हैं वह वेदान्त की ही परम भावभूमि है जिसका यदा कदा प्रदर्शन चैतन्य तथा रामकृष्ण दोनों ने समय समय पर किया। कृष्ण ने जिस तरह अर्जुन को  दिखलाया तथा अनुभव कराया कि वे ही इस जगत का अधिष्ठान है वह वेदान्त की ही परम भावभूमि पर सम्भव  है जिसमें कोई स्वयं को सम्पूर्ण जगत से एकीकृत अनुभव करता है- अहंब्रह्मास्मि का उद्घोष कर पाता है।  कृष्ण सबसे बडे वेदान्ती  हैं साथ साथ सबसे बडे मार्क्सवादी भी क्योकि मार्क्स से पहले कृष्ण ने कहा है “यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् “ अर्थात वही सच्चा वेदान्ती तथा सनातन ब्रह्म तत्व को प्राप्त होते हैं जो लोक को समर्पित करके जो कुछ बच रहता है उस अमृत रूपी अन्न से तृप्त होते हैं” या एक दूसरा सम्पूर्ण श्लोक “यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।। अर्थात् लोक यज्ञ के बाद बचे हुये अन्न का भोजन करने वाला श्रेष्ठ पुरूष है, केवल वही समस्त पापो से मुक्त होता हो पाता है। वे लोग उदरपरायण, पापी तथा चोर हैं जो केवल अपने लिये ही पकाते है। आज कल मार्क्सवाद में इकोलाँजी पर बहुत बहस है और मेरी नजर में इससे बेहतर ईकोलाँजी की बात नहीं हो सकती है। कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जिस प्रकृति तथा लोक से तुम्हे अन्न, जल इत्यादि प्राप्त होता है उसे उसका भाग दिये बिना ग्रहण करना पाप है। हिन्दू धर्म में पर्यावरण प्रेम का तत्व बहुत प्राचीन है, कृष्ण से पूर्व का है- पंच भूत यज्ञ या बलि निकालना पर्यावरण के प्रति हमारी सम्वेदनशीलता को दर्शाता है। कृष्ण एक योगेश्वर हैं -वे प्रकृति की लीला को जानते है, उसके रहस्यमय प्रभावो और शक्तियों को जानते है तथा यह जानते हैं कि उसके किस तार को इंगित भर छेड देने मात्र से किसी विशेष तत्व का  उद्रेक किया जा सकता है।

कृष्ण के पूरे जीवन प्रसंग को देखे तो हर  किसी ने उनमें परतत्व को ही देखा था, किसी ने उन्हें सामान्य मानव के रूप में नही देखा यहाँ तक कि गोपियाँ भी उन्हें एक परम प्रेमी के रूप में ही देखना पसन्द करती हैं। वेदव्यास ने जिस तरह लिखा है उससे एक बात साफ होती है कि कृष्ण का रास कोई मानवी रास नही था वह दैवी लीला थी। उन्होंने योगमाया की शक्ति से रास क्रीडा करने का संकल्प लिया क्योंकि इस तरह का रास कोई मानवीय शरीर और अन्तःकरण से नहीं कर सकता। वेदव्यास लिखते हैं ” भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लएल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमाया मुपाश्रितः” उनके एक दृष्टिपात मात्र से सारी प्रकृति में प्रेम का वातावरण बन जाता है सब कुछ काम वाणो से विंध जाता है। भगवान का संकल्प करते ही, वेदव्यास बहुत काव्यमय भाषा मे लिखते हैं ” तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं । प्राच्या विलिम्पन्नरूणेन शन्तमैं ” उनके संकल्प करते ही चन्द्रदेव प्राची दिशा के मुखमण्डल पर अपने शीतल किरणरूपी करकमलो से लालिमा की रोली-केसर मल देते है जैसे बहुत दिनों बाद अपनी प्राण प्रिया के पास आकर उसके प्रियतम पति ने उसे आनन्दित करने के लिये ऐसा किया हो।  यह मानवीय नहीं है यह परातत्व की योगलीला है, सब कुछ दैवी है तथा दैवी नियमों से संचालित है। वेदव्यास बहुत काव्यमय भाषा में इस पुरे रहस्यमय सन्दर्भ को विस्तार देते हैं यदि वे बाँसुरी की धुन भी छोडते है तो वह दैवीय है उससे मानवीय-लौकिक प्रेम का प्रकटन नहीं होता बल्कि उससे उनकी ह्लादिनी शक्ति का सम्मोहित करने वाला सामगान निकलता है। कृष्ण का कृष्णत्व उनके सोमतत्व को सम्पूर्णता मे धारण करने के कारण है। असुर प्रवृत्ति मनुष्य में भौतिकतावाद इतना गहरे अनुप्रवृष्ट हो गया है कि वह तत्वज्ञान या धर्मज्ञान  का अन्यथाकरण करके ही बुद्धिजीवी बनने की कोशिस करता है, भारत में बुद्धिजीवीयों का ओरिऐण्टल रिडिंग से धर्मविमर्श का बडा नुकसान हुआ है। सोमतत्व को ही ले तो विदेशी रीडिंग से सोम का मतलब दारू ही समझता है वास्तव सोम को सिल-बट्टे मे पीसकर पी जाने वाले धूर्त लोग उसके रहस्य को नही जान सकते, वह अनुभूति का विषय है जिसे सामगान करने के बाद ही अनुभव किया जा सकता है।
“सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिषन्त्योष॑धिषम्।
सोमं॒ यं ब्र॒ह्मणो वि॒दु॒र्न तस्या॑श्नाति कश्च!न।। -ॠग्वेद  “

शायद कोई सामगायन करने वाला ही इसको आज ठीक से बता सकता है । वेदव्यास आगे लिखते हैं कि “निशम्य गीतं तदनंगवर्धनं व्रजस्त्रियः कृष्णगृहितमानसाः। आजग्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डला” अर्थात् भगवान का वह वंशीवादन मिलन की लालसा को अत्यन्त बढाने वाला है उकसाने वाला है। यों तो श्यामसुन्दर ने पहले ही गोपियों के मन को वश में कर रखा था। अब तो उनके मन की सारी वस्तुयें -भय, संकोच, धैर्य, मर्यादा आदि की वृत्तियाँ छीन लीं। वंशीध्वनि सुनते ही उनकी विचित्र गति हो गई। जिन्होने एक साथ साधना की थी कृष्ण को पाने के लिये बिना एक दूसरे को बताये-यहाँ तक कि एक दूसरे से अपनी चेष्टा को छुपाकर, जहाँ वे थे वहाँ के लिये चल पडीं।

यह चित्त हरण मानवीय नहीं है यह नितान्त दैवीय है जिसे कृष्ण अपनी योगमाया से सम्पादित कर रहें है। बगैर चित्त का सम्पूर्ण हरण किये उस दैवी प्रेमतत्व का अनुभव भी नही हो सकता- लज्जा, भय, संकोच, मर्यादा इत्यादि चित्तप्रवृत्तियाँ प्रेम तत्व के अनुभव में बाधक हैं इसलिये वे पहले इसी का हरण करते हैं। सब कुछ ह्लादिनी शक्ति  के अधीन है।  कृष्ण अपनी ह्लादिनी शक्ति से एक पल भी वियुक्त नहीं रहते और यह भी सच है कि उनके आगोश में रहते हुये, उस पारमेश्वरी आकांक्षा का ही प्रेरक बन कर नहीं रहते बल्कि उसे अपने वश में रख उसे अपने कार्य में नियुक्त करते हैं। वे अप्राकृत हैं इसलिये उनका सब कुछ अप्राकृत है- वे अप्राकृत परम कल्याणस्वरूप उच्चतम गुणों और भावों के आश्रय हैं इसलिये इस रास लीला में जो कुछ उन्होने किया वह जीवों के कल्याण का एक साधन मात्र है। कोई भी वृत्ति जब अनन्त कोटिभावो के समुदय कृष्ण में मिलती है तो वह दैवी स्वरूप ग्रहण कर लेती है, उसके जागतिक गुण जाते रहते हैं। यदि गीता कहती है कि परमात्मा की तरफ जिनकी चित्त वृत्तियों का प्रवाह है उनके पाप-पुण्य दोनो इसी लोक में क्षीण और विगलित हो जाते हैं तो यह बहुत थियोलाँकल बात है और बहुत रहस्यमय और गूढ है, यहाँ सारे तर्क फेल हो जाते हैं। परम शुभ के बावत जो कुछ भी जगतिक है वह व्यर्थ है- यदि हम रास के बावत ही एक बात पूछे कि यदि गोपियाँ  जार स्त्रियाँ थी  तो उनका परपुरूष के प्रति प्रेम निंदनीय है तो यह सहज बात है-लौकिक धरातल पर इसे कभी भी वैध नही माना जा सकता और ऐसा नहीं है कि इसकी निंदा कृष्ण नहीं करते, वे स्वयं इसकी भर्तस्ना करते हैं जब वे रास के लिये उपस्थित गोपियों से पूछ बैठते हैं ” दुःशीलो दुर्भगो स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया। तद्बन्धूनां च कल्याण्यः प्रजानां चानुपोषणम्।। ” कुलीन स्त्रियों के लिये जार पुरूष की सेवा सब तरह से निंदनीय है। इससे उनका परलोक बिगडता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोक मे अपयश होता है। यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ क्षणिक है ही, इसमे प्रत्यक्ष-वर्तमान में भी कष्ट ही कष्ट है। मोक्ष आदि की बात कौन करे यह तो साक्षात् नरक का हेतु है” यह कह वे उनसे घर लौट जाने का आग्रह करते हैं। इसका उत्तर भी जो वेदव्यास गोपियों से दिलवाते हैं वह मानवीय नहीं भक्ति का परम आदर्श है-अलौकिक है। भक्ति का आदर्श बहुत बडा है यह खुद ही त्याग का आदर्श है-भक्ति अपने परम स्वरूप में यदि प्रेम है तो वह त्याग भी है।  यह वह परम प्रेम है जिसमें नारद कहते हैं लोक वेद का व्यापार निरूद्ध हो जाता है (सा य कामयमाना, निरोधरूपत्वात्) । यह सारी इच्छाओं और कामनाओं का निरोध है इसका स्वरूप परम त्याग के इतर कुछ हो ही नहीं सकता । गोपियों में इस बात की जाँच पडताल कृष्ण एक गुरू की तरह करते हैं जब वे उनसे वह नैतिक प्रश्न पूछते हैं और उनके उत्तर से जब सन्तुष्ट होते हैं तब रास का प्रारम्भ करते है। ज्ञातव्य हो कि यह रास आम नहीं था क्योकि भक्ति के इस परभाव भूमि पर तो कोई कोई ही पहूँचता है,  इसके लिये जिन गोपियों को कृष्ण ने चुना था वे आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि थे-जिन्हें इस दैवी प्रेमलीला का रस चखने का सौभाग्य अनेकों जन्मों की अव्यभिचारिणी भक्ति कें बाद प्राप्त हुआ था। यह एक वृहद भक्ति विमर्श की पृष्ठभूमि में रचा गया है तथा जो एक नयें विमर्श की प्रस्थापना भी करता है- यह अपने स्वरूप में बहुत गहरे वेदान्तिक है। यह भक्ति की पारम्परिक अवधारणाओ से बहुत परे का विमर्श है।  हर साल अष्टमी के दिन (अष्टमी का दिन भी बडा तत्वमींमासीय महत्व रखता है) जनता इसी कृष्ण की खोज में, इसी विमर्श के लिये उनका व्रत रखती है, उनका जन्म करवाती है और फिर उनका दिव्य  अभिषेक करती है। रास ने जिस भक्ति  विमर्श को जन्म दिया उसपर फिर किसी अन्य पोस्ट में लिखूँगा यदि समय मिला।

“त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी, भक्तिरेव गरीयसी”

–यह एक पुरानी पोस्ट थी जिसे कभी ब्लाग पर डाला था लेकिन क्यों हटा लिया था यह पता नहीं। पुनः डाल रहा हूँ आनन्द करे।

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