Posted by: Rajesh Shukla | April 14, 2012

साहित्य के पुजारियों की मठाधीशी


मैं तो इनदिनों पुजारियो से बहुत त्रस्त हूँ सच कहता हूँ, पता नहीं जनता पुजारियों से कितनी त्रस्त है । ऐसा नहीं है कि मैं बहुत अधार्मिक आदमी हूँ इसलिये मैं उनसे घृणा करता हूँ, वास्तव में धर्म से मेरा बहुत गहरा सम्बन्ध है तथा मेरे ऐस्पिरेशन्स का एक बडा पैकेज धर्मग्रन्थों से आता है। मैं पुजारियों का कम उनकी परजीविता का घोर विरोधी हूँ, यदि पुजारी रहेगा ही तो मुझे एक रचनात्मक पुजारी पसन्द होगा जैसा प्राचीन काल मे हुआ करते थे। मैं ऐसे पुजारियो को निःसन्देह महत्व दूँगा और उसकी इज्जत करूंगा क्योकि वे कुछ तो मानवता को देते ही हैं। पाश्चात्य दर्शन का किला का एक बडा हिस्सा इन रचनात्मक पुजारियों की कविताओं तथा विचारों से बनें ईंटो से बना है। पुजारी वही हो सकता है जो पूजा करना जानता है, ईश्वर के गीत गाना जानता है। पुजारी यदि अपनी परम्परा तथा संस्कृति का वाहक है तो वह नये का उदघोषक भी रहा है। परजीवी पुजारियों का सारा कर्म पेट तथा लिंग के इदगिर्द घूमता है इसलिये उनकी बुद्दि भी बहुत कमाल की होती है –सूक्ष्म पाशविक बौधिकता तथा आध्यात्मिकता के साथ एक सामान्य बुद्दि कार्यरत होती है। जनता को यदि पुजारी बहकाने में सफल हो जाता है तो उसकी एक बडी वजह है –उसका यह खा खा खौआ  प्राग्मैटिज्म । यह प्रागमैटिज्म रचनात्मक नहीं होती इसलिये पुजारी को रचनात्मक कृत्य मे लिप्त नहीं देखा जा सकता और वह इसकी बात भी नहीं करना चाहता। यह प्राग्मैटिज्म एक सर्वग्राही बुद्दि धारण करती है –जिसकी एक सार्वभौम आवाज है-जो मिल जाय उसे धन्यता से ग्रहण करो तथा और और और के लिये प्रोत्साहित करो। यूरोप में हलांकि सदैव से ऐसा कम रहा है कि यहां तक कि एक सक्षम परजीवी पुजारी स्वयं को लम्बे समय तक जारी रख सके। मध्ययुग मे तो कमोवेश ज्यादा परजीवी बन चुके, अचिन्तशील, अरचनात्मक पुजारियों को चर्च में घुसने से मना कर दिया जाता था। एक ईसाई पुजारी ऐबे बरगेदे को चर्च ने यह कहकर मुक्त कर दिया कि “अब ये न तो कविता लिख पाते हैं न हीं चिन्तनशील है इसलिये यह ज्यादती नहीं होगी यदि उन्हे धर्ममुक्त कर दिया जाय”। प्राचीन काल से ही पुजारियों की बौधिकता तथा रचनाशीलता को चर्च अपने सम्मान से जोडकर देखता रहा है और आज भी एक विशप से बहुत उच्चस्तरीय नहीं तो कमसे कम एक स्तरीय दार्शनिकता की अपेक्षा की ही जाती है। पुजरियों के पुजारी पोप तो ज्यादातर मामलो में बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते रहें हैं-दार्शनिक, कवि तथा राजनैतिज्ञ। यदि बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि पूँजीवाद का मश्तिष्क ईसाईधर्म से आया तो गलत भी नहीं है। ईसाई धर्म का पुजारी परजीवी तो होता है लेकिन वह रचनात्मक भी बहुत रहता है, वह एक शातिर बुद्धिजीवी होता है जो सदैव चर्च को क्रान्तिक बनाये रखने मे विश्वास करता है। चर्च का अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप बगैर इसके सम्भव नहीं हो सकता था।


समाज के वास्तविक शिल्पकार पुजारी इसलिये बन पाये क्योकि वे सदैव से रचनाशील और परोन्मुख रहे है और उसमें वे सदैव नये का उद्घोष करते रहे है– ये च॒ पूर्व॒ ॠष॑यो॒ ये च॒ नूत्ना॒ इन्द्र॒ ब्रह्माणि ज॒नय॑न्त॒ विप्राः॑ । -ॠग्वेद

इस पोस्ट की शुरूआत पुजारियो के बहाने किया है क्योकि आजकल आई एम हान्टेड बाई प्रीस्ट्स । ये हर जगह मौजूद हैं- आधुनिकता ने यदि पुराने पुजारियों को अप्रासंगिक बनाने की कोशिस की तो उनकी जगह नये पुजारियों को पैदा भी किया है। ये नये पुजारी आजकल तमाम संस्कृतिक मठो में विराज रहे है। ये परजीवी है, ये पिस्सू की तरह रक्तपान करते हैं, मल्टिप्लाई करते है तथा रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल बद्ध है। महान हिन्दी कवि मुक्तिबोध नें इनकी जांचपडताल कर लिखा था “रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल बद्ध ये लोग”। जिनकी शिराओ में ऐसा खून बहता हो उनसे रचनात्मकता की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? शायद यही कारण है कि हिन्दी में कवि तथा लेखको की तादात तो बहुत है शायद अन्य किसी भाषा में इतनी तादात नहीं होगी लेकिन इससे कुछ निकलता प्रतीत नहीं होता। हिन्दी में टार्च लेकर खोजो तो शायद ही कोई ठीक ठाक पढने लायक अपनी संस्कृति पर ही विमर्श या शोधग्रन्थ मिले- ले देके वही हजारीप्रसाद, रामचन्द्रशुक्ल,रामविलास शर्मा या एकाध छिटपुट और। हिन्दी विद्वानो ने भाषा पर भी कोई काम शायद ही किया जितना किया वह या तो अंग्रेजो ने किया या ईसाई पुजारियो ने किया था। हिन्दी मे फादर कामिल बुल्के तथा संस्कृत मोनियर विलियम्स के काम चर्च के काम हैं जिन्हें आज तक हिन्दी के तथाकथित विद्धान आंखमूँद कर सिर पर ढोते हैं। साठ सालो में एक डिक्शेनरी हिन्दी अंग्रेजी इलाहाबाद से छपी है जिसमें शब्दो का अकाल है। जब समाज में परजीविता बढ जाती है तो यह हर जगह दिखाई पडती है और जब यह संस्कृति में आती है तो पुनरूत्पादन, रिफिकेशन, इत्यादि की आदत सी हो जाती है और उसे ही धीरे रचनात्मक मान लिया जाता है या मानना मजबूरी हो जाता है। अब हिन्दी के पुनरूत्पादन और रिफिकेशन के बारे में उनसे ज्यादा कौन जानता है हलांकि उनमे से बहुत कम को यह एहसास होगा कि संस्कृति मे यह तभी होता है जब देश-काल के बाध का बोध खत्म हो जाता है। देश-काल का बोध सदैव होता रहे इसके लिये बहुत जरूरी होता है कि व्यक्ति रचनाशील बना रहे।

हिन्दी बुद्दिजीवीयो की परजीवीता इधर के दशक में बहुत ज्यादा बढी है। हिन्दी अनुत्पादक तथा परजीवियों का स्वार्गिक संसार बनती गई है शायद ही हिन्दी साहित्य मे कोई नई सोच तथा नया काम हो रहा है। मैं यह पोस्ट लिखने लगा एकाएक जब मेरे हाथ जनसत्ता में अज्ञेय पर हो रही मूर्खतापूर्ण बहस की कुछ कतरन हाथ लगी। हलांकि मेरा हिन्दी साहित्य से दूर दूर तक लेना नहीं है फिर भी थोडा बहुत देश के नागरिक की हैसियत से न्यूजपरपर की बहस पर तो कुछ कहा ही जा सकता है। हिन्दी साहित्य संसार में नव्वे के दशक के बाद से तो मानो पुजारियों की बाढ सी आ गई हो, हर पुजारी ने अपना एक अवतार बना डाला है। यत्र तत्र सर्वत्र जिधर देखो उधर पुजारीयों ने उत्पात मचा रखा है, ये अकेले भी नहीं है सबके चेला-चेलियाँ है तथा सबके छोटे बडे मठ है- आबाध लूट-पाट मचाये पडें है। इस तंत्र में घूसना भी बहुत कठिन है, बडी तपस्या करनी पडती है जिसमे सबसे महत्वपूर्ण है- भक्ति। अपने भगवान के लिये थोडा बहुत बतकुचन या बौधिक-पादन साथ साथ गुरू की आरती क्योंकि गुरू ही लूट का महामार्ग है। कलियुग मे वैसे भी कहा गया है कि गुरू दुष्ट होंगे, अत्याचारी होंगे, अज्ञानी होंगे , अज्ञान को ही ज्ञान बनाकर बेच सकने में कुशल होंगे, अपनी शिष्याओ के साथ ही रमण करेंगे—ले देके छिनाल-छिनरा की छिनरई ही परम साहित्य हो जायेगा। नामवर मुक्तिबोध को बेचकर वर्षो साहित्य में मठाधीशीस की तो अब सम्पादक ओम थानवी एक बडे पुजारी की भूमिका में है -अज्ञेय परम। थानवी जी ने कवि अज्ञेय का झण्डा उठा रखा है जिसमे डंडा लगा हुआ है तथा उसकी मुठ मे अदृष्य छुरी भी घुसेड रखा है कि जो कोई इस नये भगवान के बारे मे कुछ आलोचना करेगा या कोई भी नकारात्मक शब्द बोलेगा उसे मिल जुलकर पीटा जायेगा, या कि छरा ही भोंक दिया जायेगा। हलांकि जिसको थानवी भगवान मान रहे हैं उनमे वैसा मानने लायक कुछ है नही और अज्ञेय को बहुत ऊंचे साहित्यिक स्थान पर रखा भी नहीं जा सकता है। पुजारी का जैसा आदर्श होता है उससे पुजारी का बौधिक-आध्यात्मिक कद का भी पता चलता है। हिन्दी में मठाधीशी करते लोग साहित्य को वेश्यावृत्ति में बदल दे तो बहुत आश्चर्य नहीं है। ओम थानवी जी को इतिहास की यह बात शायद न पता हो कि दिल्ली के जैन समाज में अज्ञेय एक बहुत घटिया इन्सान के रूप में विख्यात थे –यह बात मुझे एक जैन बुद्धिजीवी ने ही बताई है। जैन साहब का कहना था कि उसे कोई जैन अपने घर मे घुसने नहीं देता था क्योकि वह घुसते ही घर की बेटी बहनो पर नजर गडा देता था। खैर, यह कोई बहुत बडी बात शेखर एक जीवनी के लेखक के लिये है भी नही।
एक पत्रकार टाईप साहित्यिक पुजारी राजकिशोर है जो न्यूजपेपर में कुतर्क करते रहते है, मसलन जनसत्ता में उन्होने कवि अज्ञेय पर यह कुतर्क किया कि “ अज्ञेय मानवेन्द्र नाथ राय की विचारधारा से प्रभावित थे, ऐसा कहा जाता है। राय से अज्ञेय की मित्रता जरूरी थी। पर उनका वैचारिक प्रभाव था या नहीं और था तो ठीक ठीक कितना था, यह स्पष्ट नही। बेशक अज्ञेय में मानववाद के बहुत से पहलू दिखाई देते हैं’। अब इन जनाब से पूछिये कि भाई तो फालतू का कुतर्क क्यों कर रहे हो, जब तुमको यही पता नही कि अज्ञेय में क्या था या क्या नहीं था या कुछ था भी या नहीं था ?  जब तुमने आज तक यह भी नहीं पता किया कि अज्ञेय मानवेन्द्र नाथ राय से, ज्यां पाल सात्र से या किसी अन्य शख्शियत से प्रभावित था तो उसके वैचारिक पहलू पर क्यों नाहक चर्चा करके न्यूजपेपर का २०’प्रतिशत स्पेश खा रहे हो, साथ मे इसके ऐवज में पैसा भी। और जब उसके वैचारिक पहलू की ठीक ठीक जांच पडताल नहीं की है कन्फूजन में हो तो उसके साहित्यिक पहलू की जांच पडताल कैसे करोगे? अच्छा चलो उसकी दूसरी बात को सामने रखते है कि यदि अज्ञेय फासिस्ट था या अमेरिका का पिट्ठू था, तब भी वह लेखक था कि नही था यह सवाल है? वह लेखक नहीं रहा बल्कि एक धूर्त प्रोपागाण्डा करने वाला प्रचारक हो गया –अब उसकी उपमा बदल गई- अब वह कविक्रतु कहा जाने वाला लेखक नही रहा। एक फासिस्ट प्रोपागाण्डा करने वाले को एक लेखक की पदवी नही दी जा सकती क्योकि उसे लेखकीय कर्म से च्यूत कर दिया गया है। फासिस्ट सांस्कृतिक इतिहासकारो का तो यही कहना है। खुद हिटलर का मानना था कि लेखक तथा कलाकार शासन के प्रोपागाण्डा मशीनरी में फरेबी से ज्यादा औकात नहीं रखते। इतिहासकार जोश हेरमण्ड ने लिखा है कि “ नेशनल सोशलिस्ट कला और साहित्य न केवल कुरूप है बल्कि रूपाकारो के प्रति मूर्खतापूर्ण भक्ति को दर्शाता है जो तत्वहीन है। यह मूलतः ब्रूटल है।” यह एक तथ्य है कि हिटलर के शासन में कवि, लेखक और कलाकार होने के लिये दो चीजे अत्यन्त जरूरी मानी जाती थी –पहला, नाजी पार्टी के साथ ठीक ठाक अनुभव तथा दूसरा नाजी प्रोपागाण्डा मंत्रालय का सर्टिफिकेट जिसपर गोऐबल्स का हस्ताक्षर होता था, बगैर इसके इस सास्कृतिक साम्राज्य मे प्रवेश सम्भव नही था।

दूसरी तरफ प्रेमचन्द्र के हिन्दू या अ-हिन्दू होने पर बहस जिसमे दोनो तरफ के पुजारी लड रहे है। अ-हिन्दू पक्ष वाले तर्क दे रहे हैं कि वे हिन्दू धर्म के कटु आलोचक है, मार्क्सवादी है इसलिये उन्हे होना ही चाहिये और बौधधर्म या ईस्लाम का पक्षधर होना चाहिये जबकि हिन्दू पक्ष वाले कह रहे हैं कि वे हिन्दू धर्म मे जन्मे तथा हिन्दू समाज की कुरितियो की भर्तसना की और ठीक उसी पथ पर चले जिस पथ पर तमाम महान लेखक चले। ज्यादातर रूढिवादी मार्क्सवादियों ने हिन्दुधर्म तथा संस्कृति के साथ कमोवेश बलात्कार किया है इस बात से मै भी सहमत हूँ हलाकि उनमे कुछ सार्थक लेखन भी कर गये है। बलात्कार का तर्क यह है कि हम दूसरे की इज्जत बचाने के लिये तुम्हारा बलात्कार कर रहें हैं इस वे सेक्यूलरिज्म कहते हैं। मसलन मार्क्सवादी तुलसीदास में “शुद्र गंवार ठोल पशु नारी “ वाली चौपाई लेकर हिन्दुधर्म को जीभरकर कोसेंगे लेकिन उन्हे कुरान में तमाम वेष्यावृत्ति तथा रेप के प्रंसंग उन्हे मिलेंगे ही नहीं। प्रेमचन्द्र पर चल रही बहस में यह तो आ गया की प्रेमचन्द ने हिन्दूओ के कर्मकाण्ड की बडी भर्तसना की है, कई बार अति की हद तक की है लेकिन किसी ने यह नही पूछा की जब धर्म पर उन्होने इतनी बेवाकी से अपनी बात रखी तो उन्हें बौधो का कर्मकाण्ड क्यों नहीं दिखाई दिया। उत्तरबौधो की छोडिये खुद महात्मा बुद्ध कितने बडे कर्मकाण्डी थे इसको वे क्यों नहीं पढ सके? इस लिंक पर एक प्रसंग देख लिजिये। यह पूछा जाना चाहिये कि प्रेमचन्द अंधे क्यों थे? यह पूछने का साहस करिये। क्या उनका अंधापन कांग्रेसी सांस्कृतिक पाँलिसी में हिस्सेदारी का परिणाम नहीं था जिसके अनुसार सबकी तरफ से आँख मूँद लेना है और इन हिन्दुओ को लाठी से मारना है । कमोवेश साठ सालो में हिन्दूधर्म की ज्यादातर आलोचना इसी ठंग की है। कांग्रेसियों नें रूढिवादी मार्क्वादियो का भरपूर इस्तेमाल किया, इस हद तक वे गये कि उन्हें पांच हजार साल पुरानी विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति मे कुछ भी सार नजर नही आया। दर्शनशास्त्र का इतिहास लिखने वाले गरिया गये कि भारत में तो केवल पाखण्डियो का पाखण्ड दर्शन है—उनमे से एक ने भी इस देश के न्याय दर्शन को नहीं पढा, ठीक ठीक एक सराहनीय ग्रंथ षडदर्शन पर हिन्दी मे नहीं है। पाणिनि, पातंजल, इत्यादि का तो नाम भी नही लेते। मैंने दरिदा को पढा  तो पता लगा कि वह भाषा विमर्श में हमसे कई शताब्दियो दूर खडा है। दरिदा अन्तः इसके इतर कहां पहूँचता है कि “भाषा शून्यता मे समाहित हो जाये या मौन में या उस हद जाये कि भाषा सत्य को कमसे कम शब्दो मे अभिव्यक्त कर सके।“ उसके अनुसार अंग्रेजी में तो यह बहुत मुश्किल है, फ्रेन्च में सम्भावना है। जिस भाषा की वह कल्पना कर रहा है उसे पाणिनी ने संस्कृत में ईसायत के जन्म से पहले साकार कर दिया था। सूत्र साहित्य भाषा की महती उपलब्धि है, यह गुलामो को दिखाई नहीं पडता।  मुझे लगता है कि आजकल हिन्दी में लेखन नहीं सिर्फ मठाधीशी की जा रही है, यदि इससे उपर उठकर कुछ निर्माण कार्य करे, कुछ श्रम करें तो जनता का भला होगा तथा लोग जो आज भी विदेशियो कें अध्ययन पर आश्रित है उससे थोडी मुक्ति मिलेगी। साहित्य के पुजारियों नें धार्मिक पुजारियो की तरह का ही तामझाम बना रखा है जिसकी आलोचना की जानी चाहिये। आधुनिक युग के पुजारी धार्मिक पुजारियो के भी बाप है, दे हैव लास्ट रिजन फार दी रिजन।  यह सब घृणा करने योग्य है।

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