Posted by: Rajesh Shukla | March 11, 2012

रण्डियो सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ है!


आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरूत साम्प्रतम। बहुविघ्नो मुहुर्तोऽयं….
हे मूढ लोगो सुनो! यह सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ है, अभी स्नेह करो , यह मूहूर्त विघ्नो वाला है थोडा समय लगेगा जाने मे ।

अहो संसारनैघृण्यमहो दौरात्म्यमापदाम्
अहो निसर्गजिह्यस्य दुरन्ता गतयो विधेः।
उफ, संसार की यह कितनी कठोरता है, ….. उफस्वभावतः कुटिल विधि की गति का पार पाना कठिन है।।

आजकल भारत में ऐसा लग रहा है लोगो का लूट ही स्थाई भाव हो गया है। यदि यह भाव न होता तो हम एक लूट से दूसरे लूट तक न जाते। हमने हर चीज को लूटतंत्र में कमोवेश परिवर्तित कर दिया है। पता नही कला और साहित्य में इस लूट भाव की कितनी पहूँच हो चूकी है। इस देश में मीडिया मे बैठा एक वर्ग घूस गया जो कहीं न कहीं अनपढ है लेकिन चालाक भी बहुत है क्योकि वह अविवेक को ही विवेक के रूप में सफलता पूर्वक भूनाने में और उससे लाभ लेने मे सफल हो गया है। मैं मीडिया के सभी बन्धूओ को दोषी नही ठहरा रहा हूँ लेकिन यह एक सच है कि मीडिया में गलत को वैधता प्रदान किया जा रहा है और उसका प्रमोशन किया जा रहा है। जहां वेदान्त जैसा गम्भीर दर्शन हो वहाँ अन्धविश्वास धर्म नहीं बन सकता। यदि मैं धर्म पर लिखता हूँ तो कहीं न कहीं इसकी गहनता को समझता हूँ ।मीडिया क्यों ठग और साधु मे फर्क नहीं कर पाती? क्या मीडिया बन्धुओं को भारत की आध्यात्मिक परम्परा का थोडा भी ज्ञान नही है? अभी मैने एक पोस्ट लिखा था एक ठग अन्धविश्वास प्रचारक निर्मल बाबा के बारे में। और अब मैने देखा कि मीडिया ब्रह्मकुमारी रण्डियो का प्रचार कर रही है। क्षमा करना बन्धुओ ऐसे शब्द का प्रयोग करना पडता है और आजकल मै जान बुझ कर कर रहा हूँ, रूद्र भी तो हममे ही बसते है न। जब ऐसा धूर्तो का धर्म परवान चढने लगता है तो रूद्रबोल ही धर्म की रक्षा करता है-सनातन धर्म मे कहा गया है रूद्र और विष्णु दोनो बारी बारी से आते है। विष्णु का समय खत्म शिव का समय शुरू समझो। तो मान लो कि मुझमे रूद्र की रूह बोल रही है इसलिये इसे धर्म ही मानना। हम लोग ठग और धर्म प्रचारक में अन्तर करना जानते है और उनको नंगा करना भी। एक बात जो ध्यान में रखना चाहिये वह यह कि जिसमे सद्विवेक नही है, जिसमे शास्त्रज्ञान नही, जिनमे थोडा भी तप,  और वैराग्य नही उन्हें सनातन धर्म के महान ग्रन्थ किसी स्थिति मे धर्म प्रचार के योग्य नहीं मानते। यदि आपको सही गुरू नही मिलता तो शास्त्र की सन्निधि भी आपको परम शान्ति प्रदान कर सकती है- । शास्त्र की संगति जिसको हुई है वह अधर्म नहीं कर सकता मेरा यह मानना है। जिन दुष्टो पर मैं कभी कभी लिख देता हूं वे पूरी तरह उपरोक्त गुणो से रिक्त होते हैं।

अब सुनो कथा इन ब्रह्मकुमारी रण्डियो का क्योकि इन रण्डो और रण्डियों को धर्म का ज्ञान नही हो सकता वेष्यावृत्ति से वे लबा लब होते हैं और यही उनका धर्म होता है। हमें यह धर्म करना चाहिये इन बिचेज को जहां दिखे वहीं  इस तरह धर्म का मार्ग प्रशस्त करना चाहिये शास्त्रानुसार पुनरूक्ति दोष भी नही होगा।

ब्रह्मकुमारी शिवानी जिसका ब्रह्मकुमारी के विज्ञापनो में चेहरा दिखता है कल संस्कार चैनल पर अपनी वेष्यावृत्ति का दर्शन बता रही थी। इसकी एक बानगी यहां प्रस्तुत है—

वह बहुत मद्धम मधुर आवाज में शिक्षा दे रही थी कि सतयुग में कोई धर्म नही था सारे धर्म त्रेता मे आये। इस बिच को भारत के आध्यात्मिक समय दर्शन का कोई  ज्ञान नही है। भारत का आध्यात्मिक समय दर्शन कहता है कि सतयुग में धर्म अपने चार पांवो के साथ विराजमान था अर्थात सत्य, तप, पवित्रता और दया जिसका आधार वैराग्य कहा जाता है। इससे भी पहले कौमार सर्ग था जिसमे सनक सनन्दन सनातन सनत्कुमार जैसे जन्म से वैरागी सिद्ध रहते थे जिनके ज्ञान कण का विस्तार तमाम लिखित सनातन धर्म की शाखाओ मे हुआ है। कुमार सर्ग से भी पहले सप्तऋषियों का ब्र्हम समय था। दूसरी बात इस बिच को यह ज्ञात नहीं कि बगैर धर्म के किसी कर्म का प्रारम्भ नहीं हो सकता यह बात सनातन धर्म के मूल में है तथा अनेको श्रुति सम्मत है । इसलिये कर्म के साथ जो समय शुरू हुआ उसके साथ धर्म भी शुरू हुआ। हम इसकी पुष्टि के लिये दुनिया भर का शास्त्र का उद्धरण कर सकते है  लेकिन इनके लिये इतना ही काफी है। वैसे बाबा तुलसी दास के रामचरित मानस मे यह लिखा है। वे कहते हैं–
“ ध्यानु प्रथम युग जगु मय बिधि दूजे  द्वापर परितोषित प्रभू पूजे ।
कलि केवल मल मूल मलीना पाप पयोनिधि जन मन मीना।

अर्थात सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता मे यज्ञ से और द्वापर मे ईश्वर पूजन से मुक्ति प्राप्त होती है। परन्तु कलियुग में पाप बहुत है इसे मनुष्यो का मन इस पाप के समुन्दर मे मछली की तरह बना हुआ है। पाप उसे पाप नही लगता बल्कि उसे वह धर्म के रूप मे प्रचारित करता है तथा उससे लाभ लेता है। इससे इस युग मे बाबा आगे की चौपाई मे कहतें हैं “नाम कामतरू काल कराला” मतलब कि नाम कीर्तन करने से ईश्वरलाभ होता है।

यह ब्रह्मकुमारी अब आगे कथा में कहती है कि धर्म त्रेता से शुरू हुआ जिसमे सबसे पहले ३३ करोड देवता उपर से धरती पर उतरे और पहले वे केवल भारत तक सिमटे थे अब वे दुनिया भर मे फैल गये हैं। यही वजह है कि जब भारतीय विदेश जाते हैं तो वापस नहीं आते क्योकि ये ३३ करोड देवता वहां भी हैं वे आने नहीं देते कहते हैं जाकर क्या करोंगे भारत जब सारी भारत की आत्माये यहीं मस्ती कर रही हैं।  लो जी यह तो कमाल की रण्डि है। अब आगे कहती है कि ३३ करोड आत्माये सिर्फ वहां बस ही नहीं गई हैं बल्कि वे ७०० करोड आत्माओ मे तितरबितर हो गई हैं। लेकिन दुख की बात है ये दैवी आत्माये इस समय कोई २०% कोई ३०% तो कोई ४० प्रतिशत पोटेन्शियल पर है। अब उन्हे १०० प्रतिशत पर पहूँचना है जिससे सतयुग आये इसलिये भगवान आने वाले है जो इस ब्रह्मकुमारी की चुत से सीधे निकल कर जगत का कल्याण करेंगे।  तो यह रहा इस मूढ़ का प्रवचन अंश । कह रही थी इसके आश्रमो की १८०० साखायें हो गई है। बाजार ने इसको अधर्म को फैलाने के लिये इतना धन दिया है कि यह लबालब है मुझे शक है कही इसने वेष्यावृत्ति का धन्धा तो नही खोल रखा है? कही ऐसा तो नही कि यह गरीब महिलाओ को लालच देकर धर्म की आड मे वेष्यावृत्ति करने के लिये प्रेरित करती हो? सत्यधर्मी राष्ट्रवादी कोई मीडिया वाले जांच करो भाई!  व्यापारी और बुर्जुआ वर्ग चुन चुन कर ऐसे अधर्मीयों को प्रमोट कर रहा है जिससे लूट और वेष्यावृति का साम्राज्य स्थापित किया जा सके। यदि भगवा भाजपाई –संघवाले इस धर्म के संरक्षक हैं तथा इसका प्रचार करते है तो उसका सीधा तात्पर्य है कि वे हिन्दू धर्म के दुश्मन है। वे ऐसा समाज बनाना चाहते है जहां ऐसी रण्डियो की वेष्यावृत्ति का धर्म हो तथा एक नया आशविज बनाया जा सके क्योकि आशविज जर्मनी में तभी बना जब धर्म खत्म हो गया और अविवेक तथा अंधविश्वास ने धर्म का स्थान ले लिया।  मेरी न केवल मीडियासे बल्कि इस व्यापारी वर्ग से भी गुजारिश है कि भाईयों धन कमाओ, दोहन करो लेकिन इस तरह जनता को नष्टप्रणष्ट मत करो। इस भारत माता पर तरस खाओ इसको इस तरह खराब मत करो। इस बेचारी देश की गरीब जनता के पास सिवाय ईश्वर मे विश्वास तथा आध्यात्म के है क्या! कमसे कम यह आध्यात्मिक जीवन तो उन्हे ठीक ठीक जीने का अधिकार है। मै आश्चर्यचकित हूँ कि मिडिया मे ऐसा नही है कि बुद्धिजीवी वर्ग नही है जिसे धर्म का थोडा बहुत ज्ञान न हो लेकिन क्या वजह है कि वे इसका प्रमोशन करते है?

आजकल कोई होश में अपने रहता नहीं
हर इक चुप है, कोई कुछ कहता नही-मीर

क्यों उन्हे ठग तथा धोखेबाज दिखाई नहीं पडते’? क्या वे भी रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल बद्ध हैं ? बुद्धिजीवी वर्ग यदि इस तरह खामोश रहा तो इस देश में नर्क का साम्राज्य करीब ही समझो। वैसे ही मीडिया वर्ग ने ऐसा राजनैतिक कन्फ्यूजन पैदा किया है कि एक बार फिर से दास चेतना सम्पन्न भारतीय जनता सामन्तवादी प्रवृत्तियों तथा पार्टियों को न्योता दे बैठी हैं। इसमें पूंजीवाद कभी पनप भी नहीं सकता क्योकि पूंजीवाद का दर्शन यह नहीं है वह कमसे कम प्रगतिशील है। मीडिया पूँजीवाद नही बल्कि एक नग्न सामन्तवादी लूट के लिये रास्ता बना चूका है। ऐतिहासिकतः हम जानते है पूँजीवाद कमसे कम इतना सम्वेदनहीन तो नहीं रहा है। भारतीय बुर्जुआ समाज यदि इस तरह पगलाया तो उसका भी कब खात्मा हो जायेगा कहा नही जा सकता। लूटेरे तथा शक्तिसामन्त तो बस देख रहे है मौका ।

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