Posted by: Rajesh Shukla | March 11, 2012

अकालीयों का तख्त चिन्तन के बहाने दमन तंत्र पर दो शब्द



भारतीय  बिना किसी अपवाद के किसी गम्भीर पतनशीलता का शिकार है।

बेअन्त सिंह के हत्यारे बलवन्त सिंह राजोआणा को ३१ मार्च को फासी के आदेश के साथ अकालियों की राजनीति भी स्पष्ट हो गई है। अकाली अब भाजपा को झटकने ही वाले हैं उन्हे भाजपा की जरूरत नहीं। प्रकाश सिंह बादल देश का सम्विधान को भूल. गये हैं तथा अकालीयो की कट्टरवादी नीति पर चलने लगे हैं। प्रकाश सिंह बादल स्वयं एक आतंकवादी की फांसी की सजा माफ करने की फरियाद लेकर राष्ट्रपति के पास चल कर जाने वाले हैं। सम्विधान का क्या हुआ जिसमे लिखा है कि राज्य का कोई धर्म नहीं है सिवाय सेक्यूलर राज धर्म का निर्वहन के। किसी भी समय जब सिस्टम में धर्म, जाति,कौम की की भावनाओ से नियन्त्रित होकर नेता और अधिकारी अपना सम्वैधानिक राजकीय धर्म निभाने से ईन्कार कर दे जैसा कि बलवन्त सिंह राजोआणा को फांसी देने के मामले में डी जी पी जेल शशिकान्त ने किया है तो समझना चाहिये की जनतांत्रिक सिस्ट्म कमोवेश खत्म होने की कागार पर है। कल मुसलमान गदर कर दे, कल हिन्दु गदर कर दे, कल हरिजन गदर कर दें तो क्या होगा? हिन्दू आतंकवादी और मुस्लिम आतंकवादी, कल पंजाबी आतंकवादी की तरह इसके लिये धार्मिक आंदोलन कर सकते है –ऐसे में तो कानून ही खत्म हो जायेगा। कोई भी क्रिमिनल धार्मिक भावनाओ के परम कानून से बरी हो जायेगा। क्या हमें बल पूर्वक धार्मिकता को राजनीति तथा शासन से दूर करने की जरूरत नही है, मिलजुलकर इन पुजारियो को एक बार फिर जंगल में भेजने की जरूरत है।  क्या पंजाब में पंजाबीयत, पंजाब का गर्व, पंजाबी कौम के भावनात्मक प्रवाह में सब कुछ बह जाने वाला है। भारत की जनता भी दमन चाहती है, यह दमन मे रहने की आदी हो चुकी है इसलिये वह उसे भूल नहीं पाती। सामंतवादी शक्तियो का उदय इस दासत्व और दमन की मांग से उपजा है इसके पीछे पुनः सिर्फ और सिर्फ यही तर्क है कि देश की जनता को जो दमन चाहिये वह जनतांत्रिक लिबरल सिस्टम नही दे पा रहा है। कहीं न कही भारतीय जनता दमन तथा दासत्व को सहते सहते स्व-पीडक(masochistic) होती गई है और स्व-पीडा का सुख फिर से पाना चाहती है। कछुआ प्रवृत्ति वाले साधुओं ने आध्यात्म तो सिखाया नही, जो सिखाया वह है-आत्म-पीडा मे रति प्राप्त करना। धर्म की यही अन्तिम सीमा है।
इस बात को विल्हेम रिख ने बहुत अच्छे ठंग से सामने रखा है जिसे जनता को समझने की जरूरत है। विल्हम रिख ने जब जर्मन फासिज्म पर अपना अध्ययन शुरू किया तो उसे यह अनुमान नही था हलांकि वह इस बात का साक्षात्कार कर चुका था कि इस पतन का कारण कहीं न कहीं ईसाई धर्म है। उसके अध्ययन का अन्तिम निष्कर्ष चौकाने वाला है तथा इसे भारत की जनता को समझने की जरूरत है जिसके भीतर दास चेतना इतने गहरे पैठी है कि वह स्वयं को अपने स्व विवेक से निकाल पाने मे कमोवेश असफल पाता है।
विल्हेम रिख ने लिखा “कि ऐसा क्यों है कि व्यक्ति अपनी दासता के लिये इतना उद्धत होकर लड बैठता है मानो वह उसकी मुक्ति हो? कैसे जनता उस सीमा तक पहूँच जाती है कि चिल्ला उठती है ‘और टैक्स, कमतर रोटी’! वह आगे कहता है कि  आश्चर्य की बात यह नहीं है कि कुछ लोग चुराते है या दूसरे कभी कभार स्ट्राईक पर चले जाते है बल्कि यह है कि वे सभी जो दो वक्त की रोटी के लिये मर रहे है उनके लिये चोरी सतत अभियान नही है, और वे सभी जो शोषित हैं हमेशा स्ट्राईक पर नहीं जाते: शताब्दियों के शोषण और दमन के बाद भी यह क्यों कर है कि जनता अभी भी दमन और अपमान को मौन होकर सहन करती है, उस सीमातक की वास्तव में वे दूसरो के लिये अपमान और दमन की मांग न कर अपने दमन की मांग करने लगते हैं? क्या यह सिर्फ अज्ञानता है? जनता दमन और फासिज्म की मांग क्यों करने लगती है? वह कहता है कि जनता मूर्ख नहीं है –विशेष परिस्थितियों में वह दमन और फासिज्म मांग करती है। यह जनता का परवर्जन है जिसे समझने की तथा सम्बोधित करने की जरूरत है। मानव बिना किसी अपवाद के एक गम्भीर पतनशीलता का शिकार है।
इस स्व-पीडक(masochistic) मन के आध्यात्म को समझने की जरूरत है। धर्म इससे परे की बात नहीं है और यह हमें तुलसीदास से बेहतर कहीं और नहीं मिल सकता। तुलसीदास का विनय दर्शन अपने स्वरूप मे स्व-पीडा से उपजा आध्यात्म है। मेरा यह मानना है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल होती तो शायद तुलसी दास राम कथा न लिख कर कुछ और लिखता। व्यक्ति के पैशन की दो अतियां हो सकती है-या तो वह जीवन की तरफ जायेगा या मृत्यू की तरफ। पुजारियों के सामाजिक बुनावट में  तुलसीदास के पास शायद सहज था नकारात्मक मार्ग –कुछुये का रास्ता। पुजारीयो का मार्ग कच्छप मार्ग है, हाथ पैर सिकोड कर कछुआ बन जाना तथा गुहा को दुनिया की तरफ मोड देना जिससे कि उसमे निकलने वाले पवित्र गुह-रस से जनता अपना कल्याण कर सके। तुलसीदास की दरिद्रता जग जाहिर है उसने अपनी कवितावली मे लिखा था–
जीव जहान मे जायो जहाँ सो तहाँ तुलसी तिहुँ दाह दहो है।
दोस न काहू, कियो अपनो, सपनेहू नहीं सुख लेस लहौ है।।
राम के नाम तें होउ सो होउ, न सोऊ हिये, रसना ही कहौ है।
कियो न कछू करिबो न कछू कहिबो न कछू मरिबोई रह्यो है। –कवितावली
यह रूदन है। यह पीडा महसूस करने की बात है—जबसे जन्मा हूं तबसे सपने में भी सुख नहीं देखा। मैं किसी को दोष नहीं दूंगा(वही सनातन हिन्दू दास चेतना कि सब करम का फल है) फिर वह कहता है कि आज तक कुछ नहीं किया, आज तक कुछ नही कहा , लग रहा है ऐसे ही मर जाऊंगा। एक अन्य कविता में तो विनय का यह दूत विनय की सीमा तोड डालता है और उनपर हाय! हाय ! करता है तथा आक्षेप लगाता है कि सुनो तुम देवता अपनी नपुंसकता के बारे मे–
कहौ हनुमान सौं सुजान रामराय सों।
कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये।
हरष-विषाद-राग रोग-गुन-दोष-मई
विरची विरंचि सब देखियतु दुनिये।
मायाजीव काल के करम के सुभाय के
करैया राम, वेद कहैं, सांची मन गुनिये।
तुमते कहा न होय, हा हा। सो बुझैये मोहिं
होहूँ रहौं मौन ही, बयो सो जानि लुनिये।।
जो धरम की जो घुट्टी जनम लेते ही पी ली गई है वह हर जगह बोल रही है। अन्तिम बात है कि मेरा दुख इसलिये नही है कि सामाजिक संरच्रना मे जगह नही खोज पाया है, काम नही मिल पाया या इस लिये नही है कि राजा तथा सामन्त बगैर कुछ किये सारे धन के मालिक बन गये हैं बल्कि इसलिये कि यह करम का फल है। हनुमान आदि देवताओ की नपुंसकता देख लेने के बाद ही रामायण की कथा शुरू होती है–वही पुजारीयो का मार्ग चुनना मजबूरी हो जाता है। रामायण स्व-पीडा से उपजा ग्रन्थ है जो पुनः एक बार एक ऐसे राजा की मांग करता है जो ब्राह्मण को, ऐसे कवि आत्माओ का, रचनात्मकता तथा धर्म का संरक्षक हो। निश्चय ही शायद इसके बाद तुलसी दास को खाने चबाने का मिल गया होगा। और पुजारियों की सभा मे प्रतिष्ठा भी।
यह मूल भारतीय धार्मिक प्रवृत्ति है तथा इसका असली दर्शन नैतिक दर्शन है जो अपने स्वरूप में एक पाशविकीकरण है। धर्म के पुजारियों को इस बात का सबसे अच्छा ज्ञान रहा है कि व्यक्ति की ईच्छा का दमन और नियन्त्रण कैसे किया जाय, हर वासनात्मक हिचकी पर एक भक्ति का ग्रन्थ लिखा गया है। हर हिचकी से एक नये धार्मिक सिम्बल का जन्म हुआ है-यह तंत्र, यह मंत्र , यह पुराण सब हिचकी का परिणाम है। पहली हिचकी ॰पाशविक थी॰ फ्रायड ने कहा लेकिन ऐसा नहीं है कि पहली ही थी जितनी हिचकियां थी सब पाशविक थी। एक महान मुनि था जिसका नाम है कश्यप ॠषि वह तो अपने को कछुआ का वंशज मानता था तथा खुद को भी कछुआ ही कहता था- कच्छप से उसका नाम कश्यप हुआ। सारे धर्म कछुआ का धर्म है जिससे एक बडी खतरनाक प्रवृत्ति का जन्म होता है –आत्मसंरक्षण (सेल्फ प्रिजर्वेशन) ॥ यह एक नयी आत्मा को जन्म देता है, एक नया विषयी सामने आता है जो अमानवीयता को धर्म के रूप मे अंगीकार करता है। यदि यह मध्यवर्गीय मनुष्य है और वह थोडा भी सफल हो गया है तो वह स्वयं को दूर और दूर करता जाता तथा खुद को दर्शक के रूप मे बदल लेता है जो वस्तुओं और परिस्थितियों से ऊपर है। वस्तुओं और परिस्थितियों से ऊपर रख सकने की योग्यता अर्जित की जाती है-बुर्जुआ से। बुर्जुआ के लिये यही अन्त में संक्षिप्ततः वास्तविक अर्थों में मानवीय है- जिसकी रक्षा में इसके विचारक, चिन्तक, पत्रकार दलील पर दलील देते रहते हैं। ऐसा चिन्तको का मत है कि यदि यह आत्मसंरक्षण (सेल्फ प्रिजर्वेशन) की चेतना न होती तो शायद मानवता आशविज का नाजी कैम्प की त्रासदी से बच जाती।

चलिये हम इस बात को थोडा आगे बढाने की कोशिस करते हैं इस प्रश्न के साथ- ऐसा क्यों है कि व्यक्ति अपनी दासता की संस्कृति के लिये इतना उद्धत होकर लड बैठता है, आत्मसंरक्षणवादी बन जाता है मानो इसके मिटने से उसका आस्तित्व मिट जायेगा? सवाल संस्कृति का है, वह प्राचीन पुजारियों की संस्कृति जिसमें हम पैदा होते है॒! लेकिन उससे हमारे सम्बन्ध क्या है ? हम रामायण या पुराण काल मे तो नहीं जीते फिर हम स्वयं को उससे एकीकृत कैसे कर लेते उस स्तर तक कि हम उसकी आलोचना करने वाले के खून के प्यासे हो जाते हैं? इस सास्कृतिक दासता का आधार क्या है? हमें इस प्रश्न को समझने की जरूरत है। पश्चिम में तो जब आधुनिकता का जन्म हुआ था तब इसी मनुष्य नें इस अतीत के भूत को दूर भगा दिया था। वे राजराजेश्वर, वह पुजारी, वह पोप न जाने कहा उस सांस्कृतिक प्रवाह में बह गये थे। राजराजेश्वर, पुजारी, और पोप का फिर से लौटना कैसे सम्भव हुआ? कुछ चिन्तक कहते हैं कि आधुनिकता की यही सबसे बडी असफलता है। या यह कि आधुनिक नेताओ तथा पूँजिपतियों ने राजराजेश्वर की वापसी चाही, यह उनका डिजायर है कि पुनः सामन्तवादीतंत्र का रस लिया जाय, जनता के खून का रस पुनः लिया जाय। इसके लिये पुजारी, और पोप का लौटना अनिवार्य था। मेरा यह मानना है कि राजराजेश्वर या सामन्तवाद या अकाल तख्त बगैर पुजारी के सम्भव नही, इस तंत्र पर विशेष रूप से उनका आधिपत्य रहा है और उनके जादू टोने की विचारधारा से ही यह तंत्र चलता रहा है। पुजारी की विचारधारा के होने पर अन्य विचारधारा की जरूरत तानाशाह या नेता को नही होती, उनका लौटना पुनः उस पुजारी के दमन तंत्र की वापसी है। यह एक बार पुनः मनुष्य की आशाओ की निर्मम हत्या है। देश में एक बहुत खतरनाक प्रवृत्ति का जन्म हो रहा है जिसे एक होकर खत्म करने की जरूरत है। मुझे लगता है यह प्रवृत्ति तबसे और भी बढने लगी है जबसे अमेरीकी मिडिया इस देश में क्रियाशील हुआ है। अमेरीकी फासिज्म की प्रवृत्ति को इस मिडिया द्वारा हवा दी जा रही है। हमे इसको रोकना होगा या फिर दमन के लिये तैय्यार रहना होगा।

इस पोस्ट को मै दूसरे पोस्ट में पूरा करूंगा क्योंकि जो प्रश्न पूछा था उसकी जाँच पडताल अभी होनी है—ज्यादा न सही थोडा ही।

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