Posted by: Rajesh Shukla | February 29, 2012

धार्मिक मदारियों की लूट


धर्म का इस समय यदि किसी ने अधिग्रहण किया है तो वह है व्यापारी वर्ग। व्यापारी वर्ग रोज नये बाबा पैदा कर रहा है, रोज नये भगवान पैदा हो रहे है, रोज कोई न कोई रहस्यवादी देश की गरीब जनता के  ताराणहार पैदा किये जा रहे हैं। ये सारे अधर्मी  मिलजुल कर सिर्फ एक ही काम कर रहे हैं- गन्द फैलाना। हिन्दू धर्म के बजबजाने की एक सबसे बडी वजह ये ठग अधर्मी हैं। जितने बाबा अवतारी बनाकर प्रस्तुत किये जा रहें है वे कुछ ही दिनो बाद किसी का रेप करते नजर आते है, तो किसी के कालेधन की हेराफेरी करते हुये पकडे जाते हैं। यह महत्वपूर्ण है जान लेना कि ज्यादातर बाबा विदेशियों के ऐजेण्ट के बतौर काम कर रहे हैं और उनके आश्रम तथा मठ म विदेशियों का सबसे ज्यादा निवेश है। लेकिन मजेदार बात यह है कि इन विदेशियों को न तो धर्म की समझ है न ही धार्मिकता की समझ इसलिये वे मदारियों को ऐजेन्ट बनाते हैं। इनकी तुलना हम सिर्फ एक मदारी से कर सकते हैं। आपको पता है कि मदारी दो प्रकार के होते है- पहले प्रकार का मदारी बेचारा रोजी रोटी के लिये अपना तमाशा दिखाता है, आपसे चवन्नी अठन्नी मांगता है और अपने रास्ते चला जाता है-वह आपका कोई नुकसान नहीं करता। दूसरा मदारी जादूगर होता है, वह गैंग के साथ आता है, अपना तामझाम फैलाता है और आपको लूट कर गायब हो जाता है। इन लूटेरे मदारियों के साथ तामझाम के लिये उसकी पूरी गैंग होती है। गैंग के चेले भीडं में बैठे रहते हैं जब मदारी जादूगरी के सवाल पूछता है तो वे रहस्यमय ठंग से उत्तर देते हैं। जनता सोच में पडं जाती है कि यह कैसे हो गया! या जब वह जादू मारता है तो खून की उलटी करते हुये उसका चेला ही भीडं के बीच में गिरकर छटपटाने लगता है।
कुछ इसी तरह के धार्मिक मदारी आजकल टीवी पर भी छाये हुये हैं बल्कि कुछ को तो न्यूज चैनलों ने भी स्पोन्सर कर रखा है। एक धार्मिक मदारी बाबा का सुनिये इसका  नाम है निर्मल बाबा  यह जनता के दुख दूर करने के लिये क्या क्या मदारी करता है। भीडं में इसके चेले बैठे रहते हैं और उठकर महिमा गाने लगते है जैसे मदारियों के चेले, या दुख वाले विचित्र प्रश्न पूछने लगते है, जैसे एक दिन उसकी एक चेली पूछ रही थी “बाबा! बहुत कोशिस की लेकिन कुछ काम नही होता, कही से धन नही आता। क्या करूँ मैं बहुत परेशान हूं?” तो बाबा का रहस्यवादी उत्तर आया “ कभी कोल्हापुर मन्दिर गई!” नही! “ तो धन कहाँ से आयेगा? वहां जा पहले पुजारियों से चुद के आ फिर धन आगमन होगा”॥  कहने का  मतलब है कि मन्दिर जाकर जो कुछ बचा खुचा है वह भी पुजारी को लुटा आओं फिर पूरी तरह खाली होकर समाज में चुदो॥
सामने सज कर ऐसे आता है जैसे कोई सन्त नही बल्कि कोई बहुत बडा भोगी इन्द्र हो। लोगो के दुखो का ईलाज करता है लेकिन बहुत बडा पेटू दिखता है।
आज की बात है IBN7 पर था — एक नौकरी विहीन पुत्र के पिता ने उठ कर समाधान पूछा —

पिता –बाबा बहुत नौकरी खोजी लेकिन  नहीं मिली ..क्या करें ?
बाबा- कभी मुंबई गणेश मन्दिर गये? पहले जा कर वह चुदो ? फिर मेरे पास चुदना ..ये बताओ घर में किस की पूजा करते हो?

पिता– लक्ष्मी, गणेश, शिव, राम, हनुमान, भैरव सब हैं काली भी हैं !

बाबा- काली को घर से बहार करो कृपा  आने लगेगी !:-)

एक दूसरा मदारी बाबा को एक दिन टीवी पर मदारी करते देखकर मुझे बहुत हंसी आई। उसका नाम है साधू कैलाश मानव  यह बाबा ईश्वरीय अनुग्रह करता है। यह बाबा  मन्त्र चमत्कारी है लेकिन बीच बीच में बोलते बोलते उसके गुर्गे आ जाते हैं स्टेज पर और कहने लगते हैं कि बाबा ने जो मंत्र दिया था उससे पेट ठीक हो गया कि उससे कैंसर  ठीक हो गया। फिर उसके व्यापार के संयोजक स्टेज पर आते है और जिस तरह गांवो में रण्डियाँ कहती है वैसे ही कहते हैं “ पाटन से सोधू जयसवाल जी नें ११००० की भेंट भेजी है”  इस घोषणा के साथ ही “जिन बाबू ने दिया रूपैया उनके दो लिये दो ठुमके” कुछ ऐसा ही ठुमको वाला म्यूजिक बैक ग्राऊड मे चलता है। फिर दूसरी घोषणा….मतलब कि बहुत पैसा लोग भेजते हैं क्योकि बाबा का आशिर्वाद उन पर है।आपको भी भेजना चाहिये—नाम की घोषणा की जायेगी इसकी एक दम चिन्ता न करें।  एक   दूसरा बाबा अमेरिकी फंडेड है वह भी मंत्र चमत्कार करता है हलाकि उसको ठीक से उच्चारण नही आता | उसका नाम  याद  नहीं आ रहा है अभी –यह बाबा अण्ड का बण्ड धर्म बोलते बोलते सधे हुये ठगो जैसा आंख मूदे हुये समाधि में ही दुखी जनता को प्रेरित करता है कि जितना दोगे उतना पाओगे। जिनको अनुग्रह चाहिये उसे तत्काल सामने रखी पेटी में कुछ डालना ही देना चाहिये। प्योर मदारियों वाला पेशा कर रहें सब और आर्गेनाईज्ड होकर यह सब किया जा रहा है। बेचारी जनता  ही हर तरफ से चुद रही है। आश्चर्य है कि ये मदारी आजकल IBN7 तथा अन्यो  द्वारा भी प्रमोट किये जाने लगे हैं। भारतीय धर्म का सबसे बडा चरित्र त्याग रहा है, सन्यास रहा है। कहा गया है कि “तेन त्यक्तेन भून्जिथा अर्थात् परमभोग, अमृत्त्व तथा स्वराटता उसे ही मिलता है जिसने ठीक ठीक त्याग किया है”। त्याग को धर्म का एक पांव माना गया है, इसके बगैर इसकी कल्पना नही की जा सकती। जो धर्म के तत्व हैं वह गौरतलब हैं –सत्य, दया, क्षमा, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, तितिक्षा, उपरति, स्मृति, वैराग्य, तेज, वीर्य, शास्त्रविचार इत्यादि ये सब तत्व इन मदारी बाबाओं में शायद ही दिखते हैं। मुझे तो टीवी पर शायद ही कोई बाबा शास्त्र की गम्भीरता से परिचित नजर आता है। शास्त्रविचार, मनन, तथा निदिध्यासन ही जब नहीं है तो आत्मा का मनन कैसे होगा? “आत्मा वा अरे मन्तव्यः” ये आत्मा का मनन नहीं करते, भोग का मनन तथा भोग रमण करते है तथा इन चोरो नें हिन्दू धर्म को वेष्यावत्ति में तब्दिल कर रखा है। आध्यात्मिक तप की कल्पना बगैर सन्यास के नही की जा सकती यहां तक कि भक्ति दर्शन में भी भक्तिरूपी तप को सन्यास या त्याग ही माना गया है। नारद का स्पष्ट कहना है ‘ सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्’ अर्थात भक्ति निरोधरूपी या वैराग्य रूपी है। दैवी भक्ति द्वारा कामनाओं का निरोध होता है जिसके कारण योगी स्वयमेव पूर्ण वैराग्य ग्रहण करता। इसका साफ साफ अर्थ यह भी है कि वैराग्य भी तब तक नही होगा जब तक भक्ति का ठीक ठीक उद्रेक नहीं होगा। दूसरी बात जो इस वैरग्य से निकलती है वह है यह कि यह सन्यास कोई आटू झाटू सन्यास नहीं है बल्कि यह सन्यास ऐसा है जिसे संहार रूप कहा गया है– “निरोधस्तु लोकवेदव्यापार न्यासः”– यह ऐसा न्यास है जिसको करते ही वैरागी के लिये सृष्टि संहार हो जाता है। यह सम्प्रभूता की तरफ कदम है जिसमे हर तरह के लौकिक वैदिक , सेक्यूलर नान सेक्यूलर लोकव्यापार का पूर्ण निरोध हो जाता है। शायद इसलिये कि बगैर इसके पूर्ण एकत्व या अद्वैत की उपलब्धि सम्भव नहीं। एकत्व का मतलब होता है कि आपका दूसरा कोई आधार नही है सिवाय परमात्मा के इसलिये भक्ति प्रवर्तक आचार्य का कहना हैकि जब तक आप लोकव्यापार के आश्रित है तब तक ईश्वर के साथ एकत्व सम्भव नहीं है! इन्ही भक्तों और आचार्यों के लिये कहा गया था ‘विद्वान पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति”।  इन टीवी पर प्रचारित मदारियों के बावत कह सकते हैं कि जिस तरह ‘वेष्यावृत्तिः नियमविरहितः” होती है उसी तरह इन मदारियों का मदारीधर्म हर तरह से धर्न वीहीन तथा तत्ववीहीन है। । इन पंक्तियों को इस तरह गरियाते हुये लिखने का कारण यह है कि भारतीय बुर्जुआ ईधर बीच बउरा गया है, उसे वास्तव में समझ नही आ रहा है कि वह क्या करे? लेनिन के सामने जब यह प्रश्न खडा हुआ तो वे पोलिटिकल डिस्कोर्स ने घुस गये और कामरेडो के लिये लिखा “क्यां करें?”—भारतीय बुर्जुआ के सामने भी भ्रष्टाचार के महालूट के बाद आज यह प्रश्न है लेकिन इसका उत्तर नही ढूढा गया है। इसका उत्तर सिर्फ दूसरे लूट के लिये रास्ता तैय्यार करना है और एक मध्य वर्ग है जो इस लूट का बहुत बडा भागीदार है। बुर्जुआ बोलता है àलूटरों का गैंग तैय्यार करो। यह मध्य वर्ग फौरन काम पर लग जाता है। धार्मिक लूटेरों का भी गैंग तैय्यार किया गया है, लूट आर्गेनाईज्ड रूप में किया जा रहा है। एक तरफ भ्रष्टाचार से लडने का ठोंग किया जाता है तो दूसरी तरफ भ्रष्टता, झूठ, हिपोक्रिसी, ठगी, अन्धविश्वास का प्रमोशन किया जाता है। कितने लम्बे वक्त तक यह बुर्जुआ इस तरह समाज को झूठ, हिपोक्रिसी, और ठगी पर आधारित करेगा! कितने लम्बे समय तक यह एक लूट से दूसरे लूट तक का सफर तय करता रहेगा। क्या भारत का विकास लूट की गति से तय होगा? यदि ईश्वरीय सन्देशो पर ही समाजिक कार्यकलापों, उसकी गति को स्थापित करना है तो उसे ठीक से स्थापित करना चाहिये न की मदारियों के धार्मिक ठगी तथा रिफिकेशन से। जनता को इस तरह से मत लूटो भाईयों ……धन तो लूट ही रहे हो  थोडी दया करो ! उनका आध्यात्मिक धन तो मत लूटो भाई! प्लीज!

लाचार ग्रामिण युवक – बाबा बहुत गरीब हूँ । बहुत धन ठूँठा कुछ भी हाथ नहीं लगा कृपा करें।
निर्मल बाबा- कभी सिरिडी गया है!
लाचार ग्रामिण युवक – नहीं लेकिन सोच रहा था। बडा प्रचार सुना है।
निर्मल बाबा – जाओ होकर आओ कृपा आने लगेगी।
लाचार ग्रामिण युवक – पीछे पीछे आयेगी या साथ ही साथ।
निर्मल बाबा- पीछे से आयेगी।
लाचार ग्रामिण युवक – बाबा ! यदि कही बीच मे कृपा का एक्सिडेन्ट हो गया तो मै तो गरीब ही रह जाऊंगा?
निर्मल बाबा – कृपा का एक्सीडेन्ट नही होता।
लाचार ग्रामिण युवक – लेकिब बाबा जो चीज शुरू होती वह खत्म होती है, जो चलती है वह रूकती है। हर चीज परिवर्तनशील है आमरणधर्मा है। कृपा भी तो सिरीडि से चलेगी क्योकि आपमे से तो चलेगी नही, आपसे चलनी होती तो आप सिरिडि क्यो भेंजते।
निर्मल बाबा – महात्माओ की कृपा अनोखा आश्चर्य है।
लाचार ग्रामिण युवक – बाबा! आश्चर्य कर दो सोने का सिक्का ही कृपा करके गिरा दो। शंकराचार्य जी ने तो गरीब बुढिया के घर तुरन्त कृपा की और आवले की बारिश कर दी थी। मै तो दो दिन से खाया भी नही हूँ ,जाने दो धन की कृपा, एक छोटी कृपा करो मेरी भूख ही मिटा दो।
निर्मल बाबा – घर जाओ भूख पीछे से आयेगी।
लाचार ग्रामिण युवक –बाबा पीछे से क्यों आयेगी तुरन्त क्यों नही आयेगी। कोई प्यास से मर रहा होगा और कृपा मांगेंगा तो कहोगे पहले मर, पानी पीछे से आयेगी!
निर्मल बाबा – तुरन्त वाली कृपा झूठी बात है।
युवक –सिरीडी वाले की कहानी मे तो तुरन्त कृपा की बहुत कहानी है फिर झूठी कैसे?
निर्मल बाबा – कौन सी किताब मे पढी तूने।
लाचार ग्रामिण युवक – सिरिडी मन्दिर से जो किताब छपती है।
निर्मल बाबा- किसी पुजारी ने लिखी होगी। बाबा की महिमा तो बाबा जानते थे। तू आंख मूद कर मेरी बात पर विश्वास कर। कृपा आयेगी।
लाचार ग्रामिण युवक – अभी नही आयी तो बाद मे कैसे आ जायेगी बाबा? अभी आयेगी नही तो नही आयेगी!
बाबा गुस्से मे गुर्गो से- इस आदमी को बाहर करो डिसटर्ब कर रहा है।औरो को भी कृपा देना है।
युवक चप्पल निकाल कर दौडा…॰ “रूक मेरी कृपा पहले ले। कृपा ऐसे तुरन्त आती है।”

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