Posted by: Rajesh Shukla | May 14, 2011

लेफ्ट की सम्भावना अभी भी खत्म नही हुई है



पश्चिम बंगाल के चुनाव में तृणमूल गठबन्धन ने १८४ सीटों के साथ जीत दर्ज कर ३४ साल से सत्ता का सुख भोग रहे वाम मोर्चे को शिकस्त दी है, यह लिबरल डेमोक्रेट्स की एक बडी जीत कही जा सकती है। दूसरी तरफ  केरल में अच्यूतानन्दन ने वाम को कमोवेश बचा लिया है, हार जरूर हुई है लेकिन यह कोई बडी हार नही है, केरल में जनता अब भी  मजबूती से वाम के साथ खडी है। आश्चर्य की बात यह है कि पश्चिम बंगाल मे सी पी एम का सुपडा साफ होने के बाद भी उसको ४२ प्रतिशत जनता का साथ प्राप्त है, ८प्रतिशत वोट स्विंग नें यह कोहराम मचाया है। यह  ८ प्रतिशत जनसंख्या का कौन सा हिस्सा है जिसने हवा का रूख बदल दिया? निःसन्देह यह बंगाल का निम्न और उच्च मध्यवर्ग है जो  कल तक वाम के साथ था लेकिन इस बार इसने उसका साथ छोड ममता के साथ हो लिया। ऐतिहासिक रूप से मौकापरस्त इस वर्ग से हर एक पार्टी को सतर्क रहना चाहिये 😉 ।  मिडीया का कहना कि  बंगाल चुनाव में हार से भारत में लेफ्ट ही खतम हो गया सच को झूठलाना है। सत्ता से बेदखल हो जाने से लेफ्ट खतम नही हो जाता, लेफ्ट इतना कमजोर नही, जनतंत्र में यह होता है। ३४ सालो बाद लेफ्ट को इस बदलाव की आधी को देखना पडा है, यह ठीक भी है, एकाध शाँक तो समय समय पर लगने ही चाहिये। गौरतलब बात हार नही है बल्कि यह है कि लेफ्ट एक मुश्किल समय में,  एक महापरिवर्तन की आंधी (जैसा की मीडिया वाले कह रहे है) में भी अपनी जनता को जोडे रखने मे सफल रहा है। ४२ प्रतिशत जनसंख्या यदि अब भी लेफ्ट के साथ खडी है तो टूटी जमात को फिर से जोडना कोई बडी बात नहीं है। जिन्होने छिटक कर पल्ला बदल लिया है उन्हे फिर से जोडा जा सकता है या एक नये वर्ग से उन्हे प्रतिस्थापित किया जा सकता है-दोनो विकल्प हैं।

पश्चिम बंगाल में सी पी एम इस मौकापरस्त शहरी वर्ग की मानसिकता को नही पढ पाया। यह पेटीबुर्जुआ वर्ग बदलाव में बहुत बडा किरदार अदा करता  है, यह  लेफ्ट जानता है लेकिन यह जानते हुये भी सीपीएम इन्हे बांधे रखने के लिये कुछ नही कर पाई। कहीं न कही  मध्यवर्ग के एक बडे हिस्से नें अपना पल्ला बदला है। केरल में हलांकि बहुत कुछ जस का तस है, हार हुई है लेकिन वोट स्विंग केवल १ प्रतिशत का हुआ है अर्थात् लेफ्ट की चूलें नही हिली हैं। केरल में लेफ्ट अभी भी भारी है, अभी भी कुछ बडा नुकसान नही हुआ है। दोनो राज्यो के चुनाव को यदि देखे तो यह बात साफ है कि बनिस्बत इसके कि लेफ्ट हारा है उसकी जमीन पूरी तरह स्खलित नही हुई है। अब भी सम्भला जा सकता है, नये सिरे से एक खुली सोच के साथ आगे बढा जा सकता है।

लेफ्ट को अपने बेसिक्स को फिर से ठीक करने की जरूरत है, फिर से जमीन से जुडने की जरूरत है। यह एक बडा सच है कि ममता बनर्जी भले ही इस बार जीत गई हो लेकिन वे बंगाल की सांस्कृतिकतः प्रगतिवादी जनता का प्रतिनिधित्व करने के योग्य नहीं है। उनमें न तो वह संस्कार है, न ही वह नोबेलिटी। ममता एक बनेच्चर नेता लगती है, उनका व्यक्तित्व बंगाली संम्भ्रान्तता को रिप्रजेन्ट नही करता। पश्चिम बंगाल को दुनिया उसकी उच्च संस्कृति के लिये जानती है-जिसको रविन्द्र नाथ टैगोर, विवेकानन्द, ज्योतीबसु, सत्यजीत रे जैसे लोगो नें विश्व पटल पर रिप्रजेन्ट किया।  इस दृष्टि से जनता बहुत देर तक किसी बनेच्चर को बर्दास्त नहीं करेगी। लेफ्ट को अभी से कमर कस लेना चाहिये, अभी भी कुछ नहीं बिगडा है।


दूसरी तरफ कांग्रेस ने इस चुनाव में फिर से अपना परचम लहराया है। करप्शन कोई बडा मुद्दा नही रहा। जो कुछ तमिलनाडु मे हुआ वह हर पांच साल बाद होता है, करप्शन मुद्दा हो या न हो सत्ता बदलती है।  केरल में कांग्रेस को कांटे के टक्कर में अन्ततः सत्ता मिल ही गई है, गोगोई नें पूर्ण बहुमत लाकर कांग्रेस मे एक नया जोश भर दिया है। अब कांग्रेस कह सकती है कि जनता कांग्रेस को करप्ट नही मानती, करप्शन है इससे इन्कार नही किया जा सकता लेकिन जनता इसके लिये कांग्रेस को जिम्मेदार नही मानती। तो ऐसे में ॰जय हो॰ का नारा सार्थक हुआ। कांग्रेस के पास अब केवल पाना ही पाना है। ऐसे मे जबकी प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा कुल ८२४ सीटो मे केवल पांच सीटे जीत पाई, कांग्रेस के लिये रास्ता साफ है, उसके पास कहने के लिये है कि खुद को देखो कि तुम्हे जनता का कितना समर्थन प्राप्त है। राष्ट्रीय पार्टी के बतौर  भाजपा पहले से ही अप्रासंगिक थी, यदि तमाम बडे राषट्रीय मुद्दो के बाद भी भाजपा को पांच राज्यो मे केवल पांच सीट मिलती हो तो यह पूरी तरह से अप्रांसंगिक हो चुकी है, इस पर बहुत माथापच्ची करने की जरूरत नही है।

कांग्रेस के लिये रास्ता कमोवेश साफ है। उत्तरप्रदेश के चुनाव मे कांग्रेस की इस चुनावी जीत का बहुत बडा असर पडने वाला है। कांग्रेस को इससे बहुत फायदा मिल सकता है, इसे ठीक से भुनाने की जरूरत है।

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