Posted by: Rajesh Shukla | February 5, 2011

कला मेले से बाजार में आई गर्मी


दैनिक भाष्कर में आज ५फरवरी २०११ को छपा रिव्यू

रनबीर कलेका

"रनबीर कलेका के वीडीयो Sweet Unease से एक छवि"

पिछले दिनो प्रगति मैदान में हुये ईन्डियन आर्ट समिट ध्वस्त हो चुके समकालीन कला बाजार के लिये अच्छा रहा। आर्ट समिट के तीन दिनों में कमोवेश डेढ लाख से अधिक लोगो नें कला को देखा और सराहा। कई कला के निवेशको नें अनेक बहुमूल्य कलाकृतियों में निवेश किया, इस बार बहुत सी कला दिर्घाये अपनी कलाकृतियों को बेचने में सफल रहीं। कुछ कलाकारों जैसे भारती खेर, शीला गौडा, प्रज्जवल चौधरी, शिल्पा गु्प्ता, सुमेध राजेन्द्रन, इन्द्र परमित राय, तुषार जोग इत्यादि ने नई ऊचाईयो को छुआ है। कुछ कलाकारो मसलन प्रभाकर कोल्ते तथा मनु पारेख नये प्रयोग करते दिखे तथा स्वयं को पुरानी स्टाईल से मुक्त करने की कोशिस की है। नई कला गैलरियों मसलन गैलरी स्की, लैटी ट्यूड २८, गैलरी मसकारा, वोल्टे इत्यादि ने भी इस बार अच्छी कला का प्रदर्शन किया था हलांकि पुरानी गैलरीयों वढेरा, बोस पेशिया, प्रोजेक्ट ८८ , नेचर मोर्टी तथा चामुल्ड के कलाकारों का ही बोलबाला रहा। वढेरा नें कुछ उच्चकोटि की कलाकृतियों का प्रदर्शन किया था जिसमें शिल्पा गुप्ता का ईन्सटालेशन प्रमुख था। वोल्टे गैलरी में रनबीर कलेका का विडियो कम पेन्टिंग ईन्सटालेशन( विडियो प्रोजेक्शन पेन्टेड कैनवस पर) भी काफी चर्चा में रहा। इस बार समिट नें भारतीय आधुनिक कला कें महान कलाकार मकबूल फिदा हुसैन की कलाकृतियों को भी प्रदर्शित किया जिसे पिछले दो कला मेलों में भगवा ब्रिगेड के आक्रमण के डर से प्रदर्शित नही किया गया था।
ईन्डियन आर्ट समिट का तीसरा दौर इस मामले में भी महत्वपूर्ण रहा कि उसी समय भारत का पहला प्राईवेट कला संग्रहालय का उद्घाटन हुआ। दिल्ली के गुडगाँव के डी एल एफ  स्थित इस म्यूजियम का नाम है “किरन नादर म्यूजियम”, इसका उदघाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने किया । किरन नादर भारतीय समकालीन कला की एक बडी कला खरीदार रही हैं , हाल ही में उन्होने कुछ बहुत मंहंगी कलाकृतियों को आक्शन में खरीदा है। यह नये म्यूजियम में प्रमुखता से समकालीन कला को बढावा दिया जायेगा तथा उसका संरक्षण भी किया जायेगा। किरन नादर ने हाल ही में खरीदी भारती खेर की कलाकृति ” द स्कीन स्पिक्स लान्गुएज नाट आफ इट्स ओन” तथा अनीस कपूर की कलाकृति को मयूजियम में प्रमुखता से जगह दी है। कुछ अन्य कलाकार जैसे राजा रवि वर्मा, सैय्यद रजा, तैय्यव मेहता, हुसैन, सुबोध गुप्ता , अर्पिता सिंह, की कलाकृतियों ने भी इस म्यूजियम में जगह पाई है। अभी संग्रह बहुत नही है लेकिन शुरूआत अच्छी है। इस तरह के प्राइवेट म्यूजियम का खुलना तब तक सम्भव नहीं जब तक सरकारें उदार न हों क्योकि जितना टैक्स कला पर लगता है उतना तो हिरे पर भी नही लगता है। किरन नादर खुश होंगी कि अब उनका म्यूजियम कर मुक्त बिजनेस वैन्चर बन चुका है। म्यूजियम को कर मुक्त किया गया है लेकिन यह नही कहा जा सकता कि नादर उससे पैसे नहीं कमायेगी। म्यूजियम कलाकृतियाँ बहुत मौके से बेंचती है कई बार तो कलाकृतियों के लोन से ही उन्हें करोडो की कमाई हो जाती है। यह म्यूजियम भविष्य में अन्य निवेशको के लिये एक एक उदाहरण बन सकता है। इसको देख कर कला निवेशको में एक नई उर्जा का प्रवाह हो सकता है।

यदि हम थोडी गम्भीरता से सोचें तो प्राईवेट म्यूजियमों का होना कोई बहुत अच्छी खबर नहीं है क्योंकि संस्कृति की राजनीति कें ये केन्द्र बन सकते हैं। जैक दरीदा नें इस बावत लिखा था कि प्राईवेट म्यूजियम एक शक्ति केन्द्र है जिसमें भविष्य को नियन्त्रित करने की इच्छा अनुस्यूत है। म्यूजियम भविष्य की राजनीति को ही तय करने लग सकते है क्योकि ये म्यूजियम वास्तव में सांस्कृतिक इतिहास को संजोते है इस तरह वे एक तरह के विशेष ज्ञान पर भी आधिपत्य स्थापित करते हैं। जिसके पास म्यूजियम है उसके पास ही उस संग्रहित इतिहास का विष्लेषण का अधिकार होता है। प्राईवेट म्यूजियम इतिहास को नियन्त्रित करने का एक वैध अधिकार प्राप्त कर लेते है। गौरतलब है कि इस संग्रहित सांस्कृतिक इतिहास का चरित्र वर्गीय है तथा इसमें बहुसंख्यक का कोई सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व नहीं है। यदि हम एक शब्द में कहें तो ये प्राईवेट म्यूजियम सांस्कृतिक- सत्ता के केन्द्र हैं, जिनके पास म्यूजियम हैं उन्हें सांस्कृतिक नियन्त्रण का वैध अधिकार प्राप्त हो जाता है। हम देखते है कि सरकारी पुस्तकालयों तक में यह होता है, साहित्य अकादमी पुस्तकालय में पुस्तकों के कुछ सेक्शन में ताले लगे होते हैं जिसमें रखी किताबें सबके लिये नही है उसके लिये विशेष परमिशन की जरूरत होती है। यह आधिपत्य मूलतः ब्राह्मणवाद ही है। यह सबकुछ तब होता है जब सरकारें कला के लिये कुछ नहीं करती। सरकार कला को किसी तरह का संरक्षण नही देती ऐसे में प्राइवेट संग्रहालयों का सामने आना लाजमी है। ऐसे समय में जब कला मूलतः एक शुद्ध व्यापार बन चुकी है उनके संरक्षण के लिये प्राईवेट म्यूजियम का होना एक आवश्यकता बन चुकी है। किरन नादर म्यूजियम का खुलना एक बडी शुरूआत कहा जा सकता है और जल्द ही बडे कार्पोरेट भी इस नये कर मुक्त व्यापार में हाथ आजमा सकते हैं। कला बाजार के बरक्श कलाकारों ओर गैलरियों के लिये निःसन्देह एक खुश खबरी हो सकती है।
–राजेश शुक्ला

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