Posted by: Rajesh Shukla | December 11, 2010

अर्पिता के सपने


Arpita Singh : My Lilly Pond :Oil on canvas

Good romance is that which does not substitute something ideal for ordinary reality rather a process of transforming ordinary reality.
यह सच है कि मनुष्य चाहे जहाँ भी जाये, जहाँ भी रहे, कथा कहना जारी रखेगा।  मनुष्य एक कथा कहने वाला पशु है, अपने जीवन के अन्तिम क्षण में भी वृद्ध व्यक्तियों को अपनी कथा कह देने की ईच्छा रहती है-बस हम सुनते नही हैं। वढेरा आर्ट गैलरी में चल रही अर्पिता सिंह की चित्रकृतियो की प्रदर्शनी “कोबवेब” सम्भवतः किसी रेशमी (भौतिकवादी अर्थो में) मकडजाल के बारे में है। मकडजाल एक अन्धकार या अविद्या का रूपक भी है, यदि हम उनकी कलाकृतियों के सन्दर्भ को आध्यात्मिक स्तर पर देखने की कोशिस करें। दूसरी तरफ यह मकडजाल शहरी मध्यवर्ग की एक मनःस्थिति भी है जिसमें फंसी अर्पिता का रूमानी आख्यान चलता है। रूमानी इसलिये की वास्तविकता की भयानक सच्चाईयाँ उन्हें उदास और दुःखी करती है। इस उदासी और दुःख का मूल क्या है, यह कि जो कुछ क्रान्तिक रूप से मुझसे अलग है वही वास्तविक अशुभ है, हमारे आस्तित्व के लिये खतरा है। यह निःसन्देह दुखी करता है।  इस शहरी मकडजाल, इस भौतिकवादी समय में किये गये अनुभवों की बचपन से अब तक की कथा उनकी पेन्टिंग में देखी जा सकती है। हलांकि शहर (जिससे वे बहुत आक्रान्त दिखती हैं) ने न तो उनको छोडा है और न उन्होने शहर को छोडा है। अर्पिता सम्भवतः अन्तिम आधुनिक कलाकार मानी जायेंगी जिनमें कलात्मक पुनर्प्रस्तुति का ठंग कमोवेश आधुनिकता के मध्य काल के प्रगतिशील आख्यानपरक चित्रकारों और लेखको जैसा है। औपन्यासिक आख्यान का वह मध्यकालिक आधुनिक स्टाईल ही उनको भारतीय कला में अपनी एक अलग पहचान भी देता है लेकिन कला के रूपो में तथा उसके विमर्शो में जिस तरह से बदलाव आये है उसके बावत उनके ये आख्यान तथा कला रूप पुराने लगते हैं। हर समय का एक प्रभावी कला रूप होता है। इस समय का भारतीय कला रूप क्या है? बहुत लम्बे समय तक पुरातन को हम शायद नहीं घसीट सकते! वही पचास के दशक का आर्काईक कला रूप आज भी प्रभावी रूप से सामने दिखता है, जो कि निश्चय ही अफसोसजनक है। जिस तरह की स्व-अनुभूतियाँ, मनोभाव और कथानक अर्पिता की चित्रकृतियों में है उसमें बहुत ताजगी भी नही दिखती। यह आत्मा और जगत, यह अन्दर और बाहर का द्वान्द्वात्मक आख्यान कब तक? इसका औचित्य क्या अब भी है, विशेषकर तब जबकि इसको दार्शनिकतः कभी का विसंरचित किया जा चुका है?

अर्पिता ठीक उसी तरह के मनोभावो को चित्रित करती हैं जिस तरह के मनोभावों नें बीसवी सदी के मध्य में यूरोपीय बुर्जुआ को आक्रान्त कर रखा था-शहर और उसका शोर, कारों का शोरगुल, उडते वायुयानो का शोर, भीड़ का शोरगुल इत्यादि और उसके बीच एक सुन्दर सपनो का घर और असीम शान्ति की कामना। नष्ट होती एकाकी, शान्त जिन्दगी पर रूदन और उदासी वास्तव मध्यवर्ग का एक स्थाई मनोभाव है। हलाँकि इसके बीच वह कहीं न कही एक अस्थायित्व की, एक अव्यवस्था की भी इच्छा रखता है ( क्योकि वह स्थाई मनोभाव बहुत जल्द त्रासद हो जाता है)। हलांकि यह भी सच है कि  इस “स्थाई मनोभाव” की दिनरात कामना करते हुये भी यह मध्यवर्गीय मानव त्रासदियों को रोक नहीं पाया बल्कि इसके उलट उनका एक कारण ही बना है। नाजी त्रासदी का दुस्तर समय  भी किर्कगार्ड जैसे को सौन्दर्यशास्त्र का एक क्षेत्र दिखाई पडा, बनिस्बत उस त्रासदी को रोकने का कोई उपाय करने के उस पर एक ललित निबन्ध लिखना उन्हे ज्यादा सही लगा। आस पास होती अमानवीय परिघटनाओं पर एक निष्कियता के भाव के साथ खेद व्यक्त कर आगे निकल जाना कितना आसान है! आधुनिक कला के एक दौर में द्रुत औद्योगिकीकरण कें विरोध में भी कुछ प्रवृत्तियाँ उभर कर सामने आई थी, कुछ कलाकार तो बहुत मुखर भी थे लेकिन आप पीछे तो नही जा सकते न! बुर्जुआ समाज आगे बढ गया –वैनगाँग से जैकसन पोलाँक तक का सफर बगैर रिजेशक्शन के सम्भव नही हुआ।  मध्यवर्गीय सोच में जो सुन्दर की  संकल्पना है वह आर्काईक है शायद इसीलिये बुर्जुआ समाज  उन प्रवृत्तियों को बहुत आसानी से किनारे कर पाया।  शहर है-और शहर रहेगा, कारे रहेंगी, वायुयान उडेंगे, भीड बढती ही जायेगी- आपकी आत्मिक शान्ति की परवाह इस विकास को कहाँ , जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से आप भी शरीक हैं। दूसरी तरफ क्या हमारा रूदन मिथ्या नही है? जो कुछ अशान्ति हम अनुभव करते है उसके उत्पादन में क्या हम भी भागीदार नही है?? हमारी निष्क्रियता और हमारा यह खेदजनक समाधान क्या इनके लिये सुअवसर प्रदान नहीं करते?  इस तरह का स्वकेन्द्रित ऐस्थेटिक उत्पादन वास्तव में बहुत हद तक प्रगतिशील नही कहा जा सकता। यदि आप भविष्य की तरफ छलांग लगाती मानवीय आकांक्षाओं के प्रति खेद और दुख का प्रदर्शन करते है तो आप प्रगतिशील भी नही है-आप ऐतिहासिक गत्यात्मकता का विरोधी है, आप एक तरह से स्थितिवादी है। इस तरह की मध्यवर्गीय भावनाये पूरे आधुनिकता के दौर में हमें देखने को मिलती रही है। मेरा मानना है कि औद्योगिक विकास और उससे उत्पन्न जन संस्कृति(मास कल्चर) के विरोध की नही बल्कि उसके साथ द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध में विकसित होती एक नई उच्च कला और संस्कृति की हमें जरूरत है। आज यदि हम हाई माडर्निज्म की आत्मा को एक बार फिर से आगे ले जाये तो उसकी दिशा विरोध की नही बल्कि उसके साथ एक द्वन्दात्मक सम्बन्ध में विकसित होने की होगी। अर्पिता की कलाकृतियाँ एक विभाजन को दर्शाती है जो मध्यवर्गीय है, जिसे आधुनिकता के एक दौर में हमने बहुतायत में देखा है।

हमें यह देखने की जरूरत है कि कलाकार का कला रूप (फार्म) क्या दर्शाता है तथा जनता से किस तरह का सम्बन्ध स्थापित करता है और उसकी जनता कौन है! अब भारत में भी चूँकि पचास के दशक का मध्यवर्ग हासिये पर है, कमोवेश विघटित हो गया है और एक नये मध्यवर्ग नें उनका स्थान ले लिया है ऐसे में अब खेदजनक मध्यवर्गीय आख्यानों का कोई बहुत औचित्य नहीं है।  हलाँकि अर्पिता की आख्यानपरक कृतियो में हिंसा को लेकर पेन्ट किये गये कुछ कैनवासों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उनका सरोकार कही गहरा है। मानव के सिकुडते परिवेश और जीवन की गतिविधियों को लेकर भी उनकी चिन्ताये गहरी है, मानव के “पेपर मानव” बनने को वे कहीं न कही मानव के चेतनागत पतन से जोडती हैं। “माई लीली पाण्ड” नामक कलाकृति एक खेदजनक आख्यान प्रस्तुत करती है–सपनो की दुनिया का इस तरह अव्यवस्थित हो जाना, इस तरह युद्ध भूमि में बदल जाना मन को सालता है। लीली पाण्ड एक मध्यवर्गीय सुन्दर सपना है, एक रंगीन शान्त दुनिया है जिसे आज का शहरी मानव अपने अंधविकास में रौदता जाता है, रक्तरंजित किये जाता है। लेकिन यह मध्यवर्गीय लीली पाण्ड ऐतिहासिक विकास में सदैव एक सा कहाँ बना रहता है, हम जो स्वप्निल जगत अपने लिये बुनते है उसे कहाँ तक संजो पाते हैं। मध्यवर्ग का यह लीली पाण्ड हमेशा एक ख्वाब था और सदैव एक ख्वाब बना रहेगा। आक्रान्ता तो हमेशा तैय्यार है उसे रौदने के लिये, गौरतलब है की यह रूपक भी अर्पिता की इस प्रदर्शनी की कई कृतियों में अन्तर्गुन्थित है। “अश्वमेध” नामक कलाकृति के घुडसवार-आक्रान्ता कौन हैं? क्या यह ग्लोबल पूँजीवाद है? बहुत सावधानी से पढने की जरूरत है। ध्यान रहे आक्रान्ता सिर्फ बाहर से ही नही आते है, घर में भी होते है। चिन्ता बडी है। शहरी जीवन की आपाधापी में छटपटाता यह मध्यवर्गीय मानव इससे परे जा भी कहा पाता है। यह बाहरी आक्रान्ता (ज्यादातर मामले मे ) उसे किसी प्रेत की तरह सताता रहता है। उसकी एक छोटी दुनिया है, उसका एक सीमीत सपना है, ख्वाब भी वह क्या रच पाता है!

मनुष्य निंसन्देह सिमटा है-वह माईक्रो मनुष्य होता गया है। लेकिन मुझे नही लगता कि इसमें कोई खेदजनक बात है। मनुष्य तो सदैव से एक माईक्रो स्पेश की तलाश करता रहा है, सदैव से शून्य में समाने की चाह करता रहा है। समाधि एक माईक्रो स्पेश ही है । वैदिक ऋचाओ के स्पेश एक माईक्रो स्पेश ही माने जाते रहे हैं। सम्पूर्ण भारतीय आध्यात्मिक विमर्श एक नितान्त एकाकी स्पेश की तलाश करते हैं, जहां दुःख और सन्ताप नहीं होते-अर्पिता भी उसी परम्परा की वाहक हैं। आज औद्योगिक विकास में विज्ञान ने मनुष्य को अपना एक साईबर जगत-एक माक्रो जगत बनाने की सुविधा दी है, जो वायवी होते हुये भी कमोवेश वास्तविक है। आप अपने लिये एक नया स्वप्निल जगत साकार कर सकते है। पेपर टाईगर या टीवी रीछ मानव  मनुष्य कें तकनिकी विकास के उत्पाद है तभी तो पशुता के दर्शनों का जन्म होने लगा है। यह आज की बात भी नही है– एक पशुमानव का सपना तो प्राचीन ग्रीक  से लेकर मध्ययुग तक मानवो ने देखा है। अब वे उसे साकार कर लेना चाहते है। नेटवर्किंग तथा टीवी के इस युग में खेद जैसी कोई बात नही है, अब तो इसको लेकर तमाम राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक विमर्शो का जन्म भी हो चुका है। पाठ को लेकर अब “साईबरनेटिक्स आफ रिडिंग” की चर्चा हो रही है। हमारा सब कुछ माईक्रो होता जा रहा है, ऐसे हम इस पर अफसोस नही कर सकते बल्कि इस विमर्श में ही हमे आगे बढना है। अर्पिता की चित्रकृतियों के आख्यानो को हम  पूर्व में आस्तित्ववान मध्यवर्ग कें ख्वाबों में प्रविष्ट होकर अच्छे ठंग से समझ सकते है। मध्यवर्गीय व्यक्तिगत समय और सामूहिक शहरी समय तथा उसकी गत्यात्मकता  के बीच एक घोर अन्तर्विरोध है, एक संघर्ष है और यह लाजमी भी है इसमे कोई आश्चर्य नही है। इसके पहले कि मध्यवर्गीय मानव समय के प्रति आत्मचेतन हो विकास के आयाम बदल जाते है-यह उसकी ऐतिहासिक त्रासदी है। इसमें कुछ भी क्लिष्ट नही है क्योकि “स्व” की जिस मध्यवर्गीय अवधारणा को वे अंगीकार करती है उसके साथ यह होता रहा है। उनकी पेन्टिंग अपनी बुनावट में बहुत सामान्य और सहज हैं जिसमें एक मध्यवर्गीय भावुकता है और यह भी एक ऐतिहासिक है जिसे सहेजने की जरूरत है।

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