Posted by: Rajesh Shukla | November 27, 2010

जो लूट सको वही लूट लोः गढी कलास्टूडियो की लूट पर एक नजर



[ Article was originally written for Bhaskar Hindi newspaper but before it gets published there I am posting it here for my readers. Bad thing about me is that I can not wait ..enjoy the article on garhi studio loot. !]
घोटालों नें देश को झकझोर कर रख दिया है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार देश नें घोटालों का इतना बडा जंजाल देखा है। ए राजा का घोटाला विश्व के सबसे बडे घोटालों में एक है । गणित करने वालें गणित लगा रहें है कि २ जी स्पेक्ट्रम किसी छोटे देश सकल घरेलू आय से भी ज्यादा है, कुछ का मानना है इतने बडे धन से २ करोड लोगो को रोजगार दिया जा सकता था। वैसे यह बहुत शर्मनाक बात है कि प्रधान मंत्री जी एक तरफ को दाल-आटा की बढती कीमतों को कम करने तथा सड़ रहे अन्न को गरीब जनता में मुफ्त बांटने में अपनी लाचारी दिखाते हैं और दूसरे तरफ इतने बडे घोटालो को होता हुआ देखते हैं और आँख मूदें रहते हैं । यह तो सबसे बडे घोटाले है, छोटे मोटे कितने हो रहे होंगे यह कह पाना मुश्किल है, इन छोटे मोटे घोटालों के बावत वे कहते है कि ये बहुत चिंता की बात नहीं हैं। छोटे मोटे सरकारी संस्थाओं में भी इसतरह के घोटाले और लूट का अनवरत सिलसिला बदस्तूर जारी है और साठ सालों से जारी है जिसकी तरफ सरकार कोई ध्यान नहीं देती। भ्रष्टाचार एक सनातन सत्य की तरह मान लिया गया है। यदि कोई नैतिक मूल्य सरकारी तौर पर सनातन बन चुका है तो वह है भ्रष्टाचार और मनमानी लूट। यह नीति की “तुम भी लूटो हम भी लूट रहे हैं” हमारी सबसे बडी चिन्ता का विषय है। कुछ लोग तो अब उत्तरदायित्व के साथ लूट की बात भी करने लगे है। भ्रष्टाचार की सनातनता को स्वीकार कर उसकी तरफ आँख फेर लेने का जो संस्कार निर्मित हुआ है वह न तो जनतंत्र के हित में है, न उसकी जनता के हित में है।

अभी हाल में बदहाल-परेशान कुछ नये कलाकारों ने कला की एक मात्र संस्था ललित कला अकादमी में हो रही लूट की तरफ मेरा ध्यान आकृष्ट किया। अपने आस्तित्व के शुरूआती दौर से यह संस्था कुछ लोगों की व्यक्तिगत प्रापर्टी बनी रही है और उस पर कुछ लोगों का ही अप्रत्यक्ष नियन्त्रण रहा है। राष्ट्रीय पुरस्कारों तक में धाँधली की जाती रही जिसका एक सबसे ऐतिहासिक प्रकरण कृष्णखन्ना द्वारा स्वयं को ही राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत कर लेना था। इस प्रकरण ने पहली बार ललित कला में बैठे घोचूँओ का पर्दाफाश किया था जिसके बाद खन्ना को पुरस्कार लौटाना पडा था । राष्ट्रीय कला का पुरस्कार तो अब सिर्फ लेनदेन पर आधारित हो गया है। ललितकला अकादमी ऐसे लोगो के चुंगल में अभी भी है जिन्होनें इसे एक छोटे सी लूट संस्था में बदल रखा है और गौरतलब हो कि यह लूट कोई और नही कर रहा है बल्कि दोयम दर्जे के कलाकार ही कर रहे है। वे कलाकार जो अब कला नही करते, अकादमी से मिल रही छोटे मोटी सुविधाओ और फंडों का दोहन करते हैं। ललित कला अकादमी का ईस्ट आफ कैलाश गढी में स्थित कलाकारों का स्टूडियो “ ललित कला स्टूडियो” को यदि देखे तो पता चलता कि ललित कला के कार्य करने का ठंग कैसा है। गढी स्टूडियो में कलाकारों का कम्यूनिटी सेन्टर है तथा विशेष रूप से बनाये गये नये और पुराने दो तरह के स्टूडियो हैं जिसमे रहकर कलाकार काम करते है। जब से ये स्टूडियो बने हैं तब से कुछ लोगों ने इसे अपना पुश्तैनी घर बना लिया है। कुछ कलाकार तो इन स्टूडियो में बीस-बीस सालों से हैं, कुछ कलाकार इन स्टूडियों में न तो रहते हैं न कलाकर्म करते है लेकिन उन्होने इसे हडप रखा है-बडे बडे ताले लगा रखे हैं। ललितकला अकादमी के नियम के तहत हर साल कलाकारों का स्टूडियो के लिये चयन किया जाता, हर साल कलाकारों के काम तथा उनकी उपलब्धी के आधार पर इन स्टूडियो को आवंटित करने का नियम है। लेकिन जब से यह स्टूडियो बना है तब से कुछ लोगो ने इस पर अपना एकाधिकार कर रखा है परिणामतः नये कलाकार जो नौकरी इत्यादि नहीं करते बल्कि स्वतंत्र रूप से कलाधर्म निभा रहे है, कलाकर्म में लगे हुये है उन्हें इस स्टूडियो में जगह नहीं मिल पाती है। वास्तव में यह स्टूडियो बना ही उनके लिये था जिनके लिये कला सबसे बडा धर्म है तथा जो स्वतंत्र रूप से कला में रमना चाहते है लेकिन यह उन कलाकारों शायद ही कभी मिला। वे कलाकार दर दर भटकने के लिये मजबूर रहें हैं और आज भी हैं। गौरतलब हो कि इस स्टूडियो में वे कलाकार भी है जिनके दिल्ली में तथा अन्य शहरों में एक नही, दो-दो तीन-तीन घर और उनके व्यक्तिगत कला स्टूडियों है। बहुत से कलाकार तो मर गये है लेकिन अब उनके रिश्तेदारों ने उसका अधिग्रहण कर रखा है।

इस स्टूडियो की लूट में शरीक कुछ कलाकार वर्गो के नाम इस प्रकार है—१- ललिता कट्ट (शिल्पकार) स्टूडियो नं १ –कई सालों से अपने स्टूडियो में आई तक नही है लेकिन अधिग्रहण कर रखा है २- गोगी सरोज पाल (पेन्टर) स्टूडियो नं-५ कमोवेश १५ सालो से स्टूडियो को कब्जे में कर रखा है । इनके दिल्ली मे दो दो बडे बडे घर और व्यक्तिगत स्टूडियो हैं। कला के नाम पर फेमिनिस्ट-चिरई बनाते (पुनरूत्पादन करते हुये) हुये बीस साल से ज्यादा हो गये ३- शंखो चौधरी (शिल्पकार थे, इन्हें मरे हुये कमोवेश तीन साल हो गये) स्टूडियो नं -७ कमोवेश २० साल से कब्जे में रहा लेकिन उनके मरने के बाद अब पत्नी के कब्जे में है। ५- मृणालिनी मुखर्जी ( शिल्पकार)-स्टूडियो-नं-८, कमोवेश २० वीस साल से कब्जे में, कभी कभार आना जाना होता है ४- एम के पुरी (कभी पेन्टर थे) स्टूडियो नं-२, २० सालो से कब्जे में है। अब तो ये कला का काम भी नही करते। दिल्ली में इनका अपनाघर है। ५- मुकुल पवार- स्टूडियो नं-३ ललित कला की राजनीति करते है हलांकि कहते हैं कि शिल्पकार है-बीस सालों से ज्यादा समय से कब्जे में है। ६- नन्दकटियाल (चित्रकार)- स्टूडियो नंबर-६, दो दशको से कब्जे में कर रखा है शायद ही काम करते हैं। दिल्ली में दो मंजिला मकान है। ७- उमेश वर्मा बुढे हो चुके है स्टूडियो को ही घर बना रखा है। काम नहीं करते भजन करते हैं। स्टूडियो में ही मरने की कसम खा रखी है। कुछ अन्य वर्ग हैं जो कम्यूनिटी को घुन की तरह खा रहे है उनमें प्रदीप सक्सेना, ब्रिजमोहन शर्मा, राजेन्द्र कुमार, अमिताभ भौमिक, कालीचरण इत्यादि । इस तरह सम्पूर्ण गढी कलाकार स्टूडियो को इन निकम्मे कलाकारों ने एक तरह से अड्डेबाजी का डेरा बना रखा है। मृणालिनी मुखर्जी जैसे कलाकारों के पास तो अपना सबकुछ है।  वे स्वतंत्र रूप से अपना काम करने में सक्षम हैं उन्हें तो कलाकार नैतिकता को मानना चाहिये था और उस पर चलना चाहिये थ!! उन्हें स्टूडियों नये असक्षम कलाकारों को सौप देना चाहिये था लेकिन हडपने की नैतिकता में इन्हे भी कुछ दिखाई नही पडता –हलाँकि आध्यात्म इनको भी बहुत गहरा है। यह बपौती की मानसिकता अच्छी बात नहीं है, कलाकार के लिये तो एक दम अच्छी बात नहीं है।   कम्यूनिटी सेन्टर जिसमें कलाकार मिलजुलकर काम करते हैं तथा रहते भी हैं वहाँ भी इस तरह के अड्डेबाजों ने घर बना रखा है। ज्यादातर तो सरकारी-प्राईवेट संस्थानो में नौकरी करते है, शाम ६बजे के बाद मन करता है तो स्टूडियों में तफरी करने,अड्डेबाजी तथा दारूबाजी करने चले जाते हैं। इस तरह देश के एक मात्र कलास्टूडियों को निकम्मे कलाकारों नें अड्डेबाजी का केन्द्र बना रखा है। किसी तरह कुछ नये कलाकार अपने कलाकर्म को जारी रख पा रहे है। नये कलाकारों को जो अच्छी कला कर रहें हैं उन्हें इस स्टूडियो की सख्त जरूरत है लेकिन अकादमी इसको तवज्जो नहीं देती। अकादमी में ऐसे कलाकारों और लोगों का कब्जा है जिन्होने कला में कोई योगदान नहीं दिया है उल्टे कला में विकसित हो रही छमताओं को घुन की तरह खाये जा रहे है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

–राजेश शुक्ला

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Responses

  1. सर, ये पेटी-बुर्जुआ इसी तरह इन संस्थानो को घुन की तरह खा रहे है। ये जहाँ हैं गैंग बना कर रहते है और कब्जे की रणनिति पर काम करते है। जिस तरह इन सबो ने इन संस्थाओ को कब्जे मे साठ सालो से लिया है उससे नव युवक वर्ग, नयी क्षमताये सामने नही आ पाई है। ये बडा आर्गेनाईज्ड ढं से नये कलाकारो को बाहर रखते है उन्हे घुसने ही नही देते। फक् देम सर । बहुत सुन्दर ॑

  2. काफी रोचक प्रासंगिक और तथ्यपूर्ण पोस्ट … पढने पर आपको सोचने पे विवश कर दे की आखिर क्या हो रहा है अपने देश मे…सभी का इस स्तर से नैतिकता का ह्रास हो गया है ?? और ऊपर से देखने वाले क्या कर रहे हैं??? हाँ जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो क्या करे लोग…
    आज के युग मे मानो व्यक्तियों के संस्कारों और नैतिकता का ह्रास हो गया हो , जो भी जब भी जहां मौका मिलता हो अपनी बनाने के चक्कर मे लगा हुआ है…और जब आम आदमी यह देखता है की बड़े बड़े उद्योगपति, राजनीतिज्ञ यहाँ तक की समाज के चौथे स्तम्भ के रक्षक, घोटाले कर बच निकलते हैं … तब की स्तिथि मे आम आदमी इन प्रलोभनों से कैसे बचे?
    सरकार की और से कुछ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है और साथ ही आम आदमी को ये समझना बेहद जरोरी है की “बुरे कर्मो का अंजाम बुरा ही होता है , इससे बच निकलने का कोई सवाल नहीं है”
    राजीव
    https://rrajiv.wordpress.com


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