Posted by: Rajesh Shukla | November 7, 2010

नाचती गाती ओबामा फेमिली बनाम अमेरीकी जनता की नौकरी


अमेरीकी राष्ट्रपति ने भारत की यात्रा से पूर्व साफ शब्दों में कह दिया था कि उनका एक मात्र मकसद है भारत के साथ व्यापार और बेरोजगारी से जूझती अमेरीकी जनता के लिये नौकरियों के लिये मौके उपलब्ध कराना। इसके इतर ओबामा कुछ नही करना चाहते। नाच गाना तो चलता ही रहता है -यह एक मध्यवर्गीय टोटका जैसा है जिसको क्लिंटन ने भी भारत में आकर भारतीय मध्यवर्ग का प्यारा बनने के लिये किया था और ओबामा ने भी किया। भारतीय मध्यवर्ग को नाच गाना बहुत पसंद है यह सभी विदेशियों को पता है। यह मध्यवर्गीय सेन्टीमेन्ट पर चलने वाली सत्ता की संस्कृति है जिसके केन्द्र मे मध्यवर्गीय परिवार और व्यापार है। जिस वर्ग के रहनुमा बन कर ओबामा आये है वह भी अमेरिका का वही वर्ग है जिसने विश्व  खाद्य  का सबसे ज्यादा उपभोग किया और अब स्वास्थ्य संगठनो के लिये चिंता का विषय है क्योकि उनकी मोटपा दर ४० प्रतिशत बढ गई है।

तो नाच गाने को छोड कर हम देखे तो ओबामा से हमें कोई विशेष फायदा नहीं दिखता। पाकिस्तान के आतंकवाद के मुद्दे पर जिस तरह वे खामोश रहे बल्कि जिस तरह उसे उन्होने एक सामरिक महत्व का एक विशेष कोटि का देश बना डाला उससे उनकी राजनैतिक सोच के बारे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।  ज्ञातब्य हो कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नैहर ही अमेरिका है, उनके एक पाँव सदैव व्हाईट हाउस में रहते है तिस पर भी ओबामा का पक्ष भारत की तरफ नही है हाँ बाजार के लिये तो सभी के लिये हमारे दरवाजे खुले हैं। हम सबसे बेहतर है इसमें क्योकि यहाँ कोई भी बे रोक टोक बगैर कानून लूट सकता है। हम देख रहे है जिस तरह खाद्य पदार्थो से लेकर दूध दही तक बाजार रसायनो से पटा पडा है, कौन रोकने वाला है? भारत का बाजार सबसे बेहतर तथा सबसे जल्द धनाढ्य बना देने वाला देश है-सदैव से रहा है। अमेरिका को बाजार चाहिये सो हम देंगे, अमेरिका हमारे देश का दोहन करें तथा हो सके तो यहाँ के लोगो के विरोध को दबाने के लिये एक दो टुकडियाँ भी रख लें । वैसे भी माओवादियों के लिये चिदम्ब्ररम अमेरिका की तरफ देख ही रहे थे तथा वह दिन भी याद जब ताज हमले के समय अमेरिका सैन्य सहायता मुहैय्या करा रहा था।  हम शर्मशार हो रहे थे।

ग्लोबलाईजेशन का मतलब यही तो होता है कि बाजार की ताकते चाहे वे देशी हो या बिदेशी जनता का दमन करने को तत्पर रहती हैं। ओबामा का गाँधी ठीक ही है-गाँधी इसके इतर क्या थे ‍! दिल से साम्राज्यवाद के सेवक रहे-आजादी के बाद भी ब्रिटिश अम्पायर की सेवा करते रहने की प्रतिबद्धता को बार बार दोहराते रहे। जब भारतीय बुर्जुआ का आदर्श गाँधी तो ओबामा का वह क्यों न हो यह एक नैतिक मजबूरी है? ओबामा ने कम्पनियों के मैनेजरो की मिटिंग में अपने लिये नौकरियो की डिलिंग कर डाली आधा काम पूरा हुआ। शेष काम अस्त्र-शस्त्र  आदि बेचना है जिसे कल पूरा कर लिया जायेगा। शुद्ध व्यापार है यह इसमें दोस्ताना जैसा क्या है! दोस्ताना व्यवहार भारत के साथ किसी देश का था तो वह रूस था जब वह हर तरह से भारत के लिये खडा रहता था। सभी जानते है कि पाकिस्तान विश्व आतंकवाद का केन्द्र है लेकिन ओबामा के लिये वह एक विशेष ( अति विशेष) देश है। ताज पैलेस होटल की घटना पर घडियाली आँसू बहाना तथा नोट बुक में लच्छेदार शब्द लिख देना एक बात है लेकिन उस जख्म को महसूस करना अलग बात है। अमेरिकी ट्रेड टावर हमले का दर्द  तो ओबामा को याद है उसका बदला भी लिया जा रहा है लेकिन भारतीय ताज आतंकवादी हमले के गुनहगारो के बारे में एक शब्द बोला भी नही गया जबकि यह सिद्द हो चुका है। यह मनमोहन की बहुत बडी कूटनितिक बिफलता है।

यह मध्यवर्गीय भावनात्मक पोश्चर जो ओबामा सपत्निक यहाँ दिखा रहे है उसका भारत की बहु संख्यक जनता के लिये कोई विशेष महत्व नही है शायद इस व्यापारिक लेन देन का सरोकार ही उनसे नही है । वस्तुतः यह भारतीय धनाठ्य वर्ग और अमेरीकी मध्यवर्ग की एक छोटी मोटी व्यापारिक शादी है इसके इतर कुछ भी नहीं है। इस तरह की शादियाँ उपनिवेशवादी दौर में भारतीय उच्च वर्ग ने पहले भी की हैं इसमें कोई नई बात नहीं है–अमेरिका परस्त मीडिया नाहक ही इसे राष्ट्र की प्रगति से जोडं रही है।  भारत की जनता को भी नोकरियाँ चाहिये , ओबामा ५०००० नौकरियाँ ले गये –भारत की ७० प्रतिशत आबादी मनमोहन से पूछना चाहती है कि कितनी नौकरियों की घोषणा आपने अपनी जनता के लिये किया? क्या हमें इसकी जरूरत ही नही” ? यह बुर्जुआ अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध जो लूट के आदान प्रदान पर टिका है उसका देश की बहुसंख्यक जनता के लिये क्या महत्व है। इधर बीच यह एक नया चलन है– नौकरियों का आदान प्रदान। हमारी जनता के पास देने के लिये नौकरी नही है लेकिन हम अमेरिका में नौकरी बना सकते हैं। कौन है यदि यह शोषक उच्च मध्यवर्ग नही है इसके पीछे जिसके लिये देश कोई महत्व की चीज अब नही रही । उन्होने यह मान लिया है कि देश और अस्मिता जैसे शब्द निम्न मध्य वर्ग  ‍और निम्न वर्ग के लोगों का विषय हैं शायद उनकी चेतना का विकास अभी नहीं हुआ है।

कल ओबामा और कितने व्यापार समझौते करेंगे यानि अपने हित साधेंगे यह खबरिया चैनलो  में निकलेगा ही लेकिन भारत को इसमें क्या हासिल होगा यह बडा सवाल है। निश्चय ही ओबामा कोई हीरो नही है और न ही कोई वैश्विक ताकत रहे क्योकि कोई ताकतवर देश नौकरियाँ खोजने नही आता। चीन तो नौकरी खोजने नही गया? फ्रांस नही गया कही? अमेरिका को जरूरत पडी क्योकि अमेरिका बदतर हालत में है और ओबामा की शाख दाव पर है। जिस तरह भारतीय मध्यवर्ग हाय तौबा मचाता है उसी तरह वहाँ के मध्यवर्ग ने भी हाय तौबा मचा रखी है। उसने ओबामा को मध्यावधि चुनावों में ईकार किया है। ओबामा जिस अल्प कार्पोरेट के हाथो में दो सालों से नाच रहे है उसका निकष यही होना था। लूटने वाले लूट कर बैठ गये है अब सब कुछ नया बनाने की बात है। ओबामा का प्रयास नये सिरे से किया जा रहा प्रयास है-नया बिल्डअप। किसी अर्थशास्त्री ने ठीक ही लिखा है कि किसी देश में अल्प संख्यक समुदाय जब अर्थतंत्र का वारिस बन जाता है तो वह विस्तार अलग ठंग से करता है, वह स्थिर अर्थव्यवस्था का पक्षधर नही होता। वह तात्कालिकता में विश्वास करता है तथा क्षणिका के सिद्दान्त को मानता है। इसलिये वह क्षेत्रगत लूट करता है और स्वयं का क्षेत्रगत ही विस्तार करता है सदैव लूट के क्षेत्रों को  शिफ्ट करता रहता है क्योकि वह शून्यवादी है वह जानता है कि जिस अर्थव्यवस्था में वह लूट रहा है वह अस्थिर है वह कभी भी शून्य में वीलीन हो सकती है।

तो जनता को वास्तव में इसपर कोई विश्वास नही है इसलिये उसके पास कोई आशा भी नहीं है। आशावीहीन मानव विशेषकर भारतीय मानव की क्या नियति हो सकती है? विशेषकर ऐसे विकट लूट तंत्र में जब धूर-प्रागमैटिज्म प्रभावी हो और तीन साल पहले विश्व की सबसे बडी ताकत रह चुकी महाशक्ति का राष्ट्रपति पचास हजार नौकरियों के लिये भारत की यात्रा पर आता हो ?  ऐसे अर्थतंत्र में मिटे-पिटे देश के राष्ट्रपति से अमेरिकी जनता ही क्या होप करे? अमेरिका में असंन्तोष का स्वर बहुत गहरा है।

–शुभमस्तु
राजेश शुक्ला

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