Posted by: Rajesh Shukla | September 13, 2010

पाखण्ड तंत्र


एक जैन पाखण्डी -ऐसे पाखण्डियो की संख्या पूरे देश में चालिस लाख से भी ज्यादा हे

प्रश्न – मूर्तीपूजा कहाँ से चली?

उत्तर -जैनियों से ( हलाँकि भारतीय कला इतिहासकारों ने यह माना है कि यह बौधिस्टों का प्रोपागाण्डा था। उन सबों ने मूर्ती कला का विकास किया ।)

प्रश्न-जैनियों ने कहाँ से चलाई ?
उत्तर -अपनी मूर्खता से
प्रश्न- जैनी कहते हैं शान्त ध्यानावस्था मे बैठी मूर्ती देख के जीव को शुभ परिणाम होवे है
उत्तर- जीव चेतन और मूर्ती जड़ । क्या मूर्ती के सदृश जीव भी जड़ हो जायेगा? यह सिर्फ पाखण्ड मत है जैनियो ने चलाई है।

प्रश्न -शाक्त आदि ने मूर्तियों में जैनियों का अनुकरण नही किया क्योकि जैनियों की  मूर्तीयो के सदृश वैष्णवों की मूर्तीयाँ नही हैं?

उत्तर- हाँ! ठीक है! जो जैनियो के तुल्य बनाते तो जैन मत मे मिल जाते तो जैनियों के विरूद्ध बनाई, क्योकि एक दूसरे का विरोध करना इनका काम है। जैसे जैनों ने मूर्तियाँ , ध्यानावस्थित विरक्त मनुष्य जैसी बनाई , वैसे उनके विरूद्ध वैष्णवो ने यथेष्ट शृंगारित स्त्री राधा सहित रंग राग भोग विषयासक्ति सहिताकार खडी और बैठी हुई बनाई। जैनी बहुत घंटा घरियार  आदि बाजे नहीं बजाते । ये लोग बडा कोलाहल करते हैं। इनकी लीला मे कितने फंसे और बहुत से व्यासादि ऋषियो के नाम से मनमानी असम्भव गाथा युक्त ग्रन्थ बनाये। और फिर ऐसी ऐसी मनमानी लीला करने लगे कि पाषाण की मूर्तियाँ बनाकर गुप्त कही पहाड वा जंगलादि में धर आये वा भूमि में गाड दी। पश्चात् अपने चेलों मे प्रसिद्ध किया कि मुझे रात्रि को स्वप्न में महादेव, पार्वती॰ कृष्ण, हनुमान, राम, लक्ष्मी, भैरव आदि ने कहा है कि हम अमुक अमुक ठिकाने में हैं। हमको वहाँ से ला, मन्दिर स्थापन कर तू हमारा पूजारी होवे तो हम मनोवाँछित फल देवे। जब आँख के अन्धे और गाँठ के पूरे लोगो ने पोपजी की लीला सुनी तब तो सच ही मान ली।  और उनसे पूछा कि ऐसी वह मूर्ती कहाँ है? तब तो पोप जी बोले कि अमुक पहाड वा जंगल में है चलो मेरे साथ दिखला दूँ। तब तो वे उस धूर्त के साथ चल के वहाँ पहूँचकर देखा। आश्चर्य होकर उस पोप के पग गिरकर कहा कि आपके उपर इस देवता की बडी कृपा है। अब आप चलिये हम आपका मन्दिर बनवा देंगे। उसमे देवता की स्थापना कर  आप ही पूजा करना। हमभी इस देवता के दर्शन पर्शन करके मनोवाँछित फल पावेंगे। इस प्रकार  कपटी धूर्त मन्दिर बना लेते हैं मठ बनाकर पोप लीला करते है।

–एकादश समुल्लास (सत्यार्थ प्रकाश)

नोट- ऐसा नही है कि दयानन्द धूर्त नही है यह भी बडा धूर्त था इसे कुल मिलाकर पंथ बनाना था-सारा मोटीवेशन मठ था : मतलब दुकान। सत्य? छोडिये साहब सत्य कहाँ इन्हें मिला। ये सत्य क्या जाने रूढिवादी धार्मिक तोतें हैं एक से बढकर एक चोर और लूटेरे। यह ठीक है कि कुछ पाखन्डियों के पाखण्डो को वे अन्दरूनी तौर पर जानते थे, मठों मे रहे थे इसलिये लिख सके। मैं इस पाखण्डी  दयानन्द पर भी एक लेख जल्दी ही आपके लिये पोस्ट करूंगा।

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