Posted by: Rajesh Shukla | September 10, 2010

ओबामा का राष्ट्रवाद



ऐसा नहीं है कि अब राष्ट्रवाद  अमेरिका में तरलीकृत हो गया है। अमेरिका अपने राष्ट्रवाद के कारण ही इतना महान देश बना था। अमेरिकी राष्ट्रवाद बहुत अलग तरह का राष्ट्रवाद है इसका सदैव एक गहरा सम्बन्ध देश की जनता के आर्थिक विकास से रहा है।  यह एक पूँजीवादी राष्ट्रवाद को लेकर आगे बढता है जब भी इस देश पर आर्थिक मुसीबत का पहाड़ टूटता है इसका राष्ट्रवाद उफान मारने लगता है। अभी हाल में भारत जैसे देश को आउटसोर्स करने पर जो रोक लगाई गई है वह अमेरीकी राष्ट्रवाद का ही एक नमूना है। एक तरफ तो सभी देशो से अमेरीका एक खुली मुक्त अर्थवय्वस्था की गुहार लगाता है, अपने फायदे के लिये तीसरी दुनिया के देशो पर अपनी शर्ते थोपता है तो दूसरी तरफ इस तरह की अनुदार नीतियों को अपने यहाँ लागू करता है।

यदि अमेरीकी जनता को नौकरी नहीं है तो उसकी वजह विदेशी आउटसोर्सिंग करने वाली कम्पनियाँ हैं। इसलिये अमेरिका ने उन कम्पनियों को ही प्रमुखता देने का या टेक्स मे छूट देने की घोषणा की है जो अमेरीका मे रोजगार पैदा करती हों। विदेशी आईटी आउटसोर्सिंग कम्पनियों में रोजगार की कोई सम्भावना नही है। भारत ने अमेरिकी राज्य ओहायो के इस फैसले के खलाफ अपना विरोध जताया है, आनन्द शर्मा का यह कहना कि इससे देश की आई टी पर कोई खास असर नही पडेगा वास्तविकता से आँख मूँदना है। जब देश की ज्यादतर आउटसोर्सिंग कम्पनियाँ इसी पर अपना व्यापार करती है तो इसके असर से कैसे इन्कार किया जा सकता। भारत सरकार ने अपनी नाराजगी जताते हुए हलाँकि कि कहा है कि ओहायो के गवर्नर टेड स्ट्राइकलैंड का यह फैसला जी-20 की बैठक में संरक्षणवाद के खिलाफ किए गए अमेरिका के वादों का उल्लंघन है।

लेकिन इन सब के बावजूद हमें भी अपनी आर्थिक नीतियों मे बदलाव लाने की जरूरत है। यदि चीन तमाम बाहरी कम्पनियों के एकाधिकारवादी रवैय्ये को खतम कर सकता है, उन पर देश की कम्पनियों के हितों में प्रतिबन्ध लगा सकता है तो यह काम भारत भी कर सकता है। गूगल जैसी आई टी क्षेत्र में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर प्रतिबन्ध लगाकर चीन की सरकार देशी सर्च ईंजनो तथा आईटी कम्पनियों के लिये विकास का रास्ता खोला है। यह काम भारत भी कर सकता है जिससे देश की कम्पनिया सामने आ सके। अमेरिका अपने प्रारम्भिक दिनों से ही इस तरह की आर्थिक पाँलिसी को लेकर चला है। अमेरिका में बेरोजगारी की दर करीब 10 फीसदी है। बेरोजगारी की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए अमेरिका में तेजी से आउटसोर्सिंग पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। आँकडों के अनुसार इससे 60 अरब डॉलर के आईटी-बीपीओ इंडस्ट्री को करारा झटका लगा है। भारतीय आउटसोर्सिंग कारोबार काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर करती है और इसकी आमदनी का 61 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है। इस इंडस्ट्री से देश में करीब 30 लाख लोगों को नौकरी मिलती है। इस अमेरीकी प्रतिबन्ध से तीस लाख लोगों के जीवन पर सवालिया निशान है। भारत को भी अपनी आर्थिक नीतियों को एक राष्ट्रवादी स्वरूप देने की जरूरत है।

–राजेश शुक्ला

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