Posted by: Rajesh Shukla | September 4, 2010

रामदान


रामदान का पवित्र मास चल रहा है सारी दुनिया के मुसलमान व्रत में हैं -रोजा रखे हुये है। जिस तरह सूरज अपनी तपिस से धरती को तपा देता है, सुखा देता है उसी तरह एक महीने बिना अन्न जल ग्रहण मुसलमान भी अपनी शरीर को तपाता है जिससे अल्लाह की रहमत की बारिस उस पर होवे। कहते हैं यह वह पवित्र मास हैं जिसमें मुहमम्द साहब स्वयं उपवास रखे हुये थे और बडी पीडा और दर्द में उनपर खुदा की रहमत हुई थी। इसी माह में अर्थात तीस दिन के रामदान में मुहम्मद साहब को कुरान की आयतों का साक्षात्कार हुआ था। एक एक आयतें खुदा की तरफ से उनके हृदय में उतरी थीं। जब जब कोई दिव्य आविर्भाव होता था तो कहा जाता हैं कि मोहम्मद साहब का पुरा बदन निचुड जाता था, तपते तावे सा गर्म हो जाता था और वे कम्बल ओढ कर लेट जाते थे और जब उठते थे  तो उन आयतो का उपदेश करते थे। यह बहुत योगिक मामला कहा जा सकता है बहुत इनआर्गेनिक कहिये।

व्रत का वास्तविक अर्थ तपाना ही है, यह तप है लेकिन सिर्फ शारीरिक तप नहीं है यह मानसिक तप भी है मुसलमान इन पूरे तीस दिनों तक झूठ न बोलने, कोई भी दैहिक मानसिक पाप न करने, कम से कम बोलने और सच बोलने  का व्रत लेता  है, साथ साथ कुछ शुभ संचय भी किया जाता है यानि एक तरह से यह एक पूरा व्रत वे करते हैं जो मोहम्मदसाहव ने किया था। यह उन्हें न केवल यह सीखाता है कि किस तरह बहुत तप के बाद सच हासिल होता है बल्कि उन्हें यह भी सिखलाता हैं कि जिस तरह तुम्हारी रूह भूखी प्यासी तड़पती है उसी तरह भूखा हुआ गरीब भी तडपता है इसलिये गरीबों पर दया करों , उन पर रहम करो, उनकी हर तरह से मदद करो। यह समाज में एक भाईचारे का भाव भरता है, एक दूसरे से जोडता है। मुसलमान मानते हैं कि गरीब और अमीर अल्लाह के बनाये हुये है लेकिन दोनों समान हैं इसलिये धनी को गरींब की उसी तरह खुदा का बन्दा मानकर मदद करनी चाहिये।  इन तीस दिनो में ज्यादा से ज्यादा दान देना तथा ज्यादा से ज्यादा गरीबों की मदद करना उन्हें, अन्न वस्त्र देना कृत्य है।  यह हर तरह से स्वयं को पवित्र करने का पर्व है क्योंकि पवित्र हृदय में ही ईश्वरीय शब्दों का प्रकटन होता है। तीस दिन बाद फिर जश्न का दिन है जब ईद का चाँद देखा जाता है, यह बहुत दुर्लभ खगोलीय परिघटना का क्षण है, जब चाँद तारे को मानों अपने गर्भ में समेटे प्रकट होता है। यह ईस्लाम का सिम्बल बन गया क्योकि यह साल में सिर्फ ईद के दिन ही  दिखता है, यह खगलीय परिघटना कुछ अद्भूत जरूर होगी। मुसलमान इस पवित्र दिन एक दूसरे से गले मिलते है, एक दूसरे को प्रेम और भाईचारे का सन्देश देते हैं इस पूरी धरती को ईश्वरीय बनाते हैं।

ईद के दिन जकात करनें का कुरान का आदेश है इसलिये हर मुसलमान कुछ न कुछ दान जरूर देता है-यह बाध्यता है। जो पडोसी मुसलमान भाई गरीब है उसकी सब मिलकर मदद करते है जिससे वह भी इस ईश्वरीय दिन को खुशी का दिन समझे और अपने जीवन को खुशहाल कर सके। खुदा की रहमत को इस दुनिया में फैलाने का माध्यम व्यक्ति ही है इसलिये व्यक्ति से ही यह आशा की जा सकती है-यदि कुरान आदेश करता है तो इसका भी बडा गहरा अर्थ है। हम ईश्वर के आदेश की अनदेखी करते हैं इसलिये मोहम्मद साहब ने कह दिया कि जो कुरान के आदेशों को नहीं मानता वह मुसलमान ही नही है। इससे एक बाध्यता बनती है कि यदि आप मुसलमान है तो आपको यह करना पडेगा या वह नही करना पडेगा। यदि मुस्लिम समुदाय में एक समुदाय का भाव है, एक एकत्व का भाव है कि सब एक हैं तो उसका श्रेय कुरानिक आदेश को ही है। सभी उससे बंधे है-यह किसी अन्य धर्म में नही मिलता।
ईद पर नजीर की यह  नज्म है-

है आबिदों को ताअतो-तजरीद की खुशी।
और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की खुशी।
रिंद
आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी।
कुछ दिलबरों के वस्‍ल की कुछ दीद की खुशी।
ऐसी न शब्‍बरात न बक़रीद की ख़ुशी।
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी।

–राजेश शुक्ला

 

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