Posted by: Rajesh Shukla | August 26, 2010

वेदान्ता की लूट


कार्पोरेट किस तरह भारत में आपरेट करता है किस तरह बेतरतीब लूटता है किस तरह कानून की धज्जियाँ उडाता है इसकी एक बानगी स्टारलाईट की बेदान्ता नामक कम्पनी के हाल के प्रकरण से पता चलता है। वेदान्ता ने अपना प्रेजेक्ट खडा करने के लिये पूरे ईको-सिस्टम को रौदा डाला, गाँव उजाड डाले, उडीसा के पहाडों के बसने वाली जनजातियों का आस्तित्व खतरे में पड गया। राहुल गाँधी ने आज उडीसा में एक जन सभा को सम्बोधित करते हुये कहा कि यह जनजातीय समाज की एक बडी जीत है जिसे अहिंसक ठंग से जीता गया है। इस मामले में निश्चय ही पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का जिक्र लाजमी है, जिस तरह आनन फानन में उन्होने वेदान्ता को रोका और उस पर कानूनी कार्यवाही करने की बात कही उससे थोडी आशा बंधती है। शायद इधर बीच जम कर हुई काँग्रेस की भर्त्सना नें उन्हें थोडा सचेत किया है।

प्राकृतिक सम्पदा पर जिस तरह इन कार्पोरेटों की गिद्ध दृष्टि है उस पर गम्भीरता से सोचने की जरूरत है। प्राकृतिक सम्पदा का दोहन किस तरह किया जाय इसके लिये व्यापक स्तर पर बहस की जरूरत है। राज्य की सरकारें इसमें ज्यादा महत्वपूर्ण है हर जगह ये सरकारे ही लूट में भागीदार हैं। कर्नाटक के रेड्डी बन्धूओ की लूट में बी जे पी की तात्कालीन सरकार ही जिम्मेदार थी जिसको बगैर किसी निष्कर्ष तक पहूँचाये दफन कर दिया गया। वेदान्ता को ईको सिस्टम को बिना लगाम रौदने की सिफारिश नवीन पटनायक ने की थी जिसे प्रधानमंन्त्री ने ठुकरा दिया। क्या इससे नही लगता कि इसमें करोडों का घपला भी हो रहा है‍ !! यह सरकार की न केवल प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाता है बल्कि यह जनता के साथ भी बहुत बडा विश्वासघात है।  कार्पोरट न केवल प्राकृतिक संसाधनो का दोहन करने को व्यग्र है बल्कि वह बहुत गहरे जनता की जमीन का अधिग्रहण करने को भी बहुत बेताब है। जमीन की लूट भी बहुत बडा मुद्दा है। विकास के नाम पर जनता को जमीन से न केवल कार्पोरेट बल्कि स्वयं सरकारे भी च्यूत कर रही है। जमीन जो कि उन गरींब जनता की कुल पूजी है जिस पर उसका सारा परिवार टिका है उसे जिस तरह से लूटा जा रहा है, जिस तरह उन्हें बगैर कुछ ठोस दिये हुये बेफिक्री से बेदखल किया जा रहा है वह बहुत चिन्ता की बात है। सरकार को विकास के पैमानों को तय करना पडेगा कि किस तरह का सम्बन्ध सरकार मानव जीवन और प्रकृति के बीच चाहती है-सहआस्तित्व का या प्रकृतिहीन आस्तित्व का जो हमें निश्चित ही मृत्यू की तरफ ले जाता है। इको सिस्टम सिर्फ एक अमूर्त प्रकृति तक तो सीमित नही! इसका दायरा बहुत बडा है मानव से लेकर समस्त जीवन जगत इस पर आश्रित है।  पर्यावरण के बावत हम काँमन सेंन्स फिलासफी से नही चल सकते, इसके लिये हमें एक व्यापक पारदर्शी रणनीति की जरूरत है। हमें पूँजीवादी आत्मकेन्द्रित मानवपशु से उपर उठ कर सोचने की जरूरत है। प्रकृति के प्रति हमारा वर्ताव हमारी संस्कृति को भी दर्शाता है कमसे कम हमें भरतीय संस्कृति से ही सीखना चाहिये जिसमें प्रकृति के प्रति गहरा स्नेह मिलता है। इस उद्धरण को देखिये कितना सम्वेदनशील थे हमारे पुरखे!

 

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